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Sunday 22 Jul 2018

शून्य होती संवेदनाओं के तमस में मूल्यों के रोशनदान

नवें दशक में जहां एक ओर कहानी और कहानीकारों को लेकर कुछ प्रायोजित चर्चाएं हुई, वहीं सुनील सिंह, नारायण सिंह, प्रेमकुमार जैसे कुछ युवा कहानीकारों ने अपनी रचनाधर्मिता के बूते पर अपनी उपस्थिति का अहसास कराया। चाहे हंस में छपी 'नासपीटी कलट्टरी' हो या वैचारिकी में प्रकाशित 'आज के कालिदासÓ, या 'सारिकाÓ में प्रकाशित 'श्रद्धा का ताजमहल' अथवा 'निष्कर्ष' में आयी 'गांधी पार्क' हो या 'संचेतना' में छपी 'घर कहां बसेगा'- इन सभी कहानियों में प्रेमकुमार अपनी सीमाओं के बावजूद एक संभावनाशील कहानीकार के रूप में आश्वस्त करते हैं।

'दंशित वर्तमान' कहानी में 'नैरेटर' ने एक प्रश्न पूछा है? ''क्या मुझे इस बेरोजगारी ने बिल्कुल संवेदना शून्य बना दिया है? मेरे भीतर की चाहत, कामना, इच्छा कहीं मर तो नहीं गई है?'' प्रेमकुमार ने अपनी अधिकतर कहानियों में इसी सवाल को घुमा-फिराकर पूछा है। उनकी केन्द्रीय चिन्ता हमारे दैनिक जीवन में संवेदनशीलता के निरंतर चुकते जाने से संबंधित है। उनकी एक कहानी का शीर्षक ही है- 'शून्य होती संवेदनाएं' इस शून्यता को कभी ग्रामीण जीवन के संदर्भ में देखा गया है तो कभी नगरीय-महानगरीय परिवेश में इसका बयान हुआ है। संवेदन-शून्यता कोई निजी मामला न होकर एक व्यापक प्रश्न है और इसका सीधा संबंध मूल्यों और संबंधों पर गहराए संकट से है। इसका एक छोर ग्रामीण जीवन के आर्थिक-सामाजिक स्वार्थों से जुड़ा, दूसरे सिरे पर मध्यवर्गीय जीवन की विवशताएं हैं। जब यह विसंगति फैलती है तो व्यवस्था की क्रूरता और शोषक वर्ग की अमानवीयता में परिवर्तित हो जाती है। यह उल्लेखनीय है कि प्रेमकुमार की ज्यादातर कहानियां, इस संगति को जन्म देने वाली ताकतों के विरुद्ध 'प्रतिवाद' की मुद्रा में हैं। कहीं यह 'प्रतिवाद' एक व्यक्तिगत और आत्मघाती आक्रोश के रूप में है, कहीं यह संगठित और सकारात्मक होने की गवाही देता है।

