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Thursday 19 Jul 2018

नई जमीन से उपजी कहानियाँ

अलिफ लैला, तिलिस्म और राजा-रानी के किस्सों से आगे बढ़कर आज कहानी का स्वरूप बदल गया है। घटना प्रधान कथ्यों से भी आगे बढ़ चुकी है। आज कहानी आम आदमी की दशा-दिशा और मनोविज्ञान पर केन्द्रित हुई है। आम और खास के इस मनोविज्ञान को परखना लेखक का गुण होता है। इस गुण में सफल रहे हैं डा. बी.एस. त्यागी अपने नये संकलन इंसाफ में। डा. बी.एस. त्यागी ऐसे लेखक, समीक्षक और कवि हैं, जिनका अंग्रेजी और हिंदी साहित्य पर समान अधिकार है। उनकी शैक्षिक योग्यता और उनका प्रकाशित अंग्रेजी-हिंदी साहित्य जहाँ महत्त्व रखता है, उससे अधिक महत्वपूर्ण है उनका आम जन से जुडऩा, उसके चरित्र को पढऩा और परखना। डा. त्यागी इस सबके बीच से गुजरकर अपने विचारों और दर्शन को शब्दबद्ध करते हैं। इंसाफ संकलन को पढ़ते हुए यह सब स्पष्ट होता जाता है। संकलन में कुल चौदह कहानियाँ हैं, जिनका अपना अलग-अलग क्षेत्र और अलग-अलग वजूद है। प्रत्येक कहानी नये विषय पर केन्द्रित है। संकलन की पहली कहानी 'भुलक्कड़' जब अपने शीर्ष पर पहुँचती है तो पाठक अवाक् रह जाता है। यह क्या हो गया? भूलने की बीमारी से ग्रस्त विधवा सास संध्या इलाज से जब ठीक होने लगती है तो पुत्रवधु श्रद्धा की चालाकियों से भी त्रस्त होने लगी। कहानी का एक अंश -

''मेरा नाश्ता मेज पर रख देना।''

''ओह अम्मा! अब तो हद हो गई। नाश्ता तो शिशिर के साथ कर लिया था।''

भ्रम की शिकार अम्मा अभी भी भुलक्कड़ मानी जाती रही। श्रद्धा अपनी चालाकियाँ दिखाती रही। अन्त में डाक्टर के पूछने पर कि आप आज सुबह नहीं आयी तो पाँव से जमीन को कुरेदते हुए बोली - ''डाक्टर साहब! मुझे मेरा भुलक्कड़पन लौटा दो।'' अब पाठक पर निर्भर है कि वह अपनी सोच को कितना विस्तार दे पाता है। 1984 के दंगों पर लिखी गयी कहानी 'जलती रात' मनोविज्ञान पर आधारित है। दंगे में लोगों को उकसाने वाला 'वह'सबूतों के अभाव में अदालत से बरी हो जाता है, लेकिन रह-रहकर उसे अपनी भूमिका याद आती रही। उसका जमीर उसे कोसता रहा। उसे अपने कृत्य याद आते रहे। उसकी दबी आत्मा स्वीकार कर रही थी कि वह कठोरतम सजा का हकदार है। आत्मा का बोझ हल्का करने और स्वाभिमान से जीने के लिए उसे अपना अपराध अदालत में जाकर स्वीकार कर लेना चाहिए। इस ऊहापोह में अपराध भाव के साथ उधेड़बुन उसके दिमाग में होती रही और ''फिर खामोशी छा गयी।''

खत: एक, दो, तीन खत होते हुए भी अपने आप में संवेदनाओं से परिपूर्ण संपूर्ण कहानियाँ हैं। पारिवारिक पृष्ठभूमि, मार्मिक कथ्य लिये इन खतों को पढ़कर शायद ही कोई पाठक हो, जिसकी आँखें नम न हो जाएँ। परदेस गये बेटे को लिखे माँ के खत की अंतिम कुछ पंक्तियाँ पाठक को किस मर्म तक पहुँचाती हैं, एक बानगी - ''बेटा! एक बात और है, जिसने मेरी नींद हराम कर रखी है। धीरे से कहे देती हूँ। तेरी बहन सयानी हो चली है। गली-मोहल्ले के लड़के भेडिय़े की तरह घूरते हैं। घर से बाहर भेजते डर लगता है। जब तक स्कूल से घर नहीं आ जाती, दरवाजे पर ही खड़ी रहती हूँ। बेटा इसका ख्याल रखना। थोड़े लिखे को ज्यादा समझना।'' एक और बानगी जो बहन द्वारा भाई को लिखे गये खत में है - ''श्यामा बछड़ी ने आज पिता जी के कमरे की ओर देखा और सोचती रही कि मेरा दूध क्यों नहीं निकाला। पिता जी के कमरे की ओर कातर दृष्टि से देखती रही। इस बीच उसकी छह माह की बछिया खुल गयी। उसे भी लगाया नहीं। पिता जी की अरथी उठते समय इतने जोर से रँभाई और रस्सी तोड़ दी कि लोग सहम गये।'' पशुओं में भी संवेदना होती है और कितनी होती है, साक्षात् मार्मिक उदाहरण है। खत-तीन में प्रवासी भारतीय परिवार जिससे मोंटू का परिचय हुआ और मोंटू सारा पलटू को बहन मानने लगा। इस बहन सारा की ओर से लिखे गये खत की अंतिम पंक्तियाँ - ''मोंटू की अंतिम इच्छा पूरी करना चाहती हूँ। अपने भाई की आत्मा को शांति देना चाहती हूँ। बहन, तुम ही बताओ मैं क्या करूँ? अस्थिकलश लेकर खुद आऊँ या तुम्हारे पास भेज दूँ।'' भाई-बहन का संबंध ही ऐसा है, जो संवेदनाओ को जाग्रत करता है। इसमें लेखक सफल है।

