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Wednesday 19 Dec 2018

जकार्ता पर्यटन : एक अनुभव

भारत के दक्षिण-पूर्व में छोटे-बड़े लगभग 17000 द्वीपों के समूह से बना इंडोनेशिया देश है, जावा द्वीप पर बसा जकार्ता देश का सबसे बड़ा शहर और इंडोनेशिया की वर्षों पुरानी राजधानी है। भारत के इंडोनेशिया से सैकड़ों वर्ष पुराने सम्बन्ध हैं। लगभग 2000 वर्ष पहले भारतीय व्यापारी यहाँ आते थे, धीरे-धीरे यहाँ हिन्दू राजाओं का शासन स्थापित हुआ। कालांतर में बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ और राजा के साथ प्रजा ने भी बौद्ध धर्म अपनाया। तेरहवीं सदी में मुस्लिम आये और इंडोनेशिया ने मुस्लिम शासक और इस्लाम स्वीकार किया। परन्तु सत्रहवीं सदी में यूरोप की कुछ व्यापारी कंपनियों ने व्यापार के साथ सत्ता छीनी और ईसाई धर्म का प्रचार किया। कुछ वर्ष यहाँ जापान का आधिपत्य रहा। अंतत: 1945 में इंडोनेशिया स्वतंत्र राष्ट्र बना। इस पूरी अवधि में जकार्ता ही राजधानी रहा।

मुंबई से जकार्ता के लिए सीधी उड़ान नहीं है। हम पहले कुआलालंपुर गए। वहां दो घंटे बाद जकार्ता के लिए हवाईजहाज मिला जो डेढ़ घंटे में जकार्ता पहुंचा। रात के ग्यारह बजे (इंडोनेशियाई  समय के अनुसार मध्य रात्रि को) विशाल सुकार्णो हाटा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बिजली के प्रकाश से जगमगा रहा था। हवाईअड्डे से बाहर आते ही मन प्रसन्न हो गया। चौड़ी सड़कें दोनों ओर पत्तेदार, फलदार वृक्षों और फूलों-लताओं से सजी हुई थीं।

दूसरे दिन हम शहर घूमने निकले। मेरा पुत्र दो वर्षों से यहाँ है इसलिए गाइड की आवश्यकता नहीं थी। दूर से ही उत्तुंग अट्टालिकाएं दिखाई पड़ीं। मुंबई-दिल्ली में भी बहुमंजिली इमारतों के जाल हैं लेकिन यहाँ ऊंची-ऊंची इमारतें सड़क से हटकर बनी हैं जहां पर्याप्त खुला स्थान और पार्किंग की व्यवस्था है। पूरे शहर का नियोजन अत्यंत कुशलतापूर्वक किया गया है। विस्मा नामक अट्टालिका में 51 मंजिलें हैं तो बीसीए टावर में 56, सेमिनटो सबसे ऊंची इमारत में 63 मंजिलें हैं। इन भवनों में होटल, व्यापारिक प्रतिष्ठानों के कार्यालय और माल हैं। कुछ भवनों की छतों पर हेलीपेड हैं। जकार्ता अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र होने के कारण यहाँ लगभग पौने दो सौ मॉल हैं। प्लाजा इंडोनेशिया, प्लाजा  सेनयान और ग्रैंड इंडोनेशिया शोपिंग टाउन इतने विशाल हैं कि  एक दिन में एक मॉल देखने में ही थकान आ जाती है। एक मॉल में इसीलिये बच्चों को घुमाने के लिए ट्रेन चलती है। प्रत्येक माले पर थकान मिटाने के लिए रेस्तरां हैं।

