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Tuesday 11 Dec 2018

प्रस्तावना

सुश्री रमणिका गुप्ता ने लगभग एक वर्ष पूर्व अपनी पत्रिका युद्धरत आम आदमी का एक विशेषांक प्रकाशित किया था। यह अंक ओडिआ भाषा की स्त्री कथाकारों पर केन्द्रित था। इसमें तीन पीढ़ी की लेखिकाओं की लगभग पचास कहानियां संकलित की गई थी। इस उपक्रम से एक ओर ओडिआ भाषा में लिखे जा रहे कथा साहित्य से हिन्दी पाठक परिचित हुए; ओडिआ लेखिकाओं की सामथ्र्य को जाना; तथा भारतीय समाज में औरतों की क्या स्थिति है, उसका भी मार्मिक चित्रण देखने मिला। कहना न होगा कि यह लीक से हटकर एक अभिनव प्रयास था। यह विशेषांक यदि पुस्तक रूप में आ सके तो इसका स्थायी महत्व हो सकेगा। एक दौर था जब हिन्दी की लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न भारतीय भाषाओं की रचनाओं के रूपांतरण नियमित रूप से प्रकाशित होते थे। इन लोकप्रिय पत्रिकाओं का प्रसार व्यापक था और हजारों घरों में परिवार के सदस्य उत्तम साहित्य पढऩे का अवसर पा लेते थे। अब भी अनेक पत्रिकाओं में अनुवाद प्रकाशित तो होते हैं, लेकिन साहित्यप्रेमी समाज तक वे आसानी से नहीं पहुंच पातीं।

जिनका अधिकतर समय साहित्य-साधना में बीतता है, वे निश्चित रूप से हिन्दी ही नहीं, देश-विदेश की अन्य भाषाओं में रचे जा रहे साहित्य का अध्ययन-मनन करते होंगे, किन्तु वे जो इतनी उत्कटता के साथ साहित्य में रुचि नहीं ले पाते, वे पुरानी धारणाओं से ही बंधकर रह जाते हैं। मैं स्वयं अपने को इस दूसरी श्रेणी में रखता हूं। मुझे जब जैसा समय मिलता है अन्य भाषाओं के लिए साहित्य का अनुशीलन करने का प्रयत्न करता हूं, लेकिन वह कभी पर्याप्त नहीं होता। ओडिआ साहित्य  की ही बात करूं तो फकीर मोहन सेनापति, जिन्हें व्यास कवि की उपमा दी गई है, गोपीनाथ महंती, हरेकृष्ण मेहताब, नंदनी सत्पथी, सीताकांत महापात्र, सच्चिदानंद राउत राय, राजेन्द्रकिशोर पंडा, प्रतिभा राय इत्यादि के सीमित अध्ययन के अलावा ओडिआ साहित्य के बारे में मैं बहुत अधिक नहीं जानता।

इस बीच कुछेक समर्थ रचनाकारों से निजी परिचय हुआ जैसे नृसिंह प्रसाद त्रिपाठी, यशोधरा मिश्र, इतिश्री सामंत, प्रभासिनी महाकुल, जापानी इत्यादि। तो इनकी भी कुछ रचनाएं मैंने अवश्य पढ़ी। इस पृष्ठभूमि में युद्धरत आम आदमी के उपरोक्त विशेषांक को पढऩा मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से लाभकारी था। उससे मैंने ज्ञानार्जन किया। अभी कुछ दिन पहले एक निमंत्रण पर 2017 के आखिरी दिन याने 31 दिसंबर को संक्षिप्त प्रवास पर भुवनेश्वर जाने का मौका मिला तो यह मेरे लिए एक आश्वस्तिकारक, आशाजनक और आनंददायक अनुभव सिद्ध हुआ। मेरे मित्र और कथाकार जापानी ने लगभग दो माह पूर्व फोन करके आदेश दिया था कि मुझे 31 दिसंबर को भुवनेश्वर पहुंचना है और इसके लिए भुवनेश्वर साहित्य समाज के अध्यक्ष सूज्र्य मिश्र तुमसे संपर्क करेंगे। मैं उन्हें नहीं कह सका और जब फोन आया तो मैंने तुरंत अपनी सहमति दे दी।

