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Thursday 19 Jul 2018

कुशीनारा से गुजरते: बुद्ध के साथ एक गहन अन्तर्यात्रा

समकालीन हिन्दी कविता का परिदृश्य भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के शोर से इस कदर खोता जा रहा है कि कविता अपनी बुनियादी चिन्ता से दूर होती जा रही है। एक तो कविता की अतिरिक्त गद्यात्मकता एक तरह की एकरसता पैदा कर रही है, जिससे उसकी पठनीयता और स्वीकार्यता भी घटी है। दूसरा कि कविता तथ्य-कथन के दबाव में मर्म तक पहुंचने की अपनी मौलिकता से भी हाथ धो बैठी है। शायद इसलिए अब छंदों की वापसी भी चर्चा में है। ऐसे काव्य-परिदृश्य में अत्यन्त संवेदनशील और विचार-प्रवण कवि राजकिशोर राजन की कविता-पुस्तक 'कुशीनारा से गुजरते' कविता के प्रति आशान्वित करती है कि कविता अब भी मनुष्यता की ढाल बन सकती है।

बुद्ध की जीवन-यात्रा पर केन्द्रित कुशीनारा से गुजरते की भूमिका में कवि राजन ने यह सही विस्मय प्रकट किया है- 'बुद्ध मूर्तिभंजक थे परन्तु दुनियादारी का खेल देखिए कि आज संसार में सर्वाधिक प्रतिमाएं उन्हीं की हैं।'' दरअसल गतानुगतिक विश्व के लिए यह अत्यन्त सुविधाजनक है, जो व्यक्ति इतने बड़े हो गये हैं कि वे तुम्हारी लोभ-लालच और छल की जीवन-शैली को चुनौती देते हैं, उन्हें पत्थर की प्रतिमा में बदल दो- उसके नीचे उनके संदेशों को भी दफना दो। कम से कम प्रतिमा से, मंदिरों के लोगों को पता तो चले कि तुम उनके भक्त हो, यदि यथार्थ इसका विलोम हो। बुद्ध की भक्ति के प्रसंग में कवि का यह कथन भी आज के प्रसंग में अत्यन्त सार्थक है- बुद्ध स्वयं का स्वामी होने को कहते हैं- यह सीधी-सही बात नहीं अपितु मनुष्य की सर्वोच्चता का जयघोष है। बुद्ध मनुष्य को अपना पसंदीदा रंग चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता देते हैं। किसी खास रंग को चुनने का आग्रह वे नहीं करते, न इसके लिए वे ईश्वर या स्वर्ग-नरक का भय दिखलाते हैं। उन्हें मनुष्य की स्वतंत्रता, ईश्वर से भी श्रेष्ठ महसूस होती है। निस्सन्देह जब पाठक संग्रह की कविताओं से गुजरता है तो कविता उसे अपने ही मनुष्य से गहरे स्तर पर साक्षात्कार कराती है। कविता का एक बड़ा कार्य तो यह है कि वह अतीत और वर्तमान के बीच सेतु निर्मित करती है ताकि आगे निकलकर मंगलमय विराट भविष्य की ओर देख सकें। वर्तमान विश्व के अधिकतर देशों में-सीरिया, ईरान, तुर्की और भारत-पाक सर्वत्र युद्ध और हिंसा का नर्तन हो रहा है। मनुष्य का संहार ऐसे हो रहा है... मानो करूणा, प्रेम, बंधुत्व-सब जीवन से विदा हो गये हों। 'निर्भय' शीर्षक का यह काव्य-बंध इसी भद्दे सच की अभिव्यक्ति है कि यह मनोहरा पृथ्वी मनुष्य के वध-स्थल में बदल गई है:-

प्रत्येक मनुष्य के लिए

था भय अंगुलिमाल

आखिरकार मिल ही गया

एक निर्भय से

जिसने कहा

कि जाओ

अभय हो जाओ

इस निर्भय को था ज्ञात

कि भय से भय को मारने पर

बचता भय ही

और भय से

जनमता भय ही

हजारों साल बाद, आज भी

भय से है

सबसे अधिक भय

और अपने यहां

आदमी को

आदमी से भय

भय से युद्धोन्मत हैं देश

(पृष्ठ-41)

