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Friday 27 Apr 2018

विश्व सिनेमा की समझ बढ़ाती पुस्तक

तमिलनाडु के डॉन बोस्को मीडिया सेंटर के संस्थापक निदेशक राज मारियासुसई का मीडिया शिक्षण में बड़ा नाम है। तमिलनाडु का यह मीडिया सेंटर मीडिया शिक्षण, दृश्य-श्रव्य प्रस्तुतीकरण तथा मुख्यत: डिजिटल रूप से बंटे हुए समाज और युवाओं के बढ़ रहे आर्थिक दोष को लेकर अच्छा काम कर रहा है। उनकी 2016 में प्रकाशित पुस्तक, शीर्षक वल्र्ड सिनेमा :ए सेलिब्रेशन बेहद रोचक और संग्रहणीय पुस्तक के रूप में सिने पाठकों, शोधार्थियों और सिनेमा विद्यार्थियों के लिए लिखी गई है। विश्व सिनेमा में  रुचि रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति जो पूरे विश्व के अलग अलग देशों के सिनेमा, संस्कृति, कहानियां और वहाँ के निर्देशकों के बारे में जानना चाहता है उनके लिए यह पुस्तक किसी इनसाइक्लोपीडिया से कम नहीं हैं। विश्व के बेहतरीन सिनेमा के संग्रह से इस पुस्तक में वहाँ की चुनिन्दा फिल्मों का सार इस पुस्तक में श्री राज ने लिखा है जो काबिले तारीफ  है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए आप अपने आप में महसूस करेंगे कि आपने अभी बहुत छोटी दुनिया देखी है, बड़ी दुनिया से रूबरू कराने में यह पुस्तक बखूबी मदद करेगी। सिनेमा की पुस्तकों में अपनी तरह का यह इकलौता काम कहा जा सकता है। अंग्रेजी  के वर्ण क्रम में राष्ट्रों की सूची के अनुसार वहाँ की बेस्ट फिल्मों को चुनना अपने आप में ही बड़ा काम है।

पुस्तक में अफगानिस्तान की फिल्म ओसामा, जिसका निर्देशन सिद्दिक बरमाक ने 2003 में किया, की कहानी से शुरुआत की गयी है। इस फिल्म को 2004 में बेस्ट विदेशी भाषा की फिल्म के लिए गोल्डन ग्लोब खिताब भी दिया गया। फिल्म अफगानिस्तान की तालिबानी संस्कृति और वहाँ महिलाओं की भयावह दशा को दर्शाती है। कैसे तालिबानी महिलाओं के साथ जानवरों से भी ज्यादा बुरा सुलूक करते हैं। उनका घरों से निकालना दूभर करते हैं। उसी सब में पल-बढ़ रही लड़की ओसामा जो लड़के के भेष में रहकर घर चला रही होती है, उसी की कहानी यह फिल्म कसी हुई पटकथा के साथ कहती है।

पुस्तक में अल्बानिया की फिल्म स्लोगन, अल्जीरिया की फिल्म संडे गॉड विलिंग, अंगोला की द हॉलो सिटी, अर्जेन्टीना की फिल्म अना एंड द अदर्स, आर्मेनिया की फिल्म द प्रीस्टेस, आस्ट्रिया तथा आस्ट्रेलिया की फिल्म क्रमश: द व्हाइट रिबन और रेबिट प्रूफ फेंस के जरिये इन सभी देशों की संस्कृति, कहानियों और निर्देशकों से परिचय कराया गया है।

ए से ज़ेड अक्षर तक की कैटेगरी में देशों को विभाजित करते हुए लेखक ने उन देशों की बेहतरीन फिल्मों की चर्चा इसमें की है। इनमें से अधिकतर फिल्में किसी न किसी तरह के अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हैं। पूरी पुस्तक पाठक को विश्व के बेहतरीन सिनेमा के जरिए उन देशों की यात्रा जैसे कराती दिखती है। कई फिल्मों के जरिये उन देशों की संस्कृति से नफरत, तो कहीं मुहब्बत भी होने लगती हैं। जैसे अफगानिस्तान की फिल्म ओसामा और क्यूबा की फिल्म विवा क्यूबा, जिसमें  दो वयस्क हो रहे लड़के और लड़की की कहानी बताई गयी है। फिल्म में मालु एक बड़े घर की लड़की है और जोरजीटो के गरीब घर का लड़का है जो अपनी सोशलिस्ट माँ के साथ रहता है। फिल्म में क्यूबा की क्रांति, संस्कृति और इन दोनों बच्चो के आपसी द्वंद को मार्मिकता के साथ दिखाया गया है।

ए (अ) अक्षर से शुरू होने वाले अफगानिस्तान अल्बेनिया, अल्जीरिया, अंगोला, अर्जेन्टीना, अर्मेनिया, आस्ट्रिया और आस्ट्रेलिया  की प्रमुख फिल्मों को पुस्तक में शामिल किया गया हैं।  

