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Friday 22 Jun 2018

मी दुर्गा खोटे

मुगले आज़म के निर्देशक ने फिल्म के लिए एक मार्मिक दृश्य की कल्पना की। बेटे से युद्ध के लिए पिता अकबर बेटे की माँ, अपनी पत्नी जोधाबाई के हाथों से तलवार लेने की जिद पर अड़े हैं और माँ वात्सल्य से बिंधा प्रश्न रखती है - मेरे ही बेटे को कत्ल करने के लिए आप मुझी से तलवार मांग रहे हैं। अकबर जोधाबाई के माथे से बिंदी मिटा कर चल पड़ते हैं। पर राजपूतानी का दर्प अपने पति की सलामती के लिए शब्दों में पिघल जाता है और वो अपनी सारी भावुकता पर विजय प्राप्त कर संयत स्वर में जवाब देती है- सुहाग की कीमत अगर औलाद का खून है तो लीजिये ये तलवार और बड़ी खुशी से मेरे बच्चे को कत्ल कर दीजिये मैं उफ तक नहीं करूंगी। ये दुर्गा खोटे थीं जिन्होंने जोधाबाई के द्वन्द की मर्मान्तक पीड़ा को परदे पर साकार किया था।

हिन्दी फिल्मों में अभिजात्य वर्गीय परिवार में माँ के लिए अब तक दुर्गा खोटे से अधिक उपयुक्त कोई दूसरी अभिनेत्री नहीं हुई। भावुकतापूर्ण दृश्य हो या मर्म को स्पर्श करते क्षण, दुर्गा खोटे ऐसे दृश्यों में एक अनोखी गरिमा का निर्वाह करते हुए माँ के पात्र में प्राण फूँका करती थीं। दुर्गा खोटे ने उस दौर में फिल्मों में प्रवेश किया था जब अति नाटकीय रंगमंची अभिनय ही उत्कृष्ट अभिनय माना जाता था। ऐसी पृष्ठभूमि में जन्मा कलाकार बाद के वर्षों में रियलिस्टिक अभिनय का पर्याय बन जाए यह करिश्मा दुर्गा खोटे ने कर दिखाया। खोटे को अपनी फिल्म अयोध्येचा राजा से फिल्मों में वास्तविक परिचय देनेवाले महान निर्देशक वी शांताराम भी जीवन भर नाटकीय अभिनय से मुक्त नहीं हो पाए पर उनकी खोज दुर्गा खोटे ने यह कमाल किया। ऐसी अभिनेत्री अपनी जीवनी लिखें भला इस से अच्छा क्या हो सकता था। खोटे ने हिन्दी मराठी सवाक फिल्मों के जन्म से इस दुनिया में प्रवेश किया और पचास वर्षों से भी लम्बी पारी पूरी तन्मयता और प्रसिद्धि के साथ खेली। उन्होंने हिन्दी फिल्मों के सर्वश्रेष्ठ निर्देशकों के साथ काम किया। पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी, दिलीप कुमार, राज कपूर जैसे प्रसिद्ध कलाकारों के साथ काम किया। फिल्में बनाईं और सबसे महत्वपूर्ण, मुख्यधारा की फिल्मों में रहते हुए वृत्तचित्रों का निर्माण किया, विज्ञापन फिल्मों के जन्म के साथ उनके निर्माण से भी जुड़ीं। इन्हीं दुर्गा खोटे ने अपनी जीवन संध्या पर अपनी आत्म कथा लिखी- मी दुर्गा खोटे।

