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Wednesday 19 Sep 2018

जीव-हत्या

आषाढ़ के मटमैले-धूसर बादल बिन बरसे छाये हुए थे।

'दुबे नर्सिंग होम' के गलियारे में तनाव के बादल तैर रहे थे।

प्रजापति अंकल कभी गलियारे में रखी कुर्सियों पर बैठते और कभी उठकर टहलते।  उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। मधुमेह और उच्च रक्तचाप के मरीज़ जो ठहरे।

संतान भी इतनी नालायक कि मुसीबतें खड़ी कर देतीं, परिणामत: अंकल का रोग बढ़ता जाता।

आण्टी, अंकल का साथ निभाते जब थक गईं तो वह मेरे पास चली आईं। मैं सजग हो गया।

मैं जानता था कि वह तत्काल बेटा-बहू निंदा पुराण खोल कर बैठ जाएंगी।

मैंने उन्हें पास पड़ी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

वह थकी सी बैठ गईं।

मैं भी एक कुर्सी खींच कर उनके पास बैठ गया।

यह शहर का सबसे महंगा नर्सिंग-होम है। खुशनुमा रंगों से सजा गलियारा।  छत पर जगह-जगह लटकते झाड़-फ़ानूस। साफ़-सुथरी दीवारों पर करीने से चस्पां स्वास्थ्य-चेतना जगाने वाले पोस्टर्स। 

यहां सिर्फ  हैसियत वाले ही आते हैं।

यह नगर का सबसे अच्छा प्रसूति-गृह है। यहां स्त्री-शरीर संबंधित जांच के अत्याधुनिक उपकरण हैं। वे उपकरण भी जिनसे गर्भ के पल रहे बच्चे का लिंग-निर्धारण होता है, और होती हैं अनिच्छित गर्भ से मुक्ति की क्रूर-जटिल प्रक्रियाएं। साथ ही यहां मिलती है गोपनीयता की गारंटी।

इस नर्सिंग होम की सूत्रधार हैं डाक्टर दुबे मैडम। जिनके दिमाग और हाथों के जादू की इस नगर में सर्वत्र चर्चा है। डाक्टर दुबे मैडम नगर की सभ्रान्त महिलाओं की हमराज़ हैं। तमाम उल्टे-सीधे, टेढ़े-मेढ़े केस उनके पास आते हैं।

प्रजापति अंकल जिला शिक्षा-अधिकारी हैं। राज्य की राजधानी तक पहुंच के स्वामी, जो इतने वर्षों से यहीं जमे हुए हैं। उनको उखाडऩे वाले स्वयं उखड़ जाते हैं। खुद को बेहद ईमानदार प्रशासक सिद्ध करते हैं, किन्तु उनके विभागीय मातहत यही कहते पाए जाते हैं ---''प्रजापति साहब कथरी ओढ़कर घी पीते हैं।''

तीन बेटे और बड़ी बेटी-दामाद, इन सभी को सरकारी शिक्षक के पद पर उन्होंने ही आसीन कराया है। छोटे बेटे का एक निजी स्कूल है। इस वर्ष उसे भी हाई-स्कूल तक की मान्यता उन्होंने दिलवा दी है।

उनका बड़ा बेटा राकेश मेरा मित्र है।

आण्टी आंखें मूंदे कुछ सोच रही थीं।

राकेश आपरेशन थियेटर के बंद दरवाज़े के आस-पास चहलकदमी कर रहा था।

मैंने आण्टी से राकेश की दोनों बेटियों नेहा और मेहा के बारे में पूछा जो कि कहीं नजऱ नहीं आ रही थीं।

आण्टी ने इशारे से बताया कि स्कूल गई हैैं।

फिर वह बड़बड़ाने लगीं--'' सब अपनी मर्जी के मालिक हैं! हम बूढ़े हो गए... हमें अब कौन पूछता है ?''

मैंने टुकड़ा जोड़ा--''सब ऊपर वाले का किया धरा है आण्टी!''

-''हां बेटा,  भगवान की यही इच्छा हो शायद...बस संगीता को कुछ न हो देवी मां!''

--''मैंने खुद मैडम दुबे से बात की है आण्टी! कह रही थीं कि घबराने की कोई बात नहीं। दो दिन में छुट्टी भी मिल जाएगी। आजकल मेडिकल साइंस काफी तरक्की कर गया है।'' ज्यादा ज्ञान-प्रदर्शन अवसरानुकूल न पाकर मैं ख़ामोश हो गया।

आण्टी-अंकल से जब भी मिला, राकेश और उसकी बीवी संगीता के विरूद्ध खूब शिकायतें सुनने को मिलतीं। उन दोनों की नालायकी के नित नए कारनामे!

