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Wednesday 19 Sep 2018

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल : एक विश्लेषण

 मानव संसार के अप्रतिम शाश्वत सौंदर्य की आधारशिला है रचनात्मकता। मानव संसार के सौंदर्य के स्वरूप का निर्माण होता है, कला, साहित्य, दर्शन और विचारधारा से। इन समस्त विधाओं का अभीष्ट उन्नतम स्वरूप तब प्रस्तुत होता है, जब वे परस्पर विरोधी अथवा प्रतिस्पर्धी कला, साहित्य, दर्शन और विचारधारा से ससम्मान मुठभेड़ के पश्चात, परिणामस्वरूप अपनी श्रेष्ठता एवं स्वीकृति की सशक्त स्थापना करते हैं। अर्थात मानव संसार के निर्दोष सौन्दर्य का शिलान्यास रचनात्मकता से होता है और वह रचनात्मकता सामयिक वैचारिक संघर्ष और विमर्श के उपरांत उस काया में प्रस्तुत होती है, जिसे सत्यम-शिवम-सुन्दरम का पर्याय कहा जा सकता है। इस सत्यम-शिवम-सुन्दरम के निर्माण की सम्पूर्ण प्रक्रिया अभिव्यक्ति की उस अद्वितीय मानवीय विशेषता पर आधारित होती है, जो मनुष्य को शेष प्राणियों से विशिष्ट सिद्ध करने का आधारभूत हेतु है। कदाचित यह स्वीकारना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अभिव्यक्ति से शून्य मनुष्य पशुतुल्य होगा। अभिव्यक्ति यदि मनुष्य की मौलिक प्रवृत्ति है तो अभिव्यक्ति का सम्मान, समाज की सजीवता एवं सामयिक प्रगति का प्रतीक है।

इस मानव संसार की प्रत्येक कला और उसकी प्रत्येक रचना अमूर्त अभिव्यक्ति का मूर्त रूप है। जीवन के सुख, दुख, शोक आनन्द, हर्ष, तृष्णा, आकांक्षा, कुंठा और क्रोध समस्त संवेगों का रचनात्मक प्रकटीकरण अभिव्यक्ति की शक्ति से होता है। मानव जीवन को विकार एवं विकृति से शून्य करने में अभिव्यक्ति निर्णायक भूमिका का निर्वहन करती है। अभिव्यक्ति के अभाव में, आवेगों एवं संवेगों के अवरूद्ध प्रवाह के फलस्वरूप, मानव जीवन का उन विलंबनाओं से आखेट होना अवश्यंभावी है, जिन्हें अवसाद, कुंठा, निर्वासन अथवा एकाकीपन या उदासी की संज्ञा दी जा सकती है।

अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रता से अभिप्राय यह है कि मानवीय भावनाओं, अनुभवों, आवेगों एवं संवेगों को अभीष्ट आकार प्राप्त हो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक साहित्यिक, दार्शनिक व वैचारिक लेखन की उन्मुक्तता का समर्थन करता है तथा किसी भी चित्र, चलचित्र, गीत व संगीत की प्रस्तुति को सहर्ष स्वीकारता है। साहित्य, कला, संगीत, चिन्तन-मनन और अध्ययन ये सिर्फ  मन, चित्त और बुद्धि का परिष्कार करने के ही रास्ते नहीं है, बल्कि ये हमें सत्य, शिव और सुन्दर के सम्पर्क में लाकर ऐसा आनंद भी देते हैं, जिसे अलौकिक, अद्भुत और ब्रहमानंद सहोदर कहा गया है। यह आनंद महज कल्पना नहीं, वास्तविक होता है, जिसे हम अपने जीवन में अनुभव कर सकते हैं। जिन लोगों ने इस अमृत रस की कुछ बूंदें पी ली हैं, उन्होंने मृत्यु को भी सहज भाव से गले लगाया।

              अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गुरूता, संवेदनशीलता एवं अपरिहार्यता ही वह कारण है कि मानव अधिकारों के संरक्षण से सम्बंधित प्रत्येक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय घोषणा, प्रसंविदा एवं चार्टर में इसे ससम्मान स्वीकारा गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ जो सम्पूर्ण विश्व के मनुष्यों के कल्याण के प्रति कटिबद्ध है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को समुचित रूप से यथा स्थान लिपिबद्ध कर अपनी स्वीकृति प्रदान करता है। संयुक्तराष्ट्र महासभा के संकल्प में वर्णित है कि 'मत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मूल अधिकार है और सभी स्वतंत्रताओं की कसौटी है, जिससे संयुक्त राष्ट्र गंभीर रूप से सम्बंधित है। मत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत जानकारी का अधिकार आ जाता है। इससे कहीं और हर जगह जानकारी एकत्र करना, पारेषित करना और प्रकाशित करना, विवक्षित है। अतएव यह विश्व की शांति और प्रगति के संवद्र्धन के गम्भीर प्रयास में एक आवश्यक कारक है। स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को विश्व की शांति और प्रगति के लिए अपरिहार्य माना गया है।

       इसी प्रकार 10 दिसम्बर 1948 को अस्तित्व में आयी मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में भी अभिव्यक्ति और विचारों की स्वतंत्रता को समुचित स्थान दिया गया है।

              16 दिसम्बर 1966 को स्वीकृत मानव अधिकारों सम्बंधी नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपरिहार्य तुल्य स्वीकारा गया है। इस प्रसंविदा के अनुच्छेद 19 (1) में वर्णित है कि प्रत्येक को हस्तक्षेपरहित, अभिमत प्रस्तुति का अधिकार होगा। यह भी वर्णित है किसी भी प्रकार की सूचना का आदान-प्रदान निषिद्ध नहीं रहेगा। यह मौखिक, लिखित या मुद्रित हो सकती है या कला के किसी स्वरूप में हो सकती है। स्पष्ट है कि इस प्रसंविदा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को असीमित रूप से कोई जानकारी प्राप्त करने व प्रदान करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है। इस प्रसंविदा में प्रकाशन, मुद्रण, अथवा कला के किसी भी रूप या स्वरूप में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मान्यता प्रदान की गयी है।

वस्तुत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अस्वीकारने का अर्थ मानव को मूक एवं बधिर बनाकर उसके व्यक्तित्व को नष्ट करना है। उसके लिए लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता और मानव अधिकार सभी विशिष्ट स्थितियां अर्थहीन हो जाती है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मात्र मनुष्य के लिए एक संवेदनशील विषय नहीं है, अपितु राज्य के लिए भी यह एक गंभीर प्रकरण है। यही कारण है कि भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सम्पूर्ण संवैधानिक गुरूता के साथ सम्मिलित किया गया है। भारतीय संविधान की पृष्ठभूमि में जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इतिहास पर दृष्टिपात किया जाता है, तो इसका सूत्र उस उद्देश्य प्रस्ताव तक सरलता से जुड़ जाता है, जिसे पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 13 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा में प्रस्तुत किया था और जिसे संविधान सभा ने 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया था। इस उद्देश्य प्रस्ताव में जनगण के लिए अन्य स्वतंत्रताओं के साथ-साथ विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अनिवार्य उपलब्धता की बात कही गयी थी।

              भारतीय संविधान की प्रस्तावना को संविधान का दर्शन स्वीकारा जाता है। प्रस्तावना की महत्वपूर्ण स्थिति का आंकलन इस तथ्य से भी किया जा सकता है कि उच्चतम न्यायालय ने बेरूवाड़ी विवाद में यह निर्णय दिया था कि 'जहां संविधान की भाषा में संदिग्धता होती है, वहां उद्देश्यिका (प्रस्तावना) संविधान के विधिक निर्वचन में सहायता करती है। इस महत्वपूर्ण अंश में भी यह लिखा है कि 'विचार, अभिव्यक्ति ... की स्वतंत्रता ... प्राप्त कराने के लिए। प्रस्तावना में सम्पूर्ण संविधान का सार समाहित है। प्रस्तावना का अध्ययन यह स्पष्ट कर देता है कि भारतीय संविधान किन साध्यों और मूल्यों के प्रति अभिप्रेत है। अर्थात उद्देश्यिका यह स्पष्ट करती है कि अन्य स्वतंत्रताओं के साथ-साथ विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जनगण को प्रदान करना संविधान का उद्देश्य है।

