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Thursday 18 Oct 2018

सिटी लाइट्स : चार्ली की श्रेष्ठ फि़ल्म

नहरों के नगर वेनिस (इटली) में गतिविधि का केंद्र पिआज़ा सान मार्को तीन सितंबर 1972 की अनोखी शाम मेरे मन में आज तक अंकित है।

इटली, नहरों वाला सुंदर नगर वेनिस, शानदार पिआज़ा सान मार्को चौक (संत मार्क) खुले आसमान के नीचे सैकड़ों कुरसियाँ बिछी हैं। उत्सुक और उत्तेजित दर्शक, उनमें से एक मैं, सामने है एक बहुत बड़ा सफेद परदा।

यह है उस साल के वेनिस फि़ल्म फेस्टिवल का समापन समारोह। सब के लिए खुला। दाहिनी ओर पहली मंजि़ल पर खिड़की से इटली की रानी के साथ हैं चार्ली चैपलिन। दोनों, हमें और चार्ली की फि़ल्म सिटी लाइट्स देखेंगे।

बत्तियाँ बुझती हैं। फि़ल्म और चार्ली के सम्मान में तालियाँ गडग़ड़ा उठती हैं। फि़ल्म में सुबह सुबह शांति और समृद्धि की देवी के कई मूर्तियों वाले स्मारक का लोकार्पण, एक संभ्रात महिला डोरी खींचती है। स्मारक को ढँकने वाला बड़ा परदा नीचे गिरता है। यह क्या? चार्ली चैपलिन का पात्र ट्रैंप मुख्य मूर्ति की गोदी में आराम से सोया है!

और अब जो तालियों की गडग़ड़ाहट शुरू होती है, तब दुगुनी होती जाती हैं जब चार्ली की पहली मुलाक़ात होती है अंधी फूलवाली से। और तब तक चलती रही जब अनेक रोचक घटनाओं के बाद अंधेपन से मुक्त फूल वाली चैपलिन को पहचान नहीं पाई। जैसे ही दोनों के हाथ मिले तो फूल वाली को सब कुछ याद आ जाता है।

तमाम बत्तियाँ जलती हैं। दाहिने बाल्कनी में से चार्ली और रानी हाथ हिला कर दर्शकों का सम्मान कर रहे हैं। चार्ली, रानी और दर्शक, सब की आँखें नम हैं।

यह था उस शाम का वर्णन अब देखिए पूरी फिल्म

शहर की सड़कों के सचल चित्रों पर उभरता है फि़ल्म का नाम।

सुबह, सड़क पर दर्शकों की भारी उपस्थिति। सामने है सड़क का अंत। कपड़े के परदों से ढँकी कोई चीज़। सिनेमा के परदे पर लिखा आता है - नगरवासियों की सेवा में समर्पित है शांति और समृद्धि का स्मारक। धुआँधार भाषण हो रहा है। उद्घाटन के लिए एक महिला को आमंत्रित किया जाता है वह डोरी खींचती है। परदा नीचे को गिरता है।

हम देखते हैं सब से ऊँची मूर्ति पर कोई सोया है। यह चार्ली चैपलिन का लोकप्रिय पात्र ट्रैंप है, जो सिर खुजाता है, टाँग उठाता है, खुजाता है।

हैरान दर्शक उठ खड़े होते हैं। उन्हें बैठाया जाता है। राष्ट्रगान शुरू होता है। सब सावधान मुद्रा मेंं खड़े होते हैं। नीचे वाली मूर्ति की तलवार ट्रैंप की पतलून को चीरती ऊपर निकल गई है। सब उसे उतरने को कह रहे हैं। जैसे तैसे तलवार से निकल पाता है। जूते का तस्मा बाँधता है। हड़बड़ाता गिरता पड़ता फंसता ट्रैंप नीचे उतर पाता है। इस दृश्य से जो स्थापित होता है वह यह कि बेघरबार निर्धनों के लिए आलीशान स्मारक मात्र शरणस्थल हैं।