'अजन्मा अभिमन्यु' का 'वह' राजनीतिक छिछोरापन, दलबदल, सत्ता परिवर्तन, युद्ध, हत्याएं, बाढ़, भुखमरी, सूखा, कफ्र्यू, दुर्घटना, ऐसी आपदाओं आदि के आतंक की गिरफ्त में हैं। ये सभी हादसे, देशव्यापी संवेदनशून्यता के द्योतक हैं। उसे लगता है कि युवा वर्ग खासतौर पर क्रूर और अमानवीय हुआ है। लगता है, मां के पेट में ही उन्होंने हिंसक कृत्य का पाठ पढ़ लिया है। वह नहीं चाहता कि मौजूदा हादसों की खबरें पत्नी के गर्भ में पलते बच्चे तक पहुंचे। रेडियो तोड़ देना और गर्भपात कराने का विचार न केवल स्थिति से पलायन का प्रयास है अपितु मध्यवर्गीय युवा के नपुंसक प्रतिवाद की ध्वनि भी इसमें है। अप्रिय अनुभवों के नुकीले सिरे किसी भी व्यक्ति को असहज कर देने के लिए पर्याप्त हैं। यह आकस्मिक और अस्वाभाविक नहीं है कि 'सन डॉग' का केन्द्रीय चरित्र पागल हो चुका है। आज के दमघोंटू वातावरण में संवेदनशील व्यक्ति की यह अनिवार्य परिणति है। 'सन डॉग' कहानी बताती है कि वर्तमान व्यवस्था में चीजों को सही ढंग से देखने और 'रिएक्ट' करने वाले व्यक्ति पागल करार दिए जाते हैं। भूखी भिखारिन के लिए आटा मिल के फाटक पर गालियां देता और किसी गरीब के इलाज के लिए डॉ. तनेजा से बहस करता पागल उन लोगों से कई गुना मानवीय लगता है जो हर बात पर उसे पीटते-मारते दिखाई देते हैं। एक ओर पागल का यथाशक्ति प्रतिवाद, दूसरी ओर मध्यवर्गीय युवा का समझौतापरस्त रवैया, एक 'कन्ट्रास्ट' की तरह इन कहानियों में उभरा है। अपनी एक अन्य कहानी 'शून्य होती संवेदनाएं' में कहानीकार ने युवा वर्ग के इस पक्ष पर खुला प्रश्नचिन्ह लगाया है। 'सच बताना कि क्या तुम अपने सैकड़ों ऐसे वयस्कों को नहीं जानते, जो संवेदना-शून्य होकर जी रहे हैं? पता नहीं क्यों अजीब तरह की नपुसंकता का शिकार तुम्हारी पीढ़ी होती जा रही है?' कहानियों में ही इस प्रश्न का उत्तर भी है कि बेकारी, दिशाहीनता और पूरे परिवेश में व्याप्त भ्रष्टता इसके लिए उत्तरदायी है।

ग्रामीण जीवन में संक्रमण की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी है, लेकिन वहां एक साधारण सा परिवर्तन भी बड़ा परिवर्तन महसूस होता है। 'दो मुंहे सांप', 'प्रधान जी', 'नासपीटी', 'कलट्टरी' जैसी कहानियों में आज का बदला हुआ गांव मौजूद है। गांव पहले से अधिक सम्पन्न हुआ है। पहले से अधिक मजबूत भी, क्योंकि तीस-पैंतीस बंदूकें लाइसेंसी हैं। लेकिन पहले जैसा आत्मीय और एक दूसरे की मुसीबत को अपनी पीड़ा मानने वाला गांव धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। 'दो मुंहे सांप' में गांव के बीचोंबीच डकैती पड़ती है हत्या हो जाती है, गांव अपने स्वार्थों के संदूक में बंद रहता है। कोई 'बिरानी अलाई' में नहीं पडऩा चाहता। 'प्रधान जी' और 'नासपीटी कलट्टरी' कहानियों में ग्रामीण के एक-दूसरे से अलग-थलग होने के मूल कारण की ओर स्पष्ट संकेत है। टुच्ची और अधकचरी राजनीति ने लोगों के इर्द-गिर्द जाति, धर्म, पार्टी की मजबूत दीवारें खड़ी कर दी हैं। जैसे-तैसे वोट हथियाने के लिए लोग फौजदारी पर उतर आते हैं, बूथ पर कब्जा करते हैं, फर्जी वोट डलवाते हैं। यह प्रजातांत्रिक व्यवस्था का मखौल तो है ही, हमारे  निरंतर संवेदनशून्य होते चले जाने का सुबूत भी है। 'नासपीटी कलट्टरी'में जो कुछ हुआ है वह अमानवीयता की सीमा पार कर गया है। ''रामबती को किसी ने पैने गंडासे से मारना चाहा। वो तो खैर हुई कि जागकर दौड़ पड़ी और फेंका हुआ गंडासा उसके बायें हाथ को ही जख्मी कर सका। नन्नू सिंह के घर पर रात को डकैतों ने चढ़कर उसकी व उसकी सोती हुई पत्नी की गर्दन उड़ा दी। माल को हाथ नहीं लगाया। सुमेर सिंह को रात में जंगल में लाठियों से इतना पीटा कि उसके सारे हाथ-पैर टूटे पड़े हैं...।'' चुनाव से जुड़ी आपाधापी,हिंसा, स्वार्थपरता आदि का ही परिणाम है कि संवेदनशील बुद्धिजीवी और आम आदमी दोनों ही चुनाव, लोकतंत्र आदि अवधारणाओं से उदासीन होते जा रहे हैं। सिर्फ 'संवादÓ का ताया इस स्थिति में अपने ढंग से प्रतिवाद करता है। वह सब निशानों पर ठप्पा लगाकर सबको खारिज कर देता है। यह मन:स्थिति चाहे कितनी ही खतरनाक क्यों न हो, सांपनाथ-नागनाथ में से एक को चुनने की यातना से मुक्ति में सहायक तो है ही।

