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Wednesday 25 Apr 2018

अपनी जगह, त्यौहार और चकमक क्लब

अपनी अपनी विविध आर्थिक सामाजिक शैक्षिक स्थितियों के बावजूद चकमक क्लब से जुड़े हम सब अच्छे दोस्त रहे हैं। आज हम सब लोगों में से कोई मिर्ची की दुकान, ठेकेदारी, कपड़ा सिलाई, सरकारी-प्राइवेट नौकरी आदि तरह-तरह के काम करते हैं, अलग-अलग राज्यों में रहते हैं, कुछ तो अब विदेशों में भी हैं। लेकिन अपनी जगह और चकमक क्लब के साथ जुड़कर जो कुछ भी किया और जो करना चाहते हैं वह सब करने से ज्यादा कुछ बातें हमारे मन के किसी कोने में इस तरह बस जाती हैं कि जरा सा मन में झांकने पर उन्हें देखा जा सकता है, एक पल में उस एहसास को पुन: जिया जा सकता है। यह एक ऐसा पल होता है कि पलकें भिगोने और मुस्कुराने की अनुभूतियां साथ-साथ हो उठती हैं। अपनी जगह और चकमक क्लब ऐसे ही अनुभवों का जखीरा है।

बात लगभग पंद्रह बरस पुरानी है। मेरे गाँव में गेहंू कटाई का वक्त था, सुबह-सुबह मजदूर काम पर जा रहे थे। मजदूरों की टोली से एक मजदूर हैंडपम्प पर पानी पीने के लिए रुकी, जल्दी से पानी पिया और पानी पीकर वह जाने लगी, वह कुछ दूर जा चुकी थी। उसे तेजी से आगे जाते हुए देख एक बच्ची ने पहले तो जोर से आवाज लगाई, ओ माँ, तेरा खाना तो लेती जा, अपना खाना ले जाना क्यों भूल रही हो। दोपहर में क्या खावोगी? इस बच्ची को लगा कि वह मजदूर औरत मेरी आवाज नहीं सुन पा रही है, इसलिए उसने कपड़े में बंधे खाने को उठाया और तेजी से दौड़कर उस औरत के पास पहुँच गई। हाँफते हुए उस लड़की ने मजदूर को खाने को देते हुए कहा कि माँ आप ये खाना हैंडपम्प पर भूल आई थी। आप सोच सकते है कि ऐसी परिस्थिति में इस बच्ची के साथ उस मजदूर के द्वारा कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए? उस औरत ने एक पल अपने खाने को देखा और दूसरे पल उस बच्ची को गालियां बकने लगी। वह चिंता जाहिर कर रही थी कि अब उसे दिन भर भूखा रहना पड़ेगा। जिसकी वजह सिर्फ  यह थी कि इस बच्ची की जाति और धर्म उस मजदूर से अलग थी, और उसने खाना छू दिया था।

