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Tuesday 16 Jan 2018

दानवीर

भैयाजी वयोवृद्ध हो गए। इच्छा थी कि मंत्री परिषद में रहते हुए मरते, परंतु हाईकमान ने एक न सुनी। इस चुनाव में उन्हें टिकट नहीं मिला। उन्होंने और उनके गुटवालों ने लाख कोशिशें कीं,पार्टीफंड मेंं करोड़ों रु पयों के चंदे की पेशकश भी की परंतु, उन्हें टिकट नहीं मिल सका। सचमुच बड़ा धक्का लगा उन्हें। वे बीमार रहने लगे इसलिए नहीं कि उन्हें कोई बीमारी हो गई, इसलिए कि अब उन्हें कोई नहीं पूछता। उद्घााटन, शिलान्यास, दौरा और मीटिंगों का सुख अब कहां! सुबह- सुबह अखबार हाथ में लेते ही वे उदास हो जाते। हाय! बीस पेजों वाले अखबार में उनका फोटो  अब कहीं नहीं! पहले आए दिन उनके  फटो छपते रहते। किन्हीं विशेष मौकों; जन्मदिन,विवाह की वर्षगांठ, मंत्रिमंडल में शपथ आदि लेते हुए, सभी अखबारों के पूरे पेज पर मुस्कराते हुए उनका फोटो  छपता, जिसे देखते हुए वे गदगद हो जाते। टी.वी. वाले भी उन दिनों पीछा न छोड़ते। समाचारों में तो वे छाये ही रहते। जब कोई समाचार का अवसर न बनता और एक-दो दिन टी.वी. पर उनके  दर्शन न हो पाते तो वे किसी भी ऊल-जुलूल विषय पर कु छ भी ऊट-पटांग वक्व्य दे मारते। बस सारे चैनल वाले उनके  आगे-पीछे। इस प्रकार उन्हें मीडिया में छाये रहने से परम सुख मिलता। अब वह सुख न रहा। किसी ने यह समाचार भी नहीं छापा कि भैयाजी को चुनाव में टिकट नहीं मिला। सब उन नए युवा प्रत्याशी के ही समाचार छापने लगे। अब ऐसे में भला किसे न धक्का लग जाए। उन्हें भी लग गया और वे बीमार रहने लगे।

सोचते थे बीमारी में लोग मिलने आएँगे। पार्टी में उनके  गुट वाले तक मिलने नहीं आए। चुनाव का समय है, सब नए प्रत्याशी के  साथ व्यस्त हैं। कभी-कभार कोई फ ोन पर ही उनके हाल पूछ लेता है। घर वालों ने उनके कमरे में दवा-दारू  की व्यवस्था कर दी। उनकी सेवा-टहल के  लिए एक नौकर और रख दिया और निश्चिंत हुए। इधर चुनाव संपन्न हुए। उनकी पार्टी विजयी हुई और मंत्रिमंडल में विजयी युवा प्रत्याशी को शामिल कर लिया गया। उन्हें अब और बड़ा धक्का लगा। कोई अटैक आदि नहीं आया उन्हें। पर भीतर जो आया वह अटैक से भी बड़ी चीज थी। कहीं कुछ नहीं और भीतर बहुत कु छ है। थोड़े लक्षण दिखाई दिए, भूख न लगना। नींद न आना। चिड़चिड़ापन। बात-बात पर गुस्सा। घर वालों को परेशानी। सब लोगों ने मिल कर निर्णय लिया कि कु छ दिनों के लिए इन्हें किसी बड़े अस्पताल में भर्ती कर दिया जाए। जो भी समस्या होगी डॉक्टर लोग जानेंगे और निपटते रहेंगे। यहां घर पर तो कुछ दिनों शांति रहेगी।

