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Monday 21 May 2018

मकुनी

बेटा, एक बार और सोच ले, क्या तेरा फैसला बदल नहीं सकता? मेरी मान ले बबुआ। तू दुबई-वुबई मत जा। हमारे घर में भी तो रोटी है। हम दो ही तो खाने वाले हैं। न कोई आगे न पीछे। मैं तो चार निवाले खाने वाली, वो भी अब हजम नहीं होते। दो में भी पेट भारी हो जाता है। तू खाता ही कितना है। फिर क्यों और किसके लिए तू देस छोड़कर बाहर जाने की जिद लिये बैठा है। अरे बावले, जैसा भी है, है तो अपना देस। बाहर न कोई हमारी भाषा समझेगा, न कोई मिलने वाला, न दुख-सुख बांटने वाला। अब तू मेरी बात सुन ले बेटा, अपनी जमीन छोड़कर मैं कहीं नहीं जाने वाली। आखिरी बखत में मैं कहीं वहीं निपट गई तो अपने देस की माटी भी नहीं मिलेगी। हमने तो आंखें खोली और पले-बढ़े यहीं की माटी में। तेरे बाबूजी ने भी यहीं आखिरी सांसे लीं। तुझे जाना है तो जा। मैं तो यही कहूंगी कि तू भी मत जा। हम रह लेंगे आराम से। मैं तो अनपढ़ ठहरी, फिर भी गल-गलकर मैंने इतना तो कमाया ही कि अपनी गुजर-बसर हो गई और तुझे भी पढ़ाया-लिखाया। अब तू तो बहुत पढ़-लिख गया. तू तो यूं चुटकियों में कमा लेगा, (मकुनी ने चुटकी बजाते हुए कहा)। फिर आकाश से प्रश्न करते हुए बोली- बता आकाश, क्या तू इतना भी नहीं कमा पाएगा कि हम मां-बेटे सुकून से जिंदगी गुजार सकें। अरे हम मां-बेटे चैन से रहेंगे अपने मोहनलाल गंज में। तू कहेगा तो लखनऊ में ही दो कमरे का क्वार्टर ले लेंगे। जब चाहूंगी तब शशि और रमजान चचा से भी मिल लूंगी आके। बूढ़े गले से लहराती आवाज में मकुनी ने कहा। उसके इस फैसले को सुनकर उसके बेटे आकाश ने कहा-

तो मेरी भी सुन लो मां, मैं तुम्हारे बिना तो हरगिज़ नहीं जाऊंगा। यहां कौन रखेगा तुम्हारा ख्याल? और तुम्हारे बिना मैं भी कहां रह पाऊंगा ? अब तुम्हारे समय वाला ये देश नहीं रहा। अब सब कुछ मिल जाता है यहां मां,  बस नौकरी ही नहीं मिलती और मिलती भी है तो ऐसी कि जिसके लिए इतनी बड़ी-बड़ी डिग्रियों की कोई जरूरत नहीं। इससे अच्छा तो तुमने मुझे पढ़ाया ही नहीं होता। तुमने बिना पढ़े भी इतना कमाया कि मुझे पढ़ा-लिखा दिया। मुझे किसी भी चीज के लिए किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ा, कभी सोचना नहीं पड़ा और अब भी गुजर-बसर के लिए कमा ही रही हो ना ! मैं तो इतने साल पढ़के भी बेकार हूं। मुझे पता होता तो क्यों इतने साल तुम पर बोझ बनकर रहता। मैं भी नौकरी-चाकरी करके तुम्हारा हाथ बंटाता। हम दोनों मां-बेटे प्यार से रहते और तब मां मेरे सपने भी इतने ऊंचे नहीं होते।

 आकाश की आवाज में दृढ़ निश्चय के साथ चिंता और पीड़ा थी। जो आज के अधिकांश नवयुवकों में खाई की तरह गहरी होती जा रही है या यूं कहें कि सूखते तालाब की तरह आशाएं मरती जा रही हैं, सूखती जा रही हैं और हताशा के दल-दल में नवयुवक धंसते जा रहे हैं।

मकुनी ने राहत की सांस लेते हुए कहा मैं तो यही चाहती हूं कि तू यहीं रह। न मैं कहीं जाऊंगी और न तू जाएगा। दोनों यहीं रहेंगे, मैं तो अब चैन से रहना चाहती हूं बस।