मेरे भारतीय मन को जकार्ता में कुछ मनोरंजक विचित्रताएँ दिखीं। सड़कें केवल चौड़ी ही नहीं समतल और स्वच्छ भी थीं। स्वच्छता के प्रति इतना आग्रह एक नया अनुभव था। हमारे देश के कई शहरों की कई सरकारी, निजी भवनों की दीवारों पर पान और तम्बाकू की पीक से बनी अमूर्त चित्रकला तो वर्षों से देखता रहा था, यहाँ इतनी स्वच्छता कैसे? हमारे लिए स्वच्छता बनाए रखना शासन और नगर निगम की जवाबदारी है। आम नागरिक को कष्ट उठाना नहीं पड़ता। पुत्र ने बताया, यहाँ जनता स्वयं स्वच्छताप्रेमी है। भारत की तरह यहाँ भी खाद्य और पेय पदार्थ ठेले पर बेचे जाते हैं लेकिन उनके छिलके, रैपर  सड़क पर फेंके नहीं जाते। कई जगह कूड़ादान बने हैं। पर्यटन केवल उत्तुंग अट्टालिकाओं, स्थापत्यकला, प्रकृति सौन्दर्य, विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थ, का मजा लेने और मौजमस्ती के लिए नहीं होना चाहिए, उस शहर या देश की सभ्यता, संस्कृति, लोगों के आचार, विचार, व्यवहार, विकास और आदतों को भी समझना चाहिए। भारत के समान इंडोनेशिया भी बहुधर्मी, बहुजातीय, बहुभाषी, बहुप्रजातीय और बहुसंस्कृतीय देश है। संविधान ने 6 धर्मों को मान्यता दी है  इस्लाम की तीनों शाखाएँ शिया, सुन्नी और अहमदी, ईसाई,  बौद्ध और हिन्दू। देश की सबसे बड़ी मस्जिद  इस्तिगल अत्यंत भव्य है। ईसाइयों के केथोलिक और प्रोटेस्टेंट चर्च हैं। देश का पहला प्रेस्बिटेरियन चर्च जिशोन 1695 में बना था जो आज भी खड़ा है। हम हिंदुओं के शेरों वाला मंदिर और चंडी मंदिर भी देखने गए थे। देश की राष्ट्रभाषा बहासा है लेकिन उसकी लिपि रोमन है।

जकार्ता में कई म्यूजियम हैं। हम नॅशनल म्यूजियम देखने गए। यहाँ एक खंड में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ सम्हालकर रखी गयी हैं। हमने गणेश की विशाल मूर्ति के पास खड़े होकर अपनी फोटो खिंचवायी। ये मूर्तियाँ प्राचीन हैं लेकिन खंडित नहीं। इंडोनेशिया की शासकीय विमान सेवा का नाम गरुड़ एयरवेज़ है जिस पर विष्णु के वाहन गरुड़ का चित्र बना हुआ है। एक विस्तृत सड़क पर जमीन से 15 फीट की ऊंचाई पर अत्यंत आकर्षक शिल्प बना है। दौडऩे को आतुर आठ घोड़ों से सज्जित रथ में सारथि के रूप में कृष्ण बैठे हैं और पीछे धनुर्धारी अर्जुन खड़े हैं। इसे महाभारत विजयरथ कहा जाता है। यह प्राचीन शिल्प नहीं है। स्वतंत्र इंडोनेशिया के मुस्लिम शासनकाल में बने इस शिल्प को कलाकारों ने अनुपम सौन्दर्य दिया है। रामायण और महाभारत के प्रसंगों पर आधारित नाटक और नृत्य नाटिकाओं का मंचन होता रहता है जिसका आनंद भारतीय ही नहीं स्थानीय लोग भी लेते हैं। दूसरे धर्मों को समझने और सहन करने की प्रवृत्ति प्रशंसनीय है।

जकार्ता में ब्रिटिश, फ्रेंच, जर्मन, भारतीय आदि देशों के राजकीय और व्यापारिक राजदूतावास हैं जो विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। लायब्रेरी, कलावीथिका, कला महोत्सव और खेल गतिविधियाँ होती रहती  हैं। एक  सिनेमाघर में हिंदी फिल्में भी प्रदर्शित होती हैं। जकार्ता का एक आकर्षक स्थल है- कोटा, इसे डच शासनकाल में विकसित किया गया था। यहाँ एक विस्तृत पक्का मैदान है जो पर्यटकों और स्थानीय लोगों से भरा रहता है। यहीं 300 वर्ष पुराना चर्च और एक म्यूजियम भी है। एक रेस्तरां ने भी अपनी पुरानी आकर्षक छवि बनाए  रखी है। मैदान में हज़ारों स्त्री, पुरुष और बच्चे मनोरंजन के लिए आते हैं। खाने-पीने का सामान मिलता है लेकिन कचरा नहीं। सफाईकर्मी लगातार घूमते रहते हैं। निकट ही सड़क पर फोटोफ्रेम, रंगबिरंगी चप्पलें, टीशर्ट आदि वस्तुएं देखना और खरीदना आनंददायक अनुभव है। परन्तु तमन इंडोनेशिया देखे बिना जकार्ता भ्रमण अधूरा है। एक अत्यंत विशाल भूभाग पर फैले हुए इस दर्शनीय स्थान का आनंद लेने के लिए एक पूरा दिन और कार चाहिए। यहाँ देश के प्रमुख द्वीपों के भवन, स्त्री-पुरुषों के पहनावे, अस्त्र-शस्त्र, पूजास्थल आदि की प्रतिकृतियां सुरक्षित रखी गयी हैं। राष्ट्रपति सुकार्णो और सुहार्तो की पत्नियों की इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए मुक्तहस्त से धन जुटाया गया। प्राचीन धरोहरों और अत्याधुनिक तकनीक से सजे इस मनोरंजन स्थल को देखकर निर्माताओं की अद्भुत कल्पनाशीलता, दूरदृष्टि, परिश्रम और कलाकौशल देखकर हम अभिभूत हो गए। विभिन्न प्रकार के चर्च, मंदिर और बौद्ध पूजास्थलों का  सहअस्तित्व अद्वितीय और अनुकरणीय है।

