Monthly Magzine
Tuesday 12 Nov 2019

गज़ल

आपकी तारीफ का हर लफ्ज़ खंजर हो गया

खाद इतनी डाल दी कि खेत बंजर हो गया

 

एक के दो किये टुकडे उनके टुकड़े कर दिए

देखिए चारों तरफ टुकड़ों का मंजर हो गया

 

तंदुरुस्ती बनी जिससे वह तो खेतों में उगा

उगाने  वाला उसे पर अस्थि पंजर हो गया

 

आपने बस प्रेम की लहरें गिनी है बैठकर

जिसने देखा डूब कर वह एक कलंदर हो गया

 

दुनिया ने चाहा पकडऩा कब्र तक जाते हुए

हाथ जिसने खुले रखे वह सिकंदर हो गया

 

किनारे से जो बंधी वह नदी बनकर रह गई

जिसने तोड़े किनारे वह एक समंदर हो गया  

 

 

 बदन पर मौत का पैगाम हूं मैं

कफन हूं झबले का अंजाम हूं मैं

 

बीच में दोपहर पसरी पड़ी है

सुबह से बिछड़ी हुई शाम हूं मैं

 

जमाना दूरी रख कर बैठता है

अपने ईमान को बदनाम हूं मैं

 

अभी कई मील की दूरी पड़ी है

होंठ तक जाता हुआ जाम हूं मैं

 

सदा कल पर मुझे तुम छोड़ते हो

कभी ना खत्म हो वह काम हूं मैं