दुर्गा खोटे ने जब फिल्मों में प्रवेश किया तब कुलीन और संस्कारी परिवारों की स्त्रियों के इस क्षेत्र में कदम रखने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। कुल बीस वर्ष पहले जब फाल्के ने हिन्दुस्तान में पहली फिल्म बनाई तो किसी स्त्री कलाकार ने काम करना स्वीकार नहीं किया यहाँ तक कि वेश्याओं ने भी यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इस शुरुआती दौर में विदेशी स्त्रियों ने हिन्दुस्तानी फिल्मों में स्त्री पात्र निभाए। प्रतिष्ठित परिवार से आई दुर्गा खोटे ने फिल्मों में प्रवेश किया तो विज्ञापन में उनके इसी गुण को प्रचार का साधन बनाया गया। सौलिसिटर और प्रतिष्ठित व्यापारिक घराने से आई लड़की दुर्गाबाई फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री हैं। दुर्गा खोटे के पास फिल्म और फिल्मी लोगों की कहानियों का अकूत खजाना रहा होगा पर जब उन्होंने अपनी जीवनी लिखी तो वो केवल अपने जीवन पर ही केन्द्रित रही। पर यह आत्म केन्द्रित कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है।  

उच्चवर्गीय सम्भ्रान्त परिवार था दुर्गाबाई का, लाड कुलनाम वाला यह परिवार गोवा निवासी था। बड़ा साझा परिवार बंबई में एक विशाल कोठी में निवास करता था। पिता सॉलिसिटर थे, अदालत की उलझनों से मुक्ति के लिए मराठी रंगमंच में खूब रूचि लेते। कलाकारों का घर आना-जाना भी हुआ करता। माँ कुछ अधिक संपन्न परिवार से आई थीं। उनकी माँ (दुर्गा की नानी) मलाबार हिल की एक विशाल कोठी में अकेली रहती। प्रसिद्ध संगीत विद्वान बालगंधर्व उस घर में अतिथि के रूप में रहते हुए हिन्दुस्तानी राग रागिनियों के शोध कार्य में जुड़े हुए थे। मतलब कलात्मक अभिरुचि के सभी उपादान दुर्गाबाई के आस-पास थे। माँ पिता दोनों उदार विचार के थे, इसलिए लड़कियों को अच्छी शिक्षा के साथ नाच गाने का प्रशिक्षण भी मिला। तीन बहिनों में सबसे छोटी थी दुर्गा खोटे और उनसे छोटा उनका एक इकलौता भाई। समयानुकूल तीनों बहिनों का विवाह हो गया। दुर्गाबाई का विवाह एक सम्पन्न खोटे खानदान में हुआ? खोटे परिवार उस काल के अनुसार दकियानूसी परम्परा में जी रहा था। बहू के लिए घर के बाहर की दुनिया के दरवाजे बंद हो गए। कुछ समय गुजरा और इस परिवार का वैभव व्यापारिक नुकसान की भेंट चढ़ गया। अब यह आवश्यक था कि हो सके तो दुर्गा बाई भी कुछ धनोपार्जन करें। ऐसे समय में एक परिचित फिल्म निर्माता का प्रस्ताव उन्हें फिल्म में काम करने का मिला। इस फिल्म के साथ दुर्गा खोटे का फिल्मी सफर शुरू हुआ। यह फिल्म तो असफल रही पर वी शांताराम दुर्गा के काम से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी अगली फिल्म अयोध्येचा राजा की नायिका के रूप में उन्हें चुन लिया। शांताराम की प्रभात फिल्म कम्पनी बहुत प्रसिद्ध थी और इस सफल फिल्म के साथ दुर्गाबाई नायिका के रूप में स्थापित हो गईं। एक ओर सफलता और दूसरी ओर परिवार में कलह। दुर्गा के सास-ससुर को उनका फिल्मों में काम करना बिलकुल पसंद नहीं था लेकिन दो बच्चों की माँ दुर्गा के लिए फिल्मों में काम करना शौक नहीं जरुरत थी। उन्होंने ससुराल की नापसंदगी के बाद भी फिल्मों में काम करना जारी रखा।

खोटे ने अपनी जीवनी में पिता के व्यक्तित्व, माँ के लाड़-प्यार और अनुशासन के बारे में विस्तार से लिखा है। एक समय बाद माँ के रुख में पुत्र मोह और शेष परिवार की उपेक्षा को भी उन्होंने खुल कर लिखा है। पति के असमय देहांत, फिल्मों के अनिश्चित कैरियर और शूटिंग की व्यस्तता के कारण पुत्रों के पालन पोषण की कठिनाइयों की दास्ताँ उन्होंने बहुत बारीकी से लिखी है।