एक दूसरी घटना, जब गेहूं कटाई के बाद खेतों का मालिकाना हक रखने वाले किसान फसल को अपने घर ले आते हैं, इसके बाद गाँव में यह माना जाता है कि खेत उजड़ गए हैं और अब खेतिहीन मजदूर किसान खेतों में बिखरे अनाज के दानों को बीन सकते हैं। ऐसे ही एक उजड़े खेत पर बिखरे अनाज के दानों को बीनने में सुबह से दोपहर तक चार-पाँच बच्चे लगे हुए थे। इनकी झोलियों में आधा किलो से लेकर एक डेढ़ किलो अनाज तो होगा ही, इसी दौरान हमारे गाँव के सम्मानित माने जाने वाले कई एकड़ जमीन के मालिक और कई धार्मिक कार्यक्रमों में हजारों रुपये दान दे चुके दानदाता अपने खेत पर पहुँच गए थे। निश्चय ही भीषण गर्मी में नाजुक-नाजुक उँगलियों से अनाज के दाने चुन रहे इन बच्चों को अपने खेत पर मेहनत करते हुए जब उन्होंने देखा तो वे उनके पास गए, उनसे बातचीत की। आप सोच सकते हैं कि ऐसी परिस्थिति में उनके मन में क्या विचार आए होंगे और इन बच्चों के प्रति उनका बर्ताव कैसा रहा होगा? उन्होंने बातचीत में जब जाना कि इन बच्चों के नाम किसी गैर जाति और धर्म से संबंधित हैं तो उन्होंने उन बच्चों को गालियां देना शुरू कर दिया, बच्चों के द्वारा चुने गए उन अनाज के दानों को जो जमीन पर बिखरे हुए थे, वापस जमीन पर पटक देने को कहा, बच्चों को गालियां दी और थप्पड़ भी मारे। अपने बंधुवा मजदूर को बुलाकर कहा कि खेत में इन (जातिसूचक गाली) को घुसने मत देना, नहीं तो तेरी... (गाली)। आगे उन्होंने आदेश दिया कि खेत में बिखरे भूसे और अनाज के दानों को आग लगा दो।

जमीन किसी की भी हो, सभी फसलों के उत्पादनों में मजदूर ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अनाज के हरेक दाने के उत्पादन की मजदूरों के स्पर्श के बिना कल्पना भी नहीं की सकती हैं। फिर एक जाति के मजदूर के घर उन्हीं अनाज के दानों से बनी रोटियों को किसी दूसरे मोहल्ले के मजदूर की बच्ची के छूने से ये इतनी अपवित्र कैसे हो जाती है कि दूसरे मोहल्ले का मजदूर उसे खाने के योग्य ही ना समझे? यह कैसे मुमकिन हो जाता है कि तथाकथित सम्मानित लोग किसी मजदूर और उसके बच्चों के कष्ट और दुख की अनुभूति के आधार पर उनके साथ सहयोगात्मक व्यवहार करने के बजाए उनसे अनाज के दाने छीन कर उन्हे गालियां देने लग जाते हैं? यह कैसे मुमकिन हो जाता है कि धार्मिक और आर्थिक रूप से संपन्न व सम्मानित माने जाने वाले व्यक्ति की मानवता भी उस बच्चे के लिए मर जाती है जिसकी सिर्फ मजहबी पहचान अलग है?

उपरोक्त घटनाओं के आधार पर तो इन असामान्य अमानवीय व्यवहारों की मूल वजह जाति और धर्म के आधार पर समाज का मजबूत बंटवारा ही नजर आता है। यह बंटवारा मोहर्रम, डोल ग्यारस, शिवाजी जयंती, शिवरात्रि, ईद आदि कई त्योहारों के अवसर पर जाति और धर्म के आधार पर बंटे लोगों के समूह में आसानी से देखा जा सकता है। इस प्रकार से विभाजित समाज के भीतर बड़े-बड़े त्योहारों पर सांप्रदायिक दंगों का डर बना रहना हैं अत: हमारे छोटे से गाँव में ही इन त्योहारों पर हाथों में डंडे और बंदूकें लेकर पुलिस पहरा देती हैं।

