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Monday 17 Dec 2018

समकालीन हिन्दी काव्य में नमक

नमक’ जीवन का स्वाद है और जरूरत भी । पृथ्वी का तीन-चौथाई भाग नमकीन पानी है। जीवन के इस महत्वपूर्ण घटक की चर्चा साहित्य में न हो असंभव है। पौराणिक युग में नमक की  पूजा का विधान था। अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण, छांदोग्य उपनिषद में नमक का उल्लेख है । वराह पुराण में लवण धेनु का महात्म्य वर्णित है। मत्स्य पुराण में भी लवणाचल की पूजा का विधान है। यूरोप के आदि कवि होमर ने नमक को स्वर्गीय पदार्थ कहकर उसका गुणगान किया है। महान दार्शनिक प्लेटो ने इसे देवताओं का प्रिय पदार्थ कहा है। अरब वाले भी इसको एक दैवीय वस्तु मानते थे। खुदा की कसम की तरह नमक की कसम या नमक हाथों में लेकर कसम खाते थे। हमारे यहां कृतज्ञ को नमक-हलाल और कृतघ्न को नमक-हराम की संज्ञा दी गई है। ऐसे ही न जाने कितने मुहावरे नमक ने हिन्दी साहित्य को प्रदान किए हैं। आधुनिक युग में नमक ने सवर्था नवीन अर्थ ग्रहण किया है।

आदिकाल में सिद्ध कण्हपा ने लिखा है- 'जिमि लोण बिलज्ज्इ पणिएहि, तिमि धरिणी लइ चिश्र।' भक्तिकाल में कबीरदासजी ने भी नमक शब्द का प्रयोग केवल उपमा, रूपक व उत्प्रेक्षा के रूप में ही किया है-

'कबीर गुर गुरवा मिल्या, रलि गया आटैं लौंण'

तुलसीदासजी ने 'हनुमानबाहुक' में नमक शब्द का व्यवहार परोपकार के अर्थ में किया है। हीन, दुर्बल, अनाथ तुलसीदासजी को दयासागर रघुनाथजी ने सनाथ करके स्वभाव से उत्तम फल दिया । जनप्रतिष्ठा पाकर तुलसीदासजी अपने को बड़ा समझने लगे और श्रीरामजी का भजन छोड़ दिया। तब उसके शरीर में भयंकर बरतोर के बहाने रामचंद्रजी का नमक फूट-फूट कर निकलता दिखाई दिया-ताते तनु पेशियत घोर बरतोर मिस,

फूटि-फूटि निकसत लोन रामराय को।

रहीम ने कहा है- खीरा सिर ते काटिए, मलियत नमक बनाय। इस प्रकार आधुनिक काल से पहले हिन्दी काव्य में नमक शब्द का व्यवहार केवल उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि के रूप में ही हुआ है।

सन् 1872 मेें ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल में नमक बनाने का ठेका लिया। धीरे-धीरे ज्यों- ज्यों कंपनी के प्रभुत्व का विस्तार हुआ, त्यों-त्यों वह इस व्यवसाय को अपनी मुट्ठी  में करती गई। तब अन्य किसी को नमक बनाने का अधिकार नहीं रहा। सन् 1834 में तत्कालीन सरकार ने लोना मिट्टी से नमक बनाने पर भी रोक लगा दी थी। किसी देश की आजादी की कहानी में किताबों का योगदान होता हैं, शिक्षकों का योगदान होता हैं। पत्रकारों, वकीलों और क्रांतिकारियों का योगदान होता है, मगर हमारे देश की आजादी में नमक का अनोखा योगदान रहा है। सन् 1930 में गांधीजी के एक मुट्ठी  नमक ने देश की किस्मत ही बदल दिया ।

गांधीवाद ने हिन्दी साहित्य को गहरे तक प्रभावित किया है और आज भी कर रहा है। गांधीजी ने नमक के द्वारा आम लोगों को अपने हक के लिए लडऩे की राह दिखाई। समकालीन हिन्दी काव्य परिदृश्य में नमक के लिए संघर्ष की प्रतिध्वनि और भी ऊँचे स्वर में सुनाई दे रही है। आधुनिक काल से पहले हिन्दी काव्य में नमक शब्द का प्रयोग केवल उपमा, रूपक व उत्प्रेक्षा के रुप में ही हुआ है। नमक शब्द का प्रयोग पूरे अर्थ गाम्भीर्य के साथ समकालीन काव्य में ही हुआ है। समकालीन लोकजीवन और साहित्य में नमक के साथ एक नवीन अर्थ का संश्लेष हुआ है।