              संविधान का अध्याय तीन जनगण के मौलिक अधिकारों को संस्तुत करता है। अध्याय तीन को लोकतंत्र की आधारशिला की संज्ञा दी जा सकती है। इस अध्याय के अनुच्छेद 19(1) में वर्णित है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक को भाषण तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी। भाषण तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में प्रेस की स्वतंत्रता भी सम्मिलित है। इस तथ्य की पुष्टि संविधान सभा के विचार-विमर्श एवं शीर्ष न्यायालय के अनेक निर्णयों से होता है। प्रेस की स्वतंत्रता सामाजिक तथा राजनीतिक समागम का मर्म है। न्यायालयों का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वे प्रेस की स्वतंत्रता को बनाये रखें और उन सभी विधियों या प्रशासनिक कार्यवाहियों को अविधि मान्य कर दें, जो संवैधानिक समादेश के प्रतिकूल इसमें हस्तक्षेप करती हैं। संविधान सभा के भीतर और बाहर भी इस बात पर कड़ी आलोचना की गयी थी कि वाणी और अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रता के साथ-साथ प्रेस की स्वतंत्रता भी प्रत्याभूत होनी चाहिए। स्वतंत्र प्रेस के समर्थकों ने इसको एक पृथक अधिकार न मानने के लिए प्रारूप समिति की कड़ी निन्दा की थी, किन्तु फिर भी प्रारूप समिति ने इसे स्वतंत्रता का अधिकार नहीं माना और न ही इसे मौलिक अधिकारों में शामिल किया। समिति की ओर से बोलते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि 'जो अधिकार व्यक्तिगत रूप से एक नागरिक को प्राप्त है, वह प्रेस को विशेष रूप से नहीं दिये जा सकते। प्रेस का संपादक अथवा प्रबन्धक भी नागरिक है और जब वह अपने विचार समाचार पत्रों में छापता है, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करता है। मैं नहीं मानता कि प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लेख पृथक से करने की कोई आवश्यकता है।  स्पष्ट है कि प्रेस की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में समाहित है। तकनीकी प्रगति दिन-प्रतिदिन संवाद एवं विमर्श के अनेक नवीन साधन प्रस्तुत कर रही है। यदि वे विचार एवं अभिव्यक्ति के स्वस्थ माध्यम हैं, तो वे सभी प्रेस की स्वतंत्रता की भॉंति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में सम्मिलित हैं। इक्कीसवीं शताब्दी में यूट्यूब, ट्विटर, फेसबुक और वाट्सएप इत्यादि भी अभिव्यक्ति एवं वैचारिक आदान-प्रदान के मान्य व लोकप्रिय माध्यम हैं। ये समस्त नूतन माध्यम भी प्रेस की स्वतंत्रता की भांति अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रता के मान्य माध्यम स्वीकार्य होने चाहिए।

