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Saturday 20 Jan 2018

क्या विभीषण भातृद्रोही थे ?

रामकथा में विभीषण का चरित्र, विशेषकर आधुनिक युग में, आलोचकों की भ्रूभंग का केन्द्र रहा है। वैसे वाल्मीकीय रामायण तथा परवर्ती प्राय: सभी रामायणों में यह स्थिति नहीं है। यहां रावण और उसके अनुज विभीषण का चरित्र एकदम भिन्न बताया गया है। चरित्र की यह भिन्नता दरअसल उनके गर्भोंं में आने के समय ही तय हो गई थी। वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकांड के अनुसार रावण की माता कैकसी को उसके नाना सुमाली ने कुबेर के पिता विश्रवा मुनि (ब्रह्मा के मानसपुत्र महर्षि पुलस्त्य के पुत्र) के पास संतान की कामना से भेजा था ताकि वह भी कुबेर के समान धनशाली पौत्र पा सके किंतु कुबेला में कैकसी ऋषि के पास पहुंची थी, इसीलिये उसने दुष्ट प्रकृति के रावण को जन्म दिया था। वैसे विश्रवा मुनि ने कैकसी को यह बात बता दी थी। तब उसने मुनि के चरणों में गिरते हुए कहा था कि 'नेच्छामि सुदुराचारान् प्रसादं कर्तुमर्हसिÓ मैं आपसे ऐसे दुराचारी पुत्रों की अभिलाषा नहीं रखती। आप मुझपर कृपा करें। तब मुनि ने दयावश उसे वर दिया था, 'तुम्हारा अंतिम पुत्र  'मम वंशानुरूप: स धर्मात्मा च न संशय:Ó अर्थात् मेरे वंश के अनुरूप धर्मात्मा होगा (वा.रा.उ.कां.सर्ग 10)।' यह अंतिम पुत्र ही विभीषण था। बाद में तपस्या के प्रसादस्वरूप विभीषण ने धर्मपरायण होने का वरदान भी ब्रह्मा से मांगा था। इस समय वह ब्रह्मा से कहते हैं, जो धर्म में अनुरक्त है उनके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है, अत: मैं धर्मपरायण होना चाहता हूं (वही.उ.कां.10.30-33)। उल्लेखनीय है कि प्राय: सभी प्राचीन एवं मध्ययुगीन रामकाव्यों में माता कैकसी (नैकशी) विभीषण के पक्ष में बताई गई है। भट्टिकाव्य में वह विभीषण से कहती है कि तुम अतिशय गर्व से अविनीत अपने भाई विषरूप रावण को अमृत सदृश्य बनकर शांत करो। शांत ज्वालासमूह से युक्त लंकावासियों को त्रास देने वाली सीता को जिस प्रकार रावण छोड़ दे, वैसा प्रयत्न करो। जैसे शिव ने देवों को त्रस्त करने वाले विष का पान किया था, वैसे ही रावण को राम नष्ट नहीं कर देते तब तक तुम प्रयत्न करो (2-7)।

विभीषण की इस कथा से हम सभी परिचित है कि सीता के अपहरण के बाद विभीषण ने भाई के विरोध में राम का साथ दिया था तथा भाई के विरूद्ध युद्ध में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया था तथा रावण को पराजित करने में अहम् भूमिका निभाई थी।

उल्लेखनीय है कि प्राचीन एवं मध्ययुगीन प्राय: सभी कवियों ने विभीषण के इस कृत्य की प्रशंसा करते हुए उन्हें भक्त शिरोमणि कहा है। वैसे तो आधुनिक युग में भी ऐसे अनेक कवि एवं समीक्षक ऐसे हैं जिन्होंने राम के प्रति परम्परानुकूल ही विभीषण का चरित्र-चित्रण करते हुए विभीषण के कृत्य की प्रशंसा की है किंतु ऐसे विद्वानों की भी कमी नहीं है जो उन्हें भातृद्रोही तथा रावणवध का जिम्मेदार मानते हैं और विभीषण द्वारा राम के पक्ष में जाने का एक बड़ा कारण विभीषण की लंका के राज्य को पाने की लालसा बतलाते हैं। ऐसे लोग राम की भी निंदा करते हैं जिन्होंने विभीषण को राज्याभिषेक का लालच देकर भातृद्रोह करवाया। इस पर हम बाद में चर्चा करेंगे, अभी विभीषण का अग्रज से हुआ विरोध देखते हैं।

