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Tuesday 16 Jan 2018

एक दीपक

मुम्बई में कुछ दिन गुजार कर अविनाश की समझ में आ गया था कि सिनेमा देख कर की गई कल्पना और वास्तविकता में बहुत फर्क है। फिल्म में समस्याएं उतनी गंभीर या विकट नहीं लगती जितनी वास्तव में होती है। इस अनुभव के साथ-साथ मुम्बई के प्रति उसका आकर्षण भी ख़त्म होने लगा था।

अविनाश ओडि़सा के एक छोटे से शहर, बल्कि कस्बे में जन्म लेकर वहीं पला-बढ़ा था। अपने इस मुंबई प्रवास के दौरान उसे छोटे शहर और महानगर के जीवन का फर्क अच्छी तरह समझ में आ रहा था। उसे लगता था छोटे शहर का जीवन जैसे किसी अदृश्य जाल से घिरा हुआ हो। एक निश्चित सीमा में एक-दूसरे से बँधा हुआ, एक-दूसरे से बिंधा हुआ; हर पल सब का सब को छूता हुआ सामूहिक जीवन! कभी-कभार कहीं कुछ टूट-फूट, खींच-तान, टकराहट जरूर होती, कोई मोती बिखर जाता पर फिर जल्दी ही गांठ बांध कर, सी कर या किसी और तरह सब कुछ जोड़ लिया जाता, साथ मिला लिया जाता। कल जो परिचित मुँह फेर कर चला गया था, आज उससे भेंट होने पर फिर राम-राम हो सकती थी। कल का लड़ाई-झगड़ा भूल कर फिर पहले से हो जाते थे आपसी संबंध। अपने आप फिर दुख-सुख बांटने लगते थे सभी लोग।

इधर मुंबई जैसे महानगर में लगातार दौड़ता-भागता, हाँॅफता हुआ आदमी दूसरे का चेहरा भी पहचान पाने में असमर्थ था। उसे इतनी फुर्सत नहीं मिलती थी कि दूसरों की स्मृतियाँ अपने मन में संजो कर रख सके। पास-पड़ोस में रहने वालों के प्रति यहां किसी के मन में कोई कौतूहल नहीं। यहाँ साथ रहने वाले लोगों का जीवन जैसे समानांतर रेखाओं की तरह चलता था, दूसरों को बिन छुए, बिन काटे, बिन बाँटे! आपस में बाँधे रखने वाली स्नेह या सामाजिक औपचारिकता की डोर तक नहीं! बिना विशेष कारण के यदि किसी ने किसी के बारे में जानना चाहा तो यह उसके उद्देश्य को लेकर संदेह उत्पन्न करने वाली बात थी। शुरू में अविनाश इस जीवन से बहुत चकित हुआ था। जब अपनी अचरज-भरी बेचैनी को उसने अपने मित्र सुरेश के सामने रखा तो उसने हँसते हुए अपने, इस शहर के शुरूआती दिनों के अनुभव का वर्णन किया था।

सुरेश पहली बार मुंबई अपने एक रिश्तेदार का पता लेकर आया था। गाड़ी से उतर कर उसने उनके निर्देशानुसार बस पकड़ी और उनकी बताई जगह पर पहुँचा। रिश्तेदार ने बताया था कि उनका घर बस-स्टैंड से थोड़ी ही दूरी पर था। उसने भी सोचा था पता पास हो तो घर खोजना कौन सा मुश्किल काम है। पर असल में जब पता हाथ में लेकर वह घर खोजने लगा तो सारा दिन भटकने के बाद भी घर नहीं खोज पाया। शाम होने पर वो उसी बस-स्टैंड पर वापस लौट आया जहाँ सुबह उतरा था और चुपचाप एक जगह थका-हारा उदास बैठा वापस लौटने के बारे में सोचने लगा। जिस शहर में पता होते हुए किसी का घर ढूंढना एक दिन में संभव नहीं वहाँ उसे अपना भाग्य ढूंढने में न जाने कितना समय लगे और पता नहीं अंतत: वह मिले भी कि नहीं...! ल्ेकिन वो कहते हैं न 'मेरे मन कुछ और है, विधना के कुछ औरÓ; जैसे ही उसने मन-ही-मन पक्का फैसला करके स्टेशन जाने वाली बस के बारे में पूछने के लिए पास खड़े एक सज्जन की ओर कदम बढ़ाया, देखा कि सामने उसके संबंधी, जिनका घर वह सुबह से शाम तक ढूंढता रहा था, साइकिल पर चले जा रहे हैं।