 यह उल्लेखनीय है कि नागरिकों की विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मर्यादाहीन नहीं हैं संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के अधीन कतिपय उन आधारों का उल्लेख किया गया है, जिनके आधार पर राज्य जनगण की इस स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा सकता है। ये आधार हैं-राज्य की सुरक्षा, विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार और सदाचार, न्यायालय की अवमानना, मान-हानि, अपराध के लिए प्रोत्साहन,      भारतवर्ष की संप्रभुता तथा अखण्डता। यदि किसी विचार अथवा अभिव्यक्ति के प्रकटीकरण से पूर्वोक्तकिसी प्रतिबंधात्मक मापदण्ड का उल्लंघन हो रहा हो तो राज्य को अधिकार है कि वह ऐसी विषयवस्तु को निषिद्ध या प्रतिबंधित कर दे। इस प्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कतिपय मर्यादायें स्वीकार कर संविधान ने व्यक्ति स्वातंत्र्र्य और जनगण के कल्याण के मध्य संतुलन स्थापित करने का सफल प्रयास किया है। गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) में उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी थी कि 'स्वतंत्रता अनियंत्रित अथवा बंधनों से सर्वथा मुक्त नहीं हो सकती क्योंकि उससे तो अराजकता और अव्यवस्था हो जायेगी। सभी अधिकारों की प्राप्ति और उसके उपभोग पर ... ऐसे युक्तियुक्त निर्बन्धन लगाये जा सकते हैं, जो देश के शासकों द्वारा समाज की निरापदता, स्वास्थ, शांति, साधारण व्यवस्था और नैतिकता के लिए आवश्यक समझे जायें। ... सामान्यतया प्रत्येक व्यक्ति को यह छूट है कि वह अपनी इच्छानुसार अपना जीवन चलाये। ...किन्तु व्यक्ति की इन स्वतंत्रताओं के संरक्षण के लिए समाज को कुछ शक्तियों की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए संविधान जनता के अधिकारों की घोषणा करने में व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन करता है। संविधान का अनुच्छेद 19 व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करता है। संविधान का अनुच्छेद 19 व्यक्ति की स्वतंत्रताओं की एक सूची देता है और विभिन्न खण्डों में वे निर्बन्धन दर्शाता है, जो उन पर लगाये जा सकते हैं, जिससे उनका कल्याण या साधारण सदाचार से संघर्ष न हो। ध्यातव्य है कि उच्चतम न्यायालय का यही मत रहा है कि अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रता सहित सभी स्वतंत्रताओं पर निर्बन्धन युक्तियुक्त होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने यह कहा है कि व्यक्ति और समाज के अधिकारों के बीच उचित संतुलन होने पर ही यह कहा जा सकता है कि निर्बन्धन युक्तियुक्त है। स्पष्ट है कि अतिरेक अथवा अतिउत्साह पूर्ण प्रत्येक कृत्य को उच्चतम न्यायालय उचित नहीं स्वीकारता है। वस्तुत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर चिन्ता इसी बिन्दु पर प्रस्तुत होती रही है कि इसके आकार एवं प्रकार का स्तर क्या होना चाहिए? गंभीर चिन्तन इस बिन्दु पर भी अनिवार्य है कि प्रतिबन्ध की औचित्यता का प्रमाणीकरण किस प्रकार हो सकता है? कदाचित इन प्रश्नों के प्रत्युत्तर में जनतंत्र के मापदण्डों को आधार बनाया जाना चाहिए तथापि राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता सर्वोच्च साध्य के रूप में मान्य होना चाहिए। वस्तुत: शीर्ष न्यायालय इस तथ्य के प्रति निरंतर सजग रहा है कि जनगण की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असंदर्भित, अनावश्यक एवं अप्रासंगिक प्रतिबन्ध नहीं लगाया जाना चाहिए। अपने कई निर्णयों के माध्यम से न्यायालय ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक नागरिक स्वतंत्रता का वांछनीय सम्मान अनिवार्य है। नागरिक स्वतंत्रताओं पर निर्बन्धन की आवश्यकता, मात्रा और प्रकृति किसी भी प्रकार के राग-द्वेष से प्रेरित कदापि नहीं होनी चाहिए।  निर्बन्धन की अंतर्वस्तु को उनके अधिरोपित किये जाने की रीति और उनके व्यवहार में लाये जाने के ढंग से अलग नहीं किया जा सकता अर्थात इन पर एक साथ विचार करना होगा। ... कोई आदेश तभी युक्तियुक्त होगा जब निर्बन्धन अत्यधिक न हो और निर्बन्धन अधिरोपित करने की प्रक्रिया या रीति भी न्यायोचित हो। न्यायालय को, यह अवधारित करने के लिए कि क्या विधि द्वारा अधिरोपित निर्बन्धन, प्रक्रिया की दृष्टि से युक्तियुक्त है, सभी परिस्थितियों पर विचार करना होगा जैसे उसके अधिरोपण की रीति और उस पर व्यवहार करने का ढंग। ... यदि कोई निर्बन्धन इस प्रकार अधिरोपित किया जाता है कि उससे नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों का उल्लंघन होता है, तो अयुक्तियुक्त होगा।

              इस तथ्य में सन्देह अकारण होगा कि जीवन की गुणवत्ता का सुनिश्चियन स्वतंत्रता को संस्तुत करने वाली स्थितियों से ही हो सकता है। इन स्वतंत्रताओं में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को उस स्वतंत्रता की संज्ञा दी जा सकती है, जो मनुष्य को मानवोचित होने का अवसर देती है। सुप्रसिद्ध चित्रकार एम.एफ. हुसेन के विवाद में 2008 के अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि 'साध्य यह होना चाहिए कि उस निर्णायक बिन्दु को संस्तुत किया जाये, जो जीवन की गुणवत्ता को संरक्षित करती हो। इसके लिए संकीर्ण मानसिकता को क्षीण करना होगा और यही एक उदात्त समाज का मौलिक सिद्धान्त है।