ये सुनते ही आकाश ने थोड़े गुस्से से कहा अगर तुम्हारी जिद है कि तुम मेरे साथ नहीं चलोगी.. तो अब ये भी जान लो कि मेरी भी यही जिद है, मैं जाऊंगा और जरूर जाऊंगा, वो भी तुम्हें साथ लेकर. जब तक तुम हां नहीं करतीं मैं खाने को हाथ भी नहीं लगाऊंगा। कहकर वो बाहर निकल गया और मकुनी उसे आवाज लगाती रही। उसकी आवाज दूर कहीं बजते गीत की तरह लगी जिसके कुछ शब्द हवा के झोंके के साथ सुनाई देते हैं और फिर कुछ शब्द हवा में खो जाते हैं। मकुनी की खरखराती आवाज किवाड़ के भीतर ही रह गई। तभी मकुनी का मिट्ठू  चिल्लाया - आकाश रुको, आकाश रुको। भाभी आकाश, भाभी आकाश।

  बैजू को एक तोते का बच्चा पेड़ के कोटर के बाहर मिला था और वो उसे घर ले आया था। बैजू यानी मकुनी का घरवाला। इससे पहले भी बैजू को अक्सर तोते के नन्हे बच्चे मिल जाते। वो उसे पालता और जब वो उडऩे लायक होते तो उन्हें उड़ा देता लेकिन ये मिट्ठू  उसका घर छोड़कर गया ही नहीं और फिर बैजू ने उसके लिए बड़ा-सा पिजड़ा खरीदा ताकि वो सुरक्षित रह सके। मिट्ठू सबकी बात सुनता और बीच-बीच में बोलता रहता। मिट्ठू  से मकुनी का भी मन लगा रहता और वो उसे प्यार से कहती तू तो मेरे गांव-देस का है, मेरा देवर है न... और मेरे आदमी का सबसे प्यारा नातेदार है तू। जब बैजू का ब्याह हुआ तो बैजू ने ही मिट्ठू को भाभी कहना सिखाया। तबसे उसके साथ एक रिश्ता बन गया था। जब भी मकुनी ज्यादा दुखी होती तो मिट्ठू बोलता भाभी-भइया, भइया-भाभी। जैसे कहना चाहता हो कि अगर वो रोएगी तो भइया दुखी होंगे। बैजू रोज गौरैया को भी चावल खिलाता था। उनके कच्चे आंगन में प्रकृति और इनसान के बीच गहरा और पक्का रिश्ता बन गया था। शहर आकर भी मकुनी अपने खाने से चावल निकालकर गौरैया, कौवे और मैना को खिलाने लगी। यहां भी उसका एक पक्का रिश्ता बन गया था। सभी उसकी जिंदगी से जुड़ गए थे। उसकी मुंडेर पर दाने की आस में बैठे रहते।

'मकुनी' नाम का पेड़ ज्यादा पुराना नहीं था लेकिन धूप-पानी और खाद के अभाव में पत्ते झड़ गए थे। ठूंठ पीले पड़कर सूखने लगे थे। वो खुद ही अपनी खाद बनकर आस-पास की लताओं को पाल रही थी। फिर भी उसकी फैली सूखी बाहें अपने पत्तों के आने का इंतजार कर रही थीं जिससे वो अपने आंचल की छांव में अपने बच्चे को चिलचिलाती धूप से बचा सके। आकाश इकलौता बेटा था, जिसे मकुनी ने खून-पसीने से सींचकर बड़ा किया था। पढ़ाई-लिखाई बहुत जरूरी होती है, ऐसा उसका आदमी कहता था। बैजू तो मुंशीगिरी करते-करते मर गया। गुप्ता जी की चाकरी करता और अपने इकलौते बेटे को गुप्ता जी का मुंशी बनाने का ख्वाब देखता और गुप्ता जी ने उसके विश्वास पर अपनी मौखिक वचन की मोहर भी लगा दी थी। अब ये बात किस्मत की काली तकदीर पर काली ही स्याही से लिखी गई, जो बाद में चमक नहीं सकी। चमकती भी तो कैसे? काली तकदीर पर काले हरफ अंधियारे की कोठरी से ज्यादा कुछ नहीं होते। गुप्ता जी भी असमय चल बसे और बैजू भी चल बसा। जैसे दोनों ने सांठ-गांठ करके आगे-पीछे इहलोक से परलोक का टिकट कटाया हो। एक दिन गुप्ता जी के सीने में तेज दर्द हुआ और देखते-देखते चट-पट वो खतम हो गए और छह महीने बाद एक रात बैजू ऐसा सोया कि उठा ही नहीं।  सारे हालात और मंजर बदल चुके थे। अब बैजू को दिया वादा गुप्ताइन कैसे पूरा करतीं ? गुप्ताइन के भाइयों ने उन्हें पीहर बुला लिया। रोजी-रोटी को मोहताज मकुनी भी गांव का कच्चा मकान अपनी जेठानी को देकर शहर आ गई थी, अपनी चचेरी बहन शशि के पास। मकुनी कढ़ाई का काम अच्छी तरह से जानती थी।