उनका घर वाकई बस अड्डे से बिलकुल पास था। घर ढूंढते हुए वह दिन भर में न जाने कितनी बार उस रास्ते से, उनके घर के सामने से गुजरा, पर उनका दरवाज़ा कुछ अंदर की ओर इस तरह से था कि सड़क पर से दिखता नहीं था और आसपास के घर वालों से पूछने पर कोई बता नहीं पाया था। उसने कितने ही पड़ोसियों से बार-बार नाम, काम, पता, उनके डील-डौल, चेहरे-मोहरे का ब्यौरेवार वर्णन करते हुए पूछा पर हर बार, हर एक का एक ही जवाब- 'हमें नहीं मालूम, किसी और से पूछ लीजिए।‘ अब घर देख कर उसे आश्चर्य हो रहा था कि कई सालों से पड़ोस में रह रहे लोग कैसे नहीं जानते...!

सुरेश ने अपना अनुभव बताने के बाद कहा था, 'ये एक अजब शहर है, भाई! यहाँ पड़ोसी, पड़ोसी को जानता-पहचानता नहीं। वैसे तो हर तरफ़  ठ_ के ठ_ लोग भरे मिलेंगे पर ढूंढने लगो तो आदमी एक भी नहीं मिलता। यहाँ के लोगों की छाती में हृदय नाम की मशीन तो होती है, दिल नहीं होता। रोजी-रोटी की तलाश में आए हम जैसों को ये शहर आसरा तो देता है, घर नहीं देता। कोशिश करके हम यहाँ अपना नाम भले बचा लें पर कोई पहचान नहीं पा सकते!Ó

अविनाश, खास कर जब लोकल ट्रेन में सफर करता है तब सुरेश की बातों को याद कर उनकी सच्चाई का अनुभव करता है। उस वक़्त उसे महसूस होता है जैसे वह तेज बहते हुए किसी अछोर महानद की मँझधार में जल की एक छोटी सी बूंद है।

अविनाश भी, दूर पास के छोटे-बड़े शहरों, कस्बों, गाँवों से आने वाले असंख्य अन्य लड़कों की तरह अपने भविष्य की तलाश में मुम्बई आया था। अपने मित्र सुरेश और उसके तीन दूसरे नौजवान साथियों के साथ वह मीरा रोड पर एक छोटे से कमरे में बड़ी दीन-हीन स्थिति में रह रहा था। दो महीने हो गए थे, नौकरी के लिए कई जगह आवेदन किया, इंटरव्यू दिए, यहाँ से वहाँ मारा-मारा फिरा पर कहीं भी सफलता नहीं मिली थी। आज भी वह काम मिलने की उम्मीद में किसी दफ्तर की ओर जा रहा था। दादर स्टेशन तक लोकल ट्रेन से जाना था। ओफ्फ...दफ्तर शुरू होने के समय गाडिय़ों में कितनी भीड़ होती है! उसे आश्चर्य होता है कि इतने से डब्बे में इतने सारे लोग समा कैसे जाते हैं! उसे ये सफर बहुत तकलीफदेह लगता है, ठीक से खड़े भी नहीं हुआ जाता। पर सौभाग्य से आज उसे बैठने को सीट मिल गई थी। वह आराम से बैठा बाहर के दृश्य देख रहा था और सुरेश के बारे के सोच रहा था। एक स्टेशन पर गाड़ी रूकी तो जैसे बाढ़ की तेज धारा सी लोगों की भीड़ अंदर घुसी। उसी प्रवाह में तिनके सी बहती एक महिला उसके करीब आकर संतुलन खोती हुई उस पर गिरने-गिरने को हुई और फिर अपने को किसी तरह संभालती हुई खड़ी हो गई। अविनाश की सीट के पीछे लगे लोहे के हैंडल को उन्होंने जोर से पकड़ लिया। कुछ नाटी होने के कारण ऊपर लगे रॉड तक उनका हाथ नहीं पहुँच रहा था।