दुर्गा खोटे एक प्रसिद्ध कलाकार के रूप में स्थापित थीं पर इस प्रसिद्धि के किसी आनंद को उन्होंने अपनी जीवनी में स्थान नहीं दिया। हाँ इस प्रसिद्धि के कारण उन्हें पुनर्विवाह का मौका जरूर मिला। अपने जीवन में आए इस परिवर्तन पर उन्होंने कुछ खास लिखने में कोई रूचि नहीं ली। उनकी जीवनी के केंद्र बिंदु रहे उनके दोनों पुत्र। पुत्रों की शिक्षा-दीक्षा, विवाह और उनका व्यवसाय। बहुओं के साथ आत्मीयता और खटपट का भी उन्होंने बिना संकोच सविस्तार वर्णन किया है। एक सुलझी हुई स्त्री के नाते उन्होंने इन रिश्तों में उपजी मिठास और खटास को बहुत निरपेक्ष रूप से लिखा है। अपने छोटे पुत्र की असमय मृत्यु और उसके परिवार की उथल-पुथल का अपने दृष्टिकोण से स्मरण किया और अंत में बहू के पक्ष को बड़े उदार मन से स्वीकार भी किया। दुर्गा बाई ने एक सिद्धहस्त लेखिका की तरह बहुत नाप तौल कर लिखा है। न कहानी खींची गयी न किसी घटना को यों ही निपटा देने की हड़बड़ी की गयी। जो कहा सो नि:संकोच कहा। जो नहीं कहना था कहानी को उस ओर जाने ही नहीं दिया।

दुर्गाबाई ने अपने दूसरे पति की दिलचस्पी और सहयोग के साथ वृत्तचित्रों के निर्माण का काम शुरू किया। दोनों बहुओं को उन्होंने इस काम में जोड़ा पर पारिवारिक कम्पनी में घरेलू सदस्यों की खींचतान का उन्होंने रोचक वर्णन किया है। दुर्गाबाई जीवट की निर्माता थीं। एक वृत्तचित्र के लिए उन्हें धुर आदिवासी क्षेत्र उड़ीसा के रायगड़ा में जाना पड़ा। उन दिनों रायगड़ा के लिए रायपुर से दो पैसेंजर रेलें चलती थीं। दोनों ट्रेनों में केवल थर्ड क्लास के डिब्बे लगते थे। भीड़ इतनी होती थी कि पैर रखने को जगह न मिल पाए। फिर उन दिनों इस ट्रेन के सभी स्त्री-पुरुष यात्री सिगार जैसी मोटी बीड़ी पीते रहते थे और इस बदबूदार धुंए से पूरे डिब्बे की हवा दमघोंटू हो जाती थी। निश्चय ही ऐसी स्थिति में उन्होंने यात्रा नहीं की होगी। अपने और अपनी टीम के लिए अलग बोगी की व्यवस्था की होगी। इन कठिनाइयों के बारे में उन्होंने कुछ लिखा नहीं है। रायगड़ा में भी रुकने के लिए उन दिनों सुविधाविहीन जंगल विभाग का अतिथि गृह ही उन्हें मिला होगा। किस तरह की कठिन परिस्थितियों में उन्होंने भ्रमण करते हुए वृत्तचित्र बनाए इन संस्मरणों को उनकी जीवनी में जगह नहीं मिली। फिल्मी व्यक्तियों में उन्होंने शांताराम के अलावा पृथ्वीराज कपूर और जयराज को याद किया। अपनी संयमित निकटता को उन्होंने बहुत संक्षेप में लिखा है। केवल जयराज की फिल्मी तकनीक की विशेषज्ञता भर का कुछ उल्लेख किया है। यह जीवनी मैंने अंग्रेजी अनुवाद में पढ़ी है पर अनुवाद बताता है कि निश्चय ही दुर्गा खोटे ने अपनी यह जीवनी अच्छी मराठी में लिखी होगी।