       लेखक पेरूमल मुरूगन के प्रकरण में न्यायालय ने 5 जुलाई 2016 के अपने निर्णय में सलमान रूशदी के इस कथन को उद्धृत करते हुए अनावश्यक प्रतिबंध के तर्क को ध्वस्त किया है कि किसी पुस्तक से आहत न होने का सरल उपाय है कि उसे बंद कर दिया जाये, अर्थात न पढ़ा जाये। पुन: स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अक्षुण्ण रहना, जीवन एवं समाज की गुणवत्ता एवं उदात्तता का प्रतीक है, अपने प्रत्येक निर्णय में न्यायपालिका ने इसे स्वीकारा है। न्यायमूर्ति पातंजलि शास्त्री ने भी अपने एक निर्णय में कहा है कि 'भाषण और प्रेस की स्वतंत्रता सभी लोकतांत्रिक संगठनों का मूल आधार है, क्योंकि मुक्त राजनीतिक विचार-विमर्श के बिना कोई भी सार्वजनिक शिक्षा, जो लोकप्रिय शासन की प्रक्रिया के उचित रूप में चलने के लिए बहुत जरूरी होती है, संभव नहीं है। चित्रकार हुसेन के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने तो यह टिप्पणी की थी कि 'उस चिन्तन को भी पर्याप्त स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए, जिनसे हम घृणा करते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरर्थक है, यदि उसे अपनी अभिव्यक्ति के पश्चात अभीष्ट स्वतंत्रता अनुपलब्ध रहती है। 5 जुलाई 2016 के निर्णय में मद्रास उच्च न्यायालय का यह मत है कि यदि किसी पुस्तक इत्यादि पर कोई विवाद उपस्थित होता है तो उस पर निर्णय करते समय संविधान के अनुच्छेद 19(1) को आधार बनाया जाना चाहिए। अर्थात किसी प्रतिबन्धात्मक निर्णय से पूर्व सर्वप्रथम एवं सर्वोच्च प्राथमिकता विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रदान करना अनिवार्य है।                                                                                                                                                       

विश्लेषणोपरांत यह स्वीकारना सरल है कि अभिव्यक्ति मानव चेतना की वह विशिष्ट प्रवृत्ति है, जिसको उन्मुक्त वातावरण प्रदान करना मात्र व्यक्ति विशेष के लिए ही कल्याणकारी नहीं है, अपितु शेष समाज को मानवीय स्पर्श प्रदान करने के लिए भी अनिवार्य है। कटु यथार्थ यह भी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राचीन काल से अनेक षडय़ंत्रों का आखेट रही है। वर्तमान काल में जिन व्यक्तियों को पूज्य, महान, चिंतक अथवा दार्शनिक माना जा रहा है, अतीत में उन्हें ईशनिंदा, देशद्रोह, अथवा धर्मद्रोह के आरोप में मृत्युदण्ड तक प्रदान किया जा चुका है। इस संदर्भ में ईसा मसीह, गैलीलियो, सुकरात, कॉपरनिकस, गांधी और मार्टिन लूथर किंग इत्यादि नाम तत्काल स्मरण होते हैं। अत: जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पथ की चुनौतियों पर विचार किया जाता है, तो अग्रांकित स्थितियां प्रस्तुत होती हैं-शताब्दियों से यह चुनौती प्रस्तुत होती रही है कि किसी कलाकृति, विचारधारा, दर्शन अथवा साहित्य की विषयवस्तु के प्रति समाज स्वयं न्यायालय की भूमिका में आ जाता है। इसे समाज की अधीरता अथवा असहनशीलता की संज्ञा दी जा सकती है। अपनी इस भूमिका में आकर समाज उस भावुक आक्रोश का आखेट हो जाता है, जिसके वशीभूत होकर वह किसी रचना को मात्र प्रतिबन्धित करने की मांग ही नहीं करता है, अपितु प्राय: रचनाकार के प्रति हिंसक भी हो जाता है। कदाचित यह लोकतंत्र की अपरिपक्वता का सामाजिक साक्ष्य है। इसे किसी राष्ट्र की सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक मानसिकता के संक्रमणकाल का भी लक्षण स्वीकारा जा सकता है। प्रस्तुत बिन्दु पर संक्रमणकाल से मंतव्य है कि पुरातन से मुक्ति की प्रक्रिया अपूर्ण है और समयानुकूल आधुनिकता में प्रवेश अधूरा है। परिणामस्वरूप जिस कुंठा अथवा श्रेष्ठतर ग्रंथि के अहं का जन्म होता है, उसमें इस प्रकार की असहनशीलता का प्रश्रय पाना अस्वाभाविक नहीं है।