अविनाश ने उनकी ओर देखा, वेश-भूषा साधारण थी, चेहरा कुछ बीमार सा लगा। कमजोर तो निश्चय ही थीं, भीड़ के धक्कों को मानो सह नहीं पा रही थीं, किसी तरह खड़ी रह कर इधर-उधर नजऱ दौड़ा रही थीं, जैसे किसी को ढूंढ रही हों। इसी बीच भीड़ में कहीं से एक लड़की की आवाज़ आई, 'अम्मा, घबराओ मत मैं यहाँ हूँ!Ó अविनाश समझ गया कि भीड़ की धकापेल में माँ-बेटी अलग हो गए हैं।

महिला अविनाश के बाजू से लगभग सटी हुई खड़ी थीं। गाड़ी चलने पर उन्होंने भी उसके चेहरे की ओर देखा। अविनाश ने पूछा, 'आप कहाँ तक जाएंगी?’

'दादर’’-कमजोर सी आवाज़ में उत्तर दिया उन्होंने।

अविनाश ने मन ही मन सोचा, दादर तो काफी दूर है और ये बीमार सी लग रही हैं, इतनी देर क्या ये इस तरह खड़ी रह पाएंगी? फिर कहा, मुझे उससे क्या? मुझे आज पहली बार बैठने को सीट मिली है...। खुद आराम से बैठने की बजाय बेकार दूसरों के बारे में क्यों सोच रहा हूं? हमारे छोटे शहर में इस तरह की बातों का कुछ मतलब होता है। लोग भले के लिए, इंसानियत के नाते बहुत कुछ कर जाते हैं, पर यहाँ इन सब बातों का क्या मतलब, कौन इन सब चक्करों में पड़ता है? वह खिड़की से बाहर भागते हुए शहर को मनोयोग से देखने की चेष्टा करने लगा।

अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो चढऩे वालों के धक्के से अपने को संभालने में विफल होकर वे उस पर गिर ही पड़ीं। उनके मँुह से लंबी कराह सी निकल गई। थोड़ा संभलने पर वे लज्जित होती हुई किसी तरह फिर खड़ी हुई और आँखों मे क्षमा-प्रार्थना का भाव लिए अविनाश को देखने लगीं। उनकी आँख से आँख मिलते ही अविनाश यंत्र-चालित सा उठ कर खड़ा हो गया और उनसे बोला, 'आप बैठ जाइए!’

थोड़ी देर दुविधा में रह कर और अविनाश के दुबारा कहने पर वे बैठ गईं और अविनाश की ओर कृतज्ञता भरी दृष्टि से देखने लगीं। वह उत्तर में जरा मुस्कुरा दिया और उनके बाजू में खड़ा रहा, जहाँ कुछ देर पहले वे खड़ी थीं। आसपास बैठे लोगों की अचरज भरी निगाहों को अनदेखा करता वह बाहर देखने लगा।

थोड़ी देर बारह-चौदह साल की एक लड़की भीड़ में से किसी तरह रास्ता बनाती हुई उस महिला के पास पहुँची। यह देख कर खुश हुई कि उनको बैठने की जगह मिल गई थी। एक छोटी सी थैली जो उसके हाथ में थी, वह उसने महिला को पकड़ाई। उनकी सारी बातें भले अविनाश की समझ में नहीं आ रही थीं पर 'अस्पताल’, 'दवाई’ जैसे कुछ शब्दों से उसने जाना कि उनके बीमार होने के बारे में उसका अनुमान सही था। महिला ने थैले से कुछ दवाइयाँ निकाल कर देखीं और फिर रख दीं।

