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Tuesday 19 Jun 2018

नैतिकता के मापदण्डों पर सवाल करने की जरूरत है

सेंसरशिप को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों के व्यक्तियों की अपनी अलग समझ होती है। समाज विज्ञानी, मनोविज्ञानी, राजनीतशास्त्री, फिल्मकार, पत्रकार और एक सामान्य दर्शक सेंसरशिप को लेकर अपने अलग-अलग अनुभव बताते हैं। सभी के अनुभवों में एक बात कॉमन है, वह है समाज की नैतिकता। इसी को आधार बना कर सेंसरनीति वर्तमान में भी क्रियान्वित की जा रही है। सेंसरशिप विवाद आज कोई नया-नया उभरा हुआ विवाद नहीं है। अपने जन्म से ही यह विवाद उभरते रूप में चला आ रहा है। समय-समय पर इसको लेकर कमेटियाँ बनी हैं, पर क्रियान्वयन को लेकर सरकारों ने खूब  अनदेखी भी की। जिसके चलते यह विवाद और भी प्रगाढ़ रूप लेते चले आए हैं। सीधे तौर पर हम यह कह सकते हैं कि आज हम सेंसर विवाद के सबसे बुरे दौर में हैं। 90 के बाद से जिस प्रकार फिल्मों के विषयों में अंतर आए हैं ठीक उसी प्रकार सेंसर नियमों में कई मूलभूत परिवर्तन देखे जाने चाहिए थे, पर वह नहीं किए गए। बदलते दौर में समाज के बदलने के साथ हमारी फिल्मों के विषय भी बदले हैं, लेकिन सेंसर नियमों को उतनी तेजी से बदला नहीं गया। यह कारण भी सेंसर के विवाद का मुख्य कारण माना जाता है। मौजूदा दौर में सेंसर विवाद और इसकी प्रासंगिकता को लेकर हमने राज्यसभा टीवी के वरिष्ठ पत्रकार सईद मोहम्मद इरफान से जाना कि सेंसर विवाद की मुख्य वजहें क्या है? आप कई वर्षों से फिल्म पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। राज्य सभा के चर्चित शो गुफ्तगू के जरिये आप सिनेमा के ख्याति प्राप्त व्यक्तित्वों से दर्शकों का परिचय लगातार करा रहें है। एक पत्रकार और अपने शो गुफ्तगू के अनुभवों के आधार पर उन्होंने हमसे बात की-

1.    सेंसरशिप का सीधा संबंध ब्रिटिश हुकूमत से है? हम आज भी उन्हीं के बनाए कानूनों को क्यों ढो रहें है?

सिर्फ  सिनेमा ही नहीं हम कई अन्य जगहों पर उन्हीं अंग्रेजों के बनाए नियमों को फॉलो कर रहे हैं। भारत की बदलती स्थिति-परिस्थिति के अनुसार जो मूलभूत परिवर्तन होने चाहिए थे वो नहीं हुए। समाज के बदलने, उसकी जरूरत को बदलने के साथ नियमों को हर हाल में बदला जाना चाहिए था जो नहीं हुआ। खासकर रचनात्मकता में इस तरह के कानूनों द्वारा नागरिक हितों को छीनना पूरी तरह गलत है।

2    सेंसरबोर्ड की वर्तमान गतिविधियों पर आपकी क्या टिप्पणी है? क्या इससे निर्देशकों को कोई नुकसान पहुंचता है?

हाँ क्यों नहीं, अनुराग हमेशा इस बात से दुखी रहते है कि सिगरेट पीने वालें दृश्यों में स्मोकिंग किल्स की चेतावनी क्यों देना पड़ता है। सिगरेट पीने के दृश्यों के साथ इस तरह की चेतावनी देना कहीं न कहीं सेंसर के साथ समझौता करने जैसा ही हैं। वहीं अविनाश की फिल्म में अमरीश पुरी और अमिताभ बच्चन संबंधी संवाद पर बोर्ड ने एनओसी की मांग कि थी वह कहीं से जायज नहीं था। अगर एनओसी का ही मामला है तो  माई नेम इस एंथोनि गोञ्जाल्विस गाने की एनओसी किसके पास है? नियम को अपने तरह से परिभाषित करना पूरी तरह गलत है। विवाद के बढ़ते स्तर का यह बड़ा कारण है। मुझे याद है आता है पीछे की कमेटियां इन्हींनियमों के साथ अच्छा काम कर रही थी।

3      वैश्विक सिनेमा के विषयों में खुलापन सेंसरशिप नीति के बावजूद है। भारत में तो सर्टिफिकेशन बोर्ड है ऐसे में आप क्या कहना चाहेंगे?