आण्टी के चेहरे से लगा कि उनके मन में काफ़ी गर्दो-गुबार इक_ा है। वह बहुत कुछ सुनाना चाह रही हैं। जाने क्यों मुझे भी राकेश घामड़ के खि़लाफ़  बातें सुनकर आत्म-संतोष मिला करता।

मैंने आण्टी को उकसाने के लिए गहरी सांस ली।

''हमें कुछ समझते नहीं ये दोनों। राकेश अपने ससुराल से ही सारी सलाह लिया करता है। संगीता जब देखो तब मैके फोन लगाकर बतियाती रहती है। मुझे देखकर पत्थर की मूर्तियां बन जाते हैं दोनों। बताओ बेटा! इतना बड़ा निर्णय और हमें कोई ख़बर नहीं। क्या करूं...दुश्मन हैं न हम! हमारी क्या बिसात !  भगवान न करे, कि कुछ ऊंच-नीच हुई तो समाज थू-थू करेगा। समधी-समधन को क्या जवाब देेंगे हम? वैसे भी समधन हम लोगों से नाराज़ ही रहती हैं। जाने कितनी चुगलियां लगाती है संगीता। अरे भइया! वो क्या कहते हैं न कि यदि अपना सोना ही खोटा हो तो फिर सुनार को दोष देने से क्या फ़ायदा। मेरा राकेश ऐसा नहीं था भइया..कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करूं?'' 

अंकल-आण्टी मुझे अपना हमदर्द समझते।

वे मुझसे यही चाहते '' तुम उसके दोस्त हो न बेटा...उसे समझाया करो !''

क्या मैं स्वाभावत: दुष्ट हूं? राकेश मेरी इस आदत को भली-भांति जानता। अक्सर मुझे 'नारद जी' की उपाधि से विभूषित करता।

मैंने आण्टी के ज़ख्मों पर नमक छिड़का-'' अंकल की हालत देखिए न आण्टी, कितना परेशान हैं वह !''

''रात-रात भर जागते हैं तुम्हारे अंकल! एक ही छत के नीचे, इतना तनाव? क्या कहूं, कहते रहते हैं कि तनाव से दिमाग की नसें फट न जाएं। किन्तु लड़कों और बहुओं के कान में जूं तक नहीं रेंगती। मेरे नसीब फूटे हैं बेटा... जाने किसने जीव-हत्या की ये सलाह इन्हें दी!  पाप है यह सब बेटा, पाप है ये...हे भगवन!''

नम आंखों को आंचल के कोर से पोंछा उन्होंने।

मैंने सोचा वाकई पाप ही तो है ये!

एक घनघोर शाकाहारी और अहिंसक परिवार की हिंसक वारदात!

गर्भ में फलते-फूलते एक जीव की योजना-बद्ध हत्या...!

कहने को मंडल-कमीशन के बाद बने पिछड़े-वर्ग में सूचि-बद्ध है प्रजापति परिवार। लेकिन रहन-सहन में द्विजों को भी मात देते हैं। नियम-धरम में इतने रूढि़वादी कि उच्च-कुल ब्राम्हण भी लजा जाएं।

उसी प्रजापति परिवार की नई पीढ़ी उन तमाम वर्जनाओं-परम्पराओं की बेडिय़ों से मुक्ति चाहती है।

नगर में कई लोग प्रजापति अंकल की जीवन पद्धति का अनुसरण करते हैं किन्तु उनके बच्चे ही उनके सबसे बड़े आलोचक निकल गए।

यहीं से शुरू हुई पीढिय़ों के बीच अंतहीन अंतराल की खाइयां...

प्रतिदिन की खिच-खिच!

राकेश की पत्नी संगीता मांसाहारी परिवार से है। उसके कारण राकेश ने भी अण्डा वगैरा खाना प्रारम्भ किया। मेरे घर ईद-बकरीद के मौके पर दोनों जी भर कर दावतें उड़ाते।

चूंकि उनकी रसोई में अण्डा भी नहीं उबाला जा सकता था अत: राकेश पत्नी और बच्चियों की फऱमाइशें पूरा करने के लिए बाजार से उबले अण्डे छिलवाकर जेब में छुपाकर घर ले जाता।

मैं चूंकि मुसलमान हूं, इसलिए मुझसे भी उनके घर में छुआछूत का व्यवहार होता। मेहमानों के लिए घर में अलग तरह के कप-प्लेट और गिलास आदि रखे जातेे। मुझे एक ख़ास किस्म के कप-गिलास में चाय-पानी मिला करता। मुझे इससे बुरा तो ज़रूर लगता किन्तु राकेश मेरा लंगोटिया यार था। मैं भरसक उसके घर खाने-पीने से परहेज़ किया करता। अक्सर उसके पढऩे के कमरे में बैठकें होतीं या कि हम नदी के किनारे एकान्त सड़क पर टहलने निकल जाते। राकेश की आवाज़ में जादू है। राकेश से जगजीत सिंह की गज़़लें सुनिये, दिल झूम उठेगा। उनका घर हमारे घर के सामने ही है।

बचपन में वे लोग मिलकर मुझे चिढ़ाया करते-'' मुर्गा-मुसल्लम बना क्या आज घर में ?''

