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Wednesday 25 Apr 2018

सफेद कागज

शैलेंद्र भाटिया की कविताओं के यथार्थवादी दुनिया में प्रवेश करने से पहले उनकी इस उक्ति को ध्यान में रखना जरूरी है कि रोजमर्रा की जिंदगी हमें कविता लगती है। इससे गहराई का आभास होता है, साथ ही चौहद्दी भी पता चलती है। व्यक्ति सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, उसका अस्तित्व, उसकी गरिमा, उसकी परेशानियां व उसके लिए आशा की किरण को शब्दों में पिरोने का अद्भुत संयोजन है, सफेद कागज। इसमें  विषयगत  विविधता है, बात को कहने की कला में मौलिकता तो है ही, अंदाज भी कवि का अपना है। किसी का अनुकरण नहीं। कवि शैलेंद्र भाटिया सचमुच अनुभूति के कवि हैं। सफेद कागज की कविताएं युग सापेक्ष हैं इनमें भूख की तड़प है, तो मानवीय गुणों के प्रोत्साहन की प्रेरणा भी। रिक्शेवाला, बजट, मोतियाबिंद, महंगाई, रोटियां, किसान आदि कविताओं में प्रगतिवादी स्वर है। बचपन, मां, गांव, गन्ने का जूस अकेलापन आदि  मानवीय संवेदना प्रखरता के साथ मुखरित हुई हैं। कचहरी, सफेद कागज, निर्भया, स्त्री, मैं अधूरा हूं, असहमति और आजादी, फ़ाइलें आदि कविताएं हमें मंथन को प्रेरित करती हैं। इन कविताओं में जहां यथार्थ का चित्रण है वहीं आशावाद को काफी प्रोत्साहित किया गया है। साहित्य समाज का दर्पण है शायद इसलिए कवि ने अपने समय की आवाज में कविता का रंग देखकर मनोहारी बना दिया है। गांव, शहर, यथार्थ के विविध रूप, सत्ता लोलुपता, भ्रष्टाचार, अराजकता, श्रमिक की दुर्दशा, मूल्यहस, जातीय अहंकार, न्याय, प्रशासनिक व्यवस्था की विसंगति, कलाकारों का शोषण, शिक्षा क्षेत्र में पतन, स्त्री की मानसिकता, शोषण में पराधीनता का यथार्थ, वर्ग विषमता के विविध रूप आत्मिक अभिव्यक्ति एवं चित्रण की कलात्मक अभिव्यक्ति में सफेद कागज दूसरा राग दरबारी प्रतीत होता है। समाज के सत्य के प्रति जागरुक लोगों का बल बढ़ाने में काव्य संकलन सफल हो सकता है। संपूर्ण समाज के मूल्यबोध और संस्कृत की पहचान की दृष्टि से इस कृत्य का स्वागत किया जाना चाहिए। यह मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज है। व्यवसायिकता और प्रतियोगिता के मापदंडों को दरकिनार करते हुए इस दौर में शैलेंद्र भाटिया ने सीधी, सच्ची, सरल अनुभूतियों को सहज व सुगम्य अभिव्यक्ति प्रदान कर पाठक वर्ग के समक्ष अपने अनुभवों का कुशल संयोजन प्रस्तुत किया है।