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Saturday 20 Jan 2018

कभी तो इन अंधेरों से किरण आशा की फूटेगी

वर्तमान युग में गज़़ल एक ऐसी काव्य-विधा का रूप ले चुकी है जिसमें व्यष्टि एवं समष्टि जीवन का सर्वांगीण चित्रण हो रहा है। इसमें जीवन, समाज, संस्कृति, दर्शन आदि की यथार्थपरक अभिव्यक्ति हुई है। संवेदना इसकी प्रमुख विशेषता है। दिनेश शुक्ल का अभिमत है कि, ''हिन्दी गज़़ल के पास जितनी संवेदना की जमीन है वह अन्य किसी विधा के पास नहीं। इसलिए जमीन से जुड़े, रोजी-रोटी से जुड़े सवालों के, प्रश्नों के उत्तर जिस प्रकार लेखन में आज हिन्दी गज़़ल ढूँढ़ रही है, इन तमाम सचाइयों के साथ उसका औचित्य बढ़ गया है।'' विचार, अनुभूति और गहरी संवेदना गज़़लों में समाहित है। यह विशेष उल्लेखनीय है। आधुनिक हिंदी गज़़ल में समकालीन मानव-मन के उद्घाटन के साथ समाज में व्याप्त विसंगतियों का गहन चित्रण हो रहा है।

आधुनिक युग में स्त्री गज़़लकारों ने इस विधा को अपनाना प्रारंभ किया है। स्त्री संवेदनशील होने के फलस्वरूप गज़़ल उसके स्वभाव के अनुकूल रही है। डॉ. मालिनी गौतम इधर की गज़़लकारों में उल्लेखनीय स्थान स्थापित करने का प्रयास कर रही है। उनका सन् 2014 में प्रकाशित गज़़ल-संग्रह 'दर्द का कारवाँ' चर्चित रहा हैं। डॉ. ब्रह्मजीत गौतम मानते है कि, ''मालिनी गौतम की रचनाओं का धरातल नितांत मौलिक और नवता लिये हुए है। उनमें जि़न्दगी की गरमाहट और संवेदना का घनत्व पंक्ति दर पंक्ति दिखाई देता है। अपने समय और परिवेश के सच को शब्दों में उतारना मालिनी की रचनाधर्मिता का लक्ष्य है।'' यद्यपि यह उनका प्रथम गज़़ल-संग्रह है परंतु इसमें भावनाओं का स्फुरण, विचारों की गहनता परिलक्षित होती है। संग्रह में 68 गज़़लें संकलित हैं, विषय-वैविध्य उनकी विशेषता है। प्रेम एवं श्रृंगार, प्रकृति, आर्थिक स्थिति, सामाजिकता, राजनीति, जीवन-दर्शन, वैचारिकता आदि उनकी गज़़लों का कथ्य रहा है। वेदना एवं दर्द प्रमुख विषय हैं। स्वयं गज़़लकार ने भूमिका में निवेदन किया है कि, ''गज़़ल और दर्द का नाता सदियों पुराना है। भिन्न-भिन्न स्वरूपों में हमारे जीवन, समाज, देश और परिवेश में विद्यमान दर्द कब गज़़ल बनकर सफहों पर उतर आता है पता ही नहीं चलता। ऐसा ही एक 'दर्द का कारवाँ' मैं आप सबकी नजऱ कर रही हूँ।'' सुप्रसिध्द कवि और गज़़लकार चन्द्रसेन 'विराट' ने इस गज़़लकार के संबंध में लिखा है, ''यह उनका पहला ही गज़़ल-संग्रह है और इसमें समाहित गज़़लें अपने रूपाकार, भाषा, शैली एवं कथ्य के स्तर पर प्रौढ़ता की ओर अग्रसर होती प्रतीत होती हैं। यही बात आश्वस्त करती है कि आने वाले समय में और भी परिपक्व और प्रभावी गज़़लें उनसे प्राप्त होंगी।''

