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Tuesday 19 Jun 2018

रचना संभावना है

साहित्यक संदर्भों पर, माने कई गणमान्य पाठकों को एक साथ संबोधन करते समय औपचारिकता और विनय प्रकट करने के कई तरीकों से सभी परिचित होंगे। जिनके प्रति श्रद्धा और भक्ति की सामयिक जरूरत हैं, उन्हें खुश करने का भी यह अवसर है। अवसर मिलते ही महाशयों का कीर्तिगान करनेवाले साहित्यिक ठेकेदारों के युग में शंका होती है कि कैसे सबका समान रूप से प्रणाम करे, जिसमें किसी को छोड़ देने का अंदाजा नहीं हो। मुश्किल है। सभी समान नहीं है, हर जगह यही स्थिति है। एकदम अपरिचित और दूर, अकेला और बैसाखियों व सहचरोंविहीन रहने के कारण प्रणाम औपचारिक निकल आने की दिक्कत भी है।

यह विशेषज्ञों का युग है, विशेषज्ञता पर सभी इतराते हैं। यहां पर साहित्य नहीं है, कविता, उपन्यास, कहानी, आलोचना आदि हैं। हर कहीं श्रेष्ठता पर गुटबाजी चलती है, कवि की प्रशंसा की जाती है तो उपन्यासकार या कहानीकार अपने हक में उठ खड़ा होता है। एकाधिक विधाओं की मिश्रित विशेषज्ञता भी मनाई जाती है। कभी यह भी सुनने को मिलता है कि सब श्रेष्ठ हंै, पर साहित्यिकता की चोटी उपन्यास लेखन है। वह आधुनिक युग की प्रतिमान विधा है। यहां पर साहित्यिक पुरस्कार के लिए भी आवेदन तैयार किया जाता है, सुना है जीवनवृत्त तैयार करने में दक्षता-विशेषज्ञता दिखानेवाले हैं, उसके बाद मिलना जुलना है, जुगाड़ करना है। कविता लिखी जाती है या घटित होती है। साहित्यकार जन्म लिया जाता है या निर्मित किया जाता है, दोनों पर विवाद की जरूरत नहीं है। दोनों एक साथ अपने परिसर में देखने को मिलते हैं! साहित्यकार भी बनाया जाता है। छिटपुट लेखन शुरू करने से यदि आप पर किसी बड़े साहित्यिक राजा की कृपादृष्टि है तो उनके प्रयास में पत्रिका, बाजार और परिसर आपको साहित्यकार सिद्ध कर देंगे। साहित्यिक बंधु आपके साथ हैं तो पुरस्कार आपको मिल जाएगा। एक युगप्रतिनिधि मलयाली फिल्म है-प्रान्चियेट्टन एण्ड द सेयिन्ट। उसमें नाम कमाने वास्ते भगदड़ करनेवाला एक भोलाभाला धनवान नायक है। दोस्त उसे बताता है कि पद्मश्री मिलने से उसका नाम हो जाएगा। वह उसका भी इंतजाम करता है। उसके लिए वह राजनीति के दलाल को पांच करोड़ रूपए देता है। बीच में उसके लिए इंतजाम करनेवाले उस नामी, प्रभावी समाजसेवक व लेखक कहे जानेवाले दलाल से वह अपने निष्कलंक अंदाज में पूछता है-सही व गलत मायनों पर पदक प्राप्त करने से कोई अंतर है क्या? गुरूगंभीर आवाज में उत्तर आता है-मिला पदक देखते समय सही होने पर मन में खुशी आती है तो हड़पा माल देखने पर घबराहट सी आ जाती है। वह यह भी जोड़ देता है कि इस वक्त, इससे ज्यादा मैं तुमको कुछ ज्यादा विस्तार नहीं दे पाऊंगा।

इतने सारे साहित्यकार और लिखनेवाले होते हुए भी किसी पुरस्कारार्थ लोगों को क्यों ढूंढना पडता है, घोषणा के बाद देने वालों को क्यों गाली सुननी पड़ती है? घोषित पुरस्कार भी वापस लेने या कराने की नौबतें आती क्यों? उत्तर साफ  है, यहां पर सिर्फ  नौसिखिया लोग हैं। पुरस्कार सिर्फ  एक प्रोत्साहन है, कीर्तिमान नहीं है।