कोई कृति, रचना, साहित्य या विचार शालीन नहीं है अथवा सामाजिक व्यवस्था को हानि पहुंचा रहा है या समाज में अश्लीलता का प्रचार कर रहा है अथवा राष्ट्र की एकता व अखण्डता को प्रश्नांकित कर रहा है तथा किसी धर्म अथवा किसी ईश्वर को निन्दित या अपमानित कर रहा है, इन गंभीर प्रश्नों का उत्तर किसे देना चाहिए? सामाजिक व्यवस्था, अश्लीलता, ईशनिंदा अथवा धर्म की निंदा या राष्ट्रवाद के प्रश्नों का क्या कोई शाश्वत, सार्वभौमिक अथवा सर्वमान्य उत्तर प्राप्त किया जा सकता है? क्या यह सारी स्थितियां रूढ़ अवस्था में अपने उद्देश्यों की पूर्ति कर सकती है? ऐसे साक्ष्य भरे पड़े हैं कि जिस व्यक्ति, सिद्धान्त, कृति अथवा रचना को एक समय इस प्रकार की रूढि़वादिता के प्रहार से अप्रतिष्ठित, या अस्वीकार्य किया गया अथवा मृत्यु की भेंट प्रदान की गयी, वही कालान्तर में उसी समाज को शिरोधार्य हुआ है। अर्थात इस विषय में समाज के निर्णय को भीड़तंत्र का अपरिपक्व भावुक निर्णय स्वीकारा जाना चाहिए। यक्ष प्रश्न यथावत है कि इन विषयों में निर्णायक कौन होगा तथा उसके निर्णय का आधार क्या होना चाहिए?

विश्लेषण इस प्रश्न पर भी होना चाहिए कि समाज का इन विषयों में लिया गया निर्णय कितना तटस्थ अथवा निष्पक्ष होता है? इस प्रकार के निर्णयों में संकीर्ण राजनीति की कितनी भूमिका होती है? यह संकीर्ण राजनीति मत प्राप्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से क्या इन विषयों को पक्षपातपूर्ण ढंग से उग्र स्थिति में पहुंचाने का प्रयास नहीं करती है? प्राय: अनुभव यह होता है कि ऐसे अवसरों पर समाज की तुलना में संकीर्ण राजनीति अधिक सक्रिय हो जाती है।