'ओवरकोट' अपने आप में ऐसा मनोविज्ञान है, जिसे  साधारण पाठक सहज रूप से पकड़ नहीं पाता और पकड़ पाता है तो फिर कहानी, उस मनोविज्ञान का भरपूर आनंद उठाता है। अजीब प्लॉट पर कहानी का खाका तैयार किया गया है। निश्चल अपनी पत्नी निशा की मर्जी पर उसके प्रेमी अरविंद के साथ शादी करा देता है और कानपुर लौट आता है। शादी के दस साल बाद अरविन्द का दुनिया से चले जाना और उसके भी लंबे समय बाद बुढ़ापे की दहलीज पर आकर दोनों का कंपनी बाग में मिलना, देर तक बैठे रहना, एक-दूसरे के चेहरों की झुर्रियों में कुछ तलाशना, कॉफी पीना और निश्चल का उसी तरह ओवरकोट उसके कंधों पर डालना, जिसे कभी निश्चल के साथ हुई शादी के बाद पहनने से उसने मना कर दिया था, वही 'ओवरकोट' आज फिर कंधों पर था। ''पार्क में बैठे बातें कर रहे थे। अचानक ठंडी हवा के साथ बर्फ पडऩे लगी। अब मुझे गलती का आभास हुआ। मैं ठंड से काँपने लगी। तभी वह खड़ा हुआ और अपना ओवरकोट मेरे कंधों पर प्यार से डालकर मेरा हाथ पकड़कर चल दिया - 'तुम फिक्र मत करो।'' फ्लैशबैक में कहानी का ताना-बाना बुना गया है। गरीबों और अछूत, नीच कही जाने वाली जातियों पर सवर्ण मानसिकता के लोगों द्वारा किये जा रहे शारीरिक और मानसिक अत्याचार की कहानी है 'हैडमास्टर साहब'। सवर्णों की घृणित मानसिकता और कृत्य, अनाचार और कदाचार की ओर इस कहानी में इंगित किया गया है, जिसे किसी न किसी रूप में निम्न जाति के कहे जाने वाले ये लोग आज भी झेल रहे हैं। अदालतों में इंसाफ नहीं होता, इंसाफ बिकता है। इस विडंबना को कहानी का नायक नरेश ही नहीं, न जाने कितने लोग भोग रहे हैं। कहानी का अंत ऐसा कि शॉक लगा हो - ''मैंने अपना घर, जमीन गिरवी रखकर आपको रुपये दिये हैं।'' इससे पहले कि जज साहब कुछ बोलते, नरेश ने रिवाल्वर निकालकर कनपटी पर रख दिया। ''पैसे वापस करो, नहीं तो...।''  जहाँ 'संग्रहालय' सामान्य श्रेणी में आती है, वहीं 'फैसला' बदलते समाज, बदलती विचारधारा और सच को स्वीकार्यता प्रदान करने वाली कहानी है। लेखक इस कहानी में सामाजिक समरसता पैदा करने में सफल रहा है। आधुनिकतम विषय और संदर्भों को लेकर लिखी गयी कहानी है 'हत्यारा'। कहानी का अंतिम पैरा इतना सशक्त, जिसे पढ़कर संपूर्ण कहानी पाठक के दिलो-दिमाग तक पहुँच जाती है- ''जज साहब! आज पूरा  समाज भयभीत है, और जो भयभीत नहीं, समाज उसकी बात नहीं सुनना चाहता। अपितु उसकी आवाज को लोग दबा देते हैं। जिसके नाम की आड़ में यह सब कुछ चल रहा है, उसे लोग सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान कहते हैं। मैं भी ऐसा ही समझता था। जज साहब! मैं आपको एक पते की बात बता दूँ, यह इन लोगों का बहुत बड़ा भ्रम है। मैंने एक ही वार में उसका काम तमाम कर दिया।'' भगवान का भय दिखाकर भ्रम में रिश्ता कायम कराने वाले आधुनिक भगवान आज अपने सही स्थान पर पहुँच चुके हैं। कुछ हैं, जिनके पहुँचने की प्रतीक्षा की जा रही है। भ्रमित अज्ञानी भक्तों और तथाकथित भगवानों की परिधि में घूमती कहानी है। यदि इस कहानी को मैंने लिखा होता तो इसे 'मसीहा' नाम दिया जाता। लेकिन अंधभक्तों के बीच तो वह हत्यारा ही है। भावों की प्रधानता और प्यार की चरम सीमा को छूती कहानी है 'समर्पण'। जिसे पढ़कर पाठक अवश्य ही भावुक होता है। तिलकराम नहीं चाहता कि जिंदगी भर की सहेजी हुई वस्तुओं और कठोर परिश्रम से पैदा की गयी जमीन का उसके चारों बेटों के बीच बँटवारा हो। लोगों द्वारा उससे कहा गया - ''बँटवारा कोई नयी चीज नहीं है। राजा-महाराजाओं के जमाने से होता आया है।'' बड़ा बेटा जो पढ़-लिखकर शहर नौकरी पर चला गया, वह शहर का ही होकर रह गया। बाप के बार-बार कहने पर भी वह गाँव नहीं जा सका। वह सतीश पिता के दुख को देखकर/महसूस कर अंतद्र्वंद्व में जीता रहा। ''मैं घर और गाँव से कितनी दूर हो गया। कितनी दूर चला आया उन खेत और खलिहानों से, जहाँ बचपन बीता, चलना और दौडऩा सीखा, उस पिता से जिसने मेरे ऊपर कभी धूप नहीं आने दी। कितना स्वार्थी हो गया हूँ मैं। पिछले दो सालों से घर नहीं गया। जीवन केवल बच्चों और पत्नी तक सिमटकर रह गया। माँ बीमार थी तो एक बार भी देखने नहीं गया। इन दिनों पिता जी से एक बार भी नहीं पूछा कि कहीं कोई आर्थिक तंगी तो  नहीं। पेट पट्टी बाँधकर पढ़ाया था मुझे। यह नौकरी भी रिश्वत देकर मिली थी।  कभी नहीं पूछा कि वह कर्ज वापस गया कि नहीं।'' ग्रामीण परिवेश की दशा और हालात का कारुणिक चिंतन है यह कहानी 'बँटवारा।'