उच्च शिक्षा, विशेषकर साहित्यिक व मानविकी विषयों से संबन्धित केन्द्रों, संस्थाओं व समितियों को निकम्मा लोग अड्डा बनाकर रखते हैं। कुर्सी के धनी, दिल के गरीब लोग वेतनमान पर अहंकार करते हैं, स्वार्थ के अलावा कुछ खास नहीं करते हैं। इने गिने लोगों के योगदानों व परिश्रमों के बल पर शैक्षणिक संस्थाएं चलती हैं। अजीब है यह देश, जिन्हें अध्यापकीय चेतना स्वायत्त है, उन्हें अध्यापक नहीं बनाया जाता है, जिनमें वह नहीं है, वे यू जी सी से हक के नाम पर बिन काम वेतन अदा करते हैं, कुर्सियों का खेल खेलते हैं। साहित्यिक गद्दियों का भी यही हाल है। इसके चलते छितरे और एकल चलनेवाले परिश्रमी लोगों पर खेमेबंद आक्रमण होता है और संस्था ही खेमे के कब्जे में चलती है।

 रचनात्मकता का उपयोग किसका, किसलिए व क्यों है। करोड़ों रूपए बहाकर बनाई जानेवाली फिल्मों की शक्ति सोचिए, उनके प्रश्न पूछने की क्षमता पर आकलन कीजिए। कोई किताब आती ही उस पर फिल्म बनाने की खबर आती है। चेतन भगत की किताबें इतनी लोकप्रिय क्यों हैं? क्या वे भी सिर्फ नाम और पैसे के वास्ते ही लिखते हैं। उनकी रचनाओं में प्रश्न पूछने की शक्ति नहीं है?

गांधीजी पर जब भी सोचती हूं, तरस आता है। सब विदेशी मेहमान आते ही उनका नाम लेते हंै। गांधीजी सबसे अधिक आदर का पात्र हैं, हमेशा ऐसा है। पर लगता है सबका यह पादस्मरण आदर नहीं, न किसी प्रकार की पूजा। क्यों याद करते हैं आप उन्हें? अपने लिए, औपचारिकताओं की पूर्ति के लिए। गांधीजी आपका सॉफ्ट टारगेट बनते हैं। है न? धत, रिश्वत देनेवाले हाथों तथा हवाला के बण्डलों में गांधीजी का दम जरूर घुटता होगा। बड़ी बात आपको खुश करती है तो उस पर लिखते हैं, दुनिया पर सोचविचार के अंदाज में आप पत्रिकाएं निकालते हैं। आपकी खुशी का मतलब महत्वाकांक्षा है, जो कई दफा आक्रान्तता और अनैतिक इच्छा है, और कुछ है तो बाद में। आप बड़े लोगों का स्मरण और उद्धरण करते हैं जरूर, आत्मबचाव के लिए।

