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Sunday 19 Aug 2018

छूता हूं हवा का चेहरा

किसी की याद आती है

तो याद आता है चेहरा ,

कोई क्या चेहरे के अलावा भी

और कुछ होता है ?

ऊपर से नीचे तक

हमारी पूरी देह एक चेहरा है

जिसमें सिमट जाती है जिंदगियां।

 

हवाएं बहती रहती हैं, अपना चेहरा छिपाएं। हमारे पास से गुजरती हैं, हमें छूती हुई मगर नजर नहीं आती। महसूस होती है उसकी गर्माहट, उसकी शीतलता, और उसकी हमारे भीतर स्खलित होती कुनकुनी ताजगी। ताकत। हमें हमसे मुक्त करती हुई शांति। हम उसे पहचानते हैं बगैर चेहरे के। उसे कभी देखा नहीं, मगर उसे अपने से कभी अलग नहीं पाते। वह हमारे भीतर तक जाती है, और हमें हमारे भीतर से कहीं दूर बाहर भी ले जाती है। वह आसमान से उतरती है। पेड़ों पर थिरकती है। सांसों में समाती है। पत्तों में गाती है।

बहुत दिनों तक मैं भी यही समझता रहा कि हवाओं का कोई चेहरा नहीं होता, मगर बहुत जल्दी मेरा यह भ्रम टूट गया। वह एक बरसाती शाम थी। आसमान लगातार फौवारे छोड़ छोड़कर कभी पूरी तरह सड़कों को तर कर देता, और लोग जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाने लगते थे। कभी आसमान फौवारों को रोक देता, लोग राहत की सांस लेते और कदम धीमे कर लेते, कि वह फिर से बौछार मारता, लोग हड़बड़ा जाते। अपने अपने वाहनों को तेजी से दौड़ाने लगते, कुछ पैदल चलते लोग आसपास किसी आसरे की ओर लपक जाते।

उस शाम हम दोनों शहर की सीमा से थोड़ी दूर तक पैदल साथ-साथ चलते-चलते निकल आये थे। वह बहुत कुछ बातें कर रही थी और बीच-बीच में हँंस देती थी जोरों से। मैं बातों में शामिल होते हुए भी बातों से ज्यादा उसमें शामिल था। उसकी हंसी मुझे छू रही थी। उसका दुपट्टा थोड़ा भीगा हुआ था, और भीग कर उससे कुछ ज्यादा ही लिपट गया था। जहां वह चिपका हुआ था, मेरी आँखें भी वहां बार-बार चिपक जाती थीं। अचानक उसने मेरे कानों में कुछ धीरे से कहने के लिए अपने होंठ मेरे कानों के पास लाए, और उसकी सांसों में मैंने पहली बार उस हवा का चेहरा देखा जिसे जिंदगी कहते हैं। हवा के इस चेहरे को मैं भूल नहीं सकता। वह भूलने जैसा है भी नहीं।