भुवनेश्वर साहित्य समाज  31 दिसंबर को अपना वार्षिक उत्सव मना रहा था। संस्था सृजन सम्मान और शिल्पी सम्मान ऐसे दो पुरस्कार देती है। यह सौभाग्य मुझे मिला कि वरिष्ठ रचनाकार गजानन मिश्र को सृजन सम्मान और चित्रकार बल्देव महारथा को शिल्पी सम्मान अर्पित करूं। इस अवसर पर संस्था द्वारा क्रमश: अंग्रेजी और हिन्दी में अनूदित ओडिआ कविताओं के संकलन वॉयेज और तपती रेत पर हरसिंगार का लोकार्पण भी किया। यह जानकर बेहद अच्छा लगा कि भुवनेश्वर साहित्य समाज ने कहानी और कविता के इस तरह तीन-तीन संकलन प्रकाशित किए हैं। उन्होंने इस तरह एक ओर वर्तमान ओडिआ साहित्य को वैश्विक पटल पर और दूसरी तरफ शेष भारत के समक्ष रखने का महत्वपूर्ण काम किया है।

अब तपती रेत पर हरसिंगार  के बारे में कुछ विस्तार के साथ बात।  मैं ऊहापोह में था कि निमंत्रण स्वीकार तो कर लिया है, ओडिआ साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों के बीच ऐसी क्या बात कहूं जिससे आयोजकों की और स्वयं मेरी लाज बची रहे। मैंने जिन वरेण्य रचनाकारों को पढ़ रखा था उनकी कृतियों को आधार बनाकर वक्तव्य देने का मन बना लिया था, लेकिन इस कविता संग्रह के पन्ने उलट-पुलट कर देखा, तो पूर्व निर्धारित वक्तव्य देने का इरादा छोड़ दिया। संग्रह के सरसरी तौर पर किए अवलोकन ने मुझे स्फूर्ति दी कि कोई नई बात कह सकूं। मुझे मुक्तिबोध जी के ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान वाली कसौटी सहसा स्मरण हो आई और उसे आधार बनाकर मैंने इन कविताओं पर ही अपनी बात केन्द्रित कर दी।

ओडिआ के कवि व व्यंग्यकार राधू मिश्र ने तपती रेत पर हरसिंगार का संपादन किया है। यह समकालीन ओडिआ कविता का संकलन है। इसमें सौ कवियों की कविताएं संकलित हैं। संपादक ने नाम चयन में वरिष्ठ कवि राजेन्द्र किशोर पंडा का मार्गदर्शन लिया है। राधू मिश्र ने भूमिका में उचित ही लिखा  है कि किसी हिन्दीत्तर प्रदेश से प्रकाशित यह संकलन एक अनूठा प्रयास है। ओडिआ देश की छह प्राचीन भाषाओं में से एक है और उसकी गतिशीलता निरंतर बनी हुई है। संपादक ने इसमें उन कवियों को ही लिया है जो 1947 के बाद जन्मे हैं तथा जो कविताएं ली गई हैं वे विगत बीस वर्ष के दौरान ही लिखी गई हैं। एक तरह से यह इक्कीसवीं सदी की कविताओं का संकलन है।

संकलन को तैयार करने में एक मार्गदर्शक रहे प्रोफेसर कुलजीत सिंह की राय भी सटीक है कि यह संकलन ऐसे कवियों के उत्तराधिकारियों का है जो अब नवक्लासिक या नवशास्त्रीय की श्रेणी में शुमार किए जा सकते हैं। ये कवि उस पीढ़ी के हैं जिसने स्वाधीन भारत की खुली हवा में सांस ली इसलिए पराधीन अतीत का कोई बोझ इसके कंधों पर नहीं है।' इसी तरह स्वयं संपादक ने टीका की है कि सदी के नौवें दशक में अतिकल्पना और अतिभावावेग का दामन छोड़कर कविता मनुष्य उसके परिवेश और परिस्थिति को महत्व देने लगी है। इस काल के कवि के पास विचार हंै तो नवव्यवहारिक  प्रतिक्रियाएं भी हैं जो उसके चिंतन और अनुभव की उपज हैं। संपादक का मानना है कि ये कवि पलायनपंथी न होकर अपने समय की वास्तविकता, उसके विद्रूपों से जूझ रहे हैं। वह इसे विस्तार से परिभाषित भी करता है कि इन कविताओं से अमानवीयता का विरोध है, दलित और इतर के प्रति संवेदनशीलता है, नारी मुक्ति का समर्थन है, व्यवस्थापन और पलायन की पीड़ा है, राजनैतिक विसंगति पर चोट है, ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न है, प्रेम अपरिभाषित सा है और कवि प्रचंड रूप से स्वाभिमानी है।