ऐसी जगह पर क्या आप किसी ऐसे समूह की कल्पना कर सकते हैं जिसमें शाकिर पठान, अर्चना टोंग्या, नीलू पँवार, राजेश वर्मा, अफरोज पठान, दिनेश काशिव, नीलेश राठौर, नरेंद्र साहू, दिनेश जोशी, पिंकी जाट, रामाधार पलास्या, दीपिका विकरवार, इमरान खान बनारसी, अभिषेक सोलंकी, आशीष योगी, अंसार अली, दिलीप राठौर, राकेश बिनौले, संगीता सिसौदिया जैसे नामों वाले बच्चे, युवा और वयस्क किसी के घर मोहर्रम के बाद रोट खाने, ईद के अवसर पर सिवई खाने, दिवाली के दिन मिठाई खाने के लिए एक दूसरे के घर जा रहें हो? समाज में यह घटना हमारे मुख्यधारा के समाज की प्रमुख विशेषताओं के अनुरूप कहाँ है। किसी एक जाति धर्म के अंतर्गत ही त्योहार आते हैं और किसी एक जाति धर्म के अंतर्गत ही ये त्योहार मनाए भी जाते हैं। किसी जाति-धर्म विशेष के कार्यक्रम में, यहां पर (कोई अन्य धर्म संप्रदाय नाम) का प्रवेश वर्जित है या यह कार्यक्रम केवल (जाति-संप्रदाय का नाम) के लिए ही हैं, अन्य लोग प्रवेश ना करें, आदि-आदि सूचना बोर्ड लगाया जाना सामान्य सी बात हो गई है। जाति-धर्म आधारित वर्गीकृत त्योहारों में अन्य जाति-धर्म के व्यक्तियों को शामिल होने पर खुद के अलग होने की अनुभूति के अलावा क्या मिल सकता है भला, कभी-कभी तो अंतरजातीय मेलजोल को बढ़ावा देने वाले व्यवहार दंगे-फसाद के कारण भी बन जाते हैं। किसी एक जाति, धर्म विशेष के त्योहारों में अन्य जाति धर्म के व्यक्तियों की सहभागिता की कल्पनाएं ही कई अन्य डरावनी कल्पनाओं को जन्म देने लगती हैं। जैसे, वयस्कों को बच्चों के धर्म भ्रष्ट होने का डर सताने लगता है, बच्चों के बिगड़ जाने की चिंता से वे ग्रसित हो जाएँगे, उनके बच्चे पढ़ाई में पिछड़ जाएंगे आदि-आदि ।

 अभिभावकों की यह चिंताएं और डरावनी कल्पनाएं बच्चों व किशोरों के लिए ना जाने किस-किस प्रकार की बंदिशों का कारण बनती हैं। यह डर परिवार, गाँव, तहसील, जिले, राज्य तथा देश आदि कई स्तरों पर देखा जा सकता है, जिनकी प्रकृति मूल रूप से समान ही होती है। अभिभावकों ही नहीं वरन कई प्रकार के राजनीतिक दलों और संस्कृति की रक्षा करने के नाम पर बने कई संगठन अपना विरोध दर्ज कराने के लिए आवाज उठाएंगे कि इस तरह तो देश की तथाकथित संस्कृति ही नष्ट हो जाएगी। इस प्रकार से सोचने वालों को यदि बचपन से ही हमारी संस्कृति का पाठ ऐसे ही पढ़ाया गया हो तो वे बेचारे भी क्या करें भला।

समाज में घर, परिवार या गाँव में लोगों के मिलकर सोचने, योजना बनाने और कुछ करने के लिए स्वत: बनने वाले अधिकांश समूह जाति, धर्म और लैंगिक आधारों पर बने हुए नजर आते हैं, साथ ही साथ इस प्रकार के सामूहिकीकरण व विभाजन में आर्थिक स्थितियाँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जैसे धार्मिक त्योहारों के आयोजन से संबंधित समितियां, शादी-विवाह के आयोजन के लिए जाति के आधार पर गठित होने वाले मंच, मैदानों में खेलने वाले लड़कों का समूह, पान की दुकान और बस स्टैंड पर गप्प मारने वाले मर्द और पानी भरने के लिए नलकुओं पर समूह में नजर आती औरतें।

