Monthly Magzine
Thursday 19 Jul 2018

हिन्दी कविता का व्यापक रूप: दूसरी हिन्दी

सुश्री निर्मला गर्ग जानी-मानी जनपक्षधर कवयित्री हैं। उन्होंने सामाजिक गतिकी को वर्गीय दृटि से देखा परखा है और उसे अपनी कविताओं में रचा है। फिलहाल, उनके द्वारा सम्पादित कविता-संकलन दूसरी हिन्दी मेरे सामने है, जो 2017 में प्रकाशित हुआ है। इसमें हिन्दी के उन कवियों और कवयित्रियों की एकाधिक कविताएँ संकलित की गई हैं, जो हिन्दी कविता के केन्द्र में नहीं हैं। आलोचना के क्षेत्र में अलक्षित हैं। इसलिए सम्पादिका ने उन्हें और उनकी रचनाशीलता को प्रकाश में लाने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। संकलित रचनाकारों में  कुछ मुस्लिम, दलित, आदिवासी, ईसाई सम्प्रदाय से हैं। इसके अलावा कुछ पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों से हैं। इन रचनाकारों में युवाओं के साथ वृद्ध भी शामिल हैं और बौद्ध भिक्षुक भी। हिन्दीभाषी राज्यों के अनेक सम्भावनाशील रचनाकारों के समावेश से यह संकलन सम्पूर्ण भारत के हिन्दी भाषी लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाला है। ऐसे संकलन हिन्दी में बहुत कम हैं।

संकलन का शीर्षक चौंकानेवाला है। दूसरी हिन्दी का क्या मतलब है। सम्पादिका के अनुसार दूसरी हिन्दी हाशिए की हिन्दी है, जो ब्राह्मणवादी हिन्दी से अलग है। ऐसी हिन्दी जो तत्समता के आभिजत्य से मुक्त है । दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि संकलन की दूसरी हिन्दी उन कवियों की हिन्दी से अलग है जो सत्ता-समर्थक होते हैं। आधुनिक हिन्दी कविता में निराला ने अपनी परवर्ती कविताओं में ऐसी हिन्दी का सुचारू प्रयोग किया है, जिसे केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, मानबहादुर सिंह जैसे अनेक लोकधर्मी कवियों ने अपने-अपने ढंग से प्रयुक्त किया है ।

दूसरी हिन्दी की कविताएँ पढ़ते हुए सहृदय पाठक महसूस करता है कि आज का विवेकशील रचनाकार ऐसे समाज का सपना बुन रहा है, जो धर्म की जकड़बन्दी से मुक्त हो। जात-पाँत के बन्धनों से दूर हो। नारी-उत्पीडऩ से आजाद हो। उसमें पूँजी का वर्चस्व न हो । भ्रष्ट राजनीति का बोलबाला न हो । अत: प्रत्येक रचनाकार अपनी समझ के अनुसार प्रगति-विरोधी नीतियों की निर्मम आलोचना करता है।

सुश्री अफसाना हयात आज के मर्दवादी महौल की तीखी आलोचना करती हुई कहतीं है कि कोई औरत मुसलमान हो ही नहीं सकती। क्योंकि उसके एक नहीं अनेक खुदा हैं। पहला खुदा उसका बाप है । उसकी मर्जी के बिना उसका जन्म असम्भव है। दूसरा खुदा उसका भाई है। तीसरा उसका शौहर है। चौथा उसका बेटा है। वह परिवार मेंं इन सब के अधीन है। साथ ही साथ रीति-रिवाजों और लोक लाजों के अधीन भी। इसलिए वह कहती हैं -मैं औरत हूँ, मेरे कई खुदा हैं/मैं मुसलमान नहीं हो सकती हूँ। (पृ. 26) इस कविता के बोल रूढि़वादी लोगों के दिलों पर गोली जैसी चोट करते हैं। ऐसी चोट से वे तिलमिला सकते हैं क्योंकि आजकल भारतीय समाज का ऐसा ही परिदृश्य है। लोगों के दिल-दिमाग पर कट्टरपन हावी हो रहा है। कोई भी समझदार व्यक्ति यदि वर्तमान पितृसत्ता, धर्मसत्ता, राज-सत्ता, पूंजीसत्ता के खिलाफ  बोलता है तो उसे प्रताडि़त किया जाता है। अथवा मौत के घाट उतार दिया जाता है। अथवा उसे गद्दार घोषित कर दिया जाता है। अफसाना हयात की उपर्युक्त कविता बदली हुई जीवन-दृष्टि से ही समझी जा सकती है ।