पहले जमाने में लोग लड़कियों को पढ़ाएं या ना पढ़ाएं पर सिलाई-बुनाई-कढ़ाई जरूर सिखाते थे। कहते भी थे कि बखत-बे-बखत लड़की के काम आएगा। घरवालों के कपड़े सिलेगी तो रुपया बचेगा और जरूरत आन पडऩे पर यही हुनर काम देगा, घर में चार पैसे भी आएंगे। उसकी बहन ने रमजान चचा से उसकी मुलाकात करा दी थी। रमजान चचा बहुत नेक दिल इंसान थे। एकदम फरिश्ता। रमजान माह-से पाक जान पड़ते थे। फरिश्ते की तरह सफेद झक कुर्ता पहनते। तीन इंच लम्बी दाढ़ी थी जिसे पहले उनकी बेटियां मेंहदी लगाकर रंग देती थीं मगर बेटियों के निकाह के बाद उन्होंने शगुफ्ता चची की एक भी नहीं सुनी और अब उनकी सफेद डाढ़ी उनके सफेद कुर्ते से बहुत मेल खाती और माशा अल्लाह वो खुद भी गोरे-चिट्टे थे। जब उन्होंने पहली बार मकुनी को देखा तो उसके सिर पर हाथ रखकर कहा था कि बेटी तुम पर अल्लाह का करम जरूर होगा। अब तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी। जितना तुम काम करोगी उतना तुम्हें रुपया मिल जाएगा। मकुनी ने चिकन की कढ़ाई का काम शुरू कर दिया था। दो महीने बाद रमजान चचा के घर के पास उसने एक कमरा किराए पर ले लिया था। उसका निकलना रमजान चचा के घर तक ही होता। बगल की दुकान से राशन और वहीं से तरकारी ले लाती। यही थी उसकी दिनचर्या।

शहर आकर मकुनी की जिंदगी बदल गई थी। वो दिन-रात कढ़ाई करती। वो ऐसे डिजाइन बनाती और उसको इतनी सफाई से काढ़ती कि चचा की वो पसंदीदा कारीगर बन गई थी और उसकी कढ़ाई में खूबसूरती हो भी क्यों न! दुखों को जो काढ़ रही थी वो। खुष्क सपनों का सीलापन उसकी कढ़ाई में तरावट की तरह नजर आता था। अपने इकलौते बेटे की हर मुस्कुराहट को वो अपनी कढ़ाई में उतार रही थी। जैसे-जैसे वो बड़ा हुआ उसकी उंगलियां भी रफ्तार पकडऩे लगीं। वो बैजू की तस्वीर के आगे दिया जलाकर कहती कि देखो जी, मैं तुम्हारा सपना पूरा कर रही हूं। तुम्हारे बेटे को पढ़ा रही हूं। अब उसका एक ही सपना था कि आकाश पढ़ लिखकर मुंशी बन जाए। जब उसने रमजान चचा को यह बात बताई तो चचा खूब हंसे। फिर आकाश को गोद में उठाकर बोले - अल्लाह चाहेगा तो ये अफसर बनेगा। मुंशी तो कुछ भी नहीं अफसर के आगे। बस इसकी पढ़ाई न रुके कभी।

तब बड़े विश्वास के साथ मकुनी ने कहा था चाहे जो हो जाए, भले ही मुझे पानी पीकर रहना पड़े मगर मैं आकाश की पढ़ाई नहीं रुकने दूंगी। वचन दिया है आकाश के बाबूजी को, सो तो निभाऊंगी न, वर्ना क्या मुंह दिखाऊंगी ऊपर जाकर इसके बाबूजी को?