अविनाश खड़ा-खड़ा उन दोनों के विषय में सोचने लगा। 'इन दोनों का संबंध क्या हो सकता है? माँ और बेटी? महिला की उम्र पचास से ऊपर लग रही है। नानी-नातिन या दादी-पोती भी हो सकती हैं! महिला अस्वस्थ तो है ही, इस तरह की भीड़-भाड़ में यात्रा करने की अभ्यस्त भी नहीं लगती है। इस छोटी सी लड़की के सहारे कहाँ जा रही होंगी? इनके साथ और कोई शायद नहीं है। अगर ज्यादा भीड़ हुई तो ये लोग अपने स्टेशन पर उतरेंगे कैसे?

हवा में उड़ती पतंग के साथ चरखी से खुले जाते धागे की तरह अनियंत्रित अपने विचारों को अविनाश ने सचेत होते हुए संभालने की कोशिश की और मन ही मन खुद को समझाया, 'जैसे चढ़े हैं वैसे उतर भी जाएंगे। और मुझे इतनी क्या पड़ी है उनकी जो ये सब सोच के अपना दिमाग खराब कर रहा हूँ ।Ó खड़े रहने में भी उसे असुविधा हो रही थी। छत से लटकते एक-एक हैंडिल को पहले ही दो-दो, तीन-तीन हाथों ने पकड़ रखा था। बिना कुछ पकड़े चलती गाड़ी में खड़े रहने में संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो रहा था। अविनाश को यहां के लोगों को ऐसी भीड़ भरी चलती गाड़ी में बड़े आराम से, बिना डगमगाए चलते-फिरते या बिना सहारे के खड़े देख कर बड़ा अचरज होता था। कोई खड़े खड़े ही बड़े ध्यान से अख़बार पढ़ रहा है तो कोई कागज़ की पुडिय़ा से निकाल कर बड़ा-पाव या समोसा-पाव का नाश्ता कर रहा है। कुछ तो बैठे-बैठे या खड़े-खड़े ही अपनी नींद भी पूरी कर लेते हैं- कमाल है साहब! स्टेशन पर गाड़ी लगते ही सिरों की एक माला सी अंदर आती है और दूसरी बाहर निकल जाती है। ये दृश्य अविनाश को इतने अभिभूत करने लगते हैं कि वह खुद को भूल कर उनमें खो सा जाता है। भूल जाता है कि अपना घर छोड़ कर, घर में अपनी माँ को अकेला छोड़ कर वह किसलिए इस अजनबी अनजान पिशाच जैसे शहर में आ गया है; कुछ पल वह भूल जाता है चारों ओर से दबाती पीसती भीड़ को, हाँॅफते भागते लोगों को और फिर लौट कर अचानक अपने को बिलकुल अकेला पाता है। इस अकेलेपन के पंजे से अपने को छुड़ाने के लिए वह छटपटाता है तो याद आता है अपना वह छोटा सा शहर, उस शहर में अपना छोटा सा बेमरम्मत का घर, उस घर में अब अकेली पड़ी बूढ़ी कमजोर माँ..!

आते समय माँ ने अपने आँसू पोंछते हुए, अपनी सारी जमा पूंजी उसके हाथों में सौंपते हुए कहा था, 'जा बेटा, बड़े शहर जा के बड़ा आदमी बन के आना, जिससे तेरा अपना और वंश का भी नाम ऊंचा हो..!' यह सोच कर उसे लगता है जैसे वह किसी गलत जगह आ गया है। यहाँ वो कमा-धमा के आदमी क्या बनेगा, उसे तो लगता है यहाँ वह हर पल अपनी इंसानियत खोता जा रहा है!