डॉ. मालिनी गौतम की गज़़लों का मूल स्वर दर्द, वेदना, पीड़ा है। वेदना का अर्थ है - मर्मान्तक मानसिक पीड़ा, दु:ख या दर्द। जब व्यक्ति व्यक्तिवाद के सीमित दायरे से निकलकर अपने 'स्व' का विस्तार करता है तो उसका दर्द समाज का और समाज का दर्द उसका अपना हो जाता है। यही संवेदना है। दूसरे शब्दों में वेदना की अनुभूति समष्टिगत हो जाती है। हिंदी गज़़ल के प्रमुख हस्ताक्षर दुष्यंतकुमार ने गज़़लों में व्यक्त वेदना के संदर्भ में लिखा है, ''गज़़ल लिखने और कहने के पीछे एक जिज्ञासा मुझे अक्सर तंग करती रही है कि भारत में सबसे प्रखर अनुभूति के कवियों में मिजऱ्ा ग़ालिब ने अपनी पीड़ा की अभिव्यक्तिके लिए गज़़ल का माध्यम ही क्यों चुना और अगर गज़़ल के माध्यम से गालिब अपनी निजी तकलीफ को इतना सार्वजनिक बना सकते हैं तो मेरी दूसरी तकलीफ (जो वैयक्तिक भी है और सामाजिक भी) इस माध्यम के सहारे एक अपेक्षाकृत व्यापक पाठकवर्ग तक क्यों नहीं पहुँच सकती।'' स्पष्ट है कि गज़़ल में वेदना, पीड़ा, दर्द आदि भावों की सशक्त अभिव्यक्ति की क्षमता है। डॉ. मालिनी गौतम की गज़़लों में व्यक्त दर्द तो उनके जीवन एवं गज़़ल का एक अनिवार्य अंग बन चुका है। मानो दु:ख दर्द से उनका करीबी रिश्ता हो। यद्यपि अपने ही साथियों द्वारा संकट उत्पन्न किए गए परंतु जीवन ने उसके परिणाम को सह लिया -

घाव  ढेरों  दिए  साथियों  ने  हमें

दर्द जो भी मिले जिन्दगी  सह गयी (पृ. 19)

दर्द सहने की भी एक सीमा है जब वह अत्यधिक बढ़ जाता है, हृदय में टीस उठती है, नश्तर चुभने का अहसास होता है। जब मनुष्य को व्यतीत किये गये क्षणों की स्मृति हो आती हैं, तब आँसू उमड़ पडते हैं। जयशंकर प्रसाद ने 'आँसू' काव्य में लिखा था कि - 'जो घनीभूत पीड़ा थी / मस्तक में स्मृति-सी छायी / दुर्दिन में आँसू बनकर/वह आज बरसने आयी।' यही अहसास गज़़लकार महसूस करती है -

दर्द जब हद  से गुजऱ  जाता है

दिल में नश्तर सा उतर जाता है

याद   आते   ही  पुराने  लम्हे

दर्द  आँखों  में  ठहर  जाता है  (पृ. 28)

मनुष्य के दु:ख-दर्द का कारण उसका मन होता है। जीवन में यह आवश्यक नहीं है कि जो वह चाहता है वह सभी उसे प्राप्त हो। अप्राप्ति के कारण मन में दर्द उत्पन्न होता है, मन को न प्राप्त होने की कसक बनी रहती है। व्यक्ति के जीवन में दर्द, उदासी, निराशा आदि स्थायी भाव है जो घर के वातावरण को श्मशान सा बना देते हैं। जब मन टूट जाता है, तो उदासी छा जाना स्वाभाविक ही है -

न पा सके जो चाहते  थे हम कभी

खय़ाल  बस   यही  कचोटते  रहे  (पृ. 33)

दर्द, उदासी  और  घुटन कब्जा कर बैठे हैं

घर के कोने-कोने में मरघट सा मातम छाया है  (पृ. 65)

वेदना और दर्द का कारण आत्मीयता-अपनत्व भाव का नष्ट हो जाना है। कभी नाते-रिश्ते मधुर थे, अब उनमें कटुता आ गई है। ऐसी स्थिति में अपनों से उपेक्षा एवं तटस्थता का भाव अनुभव कर मन को ठेस पहुँचती है, मन हताश-निराश और उदास हो जाता है -

आज रिश्तों में ये खटास है  क्यूँ

मेरा मन आज फिर उदास है क्यूँ   (पृ. 41)

जीवन में दुख-दर्द है परंतु उनको मन में रखकर जो अधरों पर हँसी बिखेरते हैं वे असामान्य होते हैं, उनमें दृढ़ता होती है। उसके जीवन में वेदना के प्रसंग इतनी बार आते है कि उनको सहते-सहते वह मजबूत हो गया है और यही गुण व्यक्ति को महान बनाता है -

है ग़म का खज़़ाना छुपाया हँसी में

बड़ा ही मँजा वह कलाकार निकला  (पृ. 42)

संवेदनशील डॉ. मालिनी गौतम के मन में यह कसक, वेदना व्याप्त है कि छोटे-छोटे बालकों से मजदूरी करवायी जाती है। सम्प्रति, चारों ओर असंख्य मासूम होटलों में, चाय की टपरियों पर, पटाखों के कारखाने में, खेतों में काम करते हैं। इनको मजदूरी भी कम देनी पड़ती है जबकि ये बड़े मजदूर के समान ही काम करते हैं। फिर इन मासूमों को गालियाँ देकर, मार-पीट कर काम करवाया जाता है। गज़़लकार की संपूर्ण संवेदना इन बाल-मजदूरों के प्रति है। वे इस राष्ट्रीय समस्या को इतना गंभीर मानती है कि उन्होंने एक संपूर्ण गज़़ल इन मासूम बच्चों को समर्पित की है। उनका उद्देश्य केवल आँसू बहाना नहीं है, बल्कि वे ऐसी व्यवस्था चाहती हैं, जिसमें 'कल के भावी नागरिकों' का जीवन स्वस्थ, मधुर हों -

पत्थरों  के ढेर  पर  पलता है  बचपन

रोटियों की  आस में  जलता है बचपन

होटलों में  चाय  के  कप  खडख़ड़ाता

चन्द इच्छाओं के तले  गलता है बचपन

अपने भाई और बहन की हर खुशी का

बोझ काँधे पर लिये  चलता है  बचपन

है न  आँखों  में  सुनहरा  स्वप्न कोई

एक भारी बोझ-सा  खलता है  बचपन

अपने बचपन  से निरंतर यूँ  बिछड़  के

मन मसोसे हाथ निज मलता  है बचपन

कारखानों और  मिलों  में  काम करके

वक़्त के पहले ही लो ढलता है बचपन  (पृ. 55)

यह एक संवेदनाहीनता का प्रमाण है कि ये जो मासूम है, कल के स्वप्न है, कल के नागरिक है उन पर जुल्म ढाया जाता है। वे काम से भाग न जाये इसलिए उन्हें पहरे में रखा जाता है। उन्हें मानसिक, शारीरिक कष्ट दिये जाते हैं। बाल-शोषक वर्ग निश्चित ही निर्दय है -

जो हैं मासूम उन पर ही ढाती सितम

है  ये  दुनिया  बड़ी  बेरहम  देखिए (पृ. 60)

गज़़लकार ने व्यष्टि एवं समष्टिगत वेदना का मार्मिक निरूपण किया है। मानव-जीवन के अभावों, कष्टों, त्रासद स्थितियों का परिणाम है कि गज़़लों में वेदना एवं निराशा के स्वर मुखरित हुए हैं। सरदार मुजावर का स्पष्ट मत है कि, ''हिंदी गज़़लों में वेदनाभाव एवं निराशावाद आया है, वह तत्कालीन परिस्थितियों के कारण ही। हिंदी के गज़़लकारों ने वेदना एवं निराशा को महसूस किया और उसको गज़़लों में ढाला, ऐसा किए बगैर उन्हें शायद राहत भी नहीं मिल पाती।''

यह एक वास्तविकता है कि जीवन में सुख-दु:खात्मक स्थितियाँ होती हैं। व्यक्ति को दोनों का स्वागत करना चाहिए। गज़़लकार के शब्दों में कभी गम है कभी खुशियाँ, ये रिश्ता तो पुराना है।

कभी मिला जो ग़म तो हँस के पी लिया

मिली  खुशी  तो   बस  बटोरते   रहे    (पृ. 33)

प्रेम जीवन का केन्द्रबिंदु है। यही जीवन का श्रेय और प्रेय है। साहित्य कोश के अनुसार, ''गज़़ल में प्रेम भावनाओं का चित्रण होता है। गज़़ल का शाब्दिक अर्थ नारियों से प्रेम की बातें करना है। अत: अच्छी गज़़ल समझी जाती है, जिसमें इश्क-मुहब्बत की बातें सच्चाई और असर के साथ लिखी जाएँ।''

यह आवश्यक नहीं है कि प्रेम में मिलन हो, परंतु उससे भी उदात्तता अप्राप्ति में है, विरह में है, प्रतीक्षा में है।

सोचना  मत  ये  तेरे ग़म में  मर  जायेंगे  हम

तेरी यादों के  सहारे  खुद  को सहलायेंगे  हम

तुम  भले ही  एक क्या  सौ बार ठुकरा दो हमें

ये वफा  की रीत  है  तुम को न ठुकरायेंगे हम

फूल और खुश्बू को कोई कर सका है कब जुदा

दूर रह  कर  भी  न तेरी याद  बिसरायेंगे हम (पृ. 24)

डॉ. मालिनी गौतम ने प्रकृति का चित्रण करते हुए उसके मानवीकरण पक्ष को चित्रित किया है। वैसे साहित्य में मानव-जीवन एवं प्रकृति का निरन्तर साहचर्य रहा है। मनुष्य, प्रकृति के सानिध्य में सुख-दुखात्मक अनुभूति प्राप्त करता है। पर्यावरण का संतुलन बिगडऩे से मौसम का रूख भी बदल गया है।

गरमी में  तो ओले गिरते  लेकिन  सावन  सूखा है

अपनी ढपली अपना गाना अजब तमाशा जीवन का

फूलों के दिन बीत गये लो कैक्टस के दिन आ पहुँचे   काँटो से उद्यान सजाना अजब तमाशा जीवन का। (पृ.13)

मालिनी की सूक्ष्म दृष्टि, उनका संवेदनशील मन केवल प्रकृति-चित्रण में ही नहीं, बल्कि पारिवारिकता में भी दृष्टिगत होता है। पंडित विद्यानिवास मिश्र ने लिखा है, ''मेघा के बरसे और माता के परसे ही तृप्ति मिलती है। माँ परसती है तो बेटे के आस्वाद्य में अपने आस्वाद्य को इतना मिला चुकी होती है कि वह अन्न नहीं परसती अपने मन का पूरा आस्वाद्य परसती है।''माँ अपने संतान से कभी जुदा होना नहीं चाहती। डॉ. मालिनी गौतम ने वत्सलता को इन शब्दों में व्यक्त किया है -

मेरे बच्चे कभी न होना तुम  जुदा मुझसे

मेरे आँचल के तले आओ मैं छुपा लूँ तुम्हें (पृ. 21)

'रोटी' की समस्या देश की मुख्य समस्या है। संसद में वाद-विवाद होते है परंतु रोटी का हल नहीं निकल पा रहा है। दुष्यंत ने कभी लिखा था -

भूख है तो सब्र  कर, रोटी  नहीं  तो क्या हुआ

आजकल  दिल्ली  में  है, जेरे  बहस  ये मुद्दआ

डॉ. मालिनी गौतम ने भी रोटी के संबंध में लिखा है -

जो खाली पेट हो तो चाँद भी दिखता  है रोटी

गऱीबी  किस  कदर  मासूम को  छलने लगी है (पृ.71))

डॉ. मालिनी गौतम ने अपनी गज़़लों में जीवन विषयक चिंतन भी व्यक्त किया है, जिसमें जीवन की सचाई व्यक्त हुई है। जीवन अलभ्य है, जीवन सौभाग्य है। ऐसे जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास 'दर्द का कारवाँ' में व्यक्त हुआ है -

जीवन नैया पार उसी की, झुकने का गुण सीखा जिसने

ध्वस्त हुए सपने सब उसके, तूफानों में जो अकड़ा  है (पृ.26)

डॉ. मालिनी गौतम मानती है कि जीवन में निराशा है, अवसाद है, संघर्ष है। परंतु जीवन में आशावाद भी है जो मनुष्य को जिंदा रखता है, कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देता है -      

कभी तो इन अँधेरों से किरन आशा की फूटेगी

उम्मीदों के चरागों में पतंगे  सा  मैं  जलता हूँ (पृ. 48)

डॉ. मालिनी गौतम हिंदी गज़़ल के मिजाज को खूब पहचानती है। उनकी गज़़लें अपने समय, स्थिति एवं चिंतन की साक्ष्य देती है। 'दर्द का कारवाँ' हिंदी गज़़ल के विकास में अहम् एवं महत्वपूर्ण भूमिका की परिणति हैं।