  जब मकुनी का लगन हुआ था तो वो मात्र 16 बरस की थी। मुंह दिखाई और पैर पड़ाई में गांव की सभी औरतों ने 'दूधो नहाओ-पूतो फलो' का ही आशीर्वाद दिया और सत्रहवां लगते-लगते आकाश उसकी गोद में आ गया था। किस्मत को शायद उसकी मांग का सिंदूर नहीं भाया। आकाश तीन बरस का ही हुआ था कि उसका जीवन फीका हो गया। वो पलाश से मोगरा बन चुकी थी। सुगंध तो थी मगर जीवन पूस की गुनगुनी धूप से जेठ का आतप बन गया था जो मकुनी को झुलसा रहा था। बैजू मकुनी से अक्सर कहता था कि देखना अगर मेरी बेटी होगी तो उसे तितली के रंग-बिरंगे पंख दूंगा। जिससे वो बदरंगों के जीवन को रंगों से भरेगी। अगर बेटा हुआ तो कबूतर की तरह उड़ाऊंगा आकाश में, जिससे वो रोज उड़े, खूब ऊंचा मगर सांझ को घर वापस आ जाए। इसीलिए उसने बेटे का नाम आकाश रखा। जिससे वो आकाश की तरह सबको अपनी छत दे सके। 20 साल की विधवा ने हाड़तोड़ मेहनत कर अकाश को स्कूल भेजना शुरु कर दिया। रमजान चचा ने कई बार उसको समझाया कि अभी उसके सामने पूरा जीवन पड़ा है। उसे अपने और आकाश के बारे में सोचना चाहिए। दरअसल चचा उससे उसकी शादी की बात करना चाहते थे क्योंकि इतना बड़ा जीवन अकेले काटना, वो भी इस उम्र में एक छोटे बच्चे के साथ, बहुत मुश्किल था। एक दिन रमजान चचा ने उससे कहा-

मकुनी, अभी तुम्हारी पूरी उम्र पड़ी है। तुम कहो तो तुम्हारे लिए कोई लड़का देखूं ! बिना आदमी के  इस दुनिया में जीवन जीना आसान नहीं है। अकेले कैसे काटोगी जीवन? बहुत बेरहम है ये दुनिया।

मकुनी ने उदास स्वर में कहा था -आसान नहीं है लेकिन नामुमकिन भी तो नहीं ना चचा? मेरी किस्मत में जो था मुझे मिल गया। मैंने अपना जीवन देख लिया। वो अपनी निसानी तो छोड़ गए हैं ना ? मेरी किस्मत में आदमी का साथ लिखा होता तो ये काहे को हट्टे-कट्टे जाते। किस्मत के लिखे को कोई नहीं बदल सकता चचा और फिर इस दुनिया में इकली कहां हूं मैं। भगवान ने जो मुझे आपसे मिला दिया और मेरी गोदी में है न, उनका आकाश और हंसते हुए बोली मेरा आकाश जिसे मुंशी बनाना है मुझे।

मकुनी, तुमने फिर उसे मुंशी बनाने के लिए कहा। तुमसे कितनी बार कहा है कि आकाश को मुंशी बनाने की बात छोड़ो। उससे भी ज्यादा की सोचो। अब ये पढ़-लिखकर डॉक्टर-इंजीनियर बनेगा। हिसाब-किताब थोड़े ही करेगा। इस बार रमजान चचा की आवाज कड़क थी।

मकुनी ने बड़े भोलेपन से कहा- मुझे क्या पता चचा। मेरी दुनिया, मेरी इच्छा तो वही है जो मेरे आदमी की थी। मुझे तो इतना पता है कि इसके बापू इसे मुंशी बनाना चाहते थे और वो भी तो मुंशी ही थे। मैं तो अपना पति धरम निभाऊंगी। जो मुझसे कहते थे मुझे तो वही पता है। वैसे भी मैं ठहरी अनपढ़, ज्यादा तो जानती नहीं। अब आप ही बताना इसकी पढ़ाई के बारे में। आपका तो नवासा हुआ ना आकाश! मुझे मेरी किस्मत से और कुछ नहीं चाहिए। अगर गांव की जमीन से उखड़ी तो मुझे यहां आपकी जड़ों ने जो सहारा दिया, वही काफी है मेरे लिए. वर्ना मेरा क्या होता? आप हमारे अन्नदाता हो। मैंने सुना था कि सहर वाले भतेरे चालाक होते हैं और इकली लुगाई तो कतई ना जी पाती सहर में, वो भी इतने छोटे लल्ला के संग। भला हो ऊपर वाले का कि मुझे तो आप मिल गए। कहते हैं न, कि वो एक हाथ से छीनता है तो दूसरे हाथ से देता भी है।