 रामायण के अनुसार सीता-अपहरण के बाद रावण के परिवार में एक उसके पुत्र मेघनाद को छोड़कर प्राय: सभी ने रावण के इस कृत्य की निंदा करते हुए उसे सीता को लौटाने की सलाह दी थी। बुजुर्ग नाना माल्यवान, मां कैकसी, भाई कुंभकर्ण तथा पत्नी मंदोदरी तक ने उसका विरोध किया पर सबसे मुखर विरोध विभीषण ने किया। भरे दरबार में उन्होंने कहा कि राम अजेय है...जिसका दूत एक छलंाग में समुद्र पार कर हमारी दुर्जय लंका में घुस आया और सबके सामने ही उसे जला कर चले गया, वह स्वयं कितने पराक्रमी होंगे ,यह हमें सोचना चाहिये। फिर, राम ने हमारा कोई अपराध भी नहीं किया है। खर को उन्होंने जनस्थान में इसलिये मारा क्योंकि खर स्वयं उनसे युद्ध करने गया था अत: इसमें राम का कोई दोष नहीं है। राम धर्मात्मा हैं ,अत: आप क्रोध का त्याग कर धर्म का सेवन कीजिये और उनसे युद्ध करने की अपेक्षा ससम्मान उनकी भार्या सीता को उन्हें सौंप दीजिये (वा.रा.यु.कां.सर्ग 9)।

विभीषण की बातें रावण को पसंद नहीं आई, किंतु उस समय वह चुप रहा और सभा समाप्त कर अपने महल चले गया। अब ऐसी सभा में जहां सारे के सारे सभासद राजा की मुंहदेखी कर रहे हो, विभीषण और अधिक क्या कह पाते? किंतु उनका सात्विक मन उन्हें कचोट रहा था कि जो हो रहा है ठीक नहीं हो रहा है, इसीलिये दूसरे दिन सूर्योदय होते ही विभीषण एकांत में रावण से पुन: यही अनुरोध करने उसके विशाल महल में पहुुंचे। वैसे अभी तक दोनों भाइयों के मध्य मुखर कटुता नहीं आ पाई थी तभी तो विभीषण पुन: अग्रज से अनुरोध करते हैं कि सीता को लौटा दें। वह कहते हैं-वैदेही जब से लंका में आई है तब से अपशकुन हो रहे हैं। अग्निशालाओं में अग्नि ठीक से नहीं जलती, वेदाध्ययन के स्थानों में सांप देखे जाते हैं और हवनसामग्रियों में चींटियां भर जाती है। गायों का दूध सूख गया है और पशुओं के नेत्रों से अश्रु झरते रहते हैं। नगर के फाटकों पर मांसभक्षी पशु-पक्षी चीत्कारते हैं। आपके मंत्रीगण यह बात आप तक पहुंचाने में संकोच करते हैं पर मुझे लगा कि आपको सारी जानकारी देना मेरा कर्तव्य है। इसके निदान का एकमात्र उपाय यही है कि वैदेही रामभद्र को लौटा दी जाये।

विभीषण की बातों में सच्चाई थी किंतु रावण पर तो जैसे काम का नशा सा चढ़ा हुआ था...अधिक बहस न कर उसने विभीषण को केवल यह कहकर बिदा किया कि मुझे तो ऐसे कोई अपशकुन लंका में दिखाई नहीं देते। राम भले ही इन्द्र की सहायता ले ले, पर संग्राम में मेरे सामने कभी नहीं टिक सकता (वा.रा.यु.कां.सर्ग 10)।