हवा का एक और चेहरा याद आता है। गर्मी की दोपहर थी। मैं उदास था। अकेला था। कहीं भीतर कुछ चुभा हुआ था। शायद कोई अपमान। शायद कुछ खालीपन। शायद कोई टीस। मेरे पास करने को कुछ नहीं था। कुछ पुस्तकें उलट-पलट कर रख चुका था। उनके अक्षर तक आंखों में चुभ जाते थे। इस सब की कुछ खास वजह थी। अचानक बिजली चली गयी और पंखा चलते-चलते रूक गया। कुछ देर बाद पूरी देह पसीने-पसीने हो गयी। लगता था हवा कहीं नहीं है। मैं अब हवा की अनुपस्थिति को महसूस कर रहा था, हालांकि वह कभी भी कहीं भी अनुपस्थित नहीं होती। बस रूक जाती है। थम जाती है। उसकी आहट तक नहीं आती। मैं उसके लिए एक छटपटाहट महसूस कर रहा था। कितना मुश्किल था सब कुछ। एक असहजता। एक घबराहट। एक पसीने की चिपचिपाहट और गीलापन! अचानक वह किसी खिड़की से आयी। वह बहुत आगबबूला थी। पहले उसने दरवाजा भड़भड़ाया था, मगर वह भीतर से बंद था। वह खिड़की से कमरे को रौंदती हुई आयी और मेरी आंखों में धूल सा कुछ डाल गयी। कुछ पत्ते वह नोंच लायी थी किसी पेड़ से वह जो अब मेरे कमरे के फर्श पर छटपटा रहे थे। मेरी मेज पर रखी किताबें फडफ़ड़ा उठीं। मैं चौंक गया। वह गर्म थी मगर मेरा पसीना सुखा रही थी। अचानक उसी तपी हुई हवा का तपा हुआ माथा मैंने अपने कंधे पर महसूस किया। उसे छूते ही उसका चेहरा मेरी हथेली में आ गया। वह एक खाली चेहरा था। उसमें आंखें नहीं थी। सिर्फ  एक हरारत थी, जो गोल होकर चेहरा बन गयी थी। क्या यह हवा का चेहरा था? पर उस दिन कितना अलग लग रहा था?

धीरे धीरे उस निराकार चेहरे को मैं पहचानने लगा। चेहरे को आकार में पहचानने वाली मेरी अभ्यस्त आंखें भी अब अपनी आदतें बदल रही थीं। मैं कई बार अपना चेहरा  भी आइने में छुपा देता और कमरे की रोशनी गुल करके आइने पर थोड़ा सा अंधेरा लपेट देता। मेरी आँखें अंधेरे में उस परछाई को टटोल लेती थीं जिसका आकार चेहरा कहलाता है। वह आकार नहीं था, पर फिर भी वह पहचाना जाता था। यह हवा का नहीं, मेरा अपना चेहरा था। मगर एक परछाई में तब्दील होते ही उसकी पहचान बदल जाती थी। धीरे धीरे मैं समझ गया कि चेहरे के आकार में अहंकार बार-बार अपने रंग बदलता है। कभी इंद्रधनुष की तरह रोमांटिक कभी पत्थर की तरह भावहीन। कभी झरने की तरह गाता हुआ , कभी एक हिंसक दांव की तरह मुस्कुराता हुआ।

एक दिन मैं भाषा के जंगल में रास्ता भूल गया। चेहरे को आनन भी कहते हैं। संस्कृत और उसकी दुहिता भाषाओं में चेहरे को मुख कहते हैं । मुख शब्द कभी स्त्रीलिंग नहीं होता। वह अच्छा होता है, बुरा होता है , काला या गोरा होता है , पर कभी स्त्रीलिंगी नहीं होता। लेकिन अरबी, फारसी, या उर्दू में ऐसा नहीं है । वहां पुल्लिंग शब्द चेहरा है तो स्त्रीलिंग शब्द शक्ल भी है, और सूरत भी है । जो अच्छी या बुरी भी हो सकती है। अंग्रेजी में तो वह उभयलिंगी फेस है। आखिर ऐसा क्यों? मैं सोचता रह गया!

मुख शब्द का अर्थ है  ''अग्र'' । इससे प्रमुख शब्द भी बना है। जो आगे रहता है। जैसे सेना प्रमुख सेनापति। मुख का मतलब है अगवाड़ा । अगवाड़ा पन अहंकार से पैदा होता है। अहंकार में पौरूषिकता है। इसीलिए अंग्रजी में फेस करना एक क्रियापद है जिसका अर्थ है - सामना करना। उर्दू में मुख शब्द सीधे सीधे भले ही न उपयोग होता हो, पर मुखातिब होने में मुख आ ही जाता है। इसीलिए चेहरा व्यक्तित्व के अहंकार का होता है। चाहे वह आकार में हो या निराकार में। सूरत शब्द एक बहुरूपिया शब्द भी है जो मूरत की जगह ले लेता है। मूरत यानि मूर्ति! इसलिए लोग अपनी तस्वीर या मूर्ति में रस लेते है। यह सब अहंकार का ही तो खेल है। यह चेहरा सिर पर सवार रहता है। युद्ध में पहले रथी, महारथी, शत्रु के रथ , घोड़ें या हाथी पर हमला किया जाता था ताकि शत्रु को कमजोर किया जा सके। जैसे संतों ने सीस काटि भुई मंह धरे तब प्रविस गृह माही कहकर उस आदमी को फटकारा था जो प्रेम के घर को अपनी खाला का घर समझकर घुसा चला आ रहा था।