नहीं बेटी, मैं कोई अन्नदाता नहीं हूं। कोई एहसान नहीं किया तुम पर। हमारे मजहब में लिखा है कि मजलूमों, बेवाओं और जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए। मैं तो वही कर रहा हूं और हमारे ही क्यों सभी मजहब यही तो सिखाते हैं। अल्लाह मुझे इसका सबाब जरूर देगा। रमजान चचा ने दुआ में हाथ ऊपर उठाते हुए कहा।

हां चचा, आपकी सारी इच्छाएं पूरी हों। भगवान आपको लम्बी उमर दे। अब तो बस मेरा जीना-मरना आकाश के लिए है। इसे पढ़ा पाऊं और मुंशी बना दूं, बस यही चाहूं हूं मैं।

चचा ने खीझकर उसके सिर पर हलकी-सी चपत लगाते हुए कहा- या अल्लाह अब इसे कौन समझाए। अरे, मुंशी नहीं, उससे ऊपर की सोचो मकुनी। मुंशी से बड़ा होने की सोचो। देखना तुम्हारा लख्ते जिगर एक दिन नाम रोशन करेगा।

बीस बरस की मकुनी अचानक बहुत बड़ी हो गई थी। हाड़-तोड़ मेहनत में वो खुद को भूल गई। अब उसके सिर पर रुपए कमाने का भूत सवार था। रात-रात भर वो कढ़ाई करती।

यूं ही बरसों बीत गए। वक्त के न पांव होते हैं और न पंख... फिर भी किसके हाथ आया जो मकुनी के हाथ आता। वक्त उड़ता चला गया। आकाश इंजीनियरिंग कर चुका था। सब कुछ बदल चुका था। तीन साल का छोटा बच्चा हट्टा-कट्टा नौजवान हो गया था। नहीं बदला था तो मकुनी का काम। वो अब भी आंखों का दिया जलाकर कढ़ाई करती और घर का खर्च चलाती लेकिन अब अक्सर मकुनी की कढ़ाई छापे से आगे-पीछे होने लगी। एक दिन मकुनी कढ़ाई कर जब चचा के पास ले गई तो चचा ने देखा अब तक तो थोड़ी-बहुत कढ़ाई ही छापे के बाहर होती थी मगर उस दिन उसकी सारी कढ़ाई छापे के बाहर निकल गई थी। तब रमजान चचा ने उसे कढ़ाई दिखते हुए पूछा-

मकुनी ये क्या कर रही हो आजकल? अभी तक तो थोड़ी-थोड़ी कढ़ाई ही छापे के बाहर होती थी मगर आज तो कैरी की पूरी बेल ही छापे के बाहर डोल रही है। हवा तेज चल रही है क्या, जो कैरियां झूला झूल रही हैं? चचा ने मजाकिया लहज़े में कहा, तो मकुनी ने कहा - चचा, मैंने तो कैरियां बिलकुल छापे पर ही काढ़ी हैं। सूत भर भी यहां से वहां नहीं खिसकी। तब चचा ने कुछ नहीं कहा मगर उनको शक हुआ कहीं मकुनी की नजऱ तो कमजोर नहीं हो रही। उन्होंने उसकी नजऱ की जांच कराई तो उसकी नजऱ वाकई बहुत कमजोर हो गई थी. उसकी आंखों ने भी बैजू की तरह समय से पहले ही उसका साथ छोड़ दिया था। चचा ने उसका चश्मा बनवाया. चश्मा लगाते ही वो बोली -

अरे चचा, हमारी तो दुनिया ही बदल गई. कितना साफ दिख रहा है। तब उसने पहले वाली कढ़ाई देखी और हाथ जोड़कर बोली- चचा मुझे माफ कर दो. सारी कढ़ाई बाहर भाग गई है। मैं दोबारा करके दूंगी। आपका नुकसान नहीं होने दूंगी।