'कैम्पस' वैचारिक धरातल पर अतीत की स्मृतियों को उजागर करती कहानी है। देवयानी विद्यार्थी-काल की स्मृतियों को लेकर कैम्पस देखने की चाह में यात्रा करती है। अतीत के अनेक चित्र और चेहरे उसकी स्मृतियों में तैरने लगते हैं। टी.ई.टी. के रूप में अनिमेष से उसकी मुलाकात होना भी उसकी स्मृति का सदृश भाग है। कहानी पाठक में मनोविज्ञान को जाग्रत करती है। लेखक की भाषा सहज-सरल है। क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ। शब्दों का सटीक प्रयोग हुआ है। भाषा की सहजता, अलंकारों और मुहावरों का प्रयोग भी पुस्तक में मिलता है। मर्मस्पर्शी भाव और भाषा की सहजता संकलन को पठनीयता प्रदान करता हैं। यथा - ''लालटेन भी थक गयी जलते-जलते।'' (पृ. 29) ''उसकी आँखें पेड़ों के उस पार दूर देखने लगीं, जैसे कोई भूला-बिसरा याद आ रहा हो।'' (पृ. 41) ''मुखिया जी! अगर इन चमारों के लड़के पढऩे-लिखने लगे तो आपके खेतों में काम कौन करेगा?'' (पृ. 59) ''बाग-बगीचों में मोर-मोरनियों की सुरीली आवाज ने दिन ढलने की घोषणा कर दी।'' (पृ. 60) ''चेहरे पर गुलाबी मुस्कान उभर आयी।'' (पृ. 79) ''वहाँ उसका बचपन बीता। यौवन की दहलीज पर कदम रखा और पहली बार लाल होते गालों को महसूस किया।'' (पृ. 120)

सूत्रों को कथा में जोडऩे का कौशल और कहानी में नये धरातल की तलाश, लेखक की परिपक्व बौद्धिकता और चिंतन को प्रदर्शित करते हैं। बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित होने पर भी पुस्तक में यत्र-तत्र शाब्दिक अशुद्धियाँ देखने में आयीं, यह प्रकाशकीय दोष है, लेखक इससे बरी है। संकलन हिंदी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान पाएगा, ऐसी आशा है।