एक स्टेशन पर गाड़ी के खड़े होने के झटके से अविनाश लडख़ड़ा कर उस महिला पर गिरने को हुआ। महिला ने उसके चेहरे की ओर देखते हुए पूछा, 'कहाँ तक जाएंगे आप?Ó

'दादर'-सीधा खड़ा होते हुए अविनाश ने उत्तर दिया।

'हम भी वहीं पर उतरेंगे' - पास खड़ी लड़की ने कहा। उत्तर में अविनाश के चेहरे पर मुस्कुराहट खेल गई। मासूम से चेहरे वाली उस लड़की से वह पूछना चाहता था- 'तुम लोग कहाँ से आए हो? तुम्हारी अम्मा को क्या हुआ है, क्या ज्यादा गंभीर बीमारी है? घर में और कौन-कौन हैं ?...' पर इतने दिनों के प्रवास में वह समझ चुका था कि यहाँ किसी अपरिचित लड़की से ये सब पूछना सामान्य व्यवहार नहीं माना जाएगा। हो सकता है लड़की खुद ही उस पर संदेह करने लगे।

अपने विचारों पर अविनाश को खुद ही हँसी आ गई और अपने मन से मन कहने लगा, 'ये क्या तेरा गाँव या मुहल्ला है, कि नया आदमी देखते ही उसकी मदद के लिए आगे बढ़ेगा, उसका आगे-पीछे का इतिहास पूछने लगेगा? ये मुंबई है मेरी जान, यहाँ कोई किसी का नहीं!'

उसकी इसी उधेड़-बुन के बीच अचानक स्टेशन आ गया था। दरवाज़े पर उतरने वालों की भीड़ लग चुकी थी। वह पीछे रह गया था। देखा तो ठीक उसके पीछे वह महिला और लड़की खड़े थे। किसी बहाव में बहने सा वह लोगों के साथ बह चला। इस तरह उतरते या चढ़ते समय उसे अक्सर एक अजऩबी की कही बात याद आ जाती थी। शुरू के दिनों में एक बार वह अत्यधिक भीड़ के कारण गाड़ी में चढ़ नहीं पा रहा था। किसी की प्रतीक्षा में पास खड़े एक सज्जन ने जब उसे एक के बाद एक तीन गाडिय़ों में चढऩे में असफल होते देखा तो कहा था, 'मुंबई की लोकल ट्रेन में चढ़ते-उतरने की एक टेक्नीक है। पानी पर अपने को किसी तिनके की तरह तैरता हुआ छोड़ कर तुम बस भीड़ में सही पोज़ीशन लेकर खड़े हो जाओ। भीड़ का बहाव तुम्हें अपने आप डब्बे के अंदर या बाहर पहुँचा देगा।' तब से अविनाश प्राय: वैसा ही करता है और इस टेक्नीक की सफलता पर मन-ही-मन हँसता हुआ उन्हें याद कर धन्यवाद भी देता है।

वह दरवाज़े के पास पहुँचा था कि अचानक पीछे से लड़की की असहाय सी चीख सुनाई पड़ी- 'अम्मा अम्मा..!' मुड़ कर देखा तो वे महिला एक सीट के पास कोने में भीड़ के बीच दबी जा रही थीं। लड़की उन्हें वहाँ से निकालने और दबने से बचाने की पुरजोर कोशिश कर रही थी। उन दोनों को लगभग पीसता हुआ भीड़ का रेला बेपरवाह चला जा रहा था।

अविनाश के पैर रुक गए। लोकल ट्रेन स्टेशन पर दस-पंद्रह सेकेंड से ज्यादा नहीं रुकती। ये दोनों इतने समय में उतरेंगे कैसे? बीमार महिला तो अपने को भीड़ में खड़ा भी नहीं रख पा रहीं, छोटी सी बच्ची उन्हें कहाँ निकाल पाएगी? वह नीचे उतरने की बजाय दरवाजे के बीच लगे डंडे को एक हाथ से पकड़ भीड़ के दो-तरफा दबाव का विरोध करते हुए जमकर खड़ा हुआ और दूसरे हाथ से उन महिला को किसी तरह खींच कर कोने से निकाल दरवाज़े के बाहर ठेला, फिर उस लड़की को भीे खींच कर प्लेटफॅार्म पर धकेल दिया।