कुंभकर्ण के जागने के बाद उसके द्वारा रावण का साथ देने के आश्वासन के बाद भी विभीषण ने रावण के उत्साह पर पुन: पानी फेरने का प्रयास किया। पहले तो वह निवेदन करते हैं कि सीता को लौटा दिया जाये क्योंकि वह एक विशालकाय सर्प के समान आपके गले में बंधी हुई है। जहां तक राम से युद्ध में विजय का प्रश्न है...यह प्रश्न ही व्यर्थ है, क्योंकि किसी भी तरह राम को जीता नहीं जा सकता। वे अर्थविशारद हैं अर्थात् समस्त कार्यों को करने में कुशल हैं। उनके लिये धर्म ही प्रधान है। उनके तीखे बाणों को सहने में न कुंभकर्ण, न मेघनाद, न रावण स्वयं और न उनका कोई सेनापति समर्थ है। इसके आगे विभीषण रावण तथा उसके समर्थक अन्य सभासदों के लिये भरी सभा में बहुत कठोर बात कहते हैं- ये महाराज रावण व्यसनों के वशीभूत हैं, इसलिये सोचविचार कर काम नहीं कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त ये स्वभाव से ही कठोर हैं तथा राक्षसों के नाश के लिये ही ऐसा कर रहे हैं। महाराज को राम के बैररूपी विशाल सर्प ने लपेट रखा है। अच्छा हो कि तुम सब उन्हें बलपूर्वक इससे अलग कर इनके प्राण बचाओ...आवश्यकता पड़े तो इनके केश पकड़कर भी इन्हें अनुचित मार्ग से निवृत करो! ये रामरूपी पाताल के गहरे गर्त में गिर रहेे हैं...तुम सब लोगों का कत्र्तव्य इनका उद्धार करना होना चाहिये। वास्तव में तो सच्चा मंत्री वही है जो अपने शत्रुपक्ष के बलपराक्रम को समझकर स्वामी के लिये जो हितकर हो वह कहे (वा.रा.यु.कंा.14.19)।

        विभीषण के कठोर वचनों पर अभी रावण कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करता इसके पहले ही उसका ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद विभीषण पर बरस पड़ा...बिल्कुल वैसे ही तेवर दिखाते हुए जैसे कि महाभारत में दुर्योधन ने दिखाये थे जब द्रौपदी के चीरहरण को रोकने के लिये विदुर ने धृतराष्ट्र को बुरा-भला कहा था। मेघनाद कहता है- छोटे काका ! आप डरपोक की भंाति ऐसे वचन क्यों कह रहे हैं? क्या आप जानते नहीं कि मैं इन्द्रजित् हूं...जब तीनों लोकों के स्वामी इन्द्र को मैं जीत सकता हूं, उसके ऐरावत के दोनों दांत तोड़ सकता हूं, बड़े-बड़े दैत्यों को भी शोकमग्न कर सकता हूं , तो ये दोनों मानवकुमार क्या चीज हैं? इन्हें तो हमारा एक साधारण राक्षस भी मार सकता है। (वही,15.4-7) किंतु विदुर के समान विभीषण भी इन्द्रजित् की किसी बात से डरने वाले नहीं थे बल्कि वह उसे कहते हैं, 'अपनी बालबुद्धि से तुम अपने ही विनाश की बात कह रहे हो। मुझे लगता है कि तुम ऊपर से ही अपने पिता के पुत्र हो भीतर से उनके शत्रु ही हो! तुम्हारी बुद्धि बहुत ओछी है। तुम अत्यंत दुर्बुद्धि, दुरात्मा और मूर्ख हो!' (वही, 15.10) आगे विभीषण इन्द्रजित् के प्रति और एक कठोर बात कहते हैं, 'त्वमेव वध्यश्च सुदुर्मतिश्च स चापि वध्यो च इहानयत् त्वाम।।' तुम दुर्बुद्धि तो मार डालने योग्य हो ही, जो तुम्हें इस सभा में बुला लाया है वह भी वध के ही योग्य है। सुबुद्धि तो यही है कि हम लोग देवी सीता को सुसज्जित कर राम की सेवा में समर्पित कर दें, तभी हम शोकरहित होकर लंका में रह सकते हैं (वही, 15.11-14)।