ऐसे में दिवाली जैसे किसी बड़े त्योहार से ठीक एक दिन पहले क्या वजह हो सकती है कि एक खुशनुमा माहौल में आरिफ, अमित, असलम, सुनील, इमरान, शाकिर, बुलबुल, गजानन्द आदि दिवाली मनाने वाले और दिवाली ना मनाने वाले, गाँव में रहने वाले और गाँव में ना रहने वाले कुछ लोग किसी एक जगह पर, एक साथ बैठ कर बातें कर रहें हो, किताबें पढ़ रहे हों, फिल्म देख रहे हों। निश्चय ही यह दृश्य हमारे समाज के लिए एक असाधारण घटना है, चूंकि इतिहास के इस काल में भी यदि जाति, धर्म और लैंगिक आधार ही लोगों की पहचान और भूमिकाओं का मूल आधार हैं तो ऐसे में ईद, दिवाली, मोहर्रम, होली जैसे किसी भी बड़े त्योहार पर विभिन्न जाति-धर्म के कुछ युवा-युवतियों का जमावड़ा एक असामान्य व असाधारण घटना ही प्रतीत होगी। सही मायनों में त्योहारों पर लोगों का आपस में मिलने जुलने का अवसर इससे बेहतर और क्या हो सकता है भला।

वर्ष 1992 से लेकर 2005 तक मेरे गाँव सतवास में एकलव्य संस्था के द्वारा चकमक क्लब नाम से बालगतिविधि केंद्र एवं पुस्तकालय का संचालन किया जाता रहा। किसी भी परियोजना का एक प्रस्थान बिन्दु होता है तो दूसरा समापन बिन्दु भी। ऐसा ही कुछ चकमक क्लब जैसे कार्यक्रम के साथ होना निश्चित ही था। लेकिन इस कार्यक्रम की खास बात यह देखी जा सकती है कि इसका समापन बिन्दु एक और नई यात्रा के लिए प्रस्थान बिन्दु बन गया, चकमक क्लब से जुड़े युवक-युवतियों और संगठन में कार्यरत कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मिलकर चकमक क्लब की इस असाधारण यात्रा को जारी रखने का निर्णय लिया। इसी क्रम में चकमक क्लब परियोजना के समापन के चरण में आसपास के क्षेत्रों के युवा अनौपचारिक संगठन सृजन नेटवर्क के रूप में संगठित हुए थे, वर्तमान में पहचान सामाजिक विकास संस्था का गठन किया है।

चकमक क्लब जैसे मंचों के प्रति इन युवाओं के लगाव और चाहत को दर्शाने के लिए एक बच्ची के द्वारा बाल अखबार में लिखी गई कविता की यह पंक्तियाँ उपयुक्त होंगी-

आसमान को नींद आए तो सुलाए कहाँ

धरती को मौत आए तो दफनाएँ कहाँ

समुद्र में लहर आए तो छुपाए कहाँ

चकमक की याद आए तो जाये कहाँ

जीने जैसा लगता रहा है। अत: यह (सब कुछ)कुछ करने की तरह नहीं बल्कि जीने की तरह, जीवन की एक जरूरत की तरह लगता है। जब भी मिलते हैं तो खुशी की लहर दौड़ जाती है, जब भी मिलते हंै तो यह बात जरूर चलती है कि अब किस तरह जी रहे हैं।

वर्तमान में पहचान सामाजिक विकास संस्था के रूप में संगठित होकर समाज में बच्चों के लिए जगह उपलब्ध कराने के उद्देश्य से ही अपनी जगह पुस्तकालय एवं गतिविधि केंद्र का संचालन आसपास के रहने वाले बच्चों के द्वारा, बच्चों के लिए जारी रखा जा रहा है। इस गाँव का निवासी होना ही शायद उन सब कारणों की बड़ी वजह है कि सीखने-सिखाने के उद्देश्य से लंबे समय से इस केंद्र की गर्भावस्था से ही इसकी गतिविधियों में प्रतिभागिता करने का अवसर मिल सका है। 

