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Friday 14 Dec 2018

सौ साल बाद: प्रेमचंद की कहानी \'पंच परमेश्वर’

प्रेमचंद की 'पंच परमेश्वर’ बिल्कुल आरंभिक कहानी है। सरस्वती के जून, 1916 अंक में यह पहली बार प्रकाशित हुई। इसके द्वारा वे हिंदी-मंच पर कहानीकार की तरह पहचाने गए। 'ईदगाह’ की तरह प्रेमचंद की यह ऐसी रचना है जिसके जरिए हर पीढ़ी का पहला 'परिचय’ प्रेमचंद से होता है। हिंदी के स्कूली पाठ्यक्रमों में इन कहानियों को प्राय: किसी न किसी दर्जे में पढ़ाया जाता है और विश्वविद्यालयों में भी पढ़ायी जाती हैं। इन कहानियों में इतनी सरल सहजता है कि बच्चे भी रुचि से पढ़-समझ लें और कहानी के देशकाल, समाज और कला से जुड़े निहितार्थों को उसके अन्य अध्येता भी चर्चा-समीक्षा कर लें। 'पंच परमेश्वर' के प्रकाशित होने के पहले 1915 में गुलेरी जी की 'उसने कहा था' अपनी कला और मूल्य से चमत्कृत कर सबका ध्यान खींचे थी। प्रसाद जी की कहानियाँ भी चर्चा में थीं। ऐसे समय प्रेमचंद की यह कहानी शिल्पकला की दृष्टि से साधरण लग सकती है। अपनी सहज कहानी कला द्वारा प्रेमचंद ने स्वाधीनता के मुक्ति आंदोलन और नए राष्ट्र के निर्माण में अपने पात्रों को उपस्थित कर, अपनी सैकड़ों कहानियों में रचनात्मक संधर्ष की यात्रा इस कहानी से शुरू की। वे अपने कथा लेखन की निरंतरता में जल्दी ही हिंदी कहानी के केंद्र में आ गए। लिखे जाने के सौ साल बाद भी 'पंच परमेश्वर' पर कुछ विचारणीय बिंदुओं की दृष्टि से गौर करना जरूरी लगता है।

 यह कहानी प्रेमचंद के आदर्शवादी ढाँचे में है। पात्र और परिस्थितियाँ यथार्थ के मुकम्मल धरातल पर हैं। पर उनकी परिणिति आदर्शजनक लेखकीय सपने के अनुरूप हैं। प्रेमचंद का ही दिया 'आदर्शोंन्मुख यथार्थवाद' यहाँ पूरी तरह सार्थक है। इस कहानी की बनावट बेहद एकरेखीय, पर भारतीय कथा की विरासत के निकट है। कहानी का पहला वाक्य 'जुम्मन शेख और अलगू चौधरी में गाढ़ी मित्रता थी।' किस्सा कहने के पारंपरिक ढंग 'एक राजा और रानी थेÓ जैसा ही है। अपने समय और वास्तविक ग्रामीण पात्रों को लेकर प्रेमचंद अपनी विरासत का इस्तेमाल आधुनिक कहानी के निर्माण में कैसे करते हैं- यह कहानी पहला उदाहरण है। आरंभ में ही प्रेमचंद जुम्मन शेख और अलगू चौधरी की मित्रता का मूलमंत्र बतलाकर समाज में उनकी प्रतिष्ठा का कारण 'विद्या' और 'धन' को बताते हुए दो विरोधी प्रतीकों को मित्रता के रूपक में ढालते हैं। फिर कथानक के मुताबिक कहानी में परिस्थतियों का निर्माण होता है। अपनी मिल्कियत जुम्मन के नाम लिखने के बाद की बेरुखी से तंग आकर और जुम्मन की प्रतिष्ठा के गुरूर को चुनौती देकर बूढ़ी खाला अपने हक़ के लिए पंचायत करने का फैसला करती है। गाँव-गाँव घूमकर लोगों को पंचायत में आने का न्योता देने के बाद खाला अलगू से भी दरियाफ्त करने पहुँचती है। यहाँ दोनों के संवाद कहानी की अगली यात्रा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। अलगू कहते हैं- 'यों आने को आ जाऊंगा, मगर पंचायत में मुंह नहीं खोलंूगा।' खाला के प्रश्न करने पर आगे कहते हैं कि 'जुम्मन मेरा पुराना मित्र है। उससे बिगाड़ नहीं कर सकता।' खाला का दिया उत्तर- 'बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?' यह वाक्य अलगू के अंतर्मन को झकझोर डालता है। पंचायत होने पर अलगू ही सरपंच होते हैं और फैसला खाला के पक्ष में होता है। अब दोनों मित्रों की दोस्ती में फाँक पड़ जाती है। आगे कथानक का अगला मुकाम आता है- अलगू से समझू साहु द्वारा बैल खरीदने का प्रकरण। बैल के मर जाने के बाद समझू उसके दाम अदा करने से मुकरते हैं। लोगों के समझाने पर फिर पंचायत की जाती है। अबकी सरपंच का उत्तरदायित्व जुम्मन को मिलता है। लेकिन वे सबकी उम्मीद के विरुद्ध फैसला अलगू के ही पक्ष में देते हैं। अलगू द्रवित होकर जुम्मन से लिपट पड़ते हैं। अंत में प्रेमचंद लिखते हैं- 'मित्रता की मुरझाई हुई लता फिर हरी हो गई।' यह कथा का आखिरी आदर्श वाक्य है। विरासत की सुखांत कथाओं की तरह लगभग शुभता की सदेच्छा करता आदर्श कथन 'जैसे उनके दिन फिरे, सबके फिरें' कहता हुआ। इस तरह पूरी कहानी की बनावट में अपनी कथा परंपरा का बेहद आत्मीय स्वीकार है।