चचा की आंखों में आंसू आ गए थे। चचा ने उसे पल-पल संघर्ष करते देखा था। बच्चे की परवरिश में उसने खुद को गला दिया मगर न तो उसको खाने-पीने की कमी होने दी और न ही उसकी पढ़ाई रुकने दी। चचा ने उसके सिर पर फिर हाथ रखा और कहा अल्लाह तेरे जैसी बेटी सबके आंगन में खेले।   

   मकुनी खुद को भूल चुकी थी मगर अब उसका शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था। आकाश भी चप्पल घिस रहा था मगर नौकरी नहीं मिल रही थी। जहां मिलती वहां इतना कम तनख्वाह होती कि वो खुद ही मना कर देता। जब वो मकुनी को रात-रात भर जागकर काम करते देखता तो वो खुद को ही कोसता। मकुनी ने समझाया भी कि कम पैसे मिलेंगे तो क्या हुआ, खर्च तो चलेगा मगर आकाश कहता कि एक बार कम पैसों पर काम करना शुरु करूंगा तो कभी आगे नहीं बढ़ पाऊंगा। आकाश को काफी समय गुजर गया मगर उसे कहीं नौकरी नहीं मिली। एक दिन उसकी मुलाकात एक एजेंट से हुई जिसने उससे कहा कि वो दुबई में उसके लिए काम भी ढूंढेगा और जाने का इंतजाम भी करा देगा लेकिन तीन महीने तक उसे अपनी तनख्वाह का तीस फीसदी उसे देना होगा। बस तब से आकाश दुबई जाने की जिद पर अड़ा था। दो दिन हो गए थे आकाश ने कुछ नहीं खाया। हारकर मकुनी ने दुबई जाने के लिए हामी भर दी। वो दिन भी आ गया जब मकुनी को दुबई जाना था। घर से निकलते वक्त वो मिट्ठू  से बोली-

मिट्ठू , देखा हम इंसानों को? तू तो अपने भइया को छोड़कर अपने जंगल, अपने संगी-साथियों में भी वापस नहीं गया और तेरी भाभी तुझे छोड़कर देस से बाहर जा रही है। मुझे माफ कर देना मिट्ठू । मैं चाहती थी अपनी आखिरी सांस तक तेरे साथ रहूं। तेरे भइया का फरज निभाऊं, पर अपनी कोख के जाए को कैसे छोड़ दूं? कैसे मरने दूं? देखा न, उसने खाना-पीना छोड़ दिया। तू मेरा जाया नहीं है, इसलिए तुझे तो छोड़ सकती हूं ना? ये आज के बच्चे नहीं समझते हमारे रिश्तों को, दिलों को, हमारे प्यार को। इनको कोई लगाव नहीं अपने देस से। ये बस पैसा कमाना जानते हैं और उसमें अपने नाते भी भूल जाते हैं। अब पता नहीं तुझसे दोबारा मिल भी पाऊंगी कि नहीं। क्या पता मेरे भाग में वहीं की मौत लिखी हो और मन मारकर मिट्ठू को चचा को सौंप दिया। मिट्ठू  खूब चिल्लाया-भाभी.. भाभी.. भाभी..