आज का आत्मघोषित साहित्यकार डरता है कि बराबर प्रचार में नहीं लगे रहने से कोई उसे याद नहीं करेगा। फेसबुक से हटने से विस्मृत हो जाएगा। दिन में तीन बार पोस्ट डालकर वह अपने सोचने-विचरने व साहित्यिक प्रतिबद्धता का प्रचार करता है। हालिया तुलसीरामजी की असामयिक मृत्यु की दुखद खबर फेसबुक में मिली। नीचे लिखा था कि इस पोस्ट पर लाइक न करें, केवल श्रद्धांजलि सूचित करें। देखा, फटाफट आए ढेर सारे लाइक्स। हमारे पास समय कहां है, हम अर्थी  के लिए नाचनेवाली पीढ़ी हैं। उस अर्थ में भाग्यवान है मुक्तिबोध या निराला, वे कभी फेसबुक में नहीं थे, फेसबुक भी उनकी साहित्यिकता के सामने कभी मोहजाल नहीं बिछा सका। बच गए वे, संचारक्रान्ति के इस सुखलोलुपता व बाह्याडंबर से बच गए। दीन-हीन मरे और कुछ लेकर नहीं गए, जैसे यहां पर आए थे। यही बात गांधीजी की भी है। फेसबुक पर घंटा प्रतिघंटा में पोस्ट आता रहता है कि मेरी कविता पढ़ो, कितनी अच्छी है। पचासों व सौओं बार खुद 'लाइक' करता है, अध्यापकीय कवि है तो विद्यार्थियों व दोस्तों को प्रशंसा की बौछार लगाने व खुश करने का अवसर देता है। आजकल विद्यार्थी या दोस्त भी कुछ पीछे नहीं हैं। फटाफट पढ़े या सोचे बिना यशोगान में शरीक होते हैं। अवसरों के उपयोग का यही मतलब है। अजीब है, यहां पर जिनके पास अवसर है, वे दुरूपयोग करते हैं और जिन्हें अवसरों की जरूरत है, उन्हें दिया ही नहीं जाता है। सच्चा अध्यापकीय जीवन इतने संकट में पहले कभी नहीं था। कुछ समय पहले तक किसी कबीले में कार्यरत प्राथमिक स्कूल का हेड मास्टर समाज में बडे आदर का पात्र था। अब वाइस चांसलर का नाम सुननेे पर लोग मुंह बनाते हैं, होंठ मोड़ते हैं। कम से कम केरल की स्थिति यह है कि यहां के विश्वविद्यालयों में वाइस चांसलर बनने के लिए कोई स्वाभिमानी इंसान आज तैयार नहीं है! इसलिए नहीं कि वे डरते हैं, इसलिए है कि वे आत्मसम्मान रखना चाहते हैं। अपराधियों व राजनीतिक दलालों के साथ बैठना और राज करना नहीं चाहते हैं। दस साल पहले वाइस चांसलर के आगे केरल के मुख्यमंत्री उठ खड़े होते थे तो आज के वाइस चांसलर, मुख्यमंत्री के ही नहीं, सभी मंत्रियों की चौखट पर सबेरे सबेरे बेझिझक माथा झुकाते नजर आते हैं।

लाखों रूपए बहाकर संपन्न होनेवाली संगोष्ठियों व सम्मेलनों में अतिवाचालता के सिवा कुछ खास होता नहीं है, सब लेते रहते हैं। आत्माराधना, आत्मरति, आत्माभिभूतता के शिकार लोगों के बीच में आपसी लेनदेन का नाटक होता है। वयस्क होते साहित्यकारों का रचनात्मक खालीपन और यश-पुरस्कार की लोलुपता में पड़ी युवापीढ़ी की अनुकरणात्मक करतूतों का द्वन्द्व बहुत रसीला है। कोई अपने वर्णन के लिए अखबारी इंतजाम करता है तो कोई विद्यार्थियों को प्रचार का दायित्व देता है। कोई पुराना आदमी है, कम्प्यूटर आदि में सिद्धहस्त नहीं है तो वह तनख्वाह पर आदमी रखता है कि ईमेल और ब्लॉग के जरिए अपनी साहित्यिकता का यशनिर्माण करे। वहीं पर तीन-चार साल तक प्रकाशक के पास पड़ी रहनेवाली पांडुलिपि जब प्रकाशित या मुद्रित हो जाती है, एक लेखिका को उसकी जानकारी तक नहीं होती है। अपनी किताब का विज्ञापन या समीक्षा देखकर उसे पता लगता है कि पड़ी रही पांडुलिपि पर प्रकाशक की कृपादृष्टि पड़ी है। क्या आप भरोसा करेंगे, संचारक्रान्ति के इस युग में किसी एक किताब का विमोचनकर्म भी नहीं हुआ। हां, लिखनेवाली को हर दिन फेसबुक देखना है, यह मालूम करने के लिए कि दुनिया में क्या हो रहा है, कौन मर गया, कौन जीवित है? हिंदी का कोई लेखक गुजर जाता है, तो फेसबुक ही वह आसान स्रोत है, जहां से फटाफट जानकारी प्राप्त होती है। अन्यथा जानकारी मिलना ही कठिन है, उस जंगल में जहां पर पेड़ और पौधा भी मलयालम बोलते हैं।