सुश्री प्रीति भी रूढिग़्रस्त धार्मिक मान्यताओं को नकारते हुए अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए अग्नि परीक्षा को अस्वीकारती हैं । वह पुरूष-सत्ता और धर्म-सत्ता से पूछती हैं-कौन हो तुम/ किसने दिया तुम्हें यह अधिकार/ तुम्हारी पवित्रता क्या है। (पृ. 176) आज की स्वाधीन नारी अपने वजूद की रक्षा के लिए लगातार रचनात्मक संघर्ष कर रही है-हर बार सिखाया उसे/ उसकी वर्जनाओं का पाठ/ पर मानी नहीं वह / उस निषिद्ध कर्म को/ क्योंकि प्रिय थी उसे, स्वतन्त्रता अपनी। (पृ.  177)

यही वजह है कि सुश्री प्रियंका सोनकर मीराबाई को याद करती हुई कहती हैं कि प्रेम करौं तो मारन धावैं। यह पढ़कर कबीर याद आने लगते हैं। उन्होंने कहा था कि सांच कहौं तौ मारन धावैं/झूठे जग पतियाना। कबीर और मीरा से प्रेरणा लेकर प्रियंका सोनकर खाप पंचायतों, ऑनर किलिंग, लव जेहाद का तीखा विरोध करती हैं। क्योंकि इनके नाम पर ही बर्बाद और बेनाम होती युवा पीढिय़ाँ/ गुम नाम कर दी जाती हैं / परम्परा और संस्कृति के बीहड़ जंगल में।(पृ. 179)

आज भारतीय समाज को रूढिग़्रस्त परम्पराओं और संस्कारों के नाम पर अतीत की ओर ढकेला जा रहा है। इतिहास गति हमेशा आगे की ओर रही है। परन्तु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद उसे रोक रहा है। यही कारण है कि समाज में नारी के प्रति समरसता वाली जीवन दृष्टि विकसित नहीं हो रही है। नारी को प्रतिदिन अपमानित किया जा रहा है। विरोध में बोलने पर उसे मौत का शिकार बनाया जा रहा है। समाज में उसे बराबरी का दर्जा हासिल नहीं है। अतएव प्रियंका सोनकर का कहना ठीक है-वर्णमालाओं और अक्षरों का ज्ञान/ दिलाएगा निजात तुम्हें। इस जिल्लत भरी जिन्दगी से/ कि पढ़ो और आगे बढ़ो। (पृ.182) यह उद्बोधन भारत की उस असंख्य अनपढ़ नारियों को है, जिन पर हमारे नारी विमर्शकार कम ध्यान दे रहे हैं।

वयोवृद्ध कवयित्री उषाकिरण आत्राम भी नारी-गौरव का समर्थन करती हैं। और उसके द्वारा किए गए प्रतिरोध का भी वह अपने नारी चरित्र रानी से कहती हैं-बाजार जाओगी तो/ परदेसी बाबू की नजर / तेरे ऊपर लगेगी / इसलिए तू रातराणी मत बन/ होना हो तो पलाश की लाल अंगार हो। (पृ. 65) यहाँ पलाश की लाल अंगार प्रतिरोधमूलक बिम्ब है, जो पाठक के मानस को आन्दोलित करता है। इसी प्रकार सुश्री प्रवीण बसन्ती खेस्स भी अपने आदिवासी भाई-बहनों को अपने शोषण-उत्पीडऩ के विरूद्ध जगाती हैं। और आदिवासियों के नायक बिरसा मुंडा का स्मरण भी कराती हैं। तात्पर्य यह है कि आदिवासियों को अपनी स्वाधीनता के लिए बिरसा मुंडा के समान लगातार प्रतिरोध करना होगा। उनका कहना ठीक है कि आदिवासी अपना उलगुलान जारी रखें। 

आजकल भारतीय समाज में साम्प्रदायिकता का जहर चारों ओर फैला हुआ है। अल्पसंख्यकों को अपमानित किया जा रहा है। गोरक्षा के नाम पर उन्हें प्रताडि़त किया जा रहा है। यह ठीक है कि इस्लाम के नाम पर फैला हुआ आतंकवाद पूरे देश को आग से झुलसा  रहा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत के हरेक मुसलमान को शक की निगाह से देखा जाए। उसकी देशभक्ति पर उँगली उठाई जाए। इतिहास गवाह है कि भारतीय संस्कृति के विकास में मुसलमानों का भी उल्लेखनीय योगदान रहा है। यदि मलिक मोहम्मद जायसी का पद्मावत दोहा और चौपाई में नहीं होता तो रामचरितमानस भी हमारे पास नहीं होता। यह इतिहास का कैसा मजाक है कि आज हम मुसलमानों के योगदान को दिल से नहीं स्वीकार कर रहे हैंं। शायद यही कारण है कि शाकिर अली जैसे संवेदनशील कवि ने मीडिया और मुसलमान शीर्षक रचना से मीडिया के चरित्र के आगे प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दिया है। उनका कहना है कि कोई शानी अगर / किसी देवी प्रसाद की कविता की / कुछ पंक्तियों पर ऐतराज उठाये तो/ उसे संाप्रदायिक नजरिये का शिकार माना जाएगाा/ और उसके तर्कों को उसी के मुँह पर/ कालिख की तरह मलकर /उसका नाम भी टेक्स्ट बुकों / आलोचना की पुस्तकों से मिटा दिया जाएगा/ ऐसा ही राही मासूम रजा के साथ होगा/ और अब्दुल बिस्मिल्लाह/ मंजूर एहतेशाम के साथ भी। (पृ. 263)