इस बीच अविनाश के इस हस्तक्षेप की वजह से चढ़ते-उतरती भीड़ के प्रवाह में बाधा पड़ी और कुछ धक्का-मुक्की होने लगी। अविनाश खुद दरवाज़े के बीच वाले डंडे से लगा दोनों ओर से कुछ ऐसे दब के रह गया कि उसका उतरना असंभव हो रहा था। उसका एक पैर अंदर और दूसरा बाहर प्लेटफॉर्म को छूने-छूने को हो रहा था कि गाड़ी चल दी। उसकी आँखों के आगे अँधेरा सा छा रहा था। दिमाग जैसे सुन्न हो गया था। उसी सुन्न अँधेरे में उसे महसूस हुआ कि जैसे किसी ने उसे मजबूती से पकड़ कर खींचा और वह खिंचता चला गया।

आँखों के आगे से अंधेरा छँटने पर उसने पाया कि वह प्लेटफॉर्म पर गिरा हुआ था। उसकी एक बांह किसी के मज़बूत हाथ में थी। उसके बिलकुल बाजू से गाड़ी धड़धड़ाती चली जा रही थी। तेज चलते भागते असंख्य पाँव इधर-उधर आ-आ रहे थे। शोर का एक दरिया उसके ऊपर से गुजऱ रहा था।

थोड़ी देर बाद बाँह को पकड़े उसी मज़बूत हाथ ने उसे खींच कर उठाया और खड़े होने में मदद की। अचानक अपने कान के पास उसे एक खरखराहट भरी कठोर आवाज़ का गर्जन सा सुनाई पड़ा, 'देहात से आए हो क्या?' अविनाश को लगा जैसे उसका कान बिजली का झटका खाकर झिम-झिम कर रहा हो। कुछ सचेत होने की कोशिश करते हुए उसने उस भारी, कोमलता-विहीन स्वर के स्वामी के चेहरे की ओर देखा-मज़बूत कद-काठी का अच्छा लंबा चौड़ा आदमी नजऱ आया। सर पर बिखरे से बेतरतीब बाल और चेहरे पर बढ़ी हुई अधपकी दाढ़ी-मूछें। वेष-भूषा से तथाकथित शिक्षित सफेदपोश वर्ग का नहीं, बल्कि मेहनतकश मज़दूर तबके का लग रहा था। उसके स्वर में भले कठोरता और कुछ गुस्सा भी झलक रहा था, पर आंखों में अविनाश को संवेदना और कोमलता महसूस हुई। जाने क्यों उन आंखों के सम्मोहन में बँधा अविनाश कुछ देर चुपचाप उन्हें ताकता रहा, लगा जैसे उनमें कोई खामोश सी लौ है जो आसपास एक स्निग्ध आलोक फैला रही है।

पहले से कठोरता को भरसक कम करते हुए, फिर भी कुछ विरक्ति भरे स्वर और बम्बइया हिन्दी में उसने कुछ ऐसा कहा, 'ट्रेन छूटने के बाद तुम जिस तरह उतर रहे थे वह बिलकुल गलत और ख़तरनाक था। मैंने बाँह पकड़ के ज़बरदस्ती तुम्हें थोड़ी दूर खींच के दौड़ाया तो तुम बच पाए, वर्ना गाड़ी के चक्कों के नीचे आ जाते या प्लेटफॉर्म पर गिरे भीड़ के पैरों से कुचले जाते। याद रखो ये मुम्बई शहर है, यहाँ पहला नियम है, सबसे पहले अपना सोचो। दूसरे के बारे में पहले सोच कर खुद पीछे रह गए तो खल्लास हो जाने में एक मिनट नहीं लगेगा। किसी के पास टाइम नहीं यहाँ कि रुक के एक मिनिट किसी गिरे हुए को मुड़ के देखे भी... समझे ?'