अब तक विभीषण को बिना फटकारे उसकी बातें सुनने वाला रावण पुत्र मेघनाद का बल पाकर भड़क उठा। क्रोधित हो बोल पड़ा- किसी को शत्रु के साथ अथवा क्रोधित सर्प के साथ रहना पड़े तो रह जाना चाहिये किंतु मित्र कहलाकर जो शत्रु की सेवा कर रहा हो उसके साथ तो कभी नहीं रहना चाहिये। वस्तुत: जातिभाइयों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि 'नित्यमन्योन्यसंदृष्टा व्यसनेश्वाततायिन:' जातिवाले सदा एक दूसरे पर संकट पडऩे पर हर्ष का अनुभव करते हैं। वे बड़े आततायी होते हैं। तभी तो लोक में हाथियों की कथा कही जाती है जिनके मुखिया ने एक बार कुछ अन्य हाथियों के साथ लोगों को फंदा लिये आते देख कर कहा था-हमें अग्नि, दूसरे शस्त्र तथा पाश का भय नहीं है, हमारे लिये तो हमारे स्वार्थी कुलबंधु ही अति भय की वस्तु है (वही,16.5-6)। वाल्मीकि यहांकहते हैं-यद्यपि विभीषण न्याययुक्त बातें कह रहे थे फिर भी रावण उनसे कठोर वचन कह रहा था। यह सब सुन विभीषण ने हाथ में अपनी गदा थामी और अपने चार साथी राक्षसों के साथ तत्काल उछलकर आकाश में चले गये। अंतरिक्ष में खड़े होकर ही उन्होंने रावण को पुन: उसके कृत्य के लिये फटकारा -बड़े भाई होने के कारण तुम मेरे पिता के समान आदरणीय हो अत: मुझे जो चाहे वह कह सकते हो पर मैं फिर कहंूगा, तुम्हारी बुद्धि, धर्मपथ में स्थिर नहीं है। जो पुरुष काल के वश में हो जाते हैं वे हित की कामना से भी अपने हितकारी के वचनों को नहीं सुनते। तुम समस्त प्राणियों का संहार करने वाले काल के पाश में बंधे हुए हो। तुम ऐसे घर में खड़े हुए हो जिसमें आग लगी हुई है। ऐसी दशा में मैं तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर सकता था इसलिये तुम्हें मैंने हित की बात कही। यदि तुम्हें मेरी बात अच्छी नहीं लगी तो मुझे क्षमा करो! तुम अपनी और समस्त लंकापुरी की रक्षा करो। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं यहां से चला जाऊंगा। मेरे बिना तुम सुखी रहो।

विभीषण पर पादप्रहार -उल्लेखनीय है कि कुछ रामायणों में इस अवसर पर रावण विभीषण पर पाद-प्रहार करता है किंतु वाल्मीकीय रामायण में ऐसा नहीं है, यहां वह केवल भला-बुरा कहता है। मानस में उल्लेख है कि यहां विभीषण रावण के चरण पकड़कर कहता है कि सीता को राम को सौंप दीजिये किंतु रावण यह कहते हुए कि मेरे नगर में रहते हो और तपस्वियों से प्रेम रखते हो, जाओ उन्हीं के पास जाओ और उन्हीं को नीति कहो... विभीषण पर पैरों से प्रहार करता है-

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।। 

अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।। (सुं.कां.413)

