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Monday 15 Oct 2018

फिदेल - तुम याद आते रहोगे

दिन शुक्रवार था

और वर्ष 2016 के नवम्बर की 25 तारीख

जब तुम 90 की उम्र में रुख्सत हुए इस दुनिया से ।

 

कहने को तो

दुनिया के दूसरे सिरे पर बसे

एक छोटे से देश के शासक थे तुम, पर

करोड़ों-अरबों के दिलों पर राज था तुम्हारा।

 

जो निर्णायक भूमिका निभाई तुमने

आजादी की लड़ाई में अनेक देशों की

भला कौन भुला सकता है उसे।

 

तुम न होते फिदेल -

तो कुछ अलग ही रहा होता नतीजा

अनेक अफ्रीकी और दक्षिण अमरिकी देशों के

मुक्ति संघर्षों का।

 

जब हो गया विघटन

सोवियत यूनियन का

ढह गईं समाजवादी व्यवस्थाएं

अनेक पूर्वी यूरोपीय देशों में

तब तुम्हीं थे फिदेल कि -

थामे रहे परचम समाजवाद का

बिना डगमगाए।

 

कौन भुला सकता है -

कि तुमने आजाद कराया क्यूबा को

बटिस्टा की तानाशाही से

कायम की समाजवादी-व्यवस्था

और चेतना

क्यूबा जैसे पिछड़े देश में भी।

 

वह तुम्हारा जीवट ही था फिदेल, कि -

गुरिल्ला युद्ध छेड़ा

बटिस्टा जैसे तानाशाह के खिलाफ

तुम समेत तुम्हारे मात्र 300 साथी थे

और तुम्हारे खिलाफ 10 हजार हथियारबंद सेना

न बच पाते

यदि तुम न जान रहे होते

चप्पा-चप्पा

सिएरा मेस्त्रा के पहाड़ी जंगलों का।

तुम और मजबूत हुए

जब-जब मुठभेड़ हुई।

 

फिदेल तुम्हारा जाना

हमारे लिए शोक का नहीं

क्रांतिकारी जीवन का उत्सव है।

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उत्सव में आतंक

 

बेहद प्यार था एक-दूसरे से

और मुसीबत में

एक-दूसरे की मदद की भावना

न आपस में

किसी तरह का झगड़ा था

न अदावत

ये बस्ती थी ढेर सारे पेड़ों की

आम, बबूल, शीशम

सेमल, पलाश, बाँस, बरगद सभी थे।

 

अपनी दुनिया थी और अपने मजे थे

बारिश में नाचते थे, और

बसन्त में गाते थे,

हवा में झूमते थे, और

ओलों-आंधियों का एकजुट सामना करते थे।

 

आतंक....आतंक....आतंक

आतंक के साये से

भला कौन बच पाया है,

एक दिन

घुस आए आतंकी

इनकी बस्ती में भी

कहने लगे

मिल खड़ी करनी है

कारखाने बनाने हैं

कोयले की खदान खोदनी है।

 

निहत्थे पेड़, झाड़-झंखाड़

क्या करें, क्या न करें

समूचा जंगल खामोश था,

आतंकित था

हवा चिंहाड़ रही थी, और

पत्ता-पत्ता भाग रही थी

बेतहाशा- बेचैन।

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पेंडुलम

 

दो चीजें हैं

आजादी की चाह

और

प्रेम की इच्छा-

पेंडुलम की तरह झुलता है

आदमी

बीचों-बीच ।

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बेटी ! तुम...

ऐसे वक्त में

जब अव्यवस्था ही

जीवन का पर्याय बन जाए

मुश्किल हो अंतर कर पाना

आदमी और हिंसक पशु में

हर तरफ डर की खामोशी

हर तरफ इक अनहोनी की

पदचाप सुनाई दे

इस अंधेरे समय में

बेटी! तुम......

खड़ी होना एक शक्ति पुंज बनकर

कि भाग जाए

सभ्यता का हमलावर पिस्सू।

 

नील गगन में

जैसे दूर क्षितिज तक

उड़ती है चिडिय़ा

बेटी! तुम......

देर तक उडऩा।

 

जैसे देवदारों के बीच से

कठिन होता है धूप का आना

और एक पतली किरण

निकल आती है

एक पगडंडी बनाकर

ऊंचे दरख्तों के बीच से

बेटी! तुम.....

वह किरण बनना।

जैसे ओस से भीगी हरी घास पर

चमकीली, रंग-बिरंगे पंखों वाली चिडिय़ा

फुदकती चलती है इधर से उधर

बेटी! तुम भी......

फुदकना, दौडऩा, रूकना, चलना।

 

बेटी! तुम......

एक ऐसी खिड़की रखना अपने अंतस् में

जहां से ताजी हवा आ सके तुम तक

और महसूस कर सको

कि हवा में

तुम्हारा भी हिस्सा है।

 

धूप देख सके तुम्हें

जहां से झांककर

और तुम जान सको

कि सूरज तुम्हारा भी है।

 

बेटी! तुम......

मन की किताब में

माँ-बाप के अध्याय के

छूट गए हिस्सों को

फिर से पढऩा

सुकून मिलेगा, और

आगे बढऩे का हौसला भी।

 

बेटी! तुम......

जहां भी रहो खुश रहना।

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गुलमोहर

 

जब तुम चहकती हो

तुम खुद ही नहीं चहकती

चहक उठता है आस-पास का

समूचा वातावरण ।

 

 

यह एक बड़ी विशेषता है

जिसने आकृष्ट किया है मुझे

सहज ही तुम्हारी ओर ।

 

तुम्हारा सौंदर्य

मात्र दैहिक ही नहीं

मन का सौंदर्य भी है।

 

तुम सहज हो, सरल हो

और स्वामिनी हो

एक निर्दोष व्यक्तित्व की ।

 

खूबसूरत बनाती हैं तुम्हें

तुम्हारी शिष्टता और सौम्यता 

तुम्हें यूं ही नहीं कहा था मैंने

गुलमोहर।