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Thursday 19 Jul 2018

रिश्ते मरुथल की नदी...

आज के मनुष्य का जीवन अनेक संक्रमणों के संघातों से विचलित, हलाकान, एकाकी और असहाय-सा हो गया है। इस स्थिति में उसे मानवीय संवेदना एवं सहानुभूति की ऐसी अपेक्षा है जैसी भरी भीड़ में अनबोलेपन, अजनबीयत तथा उपेक्षा से उपजे अकेलेपन को अपनत्व भरे सरस संबोधन की होती है। इसीलिए समाज की संरचना हुई है जहाँ व्यक्ति का व्यक्ति से संबंध होता है, यह संबंध भारतीय परंपरा में रिश्तों से होता है। आज का समय 'ग्लोबलाजेशन', पूँजीवादी विकास, उपभोक्तावाद, बाजारवाद आदि अनेक जरूरी एवं गैरजरूरी आख्याओं का समय है जहाँ सब कुछ है तो लेकिन हमारे सहज-सरल-प्राकृत मन को सुकून नहीं है। इसी जीवन-रस की शिद्दत से तलाश करते हुए चर्चित गीतकवि योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' के सद्य:प्रकाशित समकालीन गीत-संग्रह ने एक अचूक युक्ति सुझाई है- 'रिश्ते बने रहें'। ये रिश्ते एक बादल-मन जैसे हैं जो अपनी शीतल फुहारों से हमारे बुद्धिवादी नीरस परिवेश को सरस बनाते हैं और पारिस्थितिक तपन को ठंडक पहुँचाते हैं। 'तन के भीतर बसे हुए मन के गाँव' को अपनेपन के रस-सूत्र से बाँधते हैं-

 

'चलो करें/कुछ कोशिश ऐसी/रिश्ते बने रहें

बंद खिड़कियाँ/दरवाजे सब/कमरों के खोलें

हो न सके जो/अपने/आओं हम उनके हो लें

ध्यान रहे/ये पुल कोशिश के/ना अधबने रहें'

 

कभी-कभी लगता है कि चमकीली विकास की आँधी में बाजारू लूटपाट के चलते सारा समाज विशृंखल हो गया है, ऐसा पहले कभी नहीं था। ऐसे में- 'छोटा बच्चा/पूछ रहा है/कल के बारे में' आज के सन्नाटे-भरे कृष्णपक्षीय अंधेरे में 'कौन किसे अब राह दिखाए' यह प्रश्न तनाव से भरे समय-धनुष की तनी हुई प्रत्यंचा की तरह हर चेहरे पर उभर रहा है।

       भारतीय परंपरा में हमारी बहन-बेटियाँ, सामाजिक रिश्तों को बनाने, उन्हें नाम देने का समाजशास्त्रीय उपकरण हैं। इतना ही नहीं, रिश्तों में खुशबू और मिठास इन्हीं के बहाने आती है लेकिन आज की मानसिकता ने संबंधों को 'लेन-देन' तथा 'मतलब' के चलन से जोड़ दिया है। इस त्रासद बेरुखी एवं औपचारिकता तक सीमित हुए रिश्तों के संदर्भ का यह गीत सहृदय के सहज भावनात्मक संवेदन को अँसुवा देता है-

 

'ना पहले जैसा/अपनापन/ना ही प्यार दिखा

 फर्ज कहीं ना दिखा/दिखा तो/बस अधिकार दिखा

चिठ्ठी  ने भी/माँ का हाल/बताना छोड़ दिया

 मुनिया ने/पीहर में/आना-जाना छोड़ दिया'

 

सहृदयों को निहाल करने में सर्वथा समर्थ कवि की अभिव्यक्ति कौशल के नूतन प्रयोग और इनकी ध्वन्यर्थ व्यंजना को उद्घाटित करता संग्रह का एक गीत- 'अपठनीय हस्ताक्षर जैसे' सहज ही पाठक का ध्यान आकर्षित करता है। इस गीत के उपमान शिल्प की दृष्टि से जितने नव्यतर और स्पृहणीय हैं आनुभूतिक स्तर पर उतने ही अन्तर्गर्भी हैं-