बंगला कृत्तिवास रामायण में भी रावण विभीषण पर पादप्रहार करता है। यहां विभीषण रावण को छोड़कर चले तो जाते हैं किंतु इस तरह भाई को छोड़कर जाने का उन्हें दुख भी था। अपने मंत्रियों से वह कहते भी हैं -विपत्ति को उपस्थित देखकर मैंने बड़े भाई की उपेक्षा की है। यदि मैं राम के पास जाता हूं तो अज्ञानी लोग मुझे अपयश प्रदान करेंगे। अत: मैं सोचता हूं अभी न जाऊं। रावण के नष्ट हो जाने पर प्रस्थान करूंगा। अभी कहीं निर्जन कानन में ठहर जाता हूं और राम के चरण-कमलों का स्मरण करता हूं। विभीषण ऐसा करना तो चाह रहे थे किंतु मन की चंचलता के कारण उन्हें विश्राम नहीं मिल रहा था, अत: वह अपने बड़े भाई कुबेर के पास गये ताकि उनसे भी इस विषय में परामर्श ले सके। इधर शिवजी चिंतित हो गये कि कहीं कुबेर उसे ठीक से समझाने में असफल न हो जाये...इसलिये वे स्वयं भी कुबेर के पास पहुंच गये। तब कुबेर ने विभीषण से राम की शरण लेने कहा, यह भी कहा कि राम के पास जाते ही वे तुम्हें अपना मित्र बना लेंगे और तुम्हें उस निशाचर का राज्य भी प्रदान करेंगे। शिव ने भी ऐसा ही करने कहा किंतु विभीषण अभी भी दुविधा में थे। उन्होंने कहा भी कि इस समय राम के पास जाने पर लोग मेरी निंदा तो नहीं करेंगे। भाई को विपत्ति में देखकर उसे छोड़ आने को लोग मेरी दुष्टता कहेंंगे और इस पर यदि राम ने मुझे राज्य प्रदान कर दिया तब तो निरंतर संसार में मेरा अपयश ही विस्तारित होगा। सभी कहेंगे कि राज्य के लोभ से विभीषण ने बंधु-बांधवों को मरवा डाला। अत: इस समय मेरा राम के पास जाने का मन नहीं है। आगे आप लोग जो भी आज्ञा दें। इस पर शिव समझाते हैं कि राम की शरण लेना हर समय प्रशंसनीय ही है। राम साक्षात् परमात्मा है। उनकी भक्ति के लिये समय का बंधन ठीक नहीं है। यदि कोई कहे कि तुमने बंधु-बंाधवों का त्याग कर दिया है तो यह उचित नहीं है क्योंकि भक्ति के उत्पन्न होने पर कौन घर में रहता है? फिर, राम की सेवा करने के लिये तुम दुष्ट बंधुओं का ही तो त्याग कर रहे हो। और तुम जो कह रहे हो कि राम द्वारा राज्य दिये जाने पर तुम्हारा अपयश फैलेगा, वह भी ठीक नहीं क्योंकि तुम राज्य के लोभ से तो राम की शरण में नहीं जा रहे हो। प्रह्लाद का वध करने के बाद नृसिंह ने प्रह्लाद को राजा बनाया था। उसकी कोई निंदा नहीं करता। फिर, रावण को मरवा कर तुम पाप नहीं कर रहे हो क्योंकि राम की सहायता करने को सभी शास्त्र महान धर्म ही कहते हैं। अत: सारे संशय छोड़कर राम के शरणागत हो जाओ। तब विभीषण ने ऐसा ही किया (कृ.रा.सुं.कां.पृ. 311-317) और उसका सुफल पाया। राम ने उनसे मिल कर, सीता के कारण भाई द्वारा निष्कासित जानकर, अपने प्रति उनकी सद्भावना समझकर, न केवल उन्हें शरण दी वरन् सुग्रीव आदि के शंकित रहने के बाद भी तत्काल समुद्र का जल मंगवाकर उन्हें लंका के नये राजा के रूप में अभिषिक्त भी किया।       

क्या विभीषण प्रारंभ से रामभक्त थे?-विभीषण को लेकर यह प्रश्न  भी उठते हैं कि क्या राम से मिलने के पूर्व ही वे रामभक्तथे? लंका में हनुमान क्या विभीषण से पूर्व में मिल चुके थे? क्या हनुमान उनकी रामभक्ति से परिचित थे? रामभक्तहोने के कारण ही विभीषण का महल लंका-दहन के समय नहीं जला था?