साहित्य अध्यापन आदि से संबंधित व्यक्तियों के अधिक मानवीय और सहानुभूतिपूर्ण होने की अपेक्षा की जा सकती है। लेकिन इस तबके की मनोवृत्ति की कमोबेश यही है कि अपने स्वार्थों का बाल भी बांका न हो, चाहे यह दूसरों के उत्पीडऩ की कीमत पर क्यों न हो। 'छलावा' और 'आज के कालिदास' जैसी कहानियां इस सिलसिले में दृष्टव्य हैं। 'छलावा' में तीनों मित्र गरीबों-दुखियों पर लिखने वाले और उनके संघर्ष को शब्द और दिशा देने वाले प्रगतिशील विचारों के हैं। वे घोर बरसात में एक रिक्शे पर लदे स्टेशन की ओर चलते हैं। आम आदमी के प्रति उनकी तमाम सदाशयता उस समय गायब हो जाती है जब रिक्शा चालक अचानक बीमार हो जाता है, उल्टियां करने लगता है। अब वह इन्हें गले पड़ी आफत लगता है। अंतत: वे उसे उसी हालत में छोड़ अपना रास्ता लेते हैं। 'आज के कालिदास' में आत्मघाती संवेदनशून्यता मुखर है, जिसकी अनिवार्य स्थिति परपीडऩ है। प्राचार्य, सेक्रेटरी, क्लर्क, चपरासी सबके सब उसी डाल को हानि पहुंचा रहे हैं, जिस पर वे बैठे हैं। केवल अपने स्वार्थ पर टिकी मनोवृत्ति, दूसरे को पीडि़त करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। प्रबंधतंत्र एक नवविवाहिता प्राध्यापिका के साथ दुव्र्यहार करता है और प्राचार्य के घर गुंडे भेजे जाते हैं। सेक्रेटरी प्राचार्य की कश्मकश में शिक्षा संस्था नष्ट हो रही है। विश्वविद्यालय के अधिकारी भी समस्या का स्थायी हल नहीं चाहते। जब पढ़े-लिखों का यह हाल है तब पुलिस तंत्र के पुर्जों और वहशीपन के शिकार पागलों को क्या दोष दिया जाए। प्रेमकुमार ने 'कफ्र्यू' कहानी में दिखाया है कि किस प्रकार एसडीएम दूकानदार पर आग बबूला हो उठता है और किस प्रकार कुछ लोग पागल कुत्तों की तरह दूसरों को काटते दिखाई देते हैं।