 

'अपठनीय हस्ताक्षर/जैसे/कॉलोनी के लोग

ओढ़े हुए/मुखों पर अपने/नकली मुस्कानें

बदलें यहाँ/आधुनिकता की/पल-पल पहचानें

नहीं मिले/संवत्सर जैसे/कॉलोनी के लोग'

 

नए विकास के चमकीले फलक पर बनते-फैलते महानगरों में हमारा अपना नगर, हमारा अपना घर कहीं खो गया है शायद, तभी तो व्योमजी अपने शहर-मुरादाबाद की पीड़ा को 'ढूँढ रहे हम/ पीतलनगरी/महानगर के बीच' गीत में कहने को विवश हो जाते हैं। साथ ही राजनीतिक विद्रूपताओं, दुराचारों, छल-प्रपंचों आदि को भोगते-महसूसते हुए पथरा चुके आम आदमी की भावना को व्यंग्यात्मक गीत के माध्यम से व्याख्यायित किया है कवि ने-

 

'सुना आपने/राजाजी/दौरे पर आएंगे

राजाजी तो/राजाजी हैं/सब कुछ कर लेंगे

अपने मनमोहक/भाषण से/सब दुख हर लेंगे

कैसे पेट भरे/बिन रोटी/यह समझाएंगे'

 

आज के इस बाजारू युग ने हमें नई-नई सुविधाओं के सुख देकर हमारे मन के सच्चे सुकून को छीन लिया है। वर्तमान के मशीनी एवं 'ग्रहक-दूकानदारÓ वाले परिवेश से ऊब-खीझकर जब अतीत की सहजता को हम याद करते हैं तो 'अतीतजीवी'-'पुरातन' की संज्ञा से अभिहित किए जाते हैं, उपेक्षित-से किए जाते हैं लेकिन करें क्या? मानुषी भावनाओं वाला अतीत ही हमारी मानसिकता और रचनाधर्मिता का 'श्रेय' और 'प्रेय' दोनों हैं। परंपरा से, जीवन के हर सुख-दुख को व्यक्त करते शब्दों में जो हार्दिकता का स्पर्श, रस, सुगन्ध आदि समाये रहते थे, वे सब आज की 'इन्फर्मेशन टेक्नोलोजी' के 'टाइप्ड एटीट्यूड' में ढलकर कितने सस्ते, अपनत्वहीन और अन्यथा हो गए हैं, उनमें घर-आँगन की माटी की बात अब कहाँ? व्हाट्सएप पर की गई 'चैटिंग' ने रूबरू होकर 'मिलन-खिलन'की मनभावन परंपरा को समाप्तप्राय कर डाला है। चिठ्ठी -पत्री के शब्दों में लिखने वाले की भावनाएँ उच्छलित और व्यंजित होती थीं, वे अब मशीनी माध्यम में पढ़कर मात्र 'अमिधा' बनकर रह गई हैं जिनमें ध्वन्यर्थ व्यंजना के बिना मरुथली नीरसता आ गई है। प्रस्तुत संग्रह का एक गीत- 'चल रे मनवा' इसी टीस को बयान करता है-

 

'चल रे मनवा/व्हाट्सएप पर/चैटिंग करते हैं

मिलना-जुलना/बतियाना भी/सब कुछ छूट गया

कोई अपना बनकर/अपनों को ही/लूट गया

मरुथल-से होठों पर/चल/अपनापन धरते हैं

 