कभी पूछा करते-'' जीव-हत्या करते दया नहीं आती तुम लोगों को?''

मैं उन्हें क्या बताता। मुस्लिम-परिवेश में जन्म लिया है सो यह तो एक सामान्य सी बात होनी चाहिए। मैं स्वयं मुर्गा जिबह कर लिया करता। कितना मज़ा आता है जिबह करने में। होंठों पर दुआ के बोल 'बिस्मिल्लाहो - अल्लाहो अकबर'  यानी कि शुरू करता हूं अल्लाह के नाम से जो कि सबसे बड़ा है। और  तेज़ धार छुरी से मुर्गे की गरदन पर हल्का सा दबाव...! गरदन की सिर्फ़ मुख्य नस ही कटे, बस इतनी सावधानी चाहिए। पूरी गरदन कटी नहीं कि मुर्गा हराम... यही तो 'झटका' और 'हलाल' में फर्क है?

बिना मांस, मछली या अण्डा के हमें रसोई सूनी लगती।

अब्बा साग-भाजी देख के पिनक जाते हैं--''क्या यही तात-पात खाने के लिए मैं कमाता हूं?''

मैं प्रजापति परिवार या अपने अन्य बहुसंख्यक मित्रों को कैसे समझाता कि ये सब बड़ी स्वाभाविक बातें हैं। खान-पान का मनुष्य की विवेकशीलता और नैतिकता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।

वे तो यही समझते कि हम अपने बाप को जेल में मार डालने वाले दुष्ट औरंगज़ेब के वंशज हैं। वे यही समझते हैं कि ये लोग बड़े बर्बर, ज़ालिम और असहिष्णु होते हैं। वे यही समझते हैं कि हम मूर्ति-भंजक, विधर्मी-आतताई हैं। वे यही समझते हैं कि हम म्लेच्छ हैं। इन म्लेच्छों ने लड़कर जब पाकिस्तान ले लिया तो अब यहां क्यों हिस्सा बंटाने के लिए रूके हुए हैं। हमें पाकिस्तान चले जाना चाहिए या फिर यहां छोटे भाई की हैसियत से सिर झुकाकर रहना चाहिए।

बावजूद इन सबके, राकेश मेरा सबसे पक्का दोस्त है।

हर शाम हमें साथ घूमता देख लोग यही टिप्पणी किया करते हैं- '' कहां चली राम-रहीम की जोड़ी?''

पिछले कई दिनों से परेशान है राकेश!

''क्या करूं...कोई राह नहीं सूझती ?''

मैं क्या समझाता। बस यही कहता--''कैरी ऑन ब्वाय!''

उसने बताया कि लेडी डॉक्टर ने भी संगीता को 'कैरी' करने को कहा है,  लेकिन संगीता माने तब न!  कहती कि इस 'अबार्शन'से भले ही मर जाऊं, किन्तु मैं तीन-तीन बेटियों की मां कहलाना पसंद न करूंगी...

''समाज के ताने अब और बर्दाश्त नहीं करूंगी...आपका क्या आप तो बाहर रहते हैं...चौबीस घण्टे मांजी बस एक ही अलाप...पोते का मुंह देखने की चाहतें मुझे आतंकित किए रहती हैं। अच्छा किया कि जो जांच करवा लिया...जब से पता चला है कोख में बोझ सा मालूम पड़ता है। लगता है कि कितनी जल्दी इससे छुटकारा पा लूं !''