जी हाँ, सही कह रहे हैं। आज भी भारत में जब कभी न्यूड या कोई अश्लील दृश्य सिनेमा में आयें तो हम लोग असहज हो जाते हैं। जबकि विश्व सिनेमा में जिसे हम  नग्नता और अश्लीलता कहते है वह वहाँ की फिल्मों में संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं। भारत में भी बैंडिट क्वीन जैसी फिल्मों में इसका बखूबी प्रयोग हुआ लेकिन बोर्ड का रवैया हम सभी ने देखा। अब हमें समझना चाहिए कि जरूरत में ऐसे दृश्यों को रखना अश्लीलता नहीं है। पेचीदा नियमों और समाज की नैतिकता बरकरार रखने के लिए जिस तरह भारत में इन इन नियमों का  प्रयोग हो रहा है वह कहीं से सही नहीं है। हाल ही में बंदूकबाज की अभिनेत्री ने फिल्म की जरूरत के लिहाज से फ्रंट न्यूड शॉट दिया लेकिन निर्माता ने पेचीदा सेंसर नियमों के चलते कैमरे का प्रयोग पीछे की तरफ  से किया। कई बार रचनात्मकता में सेंसर नियम बाधा पहुंचाते हैं। यूरोप व अन्य देशों के सिनेमा में खुलापन को वहाँ का समाज स्वीकार कर चुका है लेकिन वहीं भारत के संदर्भ में उदाहरण दूँ तो हो सकता है कि सांस्कृतिक विविधताओं के चलते जो शब्द एक जगह प्यार से बुलाने के लिए प्रयोग करते है वह दूसरी जगह ऑफेेंसिव भी हो सकता है। नैतिकता के मापदण्डों पर सवाल करने की जरूरत है। आदिवासी समाज की विविधता और संस्कृति के साथ शहरी सेंसरबोर्ड कभी न्याय कर पाएगा क्या? मेरी नजऱ में कभी नहीं। इसीलिए अब बदले हुए समाज की स्थिति और आवश्यकताओं पर आधारित नैतिकता कोड बनाने जाने की सख्त जरूरत है। सेंसर के नियमों का अगर कड़ाई से पालन किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब क्षेत्रीय विविधता, संस्कृति फिल्मों से पूरी तरह दूर होगी।

4. दर्शक, सामाजिक संगठन इस ओर किस प्रकार की भूमिका निभाते हैं?

दर्शक एक इकाई नहीं है। सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक विविधताओं के कारण सभी दर्शकों के मोरेलिटी के स्टैंडर्ड हंै। उनकी अपनी समझ है। उनके अपने प्रश्न हैं, आवश्यकताएं हैं, दर्शक विरोध नहीं करेगा। धार्मिक भावनाएं आहत होने पर भले ही संगठनों द्वारा विरोध किया जा सकता है किन्तु यहाँ गौर किया जाना चाहिए कि जो धार्मिक संगठन विरोध कर रहे हैं उनका सोशल क्रिडेंशिएल क्या है? उसका स्थान क्या है? क्यों उसको इतनी मान्यता मिल रही है? यहाँ अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय फिल्म प्रदर्शनी में 10-20 लोगों द्वारा की गयी तोड़-फोड़ को कहीं से भी न्याय संगत नहीं ठहराया जा सकता। देश का संविधान बहुलता को स्वीकार करने का अधिकार देता है और इसकी यह अनिवार्य  शर्त भी है। मनमाना रवैया अपनाया जाना, बात-बात पर आहत होना गलत है इसे संभालने की जरूरत है।

5    अन्य माध्यमों की तरह सिनेमा में पोस्ट सेंसरशिप मॉडल की व्यवस्था क्यों नहीं है?

सिनेमा में यह संभव नहीं। निर्माता निर्देशक खुद सेल्फ सेंसर करते हैं। क्योंकि कार्टून, साहित्य, पेंटिंग्स आदि को मोडीफाई किया जा सकता है किन्तु सिनेमा खर्चीला माध्यम है अत: यह संभव नहीं। इसीलिए निर्माता निर्देशक खुद नहीं चाहते कि उनका धन और दिमागी मेहनत बर्बाद हो। मैं ऐसे कई फिल्मकारों को जानता हूं जिनकी रुचि विश्वसिनेमा में है। वह प्रभावित भी हंै, लेकिन फिल्म बनाते समय वह भारतीय मानकों को ध्यान में रखते हैं। हालांकि कुछ ने ये जरूर किया है कि जहां उन दृश्यों के बगैर काम नहीं चल रहा उन्हें रखा, कई बार उनको लेकर विवाद भी खड़ा हुआ।

6    सरकारी सेंसर को हटा देना चाहिए। सेल्फ सेंसर की व्यवस्था पर क्या आप अपनी सहमति जताते हैं?

हाँ मुझे लगता है यह ठीक रहेगा। रचनात्मकता के मामले में फैसला उससे ही जुड़े हुए लोगों को करना चाहिए। विवादों में भी इससे काफी कमी आएगी। आज जो लोग सेंसर बोर्ड में बैठे हैंउनके पास रचनात्मक हृदय की कमी दिखती है। मैं अगर एक उदाहरण से समझाऊं तो बेहतर रहेगा। एक संगीत समारोह में एक ऐसा क्लर्क है जिसका संगीत से कोई लेना देना नहीं है। ऐसे में उससे कलाकारों की फीस देने की बात जब कही गयी तब उसने कलाकारों से पूछा कि हाँ भाई बताइए आपने क्या गाया? कलाकार जवाब दे कि राग अलहिया बिलावल गाया। फिर क्लर्क जवाब दें कि भैया हम तो राग अलहिया का पेमेंट करेंगे बिलावल का नहीं तो वह हास्यास्पद होगा और कला की दृष्टि से निंदनीय भी। यह मेरा सच्चा अनुभव है। इससे सीख लेने की जरूरत है। जिन लोगों को उस विधा से संबंधी ज्ञान नहीं वहाँ ऐसी घटनाएँ अक्सर हो जाती हैं।

7      राज्यों के अपने सेंसर लगातार देखे जा रहे हैं?

एकदम गलत और और दुखद है। इससे फिल्मों को दोगुना हानि होती है। ऐसे में सरकारें खुद अपनी ही बनाई सेंसरनीति में विरोधाभास उत्पन्न कर रहीं है।

8 बोर्ड अगर आपत्तिजनक सिनेमा को प्रतिबंधित या उसमें कट्स न लगाएँ तो  क्या समाज की नैतिकता क्या वाकई खत्म हो जाएगी?

नैतिकता का मामला ही सापेक्ष है। किसकी नैतिकता की आप रक्षा करना चाह रहें है जो दूसरी दृष्टि से अनैतिक है। समाज पर भरोसा किया जाना चाहिए। जिस आयु वर्ग के लिए फिल्म है उसकी भी अपनी समझ है।

9   क्या सेंसर विवाद प्रमोशनल टूल्स है?  

अगर किसी को इससे फायदा मिल रहा है तो अच्छी बात है। बोर्ड कोशिश करे कि ऐसा मौका निर्देशकों और निर्माता को मिले ही न। कट्स लगाने का अपना कोई जवाब बोर्ड को तैयार रखना चाहिए। ब्लेम गेमिंग का सिलसिला अब बोर्ड को रोकना चाहिए।

10 सिनेमा के अलावा अन्य माध्यमों को सेंसर कर पाना कितना आसान है?

मेरी नजर में काफी मुश्किल है। अन्य माध्यम में कृति को आपत्तिजनक पाए जाने पर प्रतिबंधित किया जा सकता है या रोक लगाई जा सकती है लेकिन सिनेमा में पूर्व सेंसरशिप से उस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। किसी आपत्तिजनक  कार्टून पर  रोक लगाएँ जाने के बाद भी आप उसके प्रदर्शन को रोक नहीं सकते। यह उस विधा का सकारात्मक पहलू भी है। वहीं सिनेमा खर्चीला माध्यम होने के साथ-साथ उसकी असीमित पहुँच इस पर ऐसे खतरनाक सेंसरनियमों का मुख्य कारण बनती है। निर्देशक निर्माता चाहते है कि उनका पैसा और मेहनत किसी भी हाल में न डूबे।