समकालीन गीतों के इस संग्रह में 'पुरखों की यादें' भी हैं और तन के भीतर बसे हुए मन के गाँव का भावात्मक आनंद भी जो अब केवल सुधियों में ही है और कभी-कभी अश्विन मास की बदरौंखी धूप से संतप्त राही को एक टुकड़े बादल की क्षणिक छाया-सा सुकून दे जाता है। 'तुमको पत्र लिखूँ' गीत के माध्यम से सूचना तकनीक के इस सुपर युग में अपनों को पत्र लिखने की अधूरी ललक भी है जो शब्दों की खुशबुओं की चाहत में खुद ही खुशबू बन गई है और 'माँ को खोना/मतलब/दुनिया-भर को खोना है' व 'जब तक पिता रहे/तब तक ही/घर में रही मिठास' जैसे गीतों के माध्यम से माता-पिता की वत्सली यादों का बोध कराती अभिव्यक्ति भी। 'दिल्ली नहीं रही' गीत में एक साथ गुमशुदगी और शिद्दत भरी तलाश के आलम को उकेरने वाले व्योमजी को इस बात का भी गहरा संताप है कि गाँवों-घरों में 'गौरैया अब नहीं दीखती' परिणामत: खुशियों की खुशबू वाले वो स्वर कहीं खो गए हैं और हम आज की तकनीकी व आडम्बर भरी दुनिया में सुखों की नई परिभाषाएँ पढ़ रहे हैं जबकि उस घर-गौरैया की पीड़ा के ढाई आखर अनपढ़े ही रह गए। इन सब बातों का सहृदय गीतकार को गहरा संताप है।

हिन्दी में इन दिनों गीत-नवगीत की चर्चा, शौकिया और गैरशौकिया दोनों स्तरों पर चालू है।  कुछ मित्रों ने इसे नवांतर गीत की संज्ञा भी दी है किन्तु इस तरह गीत के क्षेत्र में बहुत कुछ 'अप्रिय संदर्भ' तथा अहम्मन्यता के भाव भी जुड़ गए हैं, जो नहीं होने चाहिए। मेरे जैसा नितान्त गँवई और सहज व्यक्ति तो यही जानता है कि भाव-जगत का अतीव संवेदनशील प्राणी 'कवि' अपने समय की विसंगत परिस्थितियों के दबावों एवं परिवेशगत प्रवंचनाओं से बोझिल तथा आहत होकर जब चीखता है, तब कविता बनती है। हर युग की जटिलताओं की अनुभूतियाँ, तत्युगीन अभिव्यक्ति कौशल में ही साधारणीकृत होती हैं, संप्रेषित होती हैं। मनीषी परिभू और स्वयंभू कवि जितनी ही साँसत में सब कुछ सहता है, उतनी ही गहन हार्दिकता के साथ अपनी बात कहता है इसीलिए हर युग की 'सहन' और 'कहन' अलग हो जाती है किन्तु कवि की संवेदनशीलता जो साहित्य का बीज-बिन्दु है, वह तो अपने मूल रूप में 'एवमेव' बना रहता है। सहृदयों तक संप्रेषित और साधारणीकृत होने के लिए रचनाकार अपनी 'भावयित्री' और 'कारयित्री' प्रतिभा का यथोचित उपयोग करता है, यही है गीत-नवगीत की आधार-भूमि। व्योमजी ने भी अपने संग्रह में इसी भाव-भूमि पर अपनी सशक्त अभिव्यक्ति दी है नवगीत के संदर्भ में-

 

'नवगीतों पर/शुरू हुए हैं/फिर से नए विमर्श

संस्मरण हैं/चर्चाएँ हैं/चिन्ताएँ भी हैं

आने वाले/कल की उजली/आशाएँ भी हैं

लगता है/नवगीत बनेंगे/कविता के आदर्श'

 

साररूप में कहा जा सकता है कि योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' का यह समकालीन गीत-संग्रह 'रिश्ते बने रहें' वर्तमान के यथार्थ को मजबूती के साथ अभिव्यक्त करते नवगीतों का ऐसा महत्वपूर्ण संग्रह है जिसकी साहित्य-जगत को, समाज को बहुत आवश्यकता है। अन्त में अपना एक दोहा-

 

'रिश्ते मरुथल की नदी, हरते तपन 'पियास'।

 ये भूगोल 'जुड़ाव' के, नेह भरे इतिहास।।'