असहमति का साहस की घोषणा करनेवाली पत्रिका को बहुत आदर व तत्परता से देखा करती थी। एक दिन अचानक संपादक संस्था में पधारे, किसी सेमिनार के नाम पर। अगले अंक में ही उन लोगों की प्रशंसात्मक टिप्पणी छपी हुई देखकर हैरान हुई जो सरकारी पैसे लूटकर, पथभ्रष्ट राहों से गुजरते हैं, काम के नाम पर स्वार्थ रचने के सिवा कार्यालय या समाज के लिए कुछ खास नहीं करते हैं। खुद को सर्वहारा या वामपंथ बोलते रहते हैं। केरलीय माहौल में ही नहीं, पूरे सांसारिक माहौल में ऐसा फैशन चलता रहता है। ये लोग कथनी व करनी में सागरी अंतराल रखते हैं। अपने आप को महान व प्रतिबद्ध राजनीतिक सदस्य के रूप में प्रक्षेपित करने के वाक्सामथ्र्य के अलावा उनके पास कुछ नहीं है। फिर यह सोचा कि जो देखा जाता है, वह आधा अधूरा है, जो कहा या लिखा जाता है, वह उससे भी नीचे आधा व अधूरा है। इसका बोध अपने में रखना अच्छा है, संपादक भी 'बुलाए' जाते हैं, ऐसा वैसा नहीं, कुछ खास उद्देश्यों की पूर्ति के लिए है। झंडे के रंग से आप मित्र तय करते हैं। काश, झंडे का रंग आदमी की पहचान कर देता। आपकी प्रशंसा से कुछ बदलनेवाला नहीं है तो पत्रिका में लिखा या नहीं, क्या फायदा। इससे साहित्य या समाज में क्या बदलनेवाला है? आपका परिसर आपका परिचय देता है। गलती एक या दो बार होती है महाशय, कई बार गलती सिर्फ  घटिया किस्म की राजनीति सूचित करती है। महीने में एक लाख से अधिक वेतन पानेवाले प्रोफेसरों और तोंद के बोझ में चलनेवाले वामपंथी नेताओं के बीच में रहती हूं। सोच-सोचकर बेहाल हूं कि ऐसे लोग कैसे सर्वहारा और वामपंथ का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं जो कुर्सी या पद के नाम पर वेतन तो पाते हैं, पर निश्चित आयकर तक से बचे रहते हैं। दल या संगठन को चंदा देने के अलावा इनका कोई सामाजिक या देशीय योगदान नहीं दिखता है। आत्मप्रचार के तो काफी मार्ग आज खुले हुए हैं, जिन्हें देखकर दूर के आदमी आपको रंगा सियार समझ नहीं पाता है।

गलती यहां पर नहीं है। प्रशंसा, दावत और सम्मान से ललचाकर इंसान को देवता बनाने में है। प्रशंसा में ही सही, जो लिखा जाता है, उससे आपकी नीयत भी समझ में आ जाती है। चालाकों को आप साहसी बना रहे हैं। अनुभव भी निर्मित किया जाता है, साजसज्जित अनुभवों के कारण हत्यारा आपको सखा नजर आता है। पर आपका यह संबन्ध कितना स्थायी है? कोई भी अनुभव अर्ध या अपूर्ण है यहां। हाथी बड़ा है और हम बहुत छोटे। भले ही बुद्धि के उपयोग में हम उसे काबू में रखते हैं और अपने इशारों पर चलाते हैं, पर उसे पूरा देखना तक की बात हमारे बस की नहीं है! अंधों का हाथी हम खेल रहे हैं। हमारी सीमा यही कह रही है कि हाथी को ही नहीं, सरसों को भी हम एक ही पार से देखते हैं। हैरान थी उस समय। अब नहीं हूं। अब मालूम है कि चोम्स्की ने बताया था, एक सही सिद्धान्त। वे मेनुफेक्चरिंग कन्सेन्ट का विश्लेषण करते हैं। भारत में भी यह होता है। राजनीति में शत्रु या मित्र नहीं है, अवसरानुकूल साथ लिया जाता है, जरूरत के अनुसार छोड़ा या जोड़ा जाता है। आप हल्ला मचानेवाले हैं, तो भी आपको बुलाया जाएगा। बुलाने भर से आप चुप रहेंगे तो उसके भी अवसर हैं। सरकारी संस्था से हो या निजी, विज्ञापन इसलिए दिया जाता है कि आप उसके विरोध में कुछ न लिखे या छापे। इसी चालाकी में जीवनजगत गुजरता है। अजीब है यह देश, जहां समझौते को आजादी बताया जाता है। जहां आजादी की जरूरत है, वहां उपेक्षा और समझौता चलता रहता है। जहां समझौता है, उसे एकसाथ मिलकर आप आजादी सिद्ध कर देते हैं। राजनीति के साथ जोड़कर किसी भी लंपटता की रक्षा की जा सकती है। साहित्य इसका अपवाद कैसे हो सकता है? पत्रिकाओं के संपादक व मेधावी, प्रभावी को बुला लें आप, हो सके तो पुरस्कार दें और अपनी बात सुरक्षित करें।

