Monthly Magzine
Monday 23 Jul 2018

\'अंधेर नगरी’ की मूल संवेदना: सत्ता एवं बाजार का गठजोड़

'अंधेर नगरी’ हिन्दी को 'नयी चाल’ में ढालने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का लोकप्रिय प्रहसन है। 'अंधेर नगरी चौपट राजा’ मूलत: पुरानी लोककथा है, जिसे भारतेंदु ने नयी दृष्टि से व्यंग्यार्थ सम्पन्न बनाया है। भले ही भारतेंदु जी ने इसकी रचना एक दिन में की हो, लेकिन इस छोटे से प्रहसन में उनका पूरा का पूरा समाज अपनी पूरी विषमताओं के साथ मूत्र्त हो उठता है। यह प्रहसन भारतेन्दु युगीन समाज की एक 'रियल फिल्म’ है।

आज  जब हम अपने शासनतंत्र, न्याय व्यवस्था एवं सामाजिक संरचना को 'अंधेर नगरी’ से मिलाते हैं तो बहुत कुछ हूबहू और कहीं-कहीं तो उससे भी आगे बढ़ा हुआ पाते हैं। नैतिक मूल्यों से च्युत होते समाज ने इसकी प्रासंगिकता पूर्ववत बरकार रखी है।

साधारण लोगों को अंग्रेजों एवं सामंतों की काली करतूत से सावधान करने एवं हंसी-हंसी में उनकी कलई खोलने का काम इस प्रहसन द्वारा किया गया है। यह प्रहसन साधारण प्रेक्षक को ध्यान में रखकर लिखा गया है। भारतेन्दु का मानना था कि 'जो बात साधारण लोगों में फैलेगी उसी का प्रचार सार्वदैशिक होगा।‘

उस समय का 'लोक’ जिनके-जिनके व्यवहारों से त्रस्त था एवं जिन प्रवृत्तियों के कारण समाज-गर्त में जा रहा था, उन सब पर चोट करके, भारतेन्दु जी ने लोक के प्रति अपनी चिंता को प्रदर्शित किया है। उनकी यह इच्छा है कि सभी लोग मिलकर, 'महंत’ की तरह बुद्धिमानी से अन्यायी एवं मूर्ख राजा को अपदस्थ कर दें। प्रश्न उठता है कि 'अंधेर नगरी' के माध्यम से भारतेन्दु जी आखिर क्या दिखाना चाहते हैं? जाहिर है कि उनका एकमात्र उद्देश्य गोबरधनदास के 'विदूषकपूर्ण व्यवहार, बाजार की जिह्वा पसंद वस्तुओं एवं व्यसनी राजा की हरकतपूर्ण भाषा के द्वारा सिर्फ  प्रेक्षक का मनोरंजन करना नहीं था। हास्य तो इस प्रहसन का सिर्फ ऊपरी मुलम्मा है। इस प्रहसन में उन्होंने अपने बनाये गए सिद्धान्तों का बखूबी निर्वाह किया है, उन्होंने 'नाटक’ नामक अपने निबन्ध में लिखा है कि 'समाज-संस्कार के नाटकों में देश की कुरीतियों का दिखलाना मुख्य कत्र्तव्य कर्म है।‘

महन्त जी चेलों के साथ भिक्षाटन के लिए प्रस्थान करते हैं। वे जिस नगर के पास पहुँचते हैं, वह 'दूर’ से बड़ा सुन्दर दिखाई देता है। महंत जी भिक्षा लाने के लिए गोबरधनदास को पश्चिम (उपभोक्तावादी दुनिया) की ओर एवं नारायण दास को पूरब की ओर भेजते हैं। यहाँ महन्त, गोबरधनदास तथा नारायणदास सामान्य जनता के प्रतिनिधि है, जो मेहनत-मजदूरी करके जो अन्न पैदा करते हैं, उसे चौपट राजा 'टैक्स’ के रूप में ले लेता है और उनके पास भिक्षा माँगने के सिवा कोई चारा नहीं बचता है। उसी समय के अंग्रेजी विद्वान विलियम हंटर ने यह स्वीकार किया है 'भारत के 4 करोड़ लोगों को अपर्याप्त भोजन पर जीवन बिताने की आदत हो गई है।‘