मकुनी आंखों में आंसू लिए आकाश के साथ चली गई।

वो पहली बार अपने गांव से बाहर निकली थी तो मोहनलाल गंज ही आई थी। उसके अलावा उसने कोई और शहर भी नहीं देखा था और आज वो हवाई जहाज से अपने देस से बहुत दूर दुबई आ रही थी। हवाई जहाज में वो इतनी डरी कि उसे लगा कि मानो उसका जी बैठ जाएगा। उसने एक बार भी खिड़की से बाहर नहीं झांका। उसके मन में बहुत सारी जिज्ञासाएं थीं बिदेस को लेकर। उसके मन में जाने क्या-क्या चल रहा था। भगवान जाने कैसे आदमी होंगे वहां के! पता नहीं क्या-क्या खाते होंगे वहां! कैसे घर होंगे, वहां गौरेया और मिट्ठू  मिलेंगे क्या? कोई चचा जैसा अच्छा देवता सरीखा भला मानुस और शशि जैसी बहन मिलेगी क्या? वहां भी मोहनलाल गंज जैसा घर मिलेगा ? मोहनलाल गंज में तो उसके घर के आगे खूब पेड़ थे, क्या वहां भी ऐसे ही बड़े-बड़े नीम, शीशम और आम के पेड़ होंगे? आकाश ने बताया था जैसे यहां रमजान चाचा हैं वहां वैसे लोगों की आबादी ज्यादा है। यही सब सोचते-सोचते वो दुबई पहुंच गई थी। वहां भी उसे सब लोग वैसे ही दिखाई दिये जैसे मोहनलाल गंज में थे। उसने आकाश से कहा यहां भी तो सब इंसान एक जैसे हैं, वैसे ही जैसे हमारे मोहनलाल गंज में हैं। हां, घर जरूर हाहा-हूती हैं। हमारे मोहनलाल गंज में तो ऐसा कुछ भी नहीं है लेकिन हमारे मोहनलाल गंज जैसे पेड़ नहीं हैं यहां। अरे मां, मोहनलाल गंज के अलावा भी तुम्हें कुछ पता है? फिर जवाब भी खुद देता है, कैसे पता होगा तुम तो कहीं निकली ही नहीं।

मकुनी ने थोड़ा उदास होकर कहा- क्या करती बेटा। जिसके साथ घूमना चाहा वो ही न रहा और फिर तुझे पालती या घूमती। फिर मुझे तो बाहर जाने तमीज भी नहीं थी। कैसे, कहां, क्या होता है मुझे क्या पता था।

दुबई आकर आकाश नौकरी में लग गया और मकुनी उसके जाने के बाद रोती रहती। उसे चचा की याद आती और मिट्ठू  की कमी उसे बहुत सालती। शगुफ्ता चची और शशि से जो दिल की बात कह लेती थी, उन जैसा भी उसे वहां कोई नहीं मिला। वहां उसका ऐसा घर भी नहीं था जिसमें आंगन हो और आंगन में गौरैया फुदकती मिल जाती। उसके तो यही संगी-साथी थे। वो भी उसे नहीं मिले। एक दिन वो पास के पार्क में गई तो पेड़ों पर चहकती गौरैया दिखाई दीं। उन्हें देखकर उसकी बुझी आंखों में चमक दौड़ गई और वो वहां काफी देर तक उनको देखती रही। उसे गौरैया भी एक जैसी ही लगीं लेकिन उसको लगा कि यहां की गौरैया हमारे मोहनलाल गंज की गौरैया से ज्यादा तंदरुस्त, गोल-मटक्की हैं। उसको अपने यहां की दुबली गौरैया याद आ गईं। फिर उसे लगा वो कितनी कम हो गईं थीं। पहले गांव में फुदक-फुदककर पूरे दिन उड़ती फिरतीं और झुरमुटा होते ही सामने के झाड़ में छुपना शुरू कर देतीं। वो अगले दिन से इन मुटक्की गौरैया के लिए भी थोड़े चावल लाने लगी। कुछ ही समय में विदेसी गौरैया से उसकी दोस्ती हो गई। दुबई में उसको आठ महीने हो गए थे। वो धीरे-धीरे खुद को यहां के माहौल में ढालने लगी थी। फिर भी वो उदास रहती। न उसके पास कढ़ाई का काम होता, न चचा जैसा परिवार मिला। जब तक वो जीवन के सुख को जान पाती तकदीर ने उसके हाथों में कढ़ाई का फ्रेम, सुई और धागा पकड़ा दिया था। उसकी पूरी उम्र गुजर गई थी सुई-धागों से अपने दुख सिलते-काढ़ते और अब उम्र के इस पड़ाव में उसके हाथ खाली थे। वो अक्सर खाली बैठे-बैठे कढ़ाई की तरह खाली हाथ चलाती। एक दिन चचा का फोन आया कि मिट्ठू अब नहीं रहा। बस उसके बाद तो गिरते खंडहर की तरह मकुनी रोज एक ईंट की तरह गिरने लगी। उसको यही दुख सालता रहा कि उसके आदमी की निसानी था मिट्ठू । जो उनके प्यार में जंगल नहीं गया और उनके स्वरग सिधारने के बाद उसका ख्याल रखा, वो उसके बगैर जिंदा नहीं रह पाया और प्राण त्याग दिये। मकुनी को लगता कि मिट्ठू उसकी वजह से मर गया। अब वो स्वरग में बैजू से क्या कहेगी। धीरे-धीरे मकुनी का स्वास्थ और भी बिगडऩे लगा। अब वो खाना बनाने से भी लाचार हो गई। फिर भी बेटे के लिए दाल-चावल उबाल ही देती। आकाश को भी लगने लगा कि अब उसकी मां शायद ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाएगी। वो आकाश से कहती, मैं भी कैसी अभागी हूं जो मरने पर अपनी मिट्टी में न मिल पाऊंगी। एक दिन वो टूटती सांसों से गुनगुनाने लगी-