         कहानी के पाठ में शीर्षक की सुपरिचित व्याख्या निहित है। यह पहले उर्दू में 'पंचायत' नाम से ही लिखी गई थी। कहते हैं उस समय हिंदी कम जानने के कारण, प्रेमचंद ने किसी की सहायता से हिंदी अनुवाद करा कर 'सरस्वती' में भेजी थी। अंदाज लगाया जा सकता है कि सरस्वती के तत्कालीन संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के भाषिक संशोधन की छाप भी उस पर पड़ी हो! गौर करें तो कहीं-कहीं पात्रों के अनुकूल भाषा नहीं है। कहीं उर्दू शब्द असंगत लगते हैं तो कहीं तत्सम बहुलता खटकती है। इसके चलते पंचायत और न्याय के भरोसे पर आस्था के रूप में, उसके आदर्शवाद की छाया कहानी में अनेक स्थानों पर है। प्रेमचंद का औपनिवेशिक शासन में कायम हुई न्याय-व्यवस्था में विश्वास नहीं था, जो गरीबों के लिए महँगी और ग्रामीण जनता से काफी दूर थी। वहाँ अँग्रेजी का वर्चस्व भी बड़ी बाधा थी। अत: वे गाँव के छोटे-मोटे झगड़ों और मामलों के निपटारे के लिए पारंपरिक पंचायतों को ही पर्याप्त मानते थे। कथानक के हर जरूरी अवसर पर वे किसी न किसी तरह उसका उल्लेख कर ही देते हैं कि पंच में परमेश्वर वास करते हैं या उनके मुख से खुदा बोलता है। जाहिर है वही कहानी का प्रमुख प्रतिपाद्य भी है। इस रूप में कहानी की चर्चा सर्वमान्य और बहुख्यात है। 

