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Tuesday 19 Jun 2018

तीन कविताएँ

युन्ना मोरित्स , 1937 में कियेव में जन्म

1954 में पहली कविता प्रकाशित

सर्वाधिक प्रतिभाशाली रचनाकारों के रूप में प्रचलित   । 

 

जब चुप रहने के लिए कुछ नहीं

 

जब चुप रहने के लिए कुछ नहीं,

हृदय में रिक्तता का दुख

हम डूबते जहाज की खपचियाँ हैं।

जब चुप रहने के लिए कुछ नहीं

रम्भाओ, बिना जाने कि शुरुआत कहाँ से करें

उठ जाओ,जकड़ी हुई जबान के रास्ते से,

पर उठ जाओ इस विरक्ति के लंगर पर।

जब चुप रहने के लिए कुछ नहीं

हाँ, मौन से बाहर निकल कर बहशी हो जाओ

लेकिन उस गहराई से बाहर निकलना

जब प्रेम होंठों को भींच लेता है

तब कुछ बच जाता है, चुप रहने के लिए।

इतना ज़्यादा देने का वचन न देना

अविश्वसनीय होती है इस तरह की सरलता,

उसके पास चुप रहने के लिए कुछ भी नहीं

छल करती है समुद्र में खनखनाती, चिड़कती कौडिय़ाँ।

झूठ बोल रही होती जैसे गलियारे में

तब उनके पास चुप रहने के लिए कुछ भी नहीं होता ।

सबसे ज़्यादा बोझिल होते हैं वे क्षण

जब मुलाकात होती है अतिऔपचारिक मुखौटे से

जिसके मुंह पर कसकर बंधी होती पट्टी

जैसे कि उसके पास कुछ है चुप रहने को।

 

घातक है काव्य-देवी को ऊबाना

मूर्खतापूर्ण उत्साही हर्षोल्लास से!

वह चुप रहती है घृणापूर्ण मुस्कान लिए-

जब कुछ नहीं होता हमारे पास कहने को।

अभिजात बकवास की वीरता को

क्षमा करने का कोई इरादा नहीं होता उसका।

सिहर उठती है वह,बंद कर देती है कान-

उसके कानों पर चीखने का कोई लाभ नहीं।

होगा यह कि बंद कर देगी सोच-समझकर

हमारी प्रतिभाओं को आलोकित करना,

जो ताजा है उसमें खट्टास आ जाएगी,-

और तब हमारे पास कुछ नहीं होगा चुप रहने को !

1976

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चमकती बर्फ से

चमकती बर्फ से

खिली हुई घाटी से

उल्लास भरे आलोक से

जादुई अक्षर से

मुझे बुलाया है जीवन में

दहकते गह्वर में

किसी दूसरे द्वारा नहीं,बल्कि स्वयं पहरा देते  

सृजन के देवता द्वारा। 

 

किसी दूसरे द्वारा नहीं, बल्कि स्वयं पहरा देते  

सृजन के देवता द्वारा 

मौत की ड्योढ़ी के पीछे 

बुलाया जाएगा मुझे

निष्पक्ष निर्मम  न्यायालय में

हर प्रश्न का उत्तर देने के लिए

अहंकार भरे मुस्कराहट से नहीं

कटुता भरे जोश से नहीं

फैसला टाला नहीं जायेगा किसी भी तरह ,

क्षमा कर दिया जाएगा मुझे

दया की जायेगी मुझ पर बहुत कुछ के लिए

किसी दूसरे द्वारा नहीं ,बल्कि स्वयं पहरा देते  

सृजन के देवता द्वारा !

      

किसी दूसरे का नहीं, बल्कि स्वयं पहरा देते  

सृजन के देवता का !

स्नेह प्राप्त रहा है मुझे ,,

वह मुझे भूला नहीं

उसका स्नेह और संरक्षण प्राप्त रहा है मुझे ,

 

मारा गया मुझे पर इतना नहीं कि मर जाऊं

गहरी यंत्रणाओं के बीच ,

किसी दूसरे का नहीं, बल्कि स्वयं पहरा देते  

सृजन के देवता का !

स्नेह प्राप्त रहा है मुझे ,,

 

किसी दूसरे का नहीं, बल्कि स्वयं पहरा देते  

सृजन के देवता का आदेश है

बांसुरी बन जाऊं,बजाया जाने वाला सींघ बन जाऊं ,

उल्लास भरे आलोक से

जादुई अक्षरों से

किसी गड़ेरिय़े, किसी मछेरे,

किसी लकड़हारे के होंठों पर

 

बांसुरी बन जाऊं,बजाया जाने वाला सींघ बन जाऊं ,

उसके द्वारा आदेश है

कि  मैं भ्रमण •रती रहूँ  

तरह तरह की राहों से

यह आदेश है

किसी दूसरे का नहीं , बल्कि स्वयं पहरा देते  

सृजन के देवता का ।

(1976)

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जो सुन्दर है कभी व्यर्थ नहीं होता

(बुलातअकुझावा के लिए)

 

जो सुन्दर है कभी व्यर्थ नहीं होता

नहीं फलते-फूलते होते उन अन्धकार के वर्षों में भी

व्यर्थ हैं चिनार के वृक्ष, विलो के पेड़,

और न ही पोखरे के फूल।

      

कुछ भयावह होने के बावजूद,

बहती नहीं है काली छायाओं से घिरे होने पर भी

तरंगे,गीत और व्यर्थ की यह आभा,

व्यर्थ के आंसू और दिन।

 

तरह तरह की मुसीबतें आई हमारे जीवन में

एक बार ही नहीं उन काली शताब्दियों में

व्यर्थ की रई, व्यर्थ की शाश्वतता

व्यर्थ है चूसनियों का दूध।

 

बात साफ है, साफ है

यही, और कहीं भी नहीं,कभी नहीं

जो सुन्दर है वह व्यर्थ नहीं!

इसलिए तो हम खींचे चले जाते हैं इधर।

रहस्यमयी शक्ति, प्रभावशाली जादू

उस पार से बादलों से, तारों की पुकार!

जो सुन्दर है,वह व्यर्थ नहीं

जैसे आज के दिन, वैसे ही भविष्य में भी।

(1979)

अनुवादक -शीतांशु भारती

शोधकर्ता

सेंटर फार रशियन स्टडीज़

जवाहरलाल नेहरू वि.वि.,नई दिल्ली-67