'मेरी माटी बुलाए मुझे मेरे देस

क्या करूं मुझे भाए न परदेस

पिया तोरे अंगना की मैं दुल्हनिया

मोहे भाए ना यहां का भेस'

उसकी उखड़ती सांसों और बिखरे स्वरों ने आकाश को बेचैन कर दिया। उसने तुरंत वापसी की टिकट लिया और मां से बोला मैं तुमको मोहनलाल गंज छोड़कर वापस आ जाऊंगा। अगर तुम्हें यहां कुछ हो गया तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा। तुमने अपना पूरा जीवन मुझ पर न्यौछावर कर दिया और मैं तुम्हारी आखिरी इच्छा भी पूरी न कर पाऊं तो लानत है मुझ जैसे बेटे पर। 15 दिन की छुट्टी लेकर आकाश वापस आ गया था। मकुनी की हालत देखकर रमजान चचा बहुत दुखी हुए। चचा को देखकर मकुनी काले बादलों में बिजली-सी खिलखिला दी। उसके चेहरे पर हंसी और आंखों में आंसू तैरने लगे। वो चचा से यूं लिपटी जैसे कोई बेटी ससुराल से बरसों बाद लौटकर पिता से लिपट जाती है। उसके आंगन में गौरैया भी वापस फुदकने लगी थीं। हां,मिट्ठू  का खाली पिंजरा देखकर वो गिरते झरने-सी फिर झरने लगी। शशि ने उसकी पूरी देखभाल की। एक हफ्ते में ही उसकी चेहरे पर रौनक लौट आई। आकाश के जाने का भी समय नजदीक आ रहा था।

मकुनी चलने-फिरने लगी थी। आकाश को आज वापस दुबई के लिए निकलना था। मकुनी उससे नाराज थी क्योंकि वो वापस जो रहा था। उसने आकाश से कहा मैं तुझे जाते हुए नहीं देख पाऊंगी। तू जा, तुझे ईश्वर मेरी भी उमर दे दे। तुझे अब जल्दी आने की कोई जरूरत न है। हां, मेरे मरने पर जरूर आ जइयो क्योंकि चिता को आग तो तू ही देगा न ? वो तो तेरा फरज है और न आ पाए तो भी कोई बात नहीं। कोई भी फूंक देगा मुझे। तू जा, मैं इकली ही जी लूंगी। गुस्से में मकुनी आंगन में आ गई। उसने मुंडेर पर बैठी गौरैया को चावल के दाने डाले। जैसे ही वहां गौरैया आईं, मकुनी उन्हें बहुत देर तक दाना चुगते देखती रही। फिर उसे दुबई की मुटक्की गौरैया याद आईं। उसने दाना चुगती गौरेयाओं से कहा  अरे, देखो तुम कितनी दुबली-पतली हो। जानती हो दुबई की गौरैया कितने मुटक्की गोलगप्पा जैसी हैं। उसने गाल फुलाते हुए कहा। वो सब बहुत तंदरुस्त हैं। वहां तुमको खूब खाना मिलेगा। यहां की तरह नहीं तरसोगी और न ही भूखे मरोगी। तुमको वहीं छोड़ आएं क्या? तुमरा आकाश भइया जा रहा है न वहां। तुम भी साथ जाओगी वहां..? यह कहना था कि सारी गौरैया उसके आंगन से उड़कर यहां-वहां मुंडेर बैठ गईं जैसे मकुनी की बात उन्हें अच्छी न लगी हो और देस छोड़कर जाने की बात से ही वो खफ़़ा हो गई हों। तब तक आकाश मकुनी से विदा लेने आंगन में आ गया था और दाना छोड़कर मुंडेर पर बैठी गौरैयों को देख रहा था।