अभी संचालित होने वाले अपनी जगह गतिविधि केंद्र एवं पुस्तकालय की मेरे घर से दूरी बमुश्किल एक किलोमीटर होगी। मैं बजरंग मोहल्ले मैं रहता हूँ और वहाँ से 10-12 घर बाद से मेवाती बाखल (मोहल्ले) की शुरुवात होती है। मेवाती बाखल से गुजरते हुए बेंड़ाबाबा चौक की सीमा आरंभ होती है ओर इससे आगे बढने पर गुर्जर यादव बाखल शुरू हो जाती है। मेवाती बाखल और यादव बाखल को जोड़ता है बेंड़ाबाबा चौक, और इस चौक पर स्थित एक किराए के भवन में संचालित होता है अपनी जगह पुस्तकालय एवं गतिविधि केंद्र।

अपनी जगह गतिविधि केंद्र एवं पुस्तकालय के संचालन हेतु आवश्यक खर्च जुटाना जैसे, मकान किराया, बिजली बिल, पुस्तकालय हेतु पुस्तकें, चित्रकला एवं कागज के खिलौने जैसी साप्ताहिक गतिविधियों के लिए आवश्यक स्टेशनरी खर्च और वहां की इस संस्कृति में शामिल होने के अवसरों को बनाए रखने में चकमक क्लब से निकले युवा और एकलव्य एवं समावेश संस्था के कुछ कार्यकर्ता आवश्यकता अनुसार सहयोग प्रदान करते है। इसके लिए वे व्यक्तिगत रूप से चंदा देते हैं, उनके आसपास के ऐसे लोग जो इस प्रकार के कार्यों में रुचि रखते हैं उनसे भी मदद प्राप्त करते रहे हैं, अपनी जगह पर होने वाली विभिन्न बैठकों में शामिल रहते हैं।

इसी केंद्र पर दिवाली के ठीक एक दिन पहले हम सब साथ थे चूंकि आज भी एक बैठक का आयोजन रखा गया था। इन बैठकों का सीधा संबंध बड़े-बड़े त्यौहारों से है। चूंकि बड़े-बड़े त्यौहारों पर अवकाश के दौरान गाँव से बाहर रहने वाले लोगों का भी अपनी जगह जाना संभव हो पाता है। अत: आज हम सब एक दूसरे से मिलजुल रहे थे और अपनी जगह को और बेहतर करने के लिए चर्चा कर रहे थे।

इस चर्चा में अपनी जगह केंद्र पर आज शाम चार पाँच बजे के लगभग अमित, आरिफ, शादाब, राजू, बुलबुल, मोना, असलम, संगीता, इमरान, गजानन्द, नीलेश, शाकीर आदि कई सारे नए-पुराने सदस्य उपस्थित थे, इनमें से मेरा परिचय केवल शाकीर, गजानन्द, इमरान, नीलेश, आरिफ, मोना और बुलबुल से ही था, वहाँ आने वाले नियमित सदस्यों के लिए बुलबुल, मोना और मैं एकदम नए थे। अत: केंद्र को नेतृत्व प्रदान करने वाले आरिफ व स्रोत सदस्य शादाब और अमित ने गोल घेरे में बैठाकर पहले सबका आपस में परिचय करवाया। शादाब कक्षा 6 में पढ़ाई करता है, अमित कक्षा 9 में पढ़ाई करता है, बुलबुल और मोना आज पहली ही बार मेरे साथ अपनी-जगह केंद्र पर गई थी और वह कक्षा 7 व कक्षा 9 में पढ़ती हैं, नीलेश एक किसान और व्यवसायी है, आरिफ खेती करने के साथ-साथ कपड़े भी सिलता है, गजानन्द और शाकीर भाई एक ही स्वैच्छिक संस्था में काम करते हैं, इमरान सिरोही राजस्थान और सुनील धमतरी, छत्तीसगढ़ में एक ही संस्था में नौकरी करते हैं।