आज की नई पीढ़ी के कवियों पर चाहे जितने आक्षेप लगा लें, लेकिन यह बात सभी को माननी पड़ेगी कि शब्दों की खोज के लिए वे परेशान नहीं है, अपितु वे लोकप्रचलित शब्दों में ही नये अर्थ गढ़ रहे हैं। आज के दौर के सबसे चर्चित कवि केदारनाथ सिंह ने नमक को देह के स्वाद के रुप में परिभाषित किया है- किसी से प्यार करना

तो चाहे चले जाना सात समंदर पार

पर भूलना मत

कि तुम्हारी देह ने एक देह का

नमक खाया है। 1

 मानव जाति की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह दुनिया का एकमात्र प्राणी है जो अन्न उपजाता है और भूख से मरता भी है।  जीवन की अनिवार्य मांग है - नमक, जिसके लिए अनादि काल से ही संघर्ष होता आ रहा है। शक्तिशाली शासक-वर्ग ने हमेशा इसे हथियाने का उपक्रम किया है। नमक-सत्याग्रह के माध्यम से गांधीजी ने हमें अन्याय के खिलाफ  खड़ा होना सिखाया है। कवि हेमंत कुकरेती राजनीति के केन्द्र मे बैठे लोगों से स्पष्ट कहते हैं-

हमें शरण देने के नाम पर बहस बाद में करना

अभी तो हमें थोड़ा सा पानी दो

जिसमें ढेर सारा नमक हो।2

नमक सभी के लिए जरूरी है, लेकिन दलितों व आदिवासियों के हिस्से केवल पसीना आता है, नमक नहीं। नमक का लालच देकर उन्हें हमेंशा छला गया है। बस्तर अंचल के कवि त्रिलोक महावर ने अपने काव्य संग्रह 'इतना ही नमक' में बस्तर के आदिवासियों के शोषण, पीड़ा और संघर्ष को उकेरा है। राजा दलपतदेव (1731-1774) के शासनकाल में वहां बंजारों द्वारा वस्तु-विनिमय प्रथा की शुरुआत हुई। साथ ही शुरू हुआ आदिवासियों पर बाहरी लोगों का शोषण-चक्र। बंजारों द्वारा उपलब्ध कराई गई प्रमुख वस्तुएं थी गुड़ और नमक। त्रिलोक महावर जी लिखते हैं-  नोनी / जानना चाहती है / इतनी मेहनत से /  एक पायली चिंरोजी / के बदले / अब भी क्यों मिलेगा / इतना ही नमक। 3

शुरू से ही लोहे के बल पर, नमक पर कब्जा किया जाता रहा है, लेकिन लोहा लेने के लिए नमक भी तो जरूरी है। जीवन के लिए नमक की इसी अनिवार्यता को प्रसिद्ध कवि लीलाधर जगूड़ी ने इन पंक्तियों में व्यक्त किया है-

जब उसने कहा

कि अब सोना नहीं मिलेगा

तो मुझे कोई फर्क नही पड़ा

पर अगर वह कहता

कि अब नमक नहीं मिलेगा

तो शायद मैं रो पड़़ता।4

भारत में सिंधुघाटी सभ्यता के पतन के बाद से समाज में महिलाओं का स्थान निम्न से निम्नतर होता गया है । स्त्रियों को घर के बाहर और घर के अंदर दोनों जगहों में नमक के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। घर में खाने के लिए पुरुषों के पहले कौर उठाने तक स्त्रियों की सांसें अटकी रहती हैं । हिन्दी साहित्य के आदिकाल में स्त्रियों का चित्रण एक वस्तु के रुप मे ही हुआ है । भक्तिकाल में उसे माया, जंजाल, नर्क का द्वार आदि संज्ञाओं से अभिहित किया जाता रहा है। रीतिकाल में तो उसे देह से अधिक समझा ही नहीं गया है। दुनिया के अन्य हिस्सों में भी स्त्रियों की समाज में स्थिति इससे भिन्न नहीं रही है । यूरोप के फ्रांसीसी क्रांति (1789) के बाद पूरे विश्व में स्त्री-जागरुकता का विस्तार होना प्रारंभ हुआ और नारीवादी विचारों को एक नई अभिव्यक्ति मिली। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक रूसी सुधारकों के लिए महिला एक केन्द्रीय मुद्दा बन गया। भारत में खासतौर से बंगाल और महाराष्ट्र में समाज सुधारकों ने महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक दिलाने का प्रयास किया।