तीसरा पहर। बाज़ार। चहलपहल। कारें आ जा रही हैं। ट्रैंप भी मटरगश्ती कर रहा है। मोड़ पर अख़बार बेचने वाले दो छोकरे उसे छेड़ते हैं। उन्हें फटकारता है। शो विंडो में नग्न मूर्ति रखी है। उसे निहारता है। सिगरेट के सुट्टे लगाता है। कला मर्मज्ञ की तरह कई कोणों से देखता सराहता है। मैनहोल में गिरने से बचता है। आगे बढ़ता है।

रंगबिरंगे सुंदर गुलाबों से सजी टोकरी। बाग़ की रेलिंग के सहारे मुंडेर पर बैठी है एक सुंदरी। टोकरी उसके सामने रखी है। हाथों में गुलाब हैं। वह फूल बेचती है। नुक्कड़ पर बड़ी सी कार रुकती है। और कारें भी रुक जाती हैं। सड़क बंद सी हो गई है। सजे धजे नर-नारी आ जा रहे हैं।

सड़क पर तरह-तरह की कारों के बीच चल रहा है ट्रैंप। मोटरबाइक पर पुलिस वाला है। ट्रैंप आगे नहीं बढ़ पाता। बाइक के पीछे से आ कर जो कार खड़ी है। उसके एक दरवाज़े से घुस कर फुटपाथ वाले दरवाज़े से निकलता है। फूलवाली को देखे बग़ैर वह हम से दूर जा रहा है। फूलवाली हाँक लगाती है। रुकता है, मुड़ता है। इनकार करता है। वह फूल बढ़ाती है, मानों कह रही हो, एक तो ले ही लीजिए। पास आता है। लड़की के दोनों हाथों में एक-एक फूल है। पहले हाथ वाले फूल के बजाए वह दूसरे हाथ वाला पसंद करता है। पहला फूल गिर जाता है। वह उठाता है। बेख़बर फूलवाली फुटपाथ टटोल रही है। पूछती है, आप ने उठा लिया क्या? वह झुकता है। नीचे उसके चेहरे तक पहुँच गया है। देखता है। फूल उसके हाथ मेंंं थमाता है। एक दूसरे के हाथ छू जाते हैं। वह एक फूल ट्रैंप के कोट के बटनहोल मेंं लगाती है। हाथ फिर मिलते हैं। वह सिक्का देता है। समझ गया है कि वह देख नहींसकती। सिक्का उस की हथेली पर रखता है। कार का मालिक गाड़ी में बैठता है। कार चली जाती है। वह कहती है, अपनी चेंज तो लेते जाइए। ट्रैंप समझ जाता है कि फूलवाली के लिए तो फूल कारवाले ने खऱीदा है। वह चुप है। दबे पाँव चला जाता है। मोड़ पर जो पत्थर वाला स्तंभ है, उस में पानी का नल चलता रहता है। कुछ देर बाद फिर दबेपाँव आ कर स्तंभ के सहारे मुँडेर पर बैठता है। फूलवाली को देखता रहता है। वह ख़ाली गमला नल पर धोती है। धोवन का पानी बाग़ में फेंकती है। ट्रैंप भीग जाता है। कोई पदचाप किए बग़ैर दबे पाँव पीछे को खिसक लेता है।

नोट- अंधी फूलवाली से पहली मुलाक़ात वाले इस सीन को फिल्माने में चार्ली ने कई दिन लगाए और 342 बार शूट किया। यही पूरी फि़ल्म का आधार दृश्य है, फि़ल्म का मूड स्थापित करता है। दो तीन मिनटों के इस साधारण सा लगने वाले सीन में केवल चलतफिरत और हावभाव के ज़रिए हम देखते हैं, ट्रैंप का यह समझ पाना कि फूलवाली नेत्रहीन है। उसके प्रति उपजा मन में करुण भाव। फूलवाली को यह भ्रम हो जाना कि खऱीदार कोई धनी व्यक्ति है। मुँडेर पर बैठे ट्रैंप से हम समझ जाते हैं कि वह फूलवाली पर मोहित हो चुका है। सीन के समाप्त होते होते मनोभाव तीव्रतम मात्रा तक चढ़ जाते हैं, तो पानी फेंकने का हलका सा एक्शन हास्य का टच दे कर सीन को समाप्त करता है, यह अभिनय नहीं नृत्य है।