टीवी चैनलों पर होनेवाली बहसों में मुस्लिम समाज की रूढिय़ों की तीखी आलोचना की जाती है, लेकिन उनके रचनात्मक योगदान की चर्चा न के बराबर होती है। मीडिया के इस व्यवहार से लोगों में गलत सन्देश पहुंचता है ।

दूसरी हिन्दी में संकलित रचनाकारों की रचनाएँ इस बात की साक्षी हैं कि वे भारतीय समाज में फैली विषमताओं, विफलताअंों, अन्यायों, अत्याचारों, भ्रष्टाचारों, धार्मिक पाखण्डों आदि का पुरजोर विरोध करती हैं। इस सन्दर्भ में अमरजीत कौंके की शिला, अनवर सुहैल की मैं उन बर्बरों में से नहीं, फिर काहे की दूरियाँ, अनवर शमीम की काठ का राजा, पत्थर होने से बच जाऊँगा, अरबाज खान की मस्जिद के भीतर बच्चे, असलम हसन की कोलकाता, अजेय की एक बुद्ध कविता में करूणा ढूँढ रहा है, डा.ओमलता शाक्य की संस्कारों की बेडिय़ाँ, ओ मेरे किसान, किशन लाल की एक पल के लिए, खुदेजा की बात बने, ग्रेस कुजूर की पानी ढोती औरत, गुरमीत बेदी की धर्म, गुलरेज शहजाद की रात दरिया, गणेश गनी की संसद के अहाते में नहीं उगती फसलें, जसवीर चावला की सरबजीत, तबस्सुम जहाँ की ये पत्तियाँ, निदा नवाज की विद्रोह, एहतिजाज का पोस्टर, नासिर अहमद सिकन्दर की चिमटा, मनीषा जैन की कुछ तो ऐसा करो, मुन्ना साह की असहिष्णुता, लाल सिंह दिल की वेश्या औरतें, हमारे लिए, शाहनाज इमरानी की मेरे देश में, सुनीता की मेरे गाँव की औरतें, होना चाहती हूँ आजाद शीर्षक रचनाएँ पठनीय और विचारणीय हैं।

आज का रचनाकार इतना जागरूक है कि वह भारत की भ्रष्ट राजनीति की तीखी आलोचना करने से नहीं चूकता है। इसका कारण यह है कि भारत के लोकतंत्र में अपराध का राजनीतिकरण हो चुका है और राजनीति का अपराधीकरण। यह प्रवृत्ति बहुत खतरनाक हो चुकी है। इसलिए शाहनाज इमरानी ने ठीक कहा है-पहले से ज्यादा  होते हैं/ खून, बलात्कार, हिंस्सा, अन्याय, अत्याचार / देश में आज भी राष्ट्र से पहले धर्म आता है/ मेरे देश की प्रजा तो पीछे रह गई और/ तंत्र बुलेटप्रूफ  कारों में आगे निकल गया। (पृ. 254,255) कहने की आवश्यकता नहीं कि धर्मसत्ता और राजसत्ता के गठजोड़ ने अन्याय-अत्याचार-दुराचार को बढ़ावा दिया है और राजनीति अपराधियों की आरामगाह बन गई है। हमारे देश के लोकतंत्र में लोग तो बेरोजगारी-बीमारी-भुखमरी-तबाही से रात दिन पीडि़त हो रहे हैं। परन्तु तंत्र जीवन के सारे सुख आराम से भोग रहा है।