उस आदमी के चेहरे पर अब भी खीझ का भाव बना हुआ था पर अविनाश का सम्मोहन कम नहीं हो रहा था। वह उसके चेहरे पर से न तो दृष्टि हटा पा रहा था न उसके मुँह से कोई बोल फूट रहा था, जैसे जुबान को लकवा मार गया हो। मन में एक भाव लहरा रहा था, 'हाँ, सच है, आपकी बात बिलकुल सही है। इस शहर में कदम रखने के दिन से ही मैंने इस सच को महसूस किया है। पर इस शहर की हृदयहीन भीड़ में आप जैसे लोग भी तो कहीं न कहीं छुपे हुए हैं ही, जो न सिफऱ्  मुड़ कर देखने का समय निकालते हैं बल्कि सहारा देकर उठाते हैं, समझाते हैं! ऐसा न होता तो शायद आज मुझ अनजान, अजनबी परदेसी का अस्तित्व ही सदा के लिए मिट गया होता।Ó इस भाव को महसूस करते हुए भी वह कह नहीं पा रहा था, जैसे उस पर एक मूच्र्छना सी छाई हुई थी। उस आदमी की आँखों में देखते रहने के सिवाय उसे और कुछ सूझ नहीं रहा था।

इस बीच अविनाश की बाँह को छोड़, अपनी दृष्टि उसके चेहरे पर से हटाता हुआ वह व्यक्ति लंबे-लंबे डग भरता आगे बढ़ गया। अचानक जैसे अविनाश की तंद्रा टूटी और उसे ध्यान आया कि कम-से-कम औपचारिक रूप से धन्यवाद तो देना ही चाहिए था। किंतु तब तक वह आदमी भीड़ में कहीं खो चुका था। कोशिश कर के भी अविनाश जब ढूंढ नहीं पाया तो एक लंबी साँस छोड़ते हुए उसने भी अपने रास्ते पर कदम बढ़ाए।

इस शहर में आने के बाद से ही एक घुटन सी हो रही थी अविनाश को। अपने कस्बे को लौट जाने की तीव्र इच्छा होती थी, बार-बार लगता था कि मनुष्यता से रहित इस शहर में वह अधिक समय रह नहीं पाएगा और अगर रहा तो उसके अंदर का इंसान घुट के मर जाएगा। उस घुटन से अचानक, जैसे किसी जादू की छड़ी के स्पर्श से, उसे मुक्ति मिल गई। उस अजऩबी, शायद अनपढ़ और खुरदुरे आदमी से उसे इंसानियत का शुद्ध ऑक्सीजन मिल गया। वह जान गया कि ऊपर से देखने में भले लगता हो पर यह महानगर पूरी तरह मनुष्यता से रहित नहीं है और उसमें आत्मविश्वास जागा कि वह भी यहाँ, इस अनात्मीय भीड़ में भी, जी सकता है- अपनी मानवता को बिना खोए। सचमुच, जैसे दिल के किसी कोने में एक छोटा सा दिया जल गया हो, चारों ओर एक हल्का बेमालूम सा उजाला फैलाता हुआ। इसी के साथ उसे यह भी महसूस हुआ कि इसी तरह बीच-बीच में कहीं न कहीं, कोई न कोई दीप हमेशा जल ही उठता है, तभी ये दुनिया अभी तक रहने लायक बनी हुई है। हिंसा, घृणा, स्वार्थ, ईष्र्या-द्वेष, अहंकार आदि का अंधकार अब तक मनुष्य को मिटा नहीं सका है, उसके दिल में जलते मनुष्यता के दिये को बुझा नहीं पाया है। 

 

अनुवाद- कुलजीत सिंह

एम 117,गोपबंधु  नगर, छेंड कॉलोनी, राउरकेला-769015 (ओडि़शा) मो. 09437341577