जकार्ता में शाकाहारी पर्यटकों के लिए भोजन एक समस्या है। रोटी तो कहीं भी दिखाई नहीं देतीं। अनेक प्रकार की सब्जियों और विभिन्न मांस-मछलियों, समुद्री जीवों से युक्त चावल ही मुख्य भोजन है।

इस मुस्लिम राष्ट्र में महिलाओं की स्थिति देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। वे सब जगह काम करती दिखती हैं। पेट्रोल पम्प, टोलनाका, छोटी दूकान, बड़े माल, सेलून,  मसाज सेंटर और रेस्तरांओं में स्थानीय महिलाएं सहज,  निरापद और आत्मविश्वास से रात के ग्यारह बजे तक काम करती रहती हैं।

जकार्ता केवल धनाढ्य लोगों का शहर नहीं है। असंख्य कारीगर, मजदूर, छोटे दुकानदार, घरेलु नौकर, ड्रायवर, सफाईकर्मी आदि निम्न वर्ग के लाखों लोग भी यहाँ हैं। सभी स्वच्छता, टै्रफिक नियम, धर्म और सभ्य व्यवहार का पालन करते हैं। साधारण स्त्री-पुरुषों में  गहरे नीले रंग की छटावाले पारंपरिक कपड़ों के प्रति आकर्षण दिखाई दिया।

शहर कितना भी स्वच्छ हो, वायुप्रदूषण से त्रस्त है। लाखों वाहनों के इस शहर में चौड़ी सडकों पर भी लंबा जाम लगता है। मेरे भारतीय मन को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि लोग उद्विग्न न होकर अपनी कार का इंजिन बंदकर धैर्यपूर्वक  बैठे रहते हैं। हम तो दस मिनट के जाम में अधीर होकर हॉर्न बजा-बजाकर अपना क्रोध दर्शाते हैं। ऐसे ही एक अवसर पर मेरे पुत्र ने मेरा रक्तचाप न बढ़े इसलिए एक झपकी लेने की सलाह दी और स्वयं आँख मूंदकर ध्यानमग्न हो गया। ट्रैफिक पुलिस और ट्रैफिक नियमों को अपना शत्रु माननेवाले भारतीय के लिए यह एक नया और विचित्र अनुभव था।

दो माह बाद पुन: जकार्ता से कुआलालम्पुर के अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर आये। यह विमानतल इतना विशाल होगा इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते थे। कुछ वर्ष पूर्व देखे हुए दिल्ली के घरेलू हवाईअड्डे से अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे की सड़क की याद आई। गड्ढे, पानी, कीचड़ और गन्दगी शासन और प्रशासन की लापरवाही और यात्रियों की तकलीफ  बयान कर रही थी। जकार्ता से आनेवाली उड़ान से मुंबई जानेवाली उड़ान के लिए हमें व्हील चेयर पर 15 मिनट घुमाने के बाद एअरपोर्ट की  ट्रेन में बिठाया गया। 15 मिनट बाद हम ट्रेन से उतर कर प्लेन पर पहुंचे। इतने विस्तृत भूभाग पर एअरपोर्ट बनाने के लिए अद्भुत कल्पनाशक्ति, नियोजन क्षमता, लगन और परिश्रम को देखने का यह पहला अनुभव था।