वाल्मीकि-रामायण में तो नहीं, पर परवर्ती अनेक रामकाव्यों में इनका उत्तर 'हां' है। वाल्मीकि रामायण में विभीषण केवल दूत होने के कारण हनुमान को मारने की बजाय उनकी पूंछ में आग लगाने की सलाह रावण को देते हैं। उनसे हनुमान पूर्व में मिल चुके थे, ऐसा कोई संकेत यहां नहीं है।

तमिल कंबरामायण में आंजनेय का विभीषण से कोई वार्तालाप तो नहीं होता किंतु उनके महल में एक स्फटिक चबूतरे पर सोये हुए विभीषण को देखकर हनुमान अपने मन की शक्तिसे उनका सच्चा स्वभाव समझ जाते हैं। यहां भी विभीषण उनके सहायक होते हैं। इसलिये लंका में अग्निदाह करते समय वे विभीषण के महल के सामने अग्नि के लिये रेखा ख्ीांच देते हैं कि यहां मत जाना ... और इस तरह विभीषण का महल बच जाता है। अध्यात्मरामायण में भी विभीषण से हनुमान की पूर्व-भेंट का प्रसंग तो नहीं है किंतु यह उल्लेख अवश्य है कि चूंकि विभीषण ने रावण को हनुमान को मारने से रोका था, अत: पवनपुत्र ने विभीषणगृहं त्यक्तववा सर्वं भस्मीकृतं पुरम।। (सुं.कां 4.45) अर्थात् विभीषण के घर को छोड़कर सारी लंकापुरी को भस्म कर डाला था।

मानस में रामायुध से एक महल अंकित देख हनुमान स्वयं जाकर वहां पहुंचते हैं और विभीषण को निद्रा से जागते समय  'राम राम' कहते सुनकर हर्षित होते हैं कि चलो कोई सज्जन तो मिला ...और फिर विप्र रूप धर विभीषण से परिचय का आदान-प्रदान करते हैं। हनुमान का परिचय जान विभीषण अत्यधिक प्रसन्न होते हैं और अपनी दुर्दशा भी कहते हैं-

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुं जीभ बिचारी।।

तात कबहुं मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।। (मानस, सुं.कां. 7.1)

स्वाभाविक है कि ऐसे रामभक्त का महल हनुमान नहीं जला सकते थे।

जारा नगरु निमिश एक माहीं ।  

एक विभीषण कर गृह नाही।। (मानस, सुं.कां.26)

विभीषण का परिवार - रामायण के अनुसार लंका की अशोकवाटिका में जब सीता दुखभरे दिन व्यतीत कर रही थीं तब त्रिजटा और सरमा नामक दो स्त्रियां सीता के प्रति सदय थी। इनमें से 'सरमा' को वाल्मीकि-रामायण में विभीषण की पत्नी कहा गया है जो शैलूष नामक गंधर्व की कन्या थी (वा.रा.उ.कां.12.24 )। युद्ध प्रारंभ होने के पूर्व एक बार जब दशमुख ने सीता को अपनी बनाने का प्रयास करते हुए माया का सहारा लिया था तब इसी सरमा ने सीता को सच्चाई से अवगत कराया था। हुआ यह था कि रावण ने माया से राम का कटा हुआ सिर थाल में सजा कर सीता के सामने यह कहते हुए प्रस्तुत किया कि राम की हत्या हो चुकी है अब तुम मेरी बन जाओ। यह देख विलाप करती सीता प्राण देने उद्यत हो गई थी किंतु रावण के जाने के बाद सरमा सीता पर रावण की माया का रहस्य खोल कर उन्हें बचाती है। वह यह गुप्त समाचार भी देती है कि राम समुद्रपार कर लंका पहुंच गये हैं। अब युद्ध अवश्य होगा और निश्चय ही इसमें तुम्हारे पति राम विजयी होंगे। बड़े स्नेह से सरमा कहती है- वह समय अधिक दूर नहीं जब तुम्हारे केशों की यह वेणी, जो जटाओं में परिणत हो गई है, राम अपने हाथों से उसे सुलझाएंगे तथा तुम राम से मिलकर उनकी छाती से लगकर आनंद के आंसू बहाओगी (वही, यु.कां.33.33-34)।