वही शाम। छोटे से कमरे में दादी केतली में पानी भर रही है। प्रसन्न फूलवाली पहुँचती है। ग्रामोफ़ोन पर रिकार्ड लगाती है। खिड़की में एक प्रेमी युगल को बाई करती है। इस से स्थापित होता है कि उस ने जीवन से नई अपेक्षाएँ पाल ली हैं।

रात। सड़क से लगे तालाब का चबूतरा। सीढिय़ों से एक आदमी उतरता है। छोटी अटैची से रस्सी निकालता है। उसका फंदा गले में डाल रहा है। सीढिय़ों से ट्रैंप उतरता है। टोप हिला कर आदमी से हलो करता है। दीवार के साथ वाली बैंच झाड़ता है, बैठता है, हाथ मेँ वही गुलाब है, सूँघता है। आदमी रस्सी के दूसरे सिरे पर भारी पत्थर बाँधता है। ट्रैंप आशंकित होता है। उसे रोकता है। आदमी के हाथ से पत्थर छूट कर ट्रैंप के पैर पर गिरता है। वह तिलमिला जाता है। आदमी के गले से फंदा निकालता है। जीवन का संदेश देता है। कल चिडिय़ा चहचहाएंगी...आदमी रो रहा है। ट्रैंप हिम्मत बँधाता है- बहादुर बनो, जीवन से जूझो। आदमी मरने पर उतारू है, मैं सब कुछ ख़त्म कर दूँगा। ट्रैंप के हाथ से फंदा छीन लेता है। अपने पीछे फेंकता है। फंदा दोनों को लपेट लेता है। पत्थर उठाने को झुकता है तो फंदे से उसका सिर निकल जाता है। पत्थर पानी में फेंकता है तो रस्सी के साथ ट्रैंप पानी में! काफ़ी कशमकश के बाद दोनों बाहर आते हैं। आदमी घोषणा करता है, मैं ठीक हो गया हूँ। अब हम दोनों आजीवन दोस्त हैं। चलो, घर चल कर कुछ गरम हो लें। चलते-चलते ट्रैंप बैंच पर रखा फूल उठाना नहीं भूलता।

यह आदमी मिलियनेयर (करोड़पति) है। शानदार मकान है। बटलर है। दोनों पीते हैं। बहुत पीते हैं। ट्रैंप को नए शानदार कपड़े दिए जाते हैं। मेज़बान बटलर को रौल्सरायस कार निकालने की आज्ञा देता है। दोनों होटल जाते हैं।

नोट- हम जानते हैं कि उन दिनों रईस अमेरीकी चाइनीज़ फूड के दीवाने थे। सब नूडल्स बड़े चाव से खाते थे। जैसे हंगामे ट्रैंप के साथ हर जगह होते हैं, यहाँ भी होते हैं।

घर लौटते हैं। सुबह हो रही है। ट्रैंप कार की तारीफ़  करता है। कार उसे दे दी जाती है। तभी फूलवाली फुटपाथ से गुजऱती है। ट्रैंप फूल खऱीदना चाहता है, जेब ख़ाली है। भीतर जा कर मिलियनेयर से माँग कर नोट लाता है। दस डालर में सारे फूल खऱीद लेता है। बटलर से घर में रखवाता है और फूलवाली को रौल्सरायस मेंं घर छोडऩे जाता है।