कवि राजन की जीवन-दृष्टि के स्थान में व्यापक जीवनानुभव और गहरी संवेदनशीलता की बड़ी भूमिका है तभी वह कवि और कविता को लिखन्त से निकालकर एक नया आयाम प्रदान करते हैं। मेरा आशय इस संग्रह की 'कवि' शीर्षक कविता से है। 'बुद्ध' जैसे व्यक्ति का जब रूपान्तरण होता है तो वह मनुष्य के ऐसे मुक्तिदाता बन जाते हैं कि सृष्टि की सारी कोमलता उनमें पूंजीभूत हो उठती है, सारी सुन्दरता उनमें रूपाकार हो लेती है, इसीलिए न लिखकर भी सबसे सच्चे कवि हो जाते हैं-

आपकी एक-एक मुद्रा

आपकी छवि कविता

आपकी बोली

आपकी ठिठोली

आपकी हंसी

आपकी अनथक यात्रा

यहां तक कि सुस्ताना कविता

आपके नयन जब निहारते

जब नि:शब्द रोम-रोम से श्रवण करते आप

जब आप विचारते

हे कवि!

आपके लिए, यह संसार कविता

और संसार के लिए

आप कविता

(पृष्ठ-35 )

'सिद्धार्थ से संबुद्ध' बनने की अन्तर्यात्रा कितनी दीर्घ और मारक रही होगी, यह इन कविताओं की अन्तर्यात्रा से स्पष्ट जरूर होता है लेकिन उसकी प्रतीति तो किसी सच्चे साधक को ही हो सकती है। कर दिया/भोग का त्याग/जिस दिन किया गृहत्याग/यह तो यात्रा की शुरूआत भर थी लेकिन यात्रा की परिसमाप्ति होती है-

भोग और त्याग की रस्सी

रहती राग के हाथ

घूम-फिर आता रहता

कभी भाग, कभी त्याग

सिद्धार्थ ने त्यागा भोग

और जिस दिन किया त्याग का त्याग

बन गये बुद्ध

सम्यक् संबुद्ध।

(पृष्ठृ-79)

हिन्दी में गुप्त जी की 'यशोधरा' से लेकर अन्य अनेक कविताएं बुद्ध पर केन्द्रित है और बेनीपुरी (तथागत) से पहले प्रसाद के अजात शत्रु जैसे नाटक भी हैं। प्रश्न है कि इस युवा कवि को बुद्ध ने ही क्यों प्रेरित अनुप्राणित किया? प्रसाद और बेनीपुरी के युग की तुलना में आज का पूंजीवादी साम्राज्यवादी समय मनुष्य और मनुष्यता के लिए अधिक  बर्बर और हिंसक है। सदगुण-संवेदना के सभी उत्सों पर महत्वाकांक्षी राष्ट्राध्यक्षों के द्वारा लगातार हमले हो रहे हैं। ऐसे भयावह समय में ग्लोब के हर कोने में राजन जैसे कवि-लेखक हैं, जो बुद्ध जैसे मसीहों के पास जाकर कुछ लेकर लौटते हैं जिसकी आज सख्त जरूरत है।

राजन जी की काव्य-भाषा विषय के अनुरूप तत्समप्रधान है लेकिन इतनी दुरूह नहीं कि सम्प्रेषण में कठिनाई हो। उन्होंने अपनी कविता को इस गद्यात्मकता से बचाया है। प्रकृति के सहज बिम्बों में कविता को सहजता और व्यंजकता प्रदान की है। ऐसी कविताओं में प्राय: सपाट कथनों की भरमार होने की आशंका होती है, मगर यहां प्रकृति के चित्रों ने उस आशंका से कविता को मुक्त कर दिया है। यह कवि-कर्म के प्रति कवि की गंभीरता का ही परिचायक है। उदाहरण के लिए 'मुक्तिपथ' शीर्षक कविता की निम्नांकित पंक्तियां दृष्टव्य हैं:-

सूर्य की एक रूपहली किरण

अपनी हथेलियों पर बैठा

हमें घुमा सकती

चराचर जगत में

जो जान लेता एक पत्ते की यात्रा

ब्रहाण्ड नाप लेता

(पृष्ठ-84)

मैं विस्तार में न जाते हुए हर उस पाठक से इस संग्रह को पढऩे की अनुशंसा करूंगा ,जिनमें अब भी मानवता बची है, जैसे बची रहती है रेत के नीचे भी कहीं-कहीं नमी। पढ़ेंगे तो हो सकता है वह नमी किसी दिन नदी में बदल जाए। कवि को बधाई, बहुत-बहुत बधाई।