इस संकलन के सभी रचनाकार अपनी-अपनी रचनाशीलता से अपने देश के साधारण जनों और उनके परिवेश से रागात्मक सम्बन्ध जोड़े हुए हैं। यही कारण है कि उनकी कविताओं में अपने त्रासद वर्तमान की अनेक चिन्ताएँ अनायास व्यक्त हुई हैं। गणेश गनी आज के नेताओं की श्रमहीनता पर तंज करते हुए कहते हैं कि संसद के अहाते में फसलें नहीं उगती है। वह धूमिल के समान किसानों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हैं और प्रतिरोध की आग जरूरी समझते हैं। क्योंकि-आज शब्दों पर/प्रहार हो रहे हैं/ शब्द टूट रहे हैं / मृत हो रहे हैं / वे संवाद नहीं कर सकते / आज उन पर/ धारा 144 लगी है। (पृ.104) मतलब साफ  है कि राजसत्ता बोलने की आवाज पर अंकुश लगा रही है। जानी-मानी महिला पत्रकार गौरी लंकेश ने अपनी निर्भीक बोलियों के बदले सात गोलियाँ खाईं। क्या विवेक से युक्तविरोध को दबाना ही सच्चा लोकतंत्र है। नहीं, कदापि नहीं। लोकतंत्र की सफलता के लिए शक्तिशाली विपक्ष की आवाज जरूरी है।  लेकिन आजकल ऐसा नहीं हो रहा है। धर्म की आड़ लेकर अधोगामी रूढिय़ों का समर्थन किया जा रहा है। लोगों ने धर्म का सर्व समावेशी मतलब भुला दिया है। तुलसी ने स्पष्ट कहा है-परहित सरिस धरम नहिं भाई/ पर पीड़ा सम नहिं अधमाई। कहने की जरूरत नहीं कि इस संकलन के सभी रचनाकार ऐसे ही धर्म के समर्थक हैं, जो दीनों और दलितों के प्रति हार्दिक संवेदना व्यक्त करता है। यह संकलन पंजाबी भाषा के क्रांतिकारी कवि लाल सिंह दिल को समर्पित किया गया है। उनकी नौ अनूदित कविताएँ शामिल हैं। दलित चेतना के प्रसिद्ध कवि लाल सिंह दिल ने वेश्याओं के प्रति हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हुए ठीक लिखा है-दोस्तों/ मरजी जितना घिनौना आप मुझे समझो/ ये वेश्या औरतें, लड़कियाँ/ मेरी माँएँ, बहनें और बेटियाँ हैं/ और आपकी भी/ ये गाएँ पूजने वाले हिन्दुस्तान की/ माँएँ, बहनें और बेटियाँ हैं/ ये बड़े सरमायेदारों की/ माँएँ, बहनें और बेटियाँ हैं /यदि नहीं/ तो ये आने वाले इंकलाब की/ माँएँ बहनें और बेटियाँ हैं।(पृ. 231)

उपर्युक्त कविता में वेश्या औरतों के प्रति जो संवेदना व्यक्त है, उसका परिप्रेक्ष्य बहुत व्यापक है । इतने व्यापक रूप में वेश्याओं के प्रति कम विचार किया गया है। कहने की जरूरत नहीं की वेश्याएं इस पूंजीवादी क्रूर व्यवस्था का नासूर हैं। इस व्यवस्था को उखाडऩे के बाद ही नारी को समुचित सम्मान प्राप्त हो सकता है।

सारांश यह है कि संकलित कवियों का स्वर सकारात्मक है। उसमें लोक मंगल की ध्वनि है। सामाजिक बदलाव की जोरदार इच्छा है। संकलन की भूमिका के लेखक श्री सत्यपाल सहगल ने हिन्दी को हिन्दियाँ कहना ठीक समझा है, जो तर्कसंगत नहीं है। खड़ी बोली ने धीरे-धीरे विकसित होकर ऐसी सम्पर्क भाषा का रूप धारण किया है, जो लगभग पूरे भारत में देखा जाता है और सराहा जाता है। प्रान्त भेद से हिन्दी के अनेक रूप हैं। फिर भी उसका एक मानक रूप भी विद्यमान है। यही रूप रचनाकारों द्वारा प्रयुक्त किया जाता है। परन्तु प्रत्येक समर्थ रचनाकार अपनी प्रतिभा से हिन्दी को एक और नए रूप से शोभायुक्त करता है। कहने की जरूरत नहीं कि भाषा के रचाव में महान कवियों का बहुत बड़ा योगदान है। आज के कवि उनसे भाषा लिखना सीख सकते हैं। महामनीषी त्रिलोचन ने ठीक कहा है-तुलसी बाबा, भाषा मैंने तुमसे सीखी। सम्पूर्ण देश को जोडऩेवाली हिन्दी अपने परिवार की बोलियों अलग होकर अपना अस्तित्व धीरे-धीरे सीमित कर लेगी। इसलिए हिन्दी को हिन्दियाँ कहना समुचित नहीं है।