       कहानी के एक और पक्ष की संभवत: चर्चा कम हुई है- इस कहानी में दो मित्र पात्रों का चुनाव एक मुस्लिम और एक हिंदू के रूप में अकारण नहीं आता! अंग्रेजी शासन के समय हिंदुओं और मुसलमानों को अलगाना अंग्रेजों की साम्राज्यवादी रणनीति का हिस्सा तो था ही, उसी समय आर्य समाज का शुद्धतावादी आंदोलन भी चल रहा था। प्रेमचंद आर्य समाज के सदस्य थे और उन्हें इसके द्वारा उठाए गए बहुत से मुद्दों में दिलचस्पी भी थी। लेकिन मुसलमानों को म्लेच्छ और विदेशी समझकर शुद्धिकरण आंदोलन चलाना न गंवारा था। वे ऐसे संकुचित या कट्टर विचारों के विरोधी थे। उनके सरोकार और कथाभाषा भी ऐसे विचारों को खारिज़ करते हैं। वे मानते थे कि शुद्धता के विचार से प्रेरित गतिविधियों से हिंदू-मुस्लिम के बीच खाई पैैदा होगी और भारतीय समाज की साझा विरासत का ताना-बाना टूटेगा। स्वाधीनता की लड़ाई हिंदुओं और मुसलमानों की साझा लड़ाई थी। 1916 में लिखी इस कहानी में प्रेमचंद जुम्मन शेख और अलगू चौधरी की गाढ़ी दोस्ती के जरिए भारतीय समाज के हिंदू-मुस्लिम एका और साझेपन का एक वास्तविक चित्र सामने रखते हैं। वे इसके जरिए आर्य समाज वालों को जैसे उनका अपनापा दिखाते हैं। सांकेतिक रूप से वे कहना चाहते हैं कि शुद्धतावादी कार्यवाहियों से मुस्लिमों को ठेस पहुँचेगी और हिंदुओं से उनके संबंधों में दरार पड़ेगी। इसके अलावा सांप्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध भी जुम्मन-अलगू की प्रगाढ़ दोस्ती की एक मिसाल है। और उसका हवाला प्रेमचंद ने कहानी के आरंभ में ही दे दिया है- '....साझे में खेती होती थी। कुछ लेन-देन भी था। एक को दूसरे पर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज़ करने गए थे, तब अपना घर अलगू को सौंप गए थे; और अलगू जब कभी बाहर जाते तो जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते थे। उनमें न खान-पान का व्यवहार था, न धर्म का नाता; केवल विचार मिलते थे। मित्रता का मूलमंत्र भी यही था।' आजादी के बाद से लेकर आज तक बार-बार इसी 'विचार' को तोडऩे के सियासी खेल चले हैं। सांप्रदायिकता के अनेक उभारों ने जो हालात पैदा किए, वे किसी से छिपे नहीं हैं। इस महादेश में सामाजिक सद्भाव के लिए सांप्रदायिकता एक बड़ी चुनौती है। धर्म और सांप्रदायिकता को लेकर प्रेमचंद के सुचिंतित विचार हैं- अपने रचनात्मक लेखन में भी वे बराबर इस ओर प्रेरित करते हैं। 'पंच परमेश्वर' बिना कुछ अतिरिक्त कहे हमारी साझी सांस्कृतिक-सामाजिक विरासत की ओर संकेत करती है। वर्तमान की हिंसक सांप्रदायिक घटनाओं को देखकर पंच परमेश्वर जैसी कहानियों को सिर्फ  अबोध आदर्श की सरल-सहज और कला की दृष्टि से साधारण कह कर किनारे नहीं रखा जा सकता! आज उनका मूल्य नए सिरे से उभर आता है।

          प्रेमचंद ने कहानी को रोमांटिक भाव-संवेदन और कतिपय आभिजात्य संस्कारों के समानांतर सामयिक चिंताओं और वृहत्तर जीवन संदर्भों से जोड़ा, तभी सामाजिक सोद्देेश्य और यथार्थवादी भूमिका पर कहानी के संभावनावान रास्ते फूटे। उन्होंने पंच परमेश्वर के बाद सैकड़ों ऐसी कहानियाँ लिखीं जिनमें लेखकीय निष्कर्ष या हृदय परिवर्तन की भूमिका पर कहानी का अंत है। उन्हें प्रेमचंद के आलोचकों ने आदर्शवादी खाँचे में रखकर कला की दृष्टि से अपरिपक्व कहा। प्रेमचंद ने अपनी ही सीमाओं का अतिक्रमण कथायात्रा के अगले मुकामों पर श्रेष्ठ कलात्मक और यथार्थोन्मुख कहानियाँ लिखकर किया। प्रेमचंद के आलोचकों और अध्येताओं के वर्गीकरण अपनी जगह है। पर कला की दृष्टि से साधारण कही जाने वाली कहानियों का भी अपने आंतरिक सौंदर्य के कारण कम महत्व नहीं है। दो अलग धर्मों के अभिन्न मित्रों की दोस्ती, नैतिकता और न्याय की विजय कामना कर प्रेमचंद अपने समय और समाज के नव निर्माण का ही सपना देख रहे थे। आजाद देश के इस निर्माण में यतीम, बेसहारा और पीडि़त वर्ग को हक़ और न्याय मिलना जितना जरूरी था, उतना ही हिंदू-मुस्लिम का भाईचारा। प्रेमचंद के उस सपने की अहमियत आज भी कम नहीं हुई है। इस कहानी की सामाजिकता और सौंदर्यबोध भारतीय पारिवारिक जीवन से भी जुड़ी है। जहाँ वृद्धजनों के सम्मान और हक़ का सवाल सर्वोपरि है। प्रेमचंद भारतीय संयुक्त परिवार संस्था को टूटते नहीं देखना चाहते। पर वे इस कहानी में 'खाला' और 'बूढ़ी काकी' में 'काकी' के द्वारा इन ख़तरों की ओर संकेत करते जान पड़ते हैं। हालांकि 'पंच परमेश्वर' की संरचना प्रेमचंद की अन्य पारिवारिक जीवन की कहानियों से बर्हिमुखी है- वह देशकाल की आहट को भी अधिक समेटे हुए है।