प्रेमकुमार की कहानियों में समय की प्रामाणिकता पर्याप्त है। वे यथातथ्य के चित्रण में यथेष्ट कौशल दर्शाते हैं। कई कहानियों में यथार्थ-चित्रण का आग्रह इतना प्रबल है कि लेखक का अपना विचार दब सा गया है। चर्चित कहानी 'नासपीटी कलट्टरी' भी पात्रों के अनुरूप भाषा और घटनाओं के यथार्थ चित्रण की दृष्टि से बहुत पठनीय बन पड़ी है, लेकिन कथाकार का मंतव्य इसमें उस तरह स्पष्ट नहीं है, जिस तरह 'कफ्र्यू', 'एक बूढ़ा', 'रोशनदान', 'पटरियों के लोग' आदि कहानियों में है। वस्तुत: प्रेमकुमार की कहानी यात्रा में यथार्थ-बोध और विजन की सकारात्मकता बराबर संश्लिष्ट हैं। प्रेमकुमार की कई परवर्ती कहानियों में संवेदनाओं के क्षय का अर्थ है। मूल्यों का क्षय है, मनुष्यता का क्षय है। 'ताबूत', 'काश विमल जी रो पाएं!', 'बड़े पापा प्लीज' आदि कहानियों में व्यक्ति, परिवार और समाज में विसंगतियों के दबाव और बढ़ते मानसिक तनाव के तमाम नकारात्मक प्रभाव ध्यान आकर्षित करते हैं। 'ताबूत' का अच्छा-भला और बहुत हद तक जुझारू एम. सिंह व्यवस्था के दुष्चक्र, अपनी महत्वाकांक्षा और कुटिल राजनीति का शिकार होकर अपनी मनुष्यता गंवा देता है। नैरेटर को लगता है 'निश्चय ही कोई दुरात्मा इसके अंदर प्रविष्ट हो चुकी है। चमकाने-दमकाने के बहाने कुछ खास रसायनों से घिस-घिस कर इसके मूल को समाप्त कर देना चाहती है।' छल-प्रपंच, पाखंड, शातिरी के चलते आदमी का 'बुत' और फिर ताबूत में तब्दील होना एक बड़ा हादसा है और हमारे साथ की दो बड़ी विडम्बनाओं-अमानवीयकरण और अवमूल्यन का प्रत्यक्ष साक्षी भी है। 'काश विमल जी रो पाएं!' में मनुष्यता के छीज जाने का एक अन्य संदर्भ भी कम मारक नहीं है। विमल जी की मां का देहांत उनके और उनके परिवार के लिए एक त्रासदी है लेकिन पास-पड़ोस, रिश्तेदारों में सामान्य औपचारिकता के निर्वाह का धैर्य भी नहीं है। पहले किसी की मौत पर पड़ोसी और परिचित सम्हालते-सहारा देते थे और अब- 'हम लोग इंतजार करते रहे- किसी ने आकर यह नहीं कहा कि हम अर्थी का सामान ले आएं, हम अर्थी बांध दें... सब आ-आकर खड़े होते रहे, मुंह दिखा-दिखाकर लौटते रहे।' इस भयावह अवमूल्यन के भोक्ता विमल जी अपनी मां के निधन पर रो भी नहीं पाते हैं- 'मैं रोना चाहता हूं पर... रोऊं भी तो पहले किस पर- लोगों में आए इस बदलाव पर- या मां की मृत्यु पर। एक की सोचता हूं, दूसरे का ध्यान आ जाता है। एक हटे तो दूसरे पर ध्यान दूं। दुख में रो पाना भी क्या अब आसान रह गया है?' धरती के साथ आंखों के पानी के भी लगातर सूखते जाने का हादसा मनुष्यता के अस्तित्व के लिए खतरे की घंटी है। इस संवेदनशून्यता को कहानीकार ने बहुत दुख के साथ रेखांकित किया है। यह रेखांकन जितना मर्मस्पर्शी है, उतना ही विश्वसनीय भी।

समाज में विशेषत: मध्यवर्ग में पनप रही खुदगर्जी, लोलुपता और कुटिलता का परिवार के सदस्यों पर पड़ रहा दुष्प्रभाव चिंताजनकहै। जरा-जरा सी बच्चियां परीक्षा में कम नंबर आने, सहेलियों से बिछुड़ जाने जैसे कारणों से आत्मघात की सोचने लगें तो समझ लेना चाहिए कि हमारा परिवेश जहरीला है। मौत से पहले की कयामत में कहानीकार ने सही संकेत किया है कि आत्महत्या समाज में व्याप्त हिंसा और क्रूरता की व्यंजक है। चांदनी सी बातें में भी बचपन पर हावी दबावों-तनावों की चर्चा है और इसके लिए बड़ों को उत्तरदायी ठहराया गया है। बड़े पापा प्लीज में बालमन का वीरता-शूरता के सभी प्रतीकों को ध्वस्त करते हुए आतंकवादी बनने के लिए मचलना न केवल स्तब्धकारी है अपितु नेत्रोन्मीलक भी। लेकिन मोम से पंखों के सहारे में आशा की किरण भी कौंधी है- उम्र में छोटी होकर भी आगे की यह पीढ़ी हमसे कितनी आगे है, बड़ी है, हिम्मती है।

घर कहां बसेगा और तिब्बत बाजार आदि कहानियां चीनी साम्राज्यवाद के खिलाफ संगठित तिब्बती प्रतिरोध की उम्मीद से भरा है। निर्वासित तिब्बतियों को पूरा विश्वास है कि वे एक दिन अपने देश लौटेंगे।

प्रेमकुमार की कड़ी नजर चारों ओर पसरी मूल्यहीनता और संवेदनशून्यता पर है। इनसे उत्पन्न हादसों और विसंगतियों को कभी वे द्रष्टा, तो कभी भोक्ता बन कर प्रस्तुत करते हैं।