अप्रेल-मई महीने की बात है जब गर्मी की छुट्टियों में अपनी- जगह केंद्र पर आने वाले बच्चों को अब्दुल, एक युवा कलाकार, मिट्टी के खिलौने और मुखौटे बनवाने के लिए आए थे, वे कानपुर में रहते है और एकलव्य होशंगाबाद में काम करते थे। जब उनके साथ बात चली कि सतवास में 18-20 बच्चों के एक समूह के साथ गुफ्तगू का अवसर है तो बस बच्चों के प्रति उनका अनुराग उन्हें यहाँ ले आया था। उनका कार्य व्यवहार हरेक बच्चे को इतना अच्छा लगा कि उन्हें याद कर रहा है उनमें से एक अमित। अमित इमरान से पूछ रहा है कि आप बहुत दिनों में आए, गर्मी की छुट्टी में शिविर में आपके साथ जो अब्दुल भैया आए थे वे कब आएंगे?

अक्टूबर महीने में यूनिसेफ  के द्वारा भोपाल में बाल अधिकार सम्मेलन में भागीदारी करने का न्योता अपनी जगह के बच्चों के लिए भी आया था। अपनी जगह के दो बच्चों को जाने का अवसर मिला। इसके बारे में आरिफ ने बताया कि पहले तो जितेंद्र और असलम का जाना तय किया था, लेकिन किसी वजह से नहीं जा सके। ऐसे में ऐन वक्त पर शादाब और फिरोज को जाने के लिए उनके घर वालों से बात कर राजी किया।

शादाब और फिरोज अपने अनुभव बतला रहे थे कि बाल अधिकार सम्मेलन में जब वे भोपाल गए थे, तो वहाँ क्या-क्या हुआ था, कैसा लगा?

परिचय और बातचीत का दौर चलता रहा, कुछ और नए-पुराने सदस्य आते जा रहे थे। शाम का अंधेरा भी धीरे-धीरे बढ़ रहा था, आज की शाम आस पास के लोगों ने अपने-अपने घरों के सामने से अंधेरा दूर करने के लिए रोशनी का प्रबंध कर रखा था, दीप जलने लगे थे।

शाकिर भाई पूछ रहे थे कि पुस्तकालय और सर्वे रजिस्टर आप कैसे मेंटेन करते हैं, अभी कौन सी साप्ताहिक गतिविधियां होती हैं?

असलम ने दीवार पर लगे एक साप्ताहिक गतिविधियों के चार्ट की ओर इशारा करके बताया कि कौन से दिन क्या गतिविधि की जाती हैं, किस गतिविधि के स्रोत सदस्य कौन हैं, कौन सी गतिविधियां कब-कब नहीं हो पाती हैं, यहां पर कम्प्यूटर कौन चलाएगा इसको लेकर एक बार झगड़ा हो गया था। फिर हमने उसका भी टाइम टेबल बनाया।

शाकिर भाई ने जब पूछा कि आने वाले महीनों में साप्ताहिक गतिविधियों के लिए किस-किस प्रकार के सामान की आवश्यकता होगी? तो शादाब ने पलट कर पूछा कि हम लोग यहाँ आते हैं, हमारे लिए ये किताबें, कलर, कम्प्यूटर, मकान किराया, बिजली का बिल, दरी के पैसे कौन देता है और उनको इसके बदले क्या मिलता है?

शादाब का सवाल ऐसा था कि उसका जवाब एक नहीं हो सकता था। वहाँ मौजूद सभी बच्चों को चकमक क्लब से लेकर अब तक की कहानी यात्रा बताने लगे, उम्मीद से कि उसके सवाल का जवाब वह खुद ही खोज ही खोज लेगा।

इस प्रकार बातचीत करते हुए अपनी जगह केंद्र की अब तक की गतिविधियों पर चर्चा करते हुए आगे की कार्य योजना और लगने वाले खर्च का अनुमान हो चुका था। अब तय किया कि बैठक सम्पन्न करते हैं, लेकिन नए कंप्यूटर पर कुछ अच्छी सी फिल्म देखने की सूचना पहले दे चुके थे, अत: हम आई एम कलाम फिल्म देखने लगे। अपनी जगह का तय समय शाम चार से सात बजे तक है, लेकिन आज सब लोग कई दिनों बाद मिल रहे थे और उसके बाद फिल्म देखने में यह भूल गए कि अवकाश तो दिवाली का है। यह बात सभी को याद कराई अमित के पापा ने। जब वे अमित को खोजते हुए केंद्र पर आए। दरवाजे पर खड़े होकर अंदर झांक ही रहे थे कि दूसरे बच्चों ने अमित को याद दिलाया कि यह अवकाश दिवाली का है।

अमित के पापा से मेरी नजर मिल गई, मैं बाहर आ गया था, और हम बात करने लगे कैसे हो? आजकल कहाँ हो? बहुत दिनों बाद दिखे, आदि। उन्होंने अमित से पूछा घर कब आवोगे? फिर खुद ही जवाब दिया कि फिल्म खत्म होने पर आ जाना और चले गए। अमित के पापा मेरे लिए उन दिनों से परिचित है जब हम चकमक क्लब के स्वैच्छिक सदस्य थे और आसपास के गाँवों में साक्षरता मिशन के दौरान शिक्षा और सामाजिक मुद्दों पर नाटकों का मंचन करने कभी साथ-साथ जाया करते थे और गीत गाते थे-

.1.

मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर ने बाँट लिया भगवान को

धरती बांटी, सागर बांटा, मत बांटो इंसान को

.2.

लहू का रंग एक है अमीर क्या, गरीब क्या

बने हैं एक खाक से तो दूर क्या करीब क्या

.3.

अक्षर-अक्षर पढ़ती जा आगे आगे बढ़ती जा

शहर-शहर और गाँव में आजादी की छांव में

.4.

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के

अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के

.5.

क्यों आसमान में चकमक करते तारे, क्यों इन्द्रधनुष हैं रंग-बिरंगे प्यारे

क्यों गुड़हल होता सुर्ख एकदम लाल, क्यों झिलमिल करता है मकड़ी का जाल

क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों?

अमित के पापा के जाने के बाद मुझे चकमक क्लब के जमाने के अपने गाँव के और आस पास के गाँवों के वे कई दोस्त याद आ गए जो पहले भी कई बड़े-बड़े त्योहार मिलजुल कर मना चुके थे। मुझे याद आ गए जब शाकिर भाई, इमरान, ताहिर, मुनव्वर, अफरोज के घर हम सिवई या रोट खाने जाया करते थे। दिवाली के अवसर पर सुमित और राकेश बिनौले के घर की मिठाइयां खाने जाया करते थे। और ऐसे भी कई त्योहार हमने मिलकर मनाया जिन पर ना तो कभी विद्यालयों में निबंध लिखवाया गया था और ना ही जिन पर विद्यालयों का अवकाश रखा जाता है। दुर्गा उत्सव पर चकमक क्लब की वह गरबा मंडली जिसने दो-तीन साल पूरे नौ दिन अलग-अलग गाँव जाकर गरबा किया, साक्षरता अभियान के दौरान आसपास के गाँवों में जाकर नुक्कड़ नाटक किए, गाँव के बड़े स्कूल में स्वतन्त्रता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर कई सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए, आसपास के गाँवों में सायकल से पहुँचकर विद्यालयों में बालमेलों का आयोजन किया और सूर्यग्रहण लगने पर कार्यशालाएँ। अपने गाँव में अपने साथियों के साथ मिलजुलकर यह सब करना हमारे लिए एक बहुत बड़ा त्योहार जैसा ही तो था। त्योहार तो मनाते थे लेकिन समूह में हमारी पहचान एक इंसान के रूप में थी।

अपनी जगह पर आयोजित इस बड़े त्योहार के अवसर पर आयोजित आज की यह बैठक सम्पन्न हो गई, हम तय कर चुके थे कि अगले बड़े त्योहार पर अपनी इसी जगह पर फिर मिलेंगे।