डॉक्टर आते। ब्लडप्रेशर चैक करते। दिल की धड़कन देखते। पाया गया कि भैयाजी डिप्रेशन में हैं। उनके कमरे में छत्तीस इंची एल.सी.डी. लगाया गया ताकि उनका मन बहलता रहे। अखबार और पत्रिकाओं के ढेर मंगाए जाने लगे। भैयाजी किसी भी प्रकार अवसाद से दूर हों, वे पहले की तरह चहकने लगें। अब बीमारी की जड़ कहां  है? ये डॉक्टर भला कैसे जानते? अस्पताल में एक समाजसेवी भर्ती हुए, उन्होंने अपनी मृत्यु के  समय गुर्दा, लीवर और आंखें दान करने की घोषणा की। अस्पताल के पूरे स्टाफ ने उनका सम्मान किया। टी.वी. पर इंटरव्यू प्रसारित हुआ। अखबारों में फोटो छपे। पत्रिकाओं में उसकी तारीफ में लेख प्रकाशित हुए। भैयाजी ने सब देखा, पढ़ा और सुना। मरना कब है? किसे पता? अभी तो प्रशंसा का सुख बटोर लो। बात उन्हें जम गई। उनका अवसाद जाता रहा। वे प्रसन्न रहने लगे। हफ्तेभर बाद अस्पताल वालों ने उन्हें रिलीव कर दिया।

घर आने के  कुछ दिनों बाद ही भैयाजी ने एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस की। अस्पताल वालों को भी बुलवाया। कुछ समाजसेवी संस्थाओं को आमंत्रित किया। उन्हें फू ल मालाएं पहनाई गईं। प्रेस फोटोग्राफर सक्रि य हुए। भैयाजी ने ऐलान किया- ''मैं अपने सभी उपयोगी अंग मृत्यु के  समय दान करने की आज घोषणा करता हूं...।''डॉक्टरों से अंग अनुदान का फोर्म लेकर उन्होंने उस पर अपने हस्ताक्षर किए। प्रेसवालों को उसे दिखाया। तालियां बजी। कै मरों के  लैंस चमके । उपस्थितजनों ने भैयाजी को इस पुण्य कार्य के लिए धन्यवाद कहा।

दूसरे दिन सारे टी.वी.चैनलों पर इस आयोजन की फिल्म चलाई गई। अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर भैयाजी की फोटो  सहित चार कॉलम का समाचार प्रकाशित हुआ। भैयाजी खुश हुए। दिनभर शुभचिंतकोंं के फोन आते रहे। अगले दिन सुबह-सुबह ही मुख्यमंत्री का फोन आया। उन्होंने भैयाजी के निर्णय की दिल खोल कर तारीफ की। उसके  बाद पार्टी के  राष्ट्रीय अध्यक्ष का भी फ ोन आया। उन्होंने कहा-'पार्टी आपके  निर्णय का स्वागत करती है। पार्टी के  लिए आपका यह कदम एक आदर्श है। हम संगठन में आपकी सेवाएं लेना चाहते हैं। जल्द ही पार्टी की अगली मीटिंग में आपको संगठन में कोई महत्वपूर्ण पद दिए जाने की घोषणा की जाएगी। आप जैसे कर्मठ और समाजसेवी नेता का पार्टी सम्मान करती है।'

अभी भैयाजी के आदर्शों की चर्चा के  समाचार अखबारों में लगातार छप ही रहे थे। टी.वी.पर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की सराहनाएं प्रसारित हो ही रही थीं। सहसा एक दिन स्थानीय युवा विधायक, जो इन दिनों कै बिनेट में मंत्री हैं, भैयाजी के घर दल-बल सहित आशीर्वाद लेने पधार गए। मंत्रीजी ने भैयाजी के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया। भैयाजी की छाती चौड़ी हो गई। सारे रोग-दोष दूर हुए। चुनाव में टिकट न मिलने के  कारण जो उन्हें मानसिक क्लेश था, पूरी तरह तो दूर नहीं हुआ परंतु इस तरह पार्टी और सरकार में उनकी पूछ-परख बढ़ जाने के कारण उन्हें काफ ी राहत मिली। मंत्रीजी उनके  घर आए तो एक बार फि र टी.वी.और अखबारों में भैयाजी की खबरे  छायी रहीं।

कोई छह महीने बाद भैयाजी सचमुच बीमार पड़े। फेफड़ों में इन्फेक्शन हो गया था। इस बीच वे शराब बहुत पीने लगे थे। डॉक्टरों ने भरसक कोशिश की, परंतु उन्हें बचाया नहीं जा सका। डॉक्टरों को मालूम था कि भैयाजी ने अंग अनुदान फ ार्म पर साइन करके उन्हें प्रदान किया था। वे जरू री अंगों के प्रत्यावर्तन के  लिए तत्पर हुए। हालांकि उनके  घर वाले शव की चीर-फाड़ बिल्कुल नहीं चाहते थे, परंतु अंग अनुदान की बात इतनी ज्यादा प्रचारित हो गई थी कि अब उसे छुपाया नहीं जा सकता था।