 पुरस्कार एक दायित्व है, मिलनेवाले को। देने वाले के लिए वह एक सपना है, देने वालों के साथ मिलनेवाले भी सपना देख सकते हैं और साक्षात्कार केलिए कार्य कर सकते हैं। अजीब है हमारी साहित्यिक दुनिया, यहां पर दुर्घटनाओं व अत्याचारों को बेजगह जोड़ दिया जाता है।

 सबके लिए साहित्य नहीं लिखा जाता, फिर साहित्य में आप सामान्य जनता का नाम क्यों उपयोग करते हैं? बचाव के लिए। आप कितने आम हैं, लेखन में, फिर जीवन में। इनमें कितना आप साहस रखते हैं? अपने को कभी जोखिम में नहीं डालते हैं, पद या ओहदे के लिए ही नहीं, छिटपुट सहायता के लिए तक खींचतान व चापलूसी करते हैं। उनके आगे चुप रहते हैं, उतना ही बोलते हैं, जितने में आप संकट में नहीं पड़ेंगे। उसके बाद बड़ी बातें लिख देते हैं, प्रगतिशीलता का झंडा फहराते हैं तो क्या लाभ? किसका लाभ? पुरस्कार प्राप्त होने पर एक अजीब अनुभव हुआ। खबर पाकर कुछ लोगों का फोन आया। पूछता है कि कैसे आपने इसका इंतजाम किया? गजब है, इंतजाम की रासायनिक रीतियां जानना चाहते हैं लोग। हां, गुनाह है पुरस्कार मिलना, क्योंकि पद्मश्री तक का यहां पर इंतजाम किया जाता है! अजीब है यह गणतंत्र, यहां पर राष्ट्रीय पुरस्कार भी हड़प लिया जाता है, निजी उपकारार्थ दिया जाता है। अजीब है यह साहित्यिक परिसर, जहां अटपटे लोग, लेखक बन जाते हैं,  साहित्यिक वैतालिकों की गुटबाजी में साहित्य के नाम पर सम्मेलनों व गोष्ठियों में विदेश जा सकते हैं। आप इन बातों में उतने उतावले नहीं तो भी मित्रमण्डली या व्यवस्था आपको ऐसा बनाती हैं। आत्मरति के मारे युग में आत्माभिभूत लोगों का राज चलता है! आप और कुछ बदल नहीं सकते, इसलिए कपड़े बदल लेते हैं और उसे अपने पसीने से लिपटा कर नीलामी करते हैं और ऐलान करते हैं कि उस पैसे से गरीब लड़कियों का ब्याह कर दिया जाता है! कितना अच्छा लोकतंत्र है हमारा। फिल्म सितारों, अरबपतियों, कारपोरेटों, अध्यापकों व राजनीतिज्ञों में कोई अंतर नहीं रह गया! एक ही पद्धति, एक ही परिपाटी, एक ही अंजाम। सब सामाजिक सफाई के नाम पर!