नोट: एक बार फिर फूलवाली ट्रैंप को रईस समझती है।

ट्रैंप के लौटने तक मिलियनेयर को होश आ चुका है। पिछली रात की सब घटनाएँ वह भूल चुका है। बटलर से उसे धकेलवा देता है।

नोट: यह इस पात्र के चरित्र और फि़ल्म के कथाविस्तार का अंतर्निहित अंग है। नशे में वह ट्रैंप का मित्र है, होश में उसे पहचानता नहीं।

उसी शाम फिर वह ट्रैंप को मिलता है, घर ले जाता है, शानदार पार्टी देता है। लेकिनसुबह होने पर फिर नहींपहचानता। उसी दिन मिलियनेयर विदेश यात्रा पर जा रहा है।

ट्रैंप बाग़ के कोने पर जाता है। फूलवाली नहींहै। उसके घर जाता है। खिड़की से झाँकता है। डाक्टर कह रहा कि फूलवाली बीमार है, बुख़ार है। ट्रैंप उसके इलाज के लिए पैसे जुटाना चाहता है। सड़क साफ़ करता है।

दादी को नोटिस मिलता है, अगर कल तक बक़ाया किराया नहीं दिया तो घर से निकाल दिया जाएगा। दादी नोटिस छिपा देती है।

लंच ब्रेक। ट्रैंप फूलवाली को देखने आता है। अख़बार में पढ़ता है कि विएना में आपरेशन से अंधता दूर करने की नई विधि का अन्वेषण हुआ है। वहाँ गऱीबों का इलाज मुफ़्त किया जाता है। फूलवाली के कहने पर वह नोटिस पढ़ता है, वादा करता है कि किराए का भुगतान कर देगा।

काम पर देरी से पहुँचने पर उसे निकाल दिया जाता है।

अचानक एक बाक्सर से मुलाक़ात होती है। इनाम जीतने की संभावना है। लेकिन बाक्सिंग में बुरी तरह पिट जाता है।

कुछ समय बाद।

मिलिनेयर यात्रा से लौटा है। ट्रैंप को पहचानता है, घर ले जाता है। दो चोर छिपे हैं। अंधी के इलाज के लिए मिलिनेयर ट्रैंप को एक हज़ार डौलर देता है। चोरों ने सिर पर चोट कर मिलिनेयर को बेहोश कर दिया। ट्रैंप ने पुलिस को फोन किया। मिलिनेयर की जेब से सारा धन निकाल कर चोर भाग गए।

पकड़ा गया ट्रैंप, जो पुलिस से बच कर भाग निकला, फूलवाली के घर गया, उसे नोट दिए। वह उसका हाथ पकड़ कर धन्यवाद करती रही। विदा होते उसका हाथ चूमता है। वादा करता है, फिर आऊँगा।

बाज़ार का मोड़। अख़बार वाले छोकरे खड़े हैं। दीवार के सहारे पुलिस वाले घात में हैं। ट्रैंप आता है। छोकरे छेड़ पाएँ इस से पहले ही पुलिस उसे दबोच लेती है, जेल भेज दिया जाता है।

वक्त बीतता है।

ट्रैंप रिहा हो कर बाग़ के कोने पर जाता है। फूलवाली नहीं है। निराश होता है। उसके हाथ में छड़ी नहीं है।

फूलवाली महँगे फूल सजा रही है।

नोट: स्पष्ट है कि अब वह देख सकती है। दूकान बाज़ार में है। शो विंडो है। अलमारी है। सहायिका है। धनी ग्राहक आता है, फूलों का आर्डर देता है। दादी पैसे लेती है। फूलवाली उदास है। दादी पूछती है -क्या बात है? फूलवाली कहती है- मुझे लगा वह आया है, रोती है।