विभीषण की पुत्री कला और पुत्र तरणीसेन का उल्लेख भी कहीं-कहीं मिलता है। तरणीसेन ने राम-रावण युद्ध में रावण की ओर से भाग लिया था। बंगला कवि कृत्तिवास ने इसका विस्तार से उल्लेख किया है। तरणीसेन यद्यपि पिता के समान ही रामभक्त था किंतु युद्ध के समय वह रावण के पक्ष में था और उसके आदेश पर उसने राम से वीरतापूर्वक युद्ध कर न केवल वीरगति  वरन् मोक्ष प्राप्ति भी की। कथा है कि कुंभकर्ण तथा प्राय: सभी प्रमुख महाबलियों के मारे जाने के बाद रावण विभीषण-पुत्र तरणीसेन को बुलवाता है। उसे बांहों में भरकर सम्मानित करता है और पुष्प-पान देकर उसकी युद्ध हेतु आरती उतारता है। युद्ध की बागडोर सौंपते हुए वह कहता है,' तरणी! अब लंकापुरी की रक्षा करो। इतनी बड़ी विपत्ति आ जायेगी इसका मुझे अनुमान नहीं था। तुम्हारे धर्मात्मा पिता ने मुझे बहुत समझाया पर मैंने अहंकारवश उसकी नहीं सुनी तो वह शत्रु के पक्ष में चले गये। उन्हीं के कारण हमारी कनक-लंका ध्वस्त हो रही है। तुम उनके पुत्र हो पर उन जैसे नहीं हो, यह मैं जानता हूं।' इस पर करबद्ध हो तरणी बोलता है, 'माता-पिता महागुरु होते हैं अत: उनकी निंदा नहीं करनी चाहिये, यह शास्त्रों में लिखा है, अत: पिता के विषय में मैं कुछ नहीं कहूंगा पर आश्वासन देता हूं कि युद्ध में शक्तिभर शत्रुसेना में मारकाट मचाऊंगा (कृ.रा.लं.कां. 266)।' कृत्तिवास आगे लिखते हैं- युद्धभूमि जाते समय तरणीसेन मां सरमा से मिलने गया तो उसने रोते हुए युद्ध करने से मना किया, यह भी कहा कि हम लंका छोड़ कहीं भी रहने चले जाएंगे। राम मनुष्य नहीं नारायण हैं उनसे युद्ध मत करो, किंतु तरणीसेन यह कहते हुए मां को समझाकर युद्धभूमि पहुंचा कि इसी बहाने मैं प्रभु के दर्शन कर पाऊंगा और उनके हाथों मारा गया तो सीधे स्वर्ग में आवास मिलेगा। उधर युद्धभूमि में तरणी को देखकर जब राम ने पूछा कि वानरों की सेना में अंाधी के समान आया यह तरुण कौन है, तो विभीषण ने कहा, रिश्ते में यह रावण का भतीजा लगता है, धार्मिक है, किंतु यह नहीं बताया कि यह मेरा पुत्र है। युद्ध के समय जब तरणी को राम ने श्रद्धापूर्वक 'राम राम' कहते सुना तो वे समझ गये कि यह उनका भक्त है। तब राम से उस पर वार करते नहीं बन रहा था और उसकी मृत्यु के बाद तो उनके दु:ख की सीमा नहीं रह गई थी। जब ज्ञात हुआ कि यह विभीषण का पुत्र है, तब राम का कोमल मुख आंसुओं से भर गया। शत्रुपक्ष के किसी व्यक्ति की मृत्यु पर पहली बार केवल राम ही नहीं, सारी वानर सेना रोने लग गई थी। विभीषण का रोना स्वाभाविक था किंतु यहां कृत्तिवास के विभीषण बहुत ऊंचा उठ जाते हैं जब वह कहते है कि मैं पुत्रशोक में नहीं रो रहा हूं ...पुत्र का शोक मुझे है ही नहीं क्योंकि वह तो परम भाग्यशाली है जो आपके हाथों मर कर तर गया है ...मैं तो इसलिये रो रहा हूं कि ऐसा मेरा भाग्य नहीं होगा। ब्रह्मा के वरदान से मुझे अमरत्व मिला है। तब राम ने उन्हें आश्वस्त किया कि जो तुम हो वही मैं हूं। जितने दिन तुम संसार में रहोगे मेरी कृपा सदा तुम पर बनी रहेगी (कृ.रा.लं.कां. 281)      

