Monthly Magzine
Wednesday 25 Apr 2018

सीमाएं

        1.

हम सीखते हैं

दूसरी भाषाओं में

हैलो बोलना

ये कहना कि, मैं तुमसे प्यार करता हूँ

और कई बार, शुक्रिया

 

पर हम बहुत देरी से सीखते हैं कहना

मुझे माफ कर दो

या कि

तुम किस बारे में सोच रहे हो?

 

इसीलिए हम नहीं समझ पाते हैं

अपने ही सहजातों को

जिनके पैर बड़े हुए हमारे ही जूतों में

जो रहते हैं कुछ डग दूर

रेशम के झीने पर्दों के उस पार

---------

                2.

रेगिस्तान में जैसे जैसे तुम शहर से दूर होते हो

धरती और आकाश का अंतर खत्म होता चलता है

हवाएं रेत के भुरभुरे कोटरों में सो जाती हैं

मलमल के खर्राटे भरतीं

और

सुनहली मिट्टी घंटों तैरती है बादलों के सान्निध्य में

जिनकी रुई सी परत को फाड़कर

शहद सा प्रकाश उतर आता है

धोरों के मस्तकों पर

--------

                  3.

इस अनंत अव्ययी बहाव के मध्य में

कुछ अदूरदर्शी दुस्साहसियों ने एक लीक कोर दी

और अपने कागजों में बाँट दिया अविभाज्य को

अविचलित,

दोनों ओर के बाशिंदे, जड़ और चेतन

मधुर विलाप करते हैं

एक ही धुन, लय, ताल में

पहले की भांति ही वो नहीं जानते

कुछ दूर बसे जुगलबंदी करते अन्य गीतकारों को

सीमाओं के पार या सीमाओं के भीतर ही

--------

             4.

हवाएं शांत हैं

धोरों की दो गुमनाम लम्बी पंक्तियों के बीच

घाटी में

एक झोपड़ी है

ठन्डे पत्थरों और नर्म गोबर से बंधी

आशय देती है

अबूझे, अनगढ़ चेहरों को

जो हाथों पैरों और कम्बलों के गहन पाश में

नींद की कटोरी बना कर डूब गए हैं

 

गहरे कहीं ठूंसे हुए

किसी बुड्ढे के गले से उछले खून के दाग

छीने हुए स्वर्ण की जगमग

किसी बच्चे की हड्डियों की चटखन

स्वत्व के नोचे जाने का प्रतिरोध करती

लड़की की असहाय चीखें

 

जिनके पूर्वजों की अस्थियों से मज्जा भी

राजाओं और जनप्रतिनिधियों ने चूस ली

जिनको अनाथ पाकर भी शिक्षित हुजूमों ने पीछे छोड़ दिया

भूलकर अपना उद्देश्य

जिनको पूरे के पूरे समाज

अपनी हिचकिचाहट और जिद में ये कहने से मुकर गए

कि तुम हममें से हो

हम तुम्हें प्यार करते हैं और

तुम्हें भी प्यार करना होगा हमें बदले में

-------

                         5.

खेत की बाड़ से बाहर इक_े पानी में

हिरण कुलांचें भरते हैं

गोडावणों को ढूंढते हुए,

जो इन धोरों को कब के छोड़-छाड़ कर चले गए,

फुदकते हुए निकलते हैं हड्डियों के ढेरों और

दुर्गन्ध के बीच से

जिसको हमने ठीक सीमा से बाहर

ढकेल कर छोड़ दिया

हम भूलते हैं सफाई की अपनी जिम्मेदारी

 

अपने बच्चों पर ढकेल देते हैं

कई शताब्दियों का भार

नन्ही गोलियों में सोखकर

जिससे झुके कन्धों के बीच से

लुढ़क जाते हैं

उनके सर

ऊंघ के बहाव में

वीरानी घाटियों में वो सोते सोते ही टकराते हैं

अनजानी चट्टानों और खंडहरों की दीवारों से

-----

                  6.

अरे देख रहे हो तुम?

बादल उठ रहें हैं आसमान के किनारों से

बरसेंगे वो इस बार देखना

जम कर वो भी

यों श्यामे के साढू की तरह छू कर वापस नहीं लौट जायेंगे

तुम देखना

गौशाला की प्याऊ से लेकर डूंगरगढ़ के हाईवे तक

भागफाटी से गौधूलि तक

रेत की बाहों में भरी

महीनों से बैठे जीवाणुओं की गंध

तुम्हारे नथुनों को बींध देगी

 

देखना, हमारी जमीनें मोहब्बत उगलेंगीं

अरावली को पार करके आएंगे इंद्र हमारे लिए

वहाँ ऊपर से आशीष उतरेंगे

देख रहे हो तुम?

----

                      7.

पर उस साल बारिश नहीं हुई

धरती को आँसू बहाने को भी पानी नहीं मिला

सरकारें धोखेबाज निकलीं

बादल बह गए

भगवान ढह गए