यहां काहे का हित है, रचनात्मकता को देखे बिना प्रकाशन से लेकर पुरस्कार तक को साहित्यिक धृतराष्ट्रों द्वारा तय किया जाता है, बुरी किताब को उन्हीं द्वारा प्रकाशन करवाने, अवतरणिका-समीक्षा करवाने या श्रद्धा हड़पाने की लंबी कार्यवाही क्रमबद्ध चलाई जाती है। कहीं अहिंदी प्रदेश में, किसी से कोई संपर्क बिना, अपनी दलदल में रहनेवाली ऐरेगैरे को भी कभी कभी पुरस्कार के लिए नामांकन भेज देने व सिफारिश करने तथा कृति की समीक्षा के लिए फोन कॉल, वापसी के लिए पंजीकरण डाक टिकट सहित लिफाफा और दूसरे प्रकार के प्रस्ताव आते रहते हैं तो सामान्य सी शंका यह होती है कि इन्द्रप्रस्थ में विन्यस्त्र कौरव और पाण्डव, यहां पर कैसा साहित्यिक महाभारत रचते होंगे। भागती हूं, भाग जाने को रोकनेवाला ऐसा क्या बाकी है, इस औपचारिक राजधानी में?

साहित्यकार सहित सभी लोग आजकल साधारण को ब्रान्ड बनाते हैं। चायवाला प्रयोग पर सोचिए। एक दिन में ही वह बडा महत्वपूर्ण स्थान पर पहुंच गया। सब ऐलान करते हैं कि अपना साधारण जीवन है, छोटी बातों में गुजरता है, छोटी बातें नजर आती है। कितना विनीत दिखते हैं मनुष्य। आजकल विनय भी बिकता है। आम, साधारण, सामान्य आदि के बीच दलित, स्त्री और परिस्थिति विषय भी आजकल प्रतियोगिता पथ पर हैं। बातों में असाधारण कुछ नहीं है, पर प्रकरण के उपयोग में सब अजीब है, असाधारण है। यह भी हमारे लिए सामान्य बन जाता है, आदत पड़ जाती है। पहले बडी बातें लिखनेवाले लेखक महान थे, अब पलटने वाले महान हैं। आप जयपुर फेस्टिवल में जाइए, नहीं तो किसी नामी व पैसे बहानेवाले दूसरे साहित्यिक मेले में। अपने आप साहित्यकार बन पाएंगे।  संवेदनात्मक ज्ञान या ज्ञानात्मक संवेदना की जगह मनोरंजक ज्ञान और ज्ञानात्मक मनोरंजन दुनियाभर में स्वीकार किए जाते हैं तो उनकी संभावनाओं व परतों पर देशी भाषा को भी गूंथ रखने का दायित्व हम पर है। कोई माने या न माने, अकादमिक भाषा और साधारण भाषा में, बोली और भाषा में, आम और मानक भाषा में, स्त्री व पुरूष भाषा में अंतर मानते हुए ही साहित्य आगे बढ़ सकता है। भाषा के संदर्भ में भी सरलता या साधारणता कोई ब्रान्ड नही है, विशेष गुण भी नहीं। इंसानी जीवन जगत को प्रयोगात्मक और प्रोत्साहनवर्धक बनाने में साहित्य का हस्तक्षेप सुनिश्चित करना जनहित के साथ साहित्यकार के लिए भी अनिवार्य है।

गलत मुंह से प्रशंसा भी चिढ़ पैदा करती है, चाहे वह बड़े कहे जानेवाले व्यक्ति के मुंह से ही क्यों न हो। आदर-सत्कार-सम्मान भी आजकल उपकरण हैं। सोचने पर जीवन और जगत पर वितृष्णा के कई कारण हैं, जीवन समाप्त करने के भी कई कारण हैं। लेखन करने केलिए ही नहीं, बंद करने के लिए भी कारण हैं, तभी तो पेरूमाळ मुरूगन को मीडिया में बड़ा स्थान मिला जब उन्होंने यह घोषित किया कि लेखन बंद करता हंू। हम किस तरफ  जा रहे हैं? कुछ भी होता है, यहां पर। हम मृत्यु पर जश्न करनेवाली जनता है, जन्म के पहले बच्ची को मार देनेवाली दुनिया है। मनुष्य अजीब है, तमाम विशेषताओं से बढ़कर आजकल उसकी चालाकी नजर आ रही है। यह समाज अजीब है, जहां सृजनात्मकता से बढकर साहित्यिक सुविधा की पूजा होती है। थोड़ा सृजनात्मक होते ही नाम बिक जाता है, ओहदा बन जाता है। अध्यापक होते ही पठन-पाठन या किताब को छोड़ देनेवाले लोग हैं।