वर्तमान समय मे महिलाएं घरों से निकलकर पुरुषों से बराबरी कर रही हैं, पसीना बहा रही हैं । फिर भी उन्हें अपने हिस्से का नमक नहीं मिल पा रहा है । वर्तमान दौर की चर्चित कवयित्री अनामिका ने स्त्रियों की इसी विडंबना को इन पंक्तियों में व्यक्त किया है -

जिनके चेहरे पर नमक है

पूछिए उन औरतों से

कितना भारी पड़ता है उनको

उनके चेहरे का नमक।

युवा कवि अनिल कार्की ने अपनी लंबी कविता 'पहाड़ों पर नमक बोती औरतें' मे कुमाऊं अंचल की आदिवासी स्त्रियों के दु:ख-दर्द को आवाज दी है - उगता है उनका नमक / अपनी ही बरसातों में/ अपने ही एकांत में/ अपनी ही काया में /  अपनी ही ठसक में।5

महान जर्मन दार्शनिक कार्ल माक्र्स ( 1818-1883) ने सामाज में दो वर्गों शोषक और शोषित का अस्तित्व स्वीकार किया है, जिसे उन्होंने  क्रमश: बुर्जुवा और सर्वहारा वर्ग कहा है। बुर्जुवा वर्ग नमक पर अपना एकाधिकार रखना चाहता है और सर्वहारा वर्ग को इससे वंचित रखना चाहता है। समाज की इसी अन्यायपूर्ण व्यवस्था को कवि संजय कुमार शांडिल्य' ने नमक के माध्यम से इंगित किया है-

समुद्र भी एक बड़ा कुआं है

फर्क सिर्फ नमक का है

तुम समुद्र में हो

मैं कुंए में हूं।

वैसे तो नमक पसीने बहने पर ही मिलता है, लेकिन हाल के वर्षों में सत्तासीन वर्ग ने वोट बैंक की खातिर पसीने के इस बहाव को रोका है और लोगों को पसीने बहाए बिना ही नमक बांटने का षड्यंत्र रचा है, ताकि वे आम आदमियों को निकम्मा बना  सके और  लम्बे समय तक सत्ता के शीर्ष पर काबिज रह सके।  नमक जब मुफ्त में मिलने लगता है, तब पसीने का बहना भी बंद हो जाता है और शासकों की मुट्ठियों  में आम लोगों के हिस्से का नमक का भी बंद हो जाता है । समकालीन कवि इन समस्याओं की तह तक जाता है और समाधान ढूंढने की कोशिश भी करता है। प्रसिद्ध कवि नरेश सक्सेना की निम्न कविता में नमक के लिए संघर्ष का स्वर मुखरित हुआ है-

दुनिया के नमक और लोहे में हमारा भी हिस्सा है

तो फिर दुनिया भर में बहते हुए खून और पसीने में

हमारा भी हिस्सा होना चाहिए।6

इन कवियों के अलावा वर्तमान में सक्रिय उन कवियों की एक लंबी सूची है, जिन्होने अपनी कविताओं में नमक शब्द का प्रयोग पूरी अर्थवत्ता के साथ किया है। इनमें एकान्त श्रीवास्तव, उद्भ्रांत, वीरु सोनकर, नीलकमल, गोविंद माथुर ( काव्य संग्रह- नमक की तरह-2014 ) और जितेन्द्र श्रीवास्तव प्रमुख है। कह सकते हैं कि आज का कवि उन लोगों के साथ खड़ा हुआ है, जिन्हें नमक के स्वाद से हमेशा बेदखल किया जाता रहा है । समकालीन हिन्दी काव्य नमक के लिए संघर्ष का काव्य है।

संदर्भ ग्रंथ -

1.सृष्टि पर पहरा - केदारनाथ सिंह, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, संस्करण-2014     

2चांद पर नांव - हेमंत कुकरेती, प्रकाशन-भारतीय ज्ञानपीठ, संस्करण-2003                                 

3.इतना ही नमक - त्रिलोक महावर

4.चुनी हुई कविताएं - लीलाधर जगूड़ी, किताबघर प्रकाशन नई दिल्ली, संस्करण-2008

5.उदास बखतों का रमोलिया( 2015) - अनिल कार्की

6.समुद्र पर हो रही है बारिश - नरेश सक्सेना, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली संस्करण-2001