विभीषण द्वारा रावण एवं मेघनाद के वध में सहयोग-विभीषण के आलोचक इस बात के लिये विभीषण की ख्ूाब निंदा करते हैं कि उसने युद्ध में अपने भाई रावण एवं मेघनाद के वध में मुख्य भूमिका निभाई थी। अब जिसे भाई और भतीजे ने परस्त्री के लिये गर्व के मद में चूर हो लात मारकर लंका से निकला बाहर कर दिया हो और जिसे राम ने शत्रु का भाई जानकर भी उन्हें न केवल स्वीकार किया वरन् समुचित मान भी दिया हो, उनकी सहायता वह कैसे न करता? फिर राम ने तो रावण से बैर नहीं मोल लिया था? वे बस अपनी हरण की गई धर्मपत्नी वापस चाहते थे। ऐसे में धर्मात्मा विभीषण यदि धर्म की रक्षा में सहायक बने तो क्या बुरा किया?

        यह सच है कि युद्धभूमि में विभीषण ने ही राम को मरणासन्न स्थिति से बाहर निकाला था जब मेघनाद द्वारा माया की सीता का मस्तक काट कर यह भ्रम फैलाया गया कि अब सीता मर चुकी है। सचमुच तब यदि विभीषण यह भेद नहीं खोलते तो राम शायद उसी समय प्राण त्याग देते किंतु यह बताना तो विभीषण का कत्र्तव्य था। अब जब वे राम के पक्ष में युद्ध करने उतरे थे तो हर हालत में उनकी कार्यसिद्धि में उनका योगदान होना ही था। आगे विभीषण राम को मेघनाद का यह भेद भी बताते हैं कि सीता की मृत्यु का भ्रम फैलाकर वह अवश्य निकुंभिला मंदिर में होमकर्म करने गया होगा। यह कृत्य कर वह अजेय हो जायेगा। अत: उसे रोकना अत्यंत आवश्यक है। इसीलिये वे लक्ष्मण को अपने साथ निकुंभिला मंदिर ले गये थे। उल्लेखनीय है कि लक्ष्मण द्वारा चुनौती दिये जाने पर मेघनाद और विभीषण में खूब वाक्युद्ध होता है । मेघनाद विभीषण को भातृद्रोही, कुलद्रोही, परायों का दास तथा और भी बहुत कुछ कहता है । इस पर विभीषण भी प्रत्युत्तर में कहते हैं कि मेरी रुचि अधर्म में नहीं है, जबकि तुम लोग इसी मार्ग पर चलते रहे। तुमने सती नारी का अपहरण किया। मैंने उन्हें लौटाने कहा। मेरी बातें अग्रज को पसंद नहीं थी पर क्या इसीलिये कोई अपने अनुज को घर से निकालता है? आगे विभीषण कहते हैं-जिसका शीलस्वभाव नष्ट हो गया हो ऐसे पुरुष का त्याग कