Monthly Magzine
Saturday 20 Jan 2018

मेरी बांग्लादेश यात्रा

बांग्लादेश हमारे पड़ोसी राष्ट्रों में सबसे निकट मित्र देश है। इस देश पर इसलिए भी हमारा दोस्ताना हक है कि इसकी स्वतंत्रता में हमने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बांग्लादेश को परदेश कहने में थोड़ी सी असुविधा सी होती है क्योंकि कोलकाता से बांग्लादेश की सीमा मात्र 242 किलोमीटर की है जो हमारे उत्तरप्रदेश के गांव से बहुत निकट है कोई इसकी यात्रा पर जाए तो लगता है कि बगल के किसी गांव शहर में गया हुआ है।

       प्राय: यह धारणा है कि हिंदी में सफरनामा यात्रा वृत्तांत कम लिखे गए हैं और पश्चिम बंगाल में तो एकदम नहीं जबकि हर चौथा पांचवां व्यक्ति देश-विदेश की यात्रा पर सवार है। लेकिन यह सुखद आश्चर्य की बात है कि कवि, व्यंग्यकार रावेल पुष्प (खानूजा) ने 20 वर्षों के बाद अपनी दूसरी पुस्तक कविता के इतर लाकर यात्रा साहित्य पर प्रकाशित की है। इस सूखे पड़े क्षेत्र में कम-से-कम बूंदाबांदी तो की उन्होंने।

कवि- कथाकार गक़ालकार लेखक पत्रकार से भरे इस महानगर में शायद यात्रा संस्मरण की ओर बुद्धिजीवियों का ध्यान नहीं गया है। संभव है रावेल की इस कोशिश के बाद लोग इस विधा को साधने का प्रयास करें। रावेल पुष्प की यह पुस्तक 'मेरी बांग्लादेश यात्रा' हमें कई प्रकार के अनुभवों से परिचित कराती है। हम अनुभूति कर सकते हैं कि बांग्लादेश हमारे संस्कारों, विचारों और धार्मिक भावनाओं के कितना करीब है।

       यह सच है कि बांग्लादेश एक मुस्लिम राष्ट्र होते हुए भी हिंदू संस्कारों से प्रभावित है। एपार और ओपार बांग्ला संस्कृति में कोई अंतर नहीं। जहां एक बांग्ला बोलने वाला हिंदू बंगाली से बांग्ला बोलने वाला मुस्लिम बंगाली प्रभावित होगा उतना उर्दू, हिंदी बोलने वाले मुसलमान या हिंदू से प्रभावित नहीं होगा। कहा जा सकता है कि कोई भी बंगाली पहले बंगाली होता है उसके बाद हिंदू या मुसलमान। बंगालियों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य को मातृभाषा से प्रिय और कोई वस्तु नहीं। मनुष्य जाति बदल सकता है, धर्म बदल सकता है, देश बदल सकता है मगर भाषा मातृभाषा नहीं।

       रावेल ने अपनी संकीर्तन टोली की यात्रा में सिख धर्म के साथ-साथ दो धर्मों की एक भाषा संस्कृति से परिचय कराया है और यह बताने की कोशिश की है कि मनुष्य की मातृभाषा उसके धर्म जाति से भी अधिक महत्वपूर्ण है, नहीं तो भाषा के मुद्दे पर एक देश अपने मूल से टूटकर आजाद नहीं होता। कुछ ऐसी ही स्थिति तुर्की में अतातुर्क कमाल पाशा के समय में उत्पन्न हुई थी। कमाल पाशा ने अपनी मातृभाषा तुर्की पर अरबी फारसी नहीं ठोकने दी।

रावेल ने अपनी यात्रा के माध्यम से यह समझाना चाहा है कि बांग्लादेश इस पृथ्वी का भले ही एक छोटा सा देश हो लेकिन उसके संकल्प, उसकी जिजीविषा कई बड़े राष्ट्रों से भी बड़ी है जिसने राष्ट्रसंघ में अपनी मातृभाषा संघर्षों की कुर्बानियों को स्थापित कर विश्वमंच पर भाषा दिवस की बुनियाद रखी। बांग्लादेश विश्व के उन छोटे-बड़े 48 मुस्लिम राष्ट्रों में अद्भुत उदारराष्ट्र है उसका राष्ट्रगीत एक हिंदू ने लिखा है। अपने प्रिय (मुसलिम) कवि नजरुल को शायद इसलिए इस पद से वंचित रखा कि वे अरबी, फारसी और उर्दू के भी जानकार थे।

'मेरी बांग्लादेश यात्रा' पढ़ते हुए मनमोहन ठाकौर की 1985 में प्रकाशित पुस्तक 'एक  नास्तिक की तीर्थयात्रा' की याद हो गई जिसमें उन्होंने अमरनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, गोमुख आदितीर्थ स्थलों का बड़े ही रोचक ढंग से उल्लेख किया है। उसी पुस्तक में एक अध्याय एक यात्रा आदमी से आदमी तक भी है। रावेल के इस सफरनामा में ऐसा कोई शीर्षक तो नहीं है लेकिन अपनी यात्रा के दौरान जरूर उन्होंने एक आदमी द्वारा आदमी की यात्रा को लिपिबद्ध करने का प्रयास किया है। इन्हीं प्रयासों की सिद्धि के लिए कलाकार रायजुल इस्लाम असद, मारेफिन सिद्दीकी, बदरुद्दीन उमर, नादिया इस्लाम आदि लेखक बुद्धिजीवियों से मिलना रावेल की यात्रा का उद्देश्य समझा जा सकता है।

दरअसल रावेल की यह पुस्तक एक तीर्थ यात्रा, मनुष्यता और संस्कृति को स्थापित करने हेतु यात्रा ही है। इस यात्रा में लेखक ने कई संस्कृतियों को देखा, समझा और पाठकों तक अपनी उस समझ को साझा करने की चेष्टा भी की है।  हम सिख धर्म की बहुत सी बातों से अनभिज्ञ हैं जो इस पुस्तक से जान सकते हैं। सिख धर्म की उदारता और मुगलों की बर्बरता को भी देखा जा सकता है मगर उस क्रूरता में भी एक विनम्र, विनीत, सूफीवादी विचारों से ओतप्रोत एक धर्म का प्रादुर्भाव हम देखते हैं जो मुगलों के इतिहास का एक चमत्कारिक अध्याय है।

सिख धर्म का आधार सूफीवाद के सिद्धांत पर है। सूफिज्म सिखधर्म की रूहानी शक्ति है। गुरुग्रंथ दुनिया का शायद पहला अद्भुत धार्मिक ग्रंथ है जिसमें अपने समकालीन प्राय: सभी सूफी कवियों के सत वचनों को अपने पावन पृष्ठों पर अंकित कर सम्मान देकर दुनिया के धर्मों को उदारता की सीख दी गई है। यह नफरत को मात देने का सबसे उत्तम साधन था नानक देव का। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि इस्लाम का सूफीवाद सिक्ख धर्म ने अपनाकर मुगलों की क्रूरता को मात दे दी और सूफीवाद से खाली इस्लाम दुनिया की नजरों में आज उपेक्षित और नफरत का कारण बना हुआ है।

रावेल ने अपनी पुस्तक के माध्यम से एक और समन्वय की बात रखने की कोशिश की है। वे बताते हैं कि इस्लाम की भांति पांच वक्त की नमाज के तर्ज पर सिक्खों में भी पांच वाणियां प्रचलन में है जिन्हें समय-समय पर जपने(पढऩे) का आदेश है। पाँच तख्त अर्थात धाम अकाल तख्त (अमृतसर), पटनासाहिब (बिहार), श्री केशगढ़ साहिब (आनंदपुर पंजाब), श्रीहजूर साहिब (नांदेड़ महाराष्ट्र) और श्रीदमदमा साहिब (भटिंडा पंजाब) है। इसी प्रकार पांच ककार केश, कंघा, कड़ा, कच्छा, कृपाण है। उसी के साथ यह भी जोड़ दिया जाए कि इस्लाम में अंतिम पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब की भांति दशम गुरु गोविंद सिंह ने भी यह घोषणा की कि और कोई गुरु नहीं होगा.... मैं अंतिम हूं.... गुरु ग्रंथ साहिब, मेरे बाद मार्गदर्शक होंगे। सब सिक्खन को हुक्म है गुरु मान्यो ग्रंथ।

इस पुस्तक से जहां बांग्लादेश की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तथा सांस्कृतिक जानकारी मिलती है वहीं हमें सिख धर्म की बांग्लादेश में स्थापना, विकास और दशा-दिशा का भी पता चलता है। हमें पता चलता है कि बांग्लादेश में 'सिखवार्ताÓ का एक वार्षिक अंक भी प्रकाशित किया जाता है जिसमें उर्दू छोड़कर गुरुमुखी, बांग्ला, अंग्रेजी, हिंदी भाषा में भी लेखादि होते हैं। हमें जानकारी मिलती है कि गुरुनानक देवजी की चरण पादुका वहां रखी हुई है। इसके अलावा नानकदेव जी कलकत्ता भी आए थे और कई सप्ताह यहां प्रवास में रहे। जहां वे ठहरे और संत समागम किया, आज वहां बड़ा गुरुद्वारा स्थापित है और बड़ा बाजार गुरुद्वारा के नाम से विख्यात है।

यह सर्वविदित है कि बांग्लादेश का पाकिस्तान से टूटना भाषा की ज्यादती थी। वह भाषा जिसे वह अपने ऊपर थोपने से इनकार कर रहे थे और वहीं से भाषा संग्राम शुरू हुआ। लेखक ने बांग्लादेश के लेखकों से मुलाकात कर और उस समय के क्रांतिकारी कवियों की कविताओं को पुस्तक में देकर भाषा आंदोलन की पाठक को जानकारी दी है।

इस पुस्तक में हम पाते हैं कि किस तरह लेखक सिख धर्म से संबंधित स्थानों, वस्तुओं की खोज में कष्ट उठाकर उन स्थानों तक पहुंचकर उसकी तह में  जाता है और उसका विवरण जुटाता है। रमजान में दैनिक पत्रों में नमाज के समय को बांग्ला अखबारों में प्रकाशित होते देख लेखक को आश्चर्य होता है और उसका देना इस पुस्तक में वह उचित समझता है जबकि अपने यहां पर प्राय: हर भाषा के दैनिक में रोजा इफ्तार का समय प्रकाशित होता है।

जब लेखक को पता चलता है कि सुदूर गांव में कोई गुरुद्वारा है तो वह बस छोड़कर पैदल ही निकल जाता है। बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष का उल्लेख करते हुए लेखक आचार्य विष्णुकांत शास्त्री का भी उल्लेख करना नहीं छोड़ता। शास्त्री जी उस संघर्ष पर उन दिनों धारावाहिक पत्र पत्रिकाओं में रपट लिख रहे थे। हम देखते हैं कि सिख धर्म जिसे हम पंथ भी कह सकते हैं मुगलों के अत्याचार से वजूद में आया। प्राय: सिख साहित्य और इतिहास में मुगलों के अत्याचार के ऐसे-ऐसे उल्लेख मिलते हैं कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अत: उनके जुल्मो सितम बर्बरता को खत्म करने की कसम खाने वाली सिख कौम सारा जीवन एक सैन्य जीवन जीने के संकल्प को लेकर जीती रही। निहंग सिखों को देखकर पंथ के कठिन संकल्पों के विषय में सोचा जा सकता है।

लेकिन रावेल ने यह भी बताना चाहा है कि मुगलों की बर्बरता,अत्याचार, जुल्म के बीच अकबर की उदार सहनशील मानवीय प्रवृति से समाज को बहुत राहत सुकून मिला। लेखक ने उल्लेख किया है कि एक अवसर पर मुगल सम्राट अकबर ने सिख पंगत में बैठकर लंगर खाया तथा गुरुद्वारे के लिए जमीन देने की भी पेशकश की थी। बांग्लादेश की सांस्कृतिक हलचलों का उल्लेख करते हुए लेखक ने बताया है कि एक स्थान ऐसा भी है ढाका में जहां अध्यापक और विद्यार्थी खुलकर बैठते हैं, बातचीत करते हैं, बहस करते हैं, भाषा संस्कृति पर वैचारिक आदान-प्रदान करते हैं, उस जगह का नाम टीचर स्टूडेंट चौक है। ऐसी कई जगह हैं जिसका लेखक ने उल्लेख कर हमें वहां की संस्कृति से परिचित कराया, जैसे ढाका जीरोपॉइंट, गुरु द्वारा संगतटोला,  बांग्लाबाजार जो लाहौर के उर्दू बाजार के तर्ज पर रखा हुआ है जैसोर (जैसोर कोलकाता में है) मोतीझील(कलकता में भी है),जीपीओ कुष्टिया (कोलकाता में भी है) सिलहट, चटगांव, मैमन सिंह, बंगबंधुब्रिज़, सेखारी बाज़ार, इन सब जगहों की समानता से पता चलता है कि बांग्लादेश की धरती हमारी सीमा संस्कृति से कितनी निकट है।

हमें जानकर आश्चर्य होता है कि बांग्लादेश में एक राष्ट्रीय (जातीय) मंदिर 'ढाकेश्वरी' भी है।  ढाका कालीबाड़ी या ढाका औषधालय जैसी कई दुकानें और पूजा स्थल पश्चिम बंगाल में आज भी देखे जा सकते हैं। कहा जाता है कि ढाकेश्वरी मंदिर 12 वीं शताब्दी मेंं स्थापित किया गया था।

सच्चा सौदा आज आम प्रचलन में है। इस नाम से कई संस्थायें, फिल्में भी बन चुकी हैं लेकिन असल में यह सच्चा सौदा क्या है? कहा जाता है कि युवा नानकदेव को पिता ने कुछ पैसे दिए सौदा लाने के लिए, लेकिन भावुक सूफी विचारों के नानक ने देखा कि रास्ते में एक जगह भूखे सूफी फकीर संत बैठे हुए हैं, नानक ने रास्ते से दाल आटा लाकर उनके साथ खाना पकाया और खाया। जब घर पहुंचे तो पिता ने फटकार लगाई कि तुमने क्या सौदा किया, तब नानक ने कहा मैंने तो सौदा ही तो किया है, सच्चा सौदा.....

इस पुस्तक में कुछ धर्म के नाम पर और अवैज्ञानिक तथ्यों का भी उल्लेख हुआ है जो किसी भी लेखक के लिए ऐसे पुस्तक लेखन की बाध्यता होती है। यह चमत्कार आश्चर्य रोमांच ही तो धर्मों की रीढ़ होती है। आम व्यक्ति को मुक्ति दिलाने के लिए,आकर्षित करने के लिए अगर धर्मों में चमत्कार ना हो वायवीय तथ्य ना हो तो फिर कौन उनमें विश्वास करेगा। सिख धर्म का उल्लेख करते हुए लेखक भी ऐसे कई चमत्कार विश्वासों से अपने को परे नहीं कर सका है। कारसेवकों का भी कई जगह उल्लेख हुआ है। पुस्तक में यह शब्द पहली बार अयोध्या में बाबरी मस्जिद  के ध्वंस के बाद अखबारों में आया था। दरअसल, करसेवक को अंग्रेजी अखबार वाले कारसेवक लिख रहे थे, जिसकी नकल हिंदी और उर्दूवाले भी करने लगे लेकिन फारसी की दृष्टि से यह 'कार' सही है कार का अर्थ काम है। इकबाल का एक शेर है-

बागे- बहिश्त से मुझे हुक्मे सफर दिया था क्यों

कार ए जहां दराज है अब मेरा इंतजार कर

इसी शब्द कार से कारोबार, कारनामा, कार्रवाई जिसे हम हिंदी में कार्यवाही लिखते हैं।

खैर, यात्रा वृत्तांत के संदर्भ में एक और यात्रा-सफरनामा का स्मरण होता है। कृष्णा सोबती का 'बुद्ध का मंडल' बड़ा ही रोचक और प्राकृतिक सौंदर्य से पूर्ण, पहाड़ की छटा को कलम से चित्रित करती लेखिका को पढ़ते ही बनता है।

इस पुस्तक की कुछ तथ्य की त्रुट्टियों को अगर नजरअंदाज कर दिया जाये तो इस पुस्तक की सुंदर छपाई, लेआउट, मुखपृष्ठ पर गुरुद्वारा नानकशाही ढाका की छवि, बहुत ही आकर्षक और साफ सुथरी बन पड़ी है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि पेपरबैक में प्रकाशित कर मात्र सौ रुपए  मूल्य  में 'मेरी बांग्लादेश यात्रा' उपलब्ध करा शुक्तिका प्रकाशन ने बड़ा काम किया है और सर्वग्राहिकता का अवसर दिया है। इसके लिए शुक्तिका प्रकाशन को भी  बधाई देनी चाहिए।

108 पृष्ठों की इस पुस्तक में सिख पंथ को जानने समझने के लिए बहुत कुछ है। इस पुस्तक से पाठक कवि रावेल पुष्प की उम्र का अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन इस उम्र में भी उनमें ताजगी और लेखकीय ऊर्जा है। वह अपने सृजन में युवा ही दिखते हैं अभी थके नहीं हैं। एक और जानकारी हमें मिलती है कि हिंदी के इस लेखक ने साहित्य में शिक्षा नहीं ली है। वे गणित जैसे कठिन विषय में स्नातकोत्तर हैं यानी गणित में मास्टर हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि रावेल पुष्प की यह पुस्तक 'मेरी बांग्लादेश यात्रा' हिंदी जगत में प्रेम,  सौहाद्र्र और दोनों देशों के सेतु का काम करेगी और यात्रा वृत्तांत लिखने की प्रेरणा देगी।