'अंधेर नगरी’ का 'बाजार-दृश्य’ बाजार का लोकलुभावन और विकृत सच एक साथ दिखाता है। इस बाजार में वस्तुएँ, रूप, यौवन, मूल्य-व्यवस्थाएँ, मर्यादाएँ- सब एक भाव बिक रही हैं। सभी दुकानदार हाँक-शैली का प्रयोग करके छोटी-बड़ी, मूल्यवान-मूल्यहीन, साधारण-असाधारण सभी वस्तुओं में हजार अच्छाइयाँ एवं सबका भाव समान बता रहे हैं। गोबरधनदास की सरल आँखें चौंधिया जाती हैं। वह समझ ही नहीं पाता है कि यह जो 'सेल लगा है 'टके सेर’ का इसमें से क्या-क्या चीजें खरीदूँ? बाजार विवश कर देता है खरीदने के लिए। जब वस्तुएँ सस्ती हो जाती हैं तो व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक खरीदारी करता है, लेकिन बाजार का यह 'फार्मूला’ गोबरधनदास जैसे सामान्य जन की समझ से बाहर था।

बाजार द्वारा फैलाये गये जाल में फंसकर गोबरधनदास भिक्षा में किसी तरह प्राप्त हुए 'सात पैसे’ को वहीं चढ़ा देते हैं। 'गोबरधनदास’, 'ईदगाह’के 'हामिद’ की भाँति बाजार से लड़ नहीं पाता है।

'अंधेर नगरी’ की बाजार में दुकानदार जिन विज्ञापनों का प्रयोग कर रहे हैं, उनमें अंग्रेज शासकों पर, हिंदुस्तान की तात्कालिक जड़ता पर, महाजनों पर एवं जाति व्यवस्था आदि पर करारा व्यंग्य है। धासीराम कहता है-

चना हाकिम सब जो खाते।

सब पर दूना टिकस लगाते।।

यही तो अंधेरगर्दी है हुक्मरानों की, यहाँ का खा भी रहे हैं लेकिन पेट नहीं भर रहा है, रोज के रोज टैक्स बढ़ाते जा रहे हैं। यही दर्द है आम आदमी का क्योंकि सारे करों की मार केवल और केवल उन्हीं पर पडऩी है।

पाचक वाला तो अपने विज्ञापन की पंक्तियों में महाजनों एवं अंग्रेजों की कड़ी खबर लेता है-

चूरन सभी महाजन खाते।

जिससे जमा हजम कर जाते।।

       ----

चूरन साहेब लोग जो खाता।

सारा हिन्द हजम कर जाता।।

उन्नीसवीं सदी के अंत तक महाजन ग्रामीण क्षेत्र का मुख्य अभिशाप तथा ग्रामीण जनता की बढ़ती हुई दरिद्रता का एक महत्वपूर्ण कारण बन गया था। वह जनता पर औने-पौने ढंग से ब्याज लगाकर बहुत धन एकत्रित कर लेता था और निरीह जनता ठगी महसूस करती थी। जनता का आर्थिक शोषण करने में वे अकेले नहीं थे, इस सुनियोजित धंधे में अंगरेज अफसर एवं पुलिस भी उनके साथ थी और सब का अपना-अपना हिस्सा बँटा था। नियम-कानून सिर्फ  जनता को प्रताडि़त करने के माध्यम-भर थे-

चूरन पुलिस वाले खाते।

सब कानून हजम कर जाते।।

इस बाजार में खाने-पीने की वस्तुओं के अलावा, जाति, धर्म एवं प्रतिष्ठा आदि भी बिकती है। जातवाला (ब्राह्मण) बाजार में खुलेआम इन्हें बेच दे रहा है- 'जाते जात, टके सेर जात... लुटाय दिया अनमोल माल। ले टके सेर।‘