डॉक्टरों ने फटाफट गुर्दों का अवलोकन किया। यह क्या दोनों गुर्दों में बड़े-बड़े पत्थर हैं। मालूम हुआ कि भैयाजी तो अपने दोनों गुर्दे बहुत पहले खो चुके थे, ये दोनों गुर्दे उन्होंने किन्हीं गरीब आदमियों से मुंह मांगी रकम देकर खरीदे थे। गुर्दे तो उन्होंने खरीद लिए परंतु अपने बेहिसाब खान-पान के  चलते उनके दोनों गुर्दों में पथरी हो गई, जो अब ठीक से मालूम हुई। ऐसे में ये गुर्दे किस काम के , जिसे लगाए जाएं उसे तुरंत पथरी निकलवाने के  लिए ऑपरेशन करना पड़े।

सहसा डॉक्टरों की निगाह भैयाजी के लीवर पर पड़ी। बहुत बड़ा लीवर। ताकतवर लीवर हो तो आदमी सब कुछ पचा जाता है। यह लीवर तो बेहद ताकतवर है। बड़े-बड़े घोटाले पचा लिए इसने। लंबी-लंबी योजनाएँ उदरस्थ हुईं और जाने कहां विलीन हो गईं। दिन-रात खाओ और खाते रहो सुबह सब साफ । सचमुच बहुत महत्वपूर्ण लीवर है भैयाजी का। डॉक्टरों के  लिए समस्या कि इतना पॉवरफुल लीवर वे किसे लगाएंगे? यहां तो अस्पताल में गरीब-गुरबे अपना खराब लीवर लेकर आ जाते हैं। खाने को जिनके  पास कु छ नहीं। पचाएंगे क्या खाक? इतना ताकतवर लीवर उनके लगा दें तो बेचारे भूख से मर जाएंगे। भैयाजी का यह लीवर तो बोतल में बंद जिन्न जैसा। कभी शांत न बैठने वाला। इसे तो खिलाते जाओ लगातार। कु छ भी। ऐसा लीवर किसी को लगा देना, उसके साथ अन्याय होगा। छोड़ो इसे भी। लगा रहने दो भैयाजी के शव में। एक जूनियर डॉक्टर ने अपने सीनियर को याद दिलाया-'सर, आंखें जरू र काम की होंगी। इन्हें जल्दी ही निकाल लीजिए। आंखों की डिमांड अपने अस्पताल में बहुत रहती है।' डॉक्टरों के दल ने आंखों पर ध्यान केन्द्र्रित किया। सचमुच बड़ी और सुंदर आंखें हैं, जिन्हें लगेंगी वह तो धन्य हो जाएगा। परंतु अगले ही क्षण सारे डॉक्टर भौंचक! ऐसा तो उन्होंने आज तक नहीं देखा। ये सुन्दर और बड़ी आंखें तो दृष्टिहीन हैं। शायद इन आंखों को कभी दृष्टि की जरू रत ही नहीं पड़ी। आश्चर्य कि सालों साल अपनी दृष्टिहीनता के बावजूद भैयाजी लोगों को दृष्टि देते रहे। ये दृष्टिहीन आंखें अरसे तक सरकार चलाती रहीं। अब इन्हें कौन लगाना पसंद करेगा? शायद कोई नहीं। इन्हें भी छोड़ो। जड़ी रहने दो भैयाजी के  मुखमंडल से।

डॉक्टरों ने भैयाजी के  सीने में टटोला तो उन्हें घोर आश्चर्य हुआ कि वहां दिल था ही नहीं। कहां चला गया भैयाजी का दिल? अभी तो उन्होंने भैयाजी के  शव का प्रारंभिक परीक्षण ही किया है। वैसे भी दिल निकालने की कोई बात न थी परंतु वह अपने स्थान पर होना तो चाहिए, बिना धड़कता हुआ। परंतु भैयाजी के सीने में दिल था ही नहीं। तो क्या वे इतने सालों तक बिना दिल के सफलतापूर्वक जीते रहे। अब यह तो मेडिकली प्रूफ  हो गया कि वे बिना दिल के ही सफलतापूर्वक सरकार चलाते रहे। वैसे भी प्रशासन में दिल की घुसपैठ ठीक नहीं। परंतु यहां तो दिल पूरी तरह नदारद है, यह एक सफ ल नेता और कुशल प्रशासक की पहचान है।