अहंकार स्वाभाविक रूप से पौरूषीय होता है। स्त्रैणता के जगते ही समर्पण आता है। अहंकार विगलित होने लगता है। इसके इस रूप को जानने के बाद उत्सुकता जगती है कि यदि चेहरा पौरूषीय अहंकार का प्रतीक है तो फिर स्त्री, अपने चेहरे में अनुरक्त क्यों रहती  है? उसे अपने चेहरे की चिंता क्यों होती है, सबसे ज्यादा? सौंदर्य समस्त प्राणियों का ऐश्वर्य है। स्त्री हो या पुरूष सभी इस संपदा से संपन्न होना चाहते हैं। जिसके पास रूप की जितनी संपदा होती है, उतनी ही उसकी विशिष्टता, और मान बढ़ जाता है। स्त्री के भीतर भी एक अप्रकट पौरूष होता है। जो अप्रकट है वह प्रकट से अधिक बलवान होता है। रूप के विद्युतीय मोह से आविष्ट स्त्री का अहंकार ही अपने राम को स्वर्ण मृग के पीछे अपना सराशन लेकर दौड़ाता है, बदले में स्वयं को लुट जाना भी पड़े , तो वह पीछे नहीं हटता।

जब मैं हवा का अमूर्त चेहरा महसूस करता हूं तो यह धारणा हवा हो जाती है कि चेहरे का आत्यंतिक संबंध अहंकार से है। हम देवी देवताओं की मूर्तियों में जिस चेहरे को देखते हैं उनमें अहंकार की छाया भी नहीं होती। सहज मुस्कुराहट से सजे शिशु मुख, मातृत्व छलकाती माताएं, राखी बांधती बहनें या प्राण समर्पिता प्रेयसी के चेहरे को भी अहंकार की हवा भी नहीं छूती। सुबह की शीतल हवाएं, सांध्य पवन, सागर की लहरों को गोद में लेकर झूमती झंझाएं और अग्नि की परम सखा पवमान इस हवा के कितने चेहरे हैं। कभी यह इन्द्र की सारथी बनती है। फूलों के लिए बनती है- गंधवाह। सौरभवाह। यह चंचल जगत की चंचल जगदाधार नित्यगति है। निरूप है। ऋषियों की मातरिश्वा है । वृश्णि है। धूल की ध्वजा धारण करने वाली ''धूलिध्वज'' है तो यह समीरण प्रभंजन स्वरूपा भी है। यह आंधी के रूप में आती है तब अंबाझोर, चंडवात, अंधड़ आदि कितने नामों को धारण करती है। यह उदघूर्ण होकर चक्रवात उठाती है तो मलयानिल बन कर मन का ताप भी हरती है। शायरों की प्रिय नसीम और सबा, जब यह पूरब से चले तो पुरवाई, पश्चिम से चले तो पछुआ । कितने रूप धरती है । यह निराकार चेहरे वाली है। इस चेहरे को देखना संभव नहीं, पर इसे मैं छूकर महसूस कर सकता हूं। अपनी हथेली पर उसका चेहरा धरकर उससे प्यार कर सकता हूं, और उसे अपनी सांसों में प्राणों की तरह महसूस भी कर सकता हूं। इस चेहरे में किसी अहंकार की छाया नहीं, आप चाहें तो इसे आप भी छूकर देख सकते हैं।