सौ कवियों की सौ कविताएं पढ़ते हुए बारंबार लगता है कि संपादक राधू मिश्र ने कविताओं के चयन में इन तमाम बातों का बखूबी ख्याल रखा है। विश्वास होता है कि यह संकलन समकालीन ओडिआ कविता के निश्चित ही एक प्रतिनिधि और मानक संकलन के रूप में स्वीकार होगा। तपती रेत पर हरसिंगार शीर्षक ही अपने अटपटेपन के  बावजूद बहुत कुछ कहता है। कवि सदैव सुन्दर का स्वप्न देखता है, सुन्दर की रचना करना चाहता है। हरसिंगार उसके कोमल मनोभावों का प्रतीक है, लेकिन तपती रेत जीवन की कठोर झुलसाने वाली वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करती है।

कुमार हसन की कविता है 'जंगल बुक'। इस कविता में गहरे राजनीतिक निहितार्थ हैं। कविता की अंतिम पंक्ति व्यवस्था पर तीखा प्रहार करती है-

पता नहीं, जंगल में/जनतंत्र का मतलब क्या होता है?/ स्वतंत्रता तलाशते लोग / फिलहाल विदेश दौरे पर।

उधर गिरिजाकुमार बलियार सिंह की कविता में सदियों से चले आ रहे आर्थिक शोषण और गैरबराबरी का चित्र इन पंक्तियों में है-

नकली बीज से हाय! भरा है आज तुम्हारा खेत/ धान दिखता नहीं... सिर्फ अगाड़े छांट रहा किसान/ पूंजी के सर उठाने पर रेंगने लगी है मुनाफे की लट/ तुम्हारा यह मजदूर बैठे बांध रहा है मालिक का मचान।

रामकृष्ण साहू संकेतों में अपनी बात कहते हैं। वे जानते हैं कि आज के समय में शब्दों को मूल्यहीन बना दिया गया है और एक तरह से उनकी कविता में प्रभुत्यूश की वेदना प्रतिध्वनित होती है। जब वे कहते हैं-

मैं तुम्हारी ही बातें कहता हूं/ हां हां तुम्हारी ही / वे जो आखिरी पंक्ति में/ सबके पीछे खड़े हैं कुर्सियों के अभाव में/आधे प्रकाश और आधे अंधकार में / क्या पहुंच पा रही उनके पास/ मेरे निरर्थक शब्दों की नीरवता?/

ज्ञानी देवाशीष की कविताओं का शीर्षक है- 'दलित कवि'। वे कोई आडम्बर नहीं रचते और बहुत खरे शब्दों में एक दलित लेखक के मनोभाव व्यक्त करते हैं-

चूल्हे में लकड़ी की भांति जलता है जो जीवन/ उसे कविता बना परोसना होता है/ डाइनिंग टेबल पर/ वे लोग जल रहे हैं इसीलिए तो / हांडी में उबल रहे हैं शब्द/

जैसा कि सब जानते हैं ओडिशा की धरती रत्नगर्भा है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों पर समाज का कोई हक नहीं है। इस पर अमिय पांडव चीख उठते हैं-

मत मारो मां को मेरी/ पहाड़ नहीं नियमगिरि/ मेरी मां है।

तो वहीं अभय नारायण नायक अगली पीढ़ी की चिंता करते हैं-

हमारी बेटियां/अब गा नहीं पाएंगी/भादो महीने में 'करमा' गीत।

गांवों की चिंता अनेक कविताओं में है। बादल महंती विक्षोभ से भरकर कहते हैं-

गांव में सब कुछ ठीक है/ सुनाई नहीं देती कहीं से हा-अन्न की चीख।

तो मनोज कुमार पंडा की कविता में गांव की दारुण परिस्थिति इस तरह व्यक्त हुई है-

मैली निगाह वाले सौदागरों के डर से / छिपा  हुआ है एक गांव।

एक तरफ गांव है, दूसरी तरफ राजधानी। सरोज की दिल्ली शीर्षक कविता बड़े साफ-साफ लफ्जों में कहती है-

दिल्ली पहुंच भी जाओ/ 'दिल्ली' मिलेगी नहीं तुमको।

जबकि प्रीतिधारा सामल की कविता राजधानी से गांव की ओर इन शब्दों में देखती है-

राजधानी से काशीपुर/ दिखाई देता है कैसा?/ सुन्दर युवक के चेहरे पर/ फैल गए सफेद दाग-सा?/ सड़क के किनारे कूड़े से पोलिथीन चुनते/ गैर जरूरी बच्चे-सा?

