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Sunday 22 Jul 2018

क्या कभी देखा है आपने

मादर की थाप में

झूमते हुए...

नाचते हुए...

आदिवासियों को देखा है मैंने

दहाड़ मार-मारकर

तो कभी घुट-घुटकर

रोते हुए भी, देखा है मैंने।

 

शोषण, अत्याचार और तिरस्कार को

चुपचाप कहते हुए

तथा कभी-कभी

धनुष तनाकर प्रतिकार करते हुए भी, देखा है मैंने।

अपने जंगल-जमीन को लुटते देख

जान बचाकर भागते...

तो कभी जान की बाजी लगाकर लड़ते...

आदिवासियों को देखा है मैंने।

 

हल चलाते...

मजदूरी करते...

ढोर चराते...

रिक्शा खींचते...

दूसरों के घर नौकर खटते...

शिकार करते...

न जाने किन-किन रूपों में, देखा है उन्हें मैंने।

हां, उनके नंग-धड़ंग बच्चों को

भूख से बिलखते... तड़पते...

खूब देखा है मैंने।

मगर कभी नहीं...

जी हां, कभी नहीं...

सच कहता हूं, कभी नहीं देखा है मैंने-

किसी आदिवासी को

कटोरी लिए भीख मांगते हुए!

 

क्या, कभी देखा है आपने...?

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माटी से दूर

 

मेरे पिताजी

एक किसान हैं

आज भी वह

खेती करते हैं

माटी से लथपथ रहती है,

उनकी देह

मानो

आदमी की देह नहीं

माटी का लोंदा हो

या हो...

दीमक लगा हुआ

माटी का टीला

मैं डर जाता था

उन्हें देखकर बचपन में।

 

पिताजी जानते थे

इसलिए कहते थे

बार-बार

बेटा, किताबों को रखना

माटी से दूर

ऊंचाई पर

हमारे माटी के घर में

मचान बनाकर

अन्यथा

दीमक लग जाएगी

माटी बन जाएंगी

वे किताबें।

आज मैं बड़ा हो गया हूं

बहुत बड़ा... ऊंचा भी

पर, आज भी

 

मैं मानता हूं उनकी

वह बात

आज भी डरता हूं

उनकी माटी से लथपथ देह देखकर

इसलिए रहता हूं

...माटी से दूर।

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खरीदारी

 

आया हूं बाजार में

खरीदारी करने

मुझे कुछ चीजें खरीदनी है।

 

एक के जी सुख

आधा के जी शांति

सौ ग्राम चैन

और एक मीटर संतुष्टि चाहिए।

 

इस योजन का क्या भाव है?

हां, हां, तुम्हारी भाषा में जवानी

दे दो एक लीटर

और एक लीटर सौंदर्य भी।

 

दया, भाषा, ईमानदारी, सच्चाई

आदि समस्त छोटी-छोटी मानवीय चीजों

को एक साथ मिलाकर

एक किलो दे दो

छोटे-छोटे से पैकेट चाहिए

अच्छे विचारों के

और हां

एक बोतल प्रेम भी चाहिए मुझे।

 

हे दुकानदार!

पैसा खत्म है मेरा

पर एक चीज छूट गई

फ्री में

गिफ्ट के रूप में दोगे-

एक टुकड़ा जीवन?

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पूजा की साड़ी

 

पूजा की साड़ी की

निहार रही थी मां

बार-बार

मानो अपने प्रवासी बेटे को निहार रही हो।

 

दो अंगुलियों से

रगड़ रही थी साड़ी को

अपने प्रति अपनी पतोहू की

आस्था की मोटाई

नाप रही थी।

 

सूंघने लगी

सटाकर नाक

लेने लगी सुगंध

पोते-पोतियों के प्यार की।

 

दबाने लगी जोर से

अंगूठे से

देख ली मजबूती

मां-बेटे को जोडऩे वाले

नाभि-नाल की।

 

अब फेरने लगी हाथ

आहिस्ते-आहिस्ते

कि पूरे परिवार के सिर को सहलाकर

बरसाने लगी प्रेमाशीष

 

तभी दो बूंद आंसू

टपक पड़े साड़ी पर

साड़ी हुई बदरंग

कांपने लगे होंठ।

 

बुदबुदाई मां-

क्यों आती है यह पूजा

हरेक साल?