बांग्लादेश की फिल्म मातिर मोइना इस संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है कि यह बांग्लादेश की पहली ऐसी फिल्म है जो ऑस्कर के लिए नामित हुई थी। 2002 में तारिक मसूद द्वारा निर्देशित धर्म पर बड़े और तीखे सवाल खड़े करती इस फिल्म को वहाँ की  सरकार ने प्रतिबंधित भी कर दिया था। हालांकि 2005 में फिर इसे डीवीडी संस्कारण में प्रदर्शित किया गया। बताया यह भी जाता है कि तारिक मसूद के निजी अनुभव पर यह फिल्म आधारित थी। फिल्म का एक संवाद दर्शकों पर अपनी गहरी छाप छोड़ता है- नो ट्रू रिलीजन, बी इट इस्लाम, हिन्दी और क्रिश्चियन, विल एवर मेक पीपुल ब्लाइंड। ट्रू फेथ ओपन योअर आईस। इसके अलावा बेल्जियम, बोस्निया, ब्राजील, भूटान, बुल्गारिया की प्रमुख तथा सार्थक फिल्मों को लेखक ने अपनी शोध दृष्टि से चयनित किया है।

2001 में चाइना की फिल्म बीजिंग बाइसिकिल 1948 की विक्टोरिया डी सिका की फिल्म बाइसिकिल थीव्स की याद दिलाती है। दोनों ही फिल्मों के केंद्र में नई साइकिल है किन्तु चाइना की इस फिल्म में वर्ग के संघर्ष को भी प्रतिबिम्बित किया गया है। बीजिंग बाइसिकिल एक 17 वर्षीय बच्चे की कहानी है जो अपने शहर को छोड़ बीजिंग काम ढूँढने के उद्देश्य से आता है। बीजिंग में  उसे एक कूरियर कंपनी में नौकरी तो मिल जाती हैं लेकिन उसकी परेशानियों की शुरुआत कंपनी द्वारा दी गयी साइकिल के जरिये शुरू हो जाती है। कंपनी जॉइन करने के अगले ही दिन उसकी साइकिल चोरी हो जाती है जो एक स्कूली बच्चे द्वारा खरीदी भी जा चुकी है। फिल्म में युवाओं के विषय, खासकर, आर्थिक, सामाजिक, ग्रामीण शहरी विरोधाभास को एक नए नजरिए से पेश करते हुए दिखाया गया है। लेखक द्वारा फिल्म का चयन काबिले तारीफ है। लेखक द्वारा बताए गए फिल्म के सार को पढ़ते हुए आपको यह महसूस होगा कि आपने पूरी फिल्म और चाइना की अर्थव्यवस्था और समाजीकरण को जान लिया है।

वहीं फिनलैंड के सिने इतिहास को खंगालते हुए राज मारियासुसाइ ने 2002 की फिनिश भाषा की फिल्म द मैन विदाउट पास्ट को चुना जिसके निर्देशक अकी कौरिस्माकी हैं। फिल्म एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसका अपना कोई भूतकाल नहींहै या कहें बीते हुए कल को भूल चुका है। फिल्म को 2002 में  बेस्ट विदेशी भाषा फिल्म, एकेडमी अवार्ड के लिए नामांकित किया गया था। 

इंडोनेशियन सिनेमा को भारत में न देखने वालों की संख्या देखी जाएगी तो काफी निराशा होगी लेकिन इस पुस्तक में लेखक द्वारा इंडोनेशियन सिनेमा की बेहतरीन फिल्म द रेवो ट्रुप का चयन वहाँ के सिनेमा के प्रति लगाव को बढ़ा देता है। एम रिरि रिजा की इस फिल्म को साहित्य और सिनेमा के अंतरसंबंधों के बेस्ट उदाहरण के रूप में  देख सकते हैं। यह फिल्म 70 के दशक की इंडोनेशियन शिक्षा व्यवस्था और समस्याओं का सजीव चित्रण करती हुई दिखती है।

इसी तरह लेबनान की फिल्म का एक संवाद आपको वहाँ की संस्कृति का साक्षात दर्शन करा सकता है। फिल्म का एक संवाद कोई आपसे आपका धर्म पूछे तो उसे बताना कि तुम एक लेबनीज हो, अरबी का हिन्दी अनुवाद है। 1998 की इस फिल्म में बेरूत में  हुए 1975 के नागरिक युद्ध के बाद की शहरी दिक्कतों को दर्शाया गया है।

लाइबेरिया की एक फिल्म जौनमैड डाग विश्व सिनेमा की एक धरोहर के रूप में  भी जानी जानी चाहिए। फिल्म का विषय बेहद संवेदनशील है। फिल्म दूसरे लाइबेरियन नागरिक युद्ध के समय चाइल्ड शोषण की आपबीती कहती है। वहीं मंगोलियाई फिल्म द केव आफ द यलो डाग एक खानाबदोश परिवार की आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति को बखूबी दर्शाती है। विश्व सिनेमा में  पाकिस्तान का भी अहम योगदान एक सिने शोधार्थी के रूप में मुझे दिखता हैं । पाकिस्तान की फिल्म खामोश पानी है, जिसे सबीहा सुकर ने निर्देशित की है। फिल्म पाकिस्तान की महिलाओं की समस्याओं की सजीव और कड़े शब्दों पर निंदा करते हुए वहाँ की सरकार को चेतावनी भी देती है। पुस्तक में इसके अलावा फिलीपींस की क्राइंग लेडीज, पुर्तगाल की प्रिल, कैप्टन्स, सर्बिया की द ट्रैप जैसी फिल्मों का चयन लेखक की सिनेमाई समझ और शोध के स्तर दर्शाता है।

100 देशों के सिनेमा से 100 बेहतरीन फिल्मों को चुनना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। सिनेमा की पुस्तकों के लिए अगर स्टार सिस्टम होता, तो मैं इसे 5 में से 5 स्टार देता ।