डॉक्टरों ने फ टाफ ट भैयाजी के शव पर सफेद चादर डाल दी।

सीनियर डॉक्टर बाहर आए तो भैयाजी के रिश्तेदार उनसे अब भी निवेदन कर रहे थे-'सर,ज्यादा चीर-फाड़ न करेंगे। भैयाजी के  अंतिम दर्शन के  लिए मुख्यमंत्री आने वाले हैं। चेहरा-मोहरा उनका ठीक-ठाक दिखना चाहिए। प्रेस वाले भी वहां रहेंगे। टी.वी. वाले बाहर लाइन लगाए खड़े हुए हैं। कम-से-कम उनका चेहरा साफ-सुथरा दिखना चाहिए। दिनभर न्यूज चैनल पर उनकी मृत्यु का समाचार चलेगा। उनका चेहरा बार-बार दिखाया जाएगा। डॉक्टर साहब,भैयाजी की शक्लो-सूरत अच्छी भली दिखनी चाहिए। हजारों लोग उनके अंतिम दर्शन करके धन्य होंगे। हाईकमान, स्थानीय मंत्री और सैकड़ों पार्टी कार्यकर्ता उन्हें श्रद्धांजलि देने आएंगे, ऐसी हालत में उनका शव सही सलामत होना चाहिए। वो तो भैयाजी ने एक सार्वजनिक कार्यक्र म में अंग अनुदान की घोषणा कर दी थी वरना हम उनके शव से एक अंग न निकालने देते आपको।'

डॉक्टर ने उन्हें आश्वस्त किया-'चिंता की कोई बात नहीं है। हम आपकी भावनाओं का आदर करते हैं। भैयाजी हमारे भी प्रिय थे। आखिर इस शहर के प्रभावशाली और लोकप्रिय नेता रहे हैं वे। हमने उनके  शव का सिर्फ ऊपरी परीक्षण किया है, उसमें से हमने कोई अंग नहीं निकाला। उनका शव सही सलामत है, चाहें तो आप भीतर जाकर देख लें।'

भैयाजी के  बंधु-बांधव डॉक्टर की बात सुनकर बहुत खुश हुए। पहले तो उन्हें डॉक्टर की बात पर भरोसा ही नहीं हो रहा था, परंतु जब उन्होंने भीतर जाकर तसल्ली कर ली और दूसरे जूनियर डॉक्टरों से भी पूछताछ कर ली, तब उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि भैयाजी की डेड बॉडी पूरी तरह सही सलामत है।

राज्य में दो दिनों का राजकीय शोक घोषित किया गया। जैसा कि तय था, मुख्यमंत्री, पार्टी हाईकमान, स्थानीय मंत्री और हजारों लोग भैयाजी के अंतिम दर्शन के  लिए उनके बंगले में पधारे। समूचे मीडिया में भैयाजी का जीवन संघर्ष, सरकार में उनका योगदान और उनके  महान व्यक्तित्व के  चर्चे छाए रहे। बार-बार उनका वह फोटो जो कल ही अस्पताल से उन्हें ले जाते हुए लिया गया था, दिखाया जाता रहा। उनके  चेहरे पर एक अनोखी मुस्कान बिखरी हुई थी। उनके  रिश्तेदार प्रसन्न थे कि इन दिनों सत्ता से बाहर रहते हुए भी पार्टी और सरकार ने उनकी मृत्यु पर, उन्हें महत्व प्रदान करने में कोई कसर नहीं की। मीडिया की भूमिका पर भी उन्होंने संतोष व्यक्त  किया। उन्हें लगा कि भैयाजी ऊपर किसी लोक में यदि टी.वी. देख रहे होंगे और ये अखबार उनके  सामने लाए जाएंगे तो वे अवश्य प्रसन्न होंगे। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।

अस्पताल के  डॉक्टर समूह को जरू र अफसोस है कि अंग अनुदान की घोषणा के उपरांत वे एक व्यक्ति के  शरीर से कोई भी अंग निकाल कर प्रत्यारोपित नहीं कर पाए।