       वर्तमान समय में एक शब्द प्रचलन में आ गया है, जिसे घृणास्पद व्याख्यान अथवा अंग्रेजी में हेट स्पीच कहते हैं। इस घृणास्पद व्याख्यान का अर्थ यह है कि ऐसे समस्त सार्वजनिक व्यवहार जो किसी व्यक्ति अथवा समूह के विरूद्ध हिंसा अथवा घृणा का प्रचार जाति, प्रजाति, रंग, धर्म या राष्ट्र इत्यादि को आधार बनाकर किये जाएं। परन्तु इस विषय पर सुनिश्चित अवधारणा का सर्वथा अभाव है। 'इंग्लैण्ड में एक उपदेशक को इसलिए बंदी बनाया गया क्योंकि वह बाइबिल के उद्धरणों का सार्वजनिक पाठ कर रहा था। आयरलैण्ड में एक बिशप के विरूद्ध इस बात के लिए प्रकरण पंजीबद्ध किया गया क्योंकि वह समाज में बढ़ रही ईश्वरहीनता पर प्रवचन दे रहा था। स्पेन में एक टेलिविजन नेटवर्क को इसलिए दण्डित किया गया क्योंकि वह सार्वजनिक रूप से पारंपरिक पारिवारिक मान्यताओं का समर्थन कर रहा था तथा समलैंगिकता की आलोचना कर रहा था।  भारत में भी धर्म, राष्ट्रवाद, स्त्री-पुरूष सम्बन्ध संस्कृति, इत्यादि विषयों पर कोई कृति, रचना अथवा व्याख्यान के घृणास्पद या हेट स्पीच में परिवर्तित होने का जोखिम निरंतर रहता है, जबकि पूर्व वर्णित साक्ष्यों से स्पष्ट होना सरल है कि घृणास्पद व्याख्यान का आधार परिवर्तनशील है। अर्थात यह प्रश्न प्रस्तुत होता है कि क्या प्रत्येक व्याख्यान को भले ही उसमें घृणास्पद तथ्य हो स्वतंत्रता होनी चाहिए अथवा मात्र स्वच्छ, प्रत्येक आलोचना या घृणास्पद तथ्यों से मुक्त व्याख्यान को ही प्रस्तुति की स्वतंत्रता होनी चाहिए? इस सम्बन्ध में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति वुडरो विल्सन का कथन स्मरणीय है कि 'वाणी की महान स्वतंत्रता श्रेष्ठतम सुरक्षा है, क्योंकि यदि कोई व्यक्ति मूर्ख है और उसे बोलने की स्वतंत्रता है तो वह स्वयं अपनी मूर्खता का प्रचार करेगा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षण के लिए जनगण को नेतृत्व ग्रहण करना होगा। साहित्यकारों व कलाकारों और उनके संगठनों को नागरिक समाज के संगठनों के साथ तादात्म्य स्थापित करते हुए उस भय का सर्वनाश करना होगा,  जिसके दुष्प्रभाव से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कुंठित होती है। अंतत: और यथार्थ शाश्वत समाधान जनगण के द्वारा ही संभव है।

मन की भूख या मानव चेतना की जरूरतों का अहसास केवल मनुष्य को होता है, क्योंकि मनुष्य के पास बुद्धित्व होता है और वह आत्मचिंतन कर सकता है। चेतना की भूख मनुष्य को सत्य, शिव और सुन्दर की तलाश करने और इनसे जीवन को समृद्ध करने में प्रवृत्त करती है। साहित्य, संगीत, कला, विज्ञान, दर्शन, चिंतन, मनन और अध्ययन संस्कृति के अंग है, जो मनुष्य-जीवन को सत्य, शिव और सुन्दर की अनुभूतियों से संपन्न और समृद्ध करते हैं। अर्थात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक मात्र विकल्प है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की यथार्थ स्थापना। बापू ने कहा था सत्य ही ईश्वर है। स्मरणीय है कि उनका सत्य स्वतंत्रता से निकला मूल्य था। ... महात्मा गांधी के इस विचार को सात्र्र आदि अस्तित्ववादी लेखकों ने आगे बढ़ाया जिन्होंने स्वतंत्रता को साहित्य कलाओं का सर्वोपरि मूल्य माना। अस्तित्ववाद के अनुसार किसी रचना का सौन्दर्य उसमें अभिव्यक्त स्वतंत्रता की चाह का फल है। ...सत्य, शिव और सुन्दर के मूल उत्स के रूप में किसी अदृश्य दैवी सत्ता की कल्पना करने की जरूरत नहीं है। इन मूलभूत सांस्कृतिक मूल्यों को प्रत्यक्ष जीवन में अनुभव किये जाने वाली स्वतंत्रता, समता और बंधुता जैसे जीवनदायी अहसासों में पाया जा सकता है। स्पष्ट है कि किसी कृति अथवा रचना का मूल्यांकन महात्मा गांधी के ईश्वर की शपथ लेकर किया जाना चाहिए तथा स्वतंत्रता, समता और बंधुता सदृश्य अस्तित्ववादी मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की समीक्षा होनी चाहिए। तत्पश्चात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उन जीवनदायिनी अनुभूतियों की जीवंत साक्ष्य अनिवार्यत: होगी जिनसे मानवीय मूल्य साकार होते हैं।