राकेश ने अपनी पत्नी की बातें सामने रखीं।

''ख़तरा तो है ही!'' मैं चिन्तित हो उठा।

अजीब घामड़ है राकेश...जब 'अबार्शन' ही कराना था तब इतना विलम्ब क्यों किया? पांचवें महीने का 'अबार्शन' एक 'रिस्क' है।

हम दोनों मित्रों में और भी कई समानताएं हैं। एक ही वर्ष हम दोनों का विवाह हुआ। हम दोनों को ही दो-दो बेटियां हैं।

घरवालों को बिना बताए मैंने तो चुपचाप परिवार नियोजन कर लिया था, किन्तु राकेश गर्भधारण की प्राकृतिक प्रक्रिया को युक्ति-पूर्वक टालते रहता। उसकी पत्नी संगीता जब मेरी बीवी से मिलती तो बताती कि हर माह चिन्ता लगी रहती है। कहीं गलती न हो गई हो। कहीं 'ठहर' न जाए।

मैंने समझाया कि यह एक खतरनाक खेल है। किसी भी तरह गणना में चूक फंसा देगी। वह न माना। मैंने एक बार उसकी व्यक्तिगत पुस्तकालय में एक किताब देखी। 'पुत्र-प्रात्ति योग'... किन्हीं आयुर्वेदाचार्य श्री श्री द्वारा रचित किताब...जिसके बारे में उसने आज तक मुझे कुछ न बताया था।

मुझसे छिपाकर रखी थी उसने वह पुस्तक...लेकिन मेरी गिद्ध-दृष्टि से बच न सकी।

चुपके से पढ़ी थी वह किताब मैंने!

उस पुस्तक में पौराणिक संदर्भों के अलावा पुत्र-प्राप्ति के लिए धार्मिक कर्मकाण्डों के अतिरिक्त स्त्री-सहवास के लिए सुदिन-चर्चा भी थी। मुझे राकेश की मूढ़ता पर तरस आता।

संगीता जब मेेरी बीवी से मिलती तो घुमा-फिरा कर बस एक ही बात -''सास के उलाहने-ताने...पोता न आया तो पुरखों की आत्माएं भटकती रहेंगी!''

''पोता न खिला पाने का दुख तो मेरी सास को भी है, किन्तु पोता न आने से हमारे मज़हब में ऐसा कोई संकट नही आता!'' मेरी बीवी समझाती।

उसके तर्क की धज्जी उड़ा दी जाती कि म्लेच्छों का क्या धर्म और कैसी मुक्ति?

मेरी बीवी को बेटा खिलाने का कितना शौक है, मुझे मालूम है, लेकिन इस बात पर अपना बस तो नहीं। तो परम्परागत मार्ग यह है कि जब तक बेटा न पैदा हो अनिच्छित पुत्रियों की लाइन लगाते रहिए।

कभी-कभी बेटे वालियों को इतराते देख वह कहती -''मन करता है कि किसी का बेटा चुरा कर ले आऊं! वाह रे ख़ुदा की कुदरत...किसी को बेटे पर बेटा और किसी के पास बेटियों का ढेर...''

रियाज़ ड्राइवर की बीवी को ही देेखें...बेटे की तलाश में पांच लड़कियों की आमद और सुना है कि इस साल वह पुन: पेट से है!

एकान्त में मेरी बीवी अक्सर कहा करती-''बेटियां तो चल देंगी, हमारी इस कमाई, धन-दौलत का क्या होगा ?''

मैं क्या जवाब देता।

बस, मुझे इतना पता था कि पुत्र के आविष्कार के लिए अब और कोई प्रयोग नहीं। अल्लाह ने जो दिया, सब उसी की मेहरबानी है। उसको यह संसार चलाना है। उसे अच्छी तरह मालूम है कि संसार में नर-नारी का अनुपात क्या हो? हमारे नसीब में बेटियां हैं तो हम उन्हें बेटों की तरह पालेंगे।

लेकिन क्या भावनात्मक रूप से मेरा यह तर्क हमें राहत दे पाता था?

राकेश ने बताया कि उसकी ससुराल इंदौर में भी संगीता का 'चेक-अप' कराया गया था। भ्रूण-परीक्षण से यही पता चला कि पेट में पल रहा भ्रूण नर नहीं बल्कि मादा है।

राकेश और संगीता दोनों नहीं चाहते थे कि एक और 'कन्या-शिशु' उनके संसार में आए।

अंकल-आण्टी की नाराजग़ी के बावजूद उन लोगों ने ये निर्णय लिया है।

कुर्सी पर बैठी आण्टी की आंखें बंद हैं।

अंकल उसी तरह बेचैन से टहल रहे हैं।

आपरेशन-थियेटर के दरवाज़े के पास राकेश चिन्तित-मूर्तिवत खड़ा है।

नर्सिंग-होम के गलियारे से दीख पड़ता आसमान का टुकड़ा अब मटमैला-धूसर हो गया है। लगता नहीं कि बारिश होगी। बस, उमस बनी रहेगी।

पसीने से तन-बदन चिपचिपाने लगा ।

मौसम में मनहूसियत सी तारी है....।