बाजार ने ऐसी आँधी चलायी कि सभी लोग उड़ गए। क्रान्तिकारी महन्त ही अपने वजूद को इस घोर संकट में बचा पाया। वह जानता है कि 'ऐसी नगरी में रहना उचित नहीं है, जहाँ टके सेर भाजी और टके ही सेर खाजा हो।‘ गोबरधनदास जो खाने के लिए तरस गया है, वह इस 'टके सेर’ वाली नगरी को छोड़कर नहीं जाना चाहता। वह महन्त से साफ-साफ कह देता है कि 'और जगह दिन भर माँगो तो भी पेट नहीं भरता... सो मैं तो यही रहूँगा।‘

अंधेर नगरी के राजा की राजभाषा तो और भी जनानुकूल नहीं है। राजा तमाम प्रकार के चापलूसों से घिरा हुआ है। वह सुरा-सुंदरी में मस्त है, उसे होश नहीं है कि वह किस काम के लिए राजसिंहासन पर बैठा है। राजसभा में सुख-सुविधा की सारी चीजें आवश्यकता से अधिक मौजूद है।

एक सामान्य नागरिक (फरियादी) राजसभा में किसी तरह न्याय की आस लेकर पहुँचने को पा गया है। उसकी बकरी कल्लू बनिये (धनाढ्य) की दीवार गिरने से दब गई थी। राजा कहता है- 'तुम्हारा न्याव यहाँ ऐसा होगा कि जैसा जम के यहाँ भी न होगा।' भारतेंदु जी यहाँ दिखाते हैं कि यह राजा नहीं यमराज का दूसरा रूप है; यह कब आम लोगों की जिंदगी ले लेगा कोई भरोसा नहीं हैं।

कल्लू बनिया, कारीगर, चूनेवाला, भिश्ती, कसाई, गँडेरिया सब एक-दूसरे के ऊपर अपनी गलती टरकाकर बच जाते हैं। अंत में कोतवाल को फाँसी की सजा हो जाती है, लेकिन वे भी दुबले होने का बहाना बनाकर बच निकलते हैं। जैसा कि हमेशा होता आया है कि बड़े लोग कानून के फंदे से बच निकलते हैं और फंसता है एक सामान्य गरीब आदमी, वैसा ही इस 'केस’ में भी होता है। 'प्यादे’ गोबरधनदास को मोटे होने के जुर्म में फाँसी देने के लिए पकड़ ले जाते हैं। गोबरधनदास की तरह आज भी लोग बिना जुर्म के सलाखों के पीछे ढ़केल दिए जाते हैं।

गोबरधनदास घबरा जाता है। संकट की इस घड़ी में वह गुरुजी का स्मरण करता है। अपने गुरु की युक्ति से गोबरधनदास छूट जाता है और स्वर्ग जाने की लालसा में अंधेर नगरी के चौपट राजा फाँसी लगाकर इस संसार से विदा होते हैं। गुरु जी की टिप्पणी है-

जहाँ न धर्म न बुद्धि नहिं नीति न सुजन समाज।

वे ऐसहि आपुहि नसैं, जैसे चौपट राज।।

चौपट राजाओं का जनता ऐसा ही अंत चाहती है। रामविलास शर्मा ने लिखा है कि ''अंधेर नगरी चौपट राजा’ अंग्रेजी राज्य की अंधेरगर्दी की आलोचना ही नहीं है, वह इस अंधेरगर्दी को खत्म करने के लिए भारतीय जनता की प्रबल इच्छा भी प्रकट करता है।‘ रामस्वरूप चतुर्वेदी इसीलिए इस प्रहसन को 'क्लासिक’ की कोटि में रखते हैं।

अंधेर नगरी की मूल संवेदना परदे के पीछे की इन्हीं सब सच्चाइयों से जुड़ी हुई है। राजा, बनिया-बाजार और छलावे से भरी न्याय प्रणाली कैसे गठबंधन करके अपनी सरकार चलाती है तथा मनुवादी व्यवस्था के ठेकेदार कैसे जाति-धर्म को बेच दे रहे हैं, इन सबको 'साइलेन्टली’ दिखाना और इनसे सावधान करना ही इस प्रहसन का अभीष्ट है।