संकलन में सावित्री कबि अकेली लड़की का गीत लिखती हंै-

सभी के सो जाने के बाद अकेली लड़की/ चुपचाप घर से निकलती है/ सालों पुराने नपे तुले रिश्ते/ पुराने बक्से के भीतर उनकी संभाली हुई पोथी।

तो शुभश्री लेंका की कविता में विज्ञापन की नारी है-

विज्ञापन में न रोने वाली नारी है वह / चिकनी, चुलबुली/सबकी ईष्र्या के कारण बनती/ उसका नहीं है पता मारफत भी नहीं / चतुराई का जाल ले / वह चतुर मछुआरे की भांति/ छटपटाती तृष्णाओं को / अपने जाल में फंसा लेती है।

गायत्री बाला पंडा आज के भारत में बच्चों के भविष्य पर प्रश्न उठाते हुए लिखती हैं-

बच्चे प्रश्न चिन्ह बन जाने पर / क्यों डोल उठता है देश/ तब बच्चे बैठे होते हैं लंबी कतारों में/ खाने के लिए नहीं, ना ही बही-खातों के लिए/ गुडिय़ा-खिलौनों के लिए नहीं/ मांग रहे होते हैं अपनी माटी की मुक्ति/ मांग रहे होते हैं जीने का अधिकार/ मांग रहे होते हैं शांति।

उसी क्रम में दुर्गाप्रसाद पंडा ड्राइंग के पन्नों पर बेटी की धरती का चित्र बनाते हैं-

हां, ड्राइंग की वह चपटी धरती/ आज भी कभी-कभी आती है/ उसके सपने में/ पर बेटी समझ चुकी है/

जिन्दगी इतनी हरी-भरी और आसान नहीं है/ ड्राइंग के पन्नों के बाहर।

अमिय रंजन महापात्र की कविता पुरी जैसे शहर में एक दिन की ये पंक्तियां बेहद मार्मिक हैं-

चूल्हा चख रहा था चावल के उस स्वाद को / जो उस पर उछल-उछल कर गिर रहे थे/ उधर किसी मरीचिका से घड़ा-घड़ा पानी लाकर/ मैं तपन को मिटा रहा था/

उसी तरह रमेश पति की कविता में पुरी और कोणार्क नए संदर्भों के साथ आते हैं-

देश की संपदा को / चंद पूंजीपतियों के हाथों सौंपकर/ गरीबों के खून से महल बनाना / कोई नई बात नहीं है/ लेकिन उन दिनों/ बनाए गए कोणार्क या श्री मंदिर/ संकेत है एक पुरानी जाति का/ जिन मजदूरों के पसीने से / बनकर खड़े हैं ये/ राज कार्यालय/ आज उसी के अंदर/ उनका प्रवेश मना है/

मनुष्य की गरिमा और अस्मिता को हृदयभेदी शब्दों से चित्रित करने वाली दो कविताएं मुझे विशेष उल्लेखनीय जान पड़ती है। श्रीदेब पांवपोश में लिखते हैं-

एक फटे हुए जूट का बोरा पड़ा है/ चौखट पर, पांव पोंछने को/ कितने पांवों का स्पर्श पाता है पांवपोश/ पर अहल्या बनना क्या इतना आसान है/ पत्थर के लिए, इतना अनायास भी नहीं/ एक कविता बनने के लिए कम पड़ जाती है/ कभी-कभी शब्दों की आयु/

वहीं स्वरूप महापात्र जितना ऊपर उठना हो में बरजते हैं-

जितना ऊपर उठना चाहते हो / उठो / कोई मनाही नहीं / लेकिन इतना भर याद रहे / किसी की पीठ पर न पड़े पांव।

यूं तो संकलन की लगभग हर कविता उद्धृत करने योग्य है, लेकिन स्थान सीमित है। पत्रिका के आगामी अंकों में आप ऐसी कुछ कविताएं पढ़ सकेंगे जो मुझे निजी तौर पर प्रभावपूर्ण लगीं।

 तपती रेत पर हरसिंगार

(समकालीन ओडिआ कविताएं)

संपादक- राधु मिश्र

प्रकाशक- भुवनेश्वर साहित्य समाज

पृष्ठ- 242

मूल्य- 350 रुपए