थका माँदा सा बेचारा, जि़ंदगी से पूरी तरह टूटा, निराश ट्रैंप बाज़ार में जैस-तैसे घिसट रहा है। कोट की कोहनियाँ फटी हैं। पतलून के पीछे से सफेद सा कपड़ा झाँक रहा है। अब उसके हाथ में छड़ी नहीं है। बाज़ार के मोड़ वाली शो विंडो पर यूँ ही रुकता है, झुकता है। बिजली के खंबे से छोकरे देखते हैं। एक छोकरा मुँह में कुछ भरता है। सीटी जैसी फुंकनी से कंकड़ फेंकता है। कंकड़ ट्रैंप के सिर पर लगता है। रुआँसा सा हो आता है। उठ खड़ा होता है। एक और कंकड़ सिर पर लगता है। वह हाथ उठा कर उलाहना सा देता है। छोकरे हँसते हैं। वह आगे बढ़ता है, एक और कंकड़ लगता है। असहाय सा शिकायती नजऱों से देखता है।

नोट: पहले जब वे ट्रैंप को छेड़ते थे, लगता था कि बेकार ही उन्हें फि़ल्म मे जगह दी गई है। अब समझ में आती है उन दोनों छोकरों की क्लाईमैक्स में महत्वपूर्ण भूमिका।

दूकान से सहायिका निकलती है। फुटपाथ पर पड़े फूल को झाड़ू से सड़क पर गिराती है। वह देखता है, उठाने को झुकता है। फटी पतलून से निकलता कपड़े का टुकड़ा छोकरे खींच लेते हैं, भागते हैं, टुकड़ा वापस छीन कर वह लौटता है, नाक पोंछता है। दूकान में से फूलवाली शरारती मूड मेंंहै। एक फूल आगे बढ़ाती है। वह देखता है और देखता रह जाता है, उस की फूलवाली! वह देखता रहता है, देखता रहता है, देखता रहता है। वह उसे नहीं पहचानती (कभी देखा ही नहीं था) मखौल सा उड़ाती सहायिका से कहती है I have made a conquest !!

ट्रैंप की हालत देख कर उसे दया आती है। उसके हाथ के फूल की पंखुडिय़ाँ ढलक कर नीचे गिर जाती हैं। सहानुभूति से वह एक फूल उस की ओर बढ़ाती है। सहायिका से कुछ कहती है। सहायिका एक सिक्का देती है। सिक्का ट्रैंप को दिखाती है। लो, वह देखता रहता है, लेना नहीं चाहता। जा रहा है, रुकता है, वापस मुड़ता है। हाथ बढ़ा कर फूल पकड़ता है। आगे बढ़ कर वह उसका हाथ पकड़ती है। सिक्का उसकी हथेली पर रख कर मुट्ठी  बंद करती है। हथेलियों में उसका हाथ दबाती है।

हाथों की छुअन, पहचान का जादुई क्षण... पहले उसके कोट का कालर सहलाती है। हाथ अपने गाल पर रखती है। दूसरा हाथ ट्रैंप के हाथ में है। तुम..? एक दूसरे को देखे जा रहे हैं। वह कहता है अब देख सकती हो तुम। दोनों एक दूसरे की आँखों में खो जाते हैं।इस अंतिम दृश्य के बारे में चार्ली ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में लिखा था- मैं अभिनय नहीं कर रहा। खेद से भरा हूँ। अपने से बाहर निकल कर खड़ा हूँ। बस देख रहा हूँ। बेहद सुंदर, अति सुंदर, अति अभिनय से बहुत दूर।

यह थी चार्ली की फि़ल्म सिटी लाइट्स। चार्ली चैपलिन को ही नहीं अधिकतर समालोचकों को भी यह उस की सर्वश्रेष्ठ कृति लगती है। यह चार्ली की अंतिम पूरी तरह मूक फि़ल्म थी। इस के बाद वाली माडर्न टाइम्स में कोई संवाद तो नहीं हैं, लेकिन उस की आवाज़ बिना किसी शब्द के एक अगड़मबगड़म गीत है। उसके बाद वाली चार्ली की सभी फि़ल्में सवाक् हैं।