औरतों की नाजुक स्थितियों व बदतर जीवन संदर्भों पर सोचती हुई कई बार उन विधवा, गृहस्थिन, पारिवारिक बोझ ढोनेवालियों पर चिंतित हो जाती हूं जो विदर्भ जैसे इलाकों में आदमी की आत्महत्या के बाद, जीती हैं, जीवन को हराती हैं, अपने बच्चों सहित परिवार को संभालती हैं। वे खुदकुशी नहीं करती हैं, कम से कम उस दृष्टि से नहीं, उस दर में भी नहीं। जीती हैं, जीने देती हैं। काम और उम्मीदें बंद नहीं रखती हैं। उनकी जिजीविषा, आत्मधैर्य व जुझारूपन पर साहित्य व साहित्यिक दुनिया चुप क्यों हैं? स्वामी ने जिन कारणों पर आत्माहुति की थी, वे कारण उन्हें खुदखुशी तक नहीं ले जाते हैं! यह राष्ट्र अजीब है, जिनमें जीने की हिम्मत है, उसे जीवन का जिम्मा सौंपा नहीं जाता।  आपने देखा होगा, ईसा मसीह अपने घुटनों पर किसी के दरवाजे पर खटखटाते हैं, सालों से वे यह कर रहे हैं। आज भी ईसा उसी मुद्रा में हैं, खटखटाते रहते हैं। क्यों? क्यों कि दरवाजा अंदर से बंद है, वह नहीं खुलेगा। जिसने उसे अंदर से बंद किया है, उसकी नीयत है तो ही दरवाजा खुल जाएगा। पर खटखटाना हमारा कार्य है, वही करती हूं। खुल जाता है तो अच्छा, नहीं खुलता है तो फिर खटखटाती हूं। कोई इसे हक मानता है तो कोई इसे प्रतिरोध कहता है। कोई इसका गुणगान करता है, तो कोई धिक्कार। पर यह इंसानियत पर होनेवाले खेल के विरोध में है। मनुष्यत्व के पतन के विरोध में है। स्वार्थ में रहनेवली गिरगिटी वृत्ति के विरोध में है। किसी की गाली, पिटाई या गोली नहीं लग जाती है तो आगे भी कलम लूंगी और आपसे मुखातिब रहूंगी, क्योंकि लेखन जीवित रहने व सांस छोडऩे की क्रिया है।

अजीब है हमारी साहित्यिक दुनिया। कई बार वह अंदर से सीलबंद दिखता है। खट् खट् लगाने पर वह खुलता नहीं है। अब अपने वक्त व रूचि के अनुसार नहीं, लोगों के वक्त व रूचि के अनुसार इसे खोलकर रखना है। इसे अंदर से खोल देना है। दरवाजे के बाहर लहराती हवा अंदर आएगी, उसकी शीतलता में रचनात्मकता का पक्ष स्पष्ट हो जाएगा। हां, उम्मीद करती हूं कि कोई ऐसा दिन आएगा, जिसमें लेखन के क्षेत्र में हम, असली अर्थ में हम बन जाएंगे। मालूम होगा आपको, महान लोगों ने माना है, हम अनुभव भी करते हैं, यह दुनिया द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद पर चलती है। भले ही वह कठिन व अजीब अनुभव दे रही है, पर उसकी मोहकता अब भी शेष है। उम्मीदें बाकी हैं। हम जीना चाहती हैं, विदर्भ में बलि चढ़ानेवाले किसानों की विधवाओं का साहस बटोरना भी चाहती हैं। जब अक्षरों में अंतरंग की बारिश होती है, मन हल्का होता है। वाचन के लिए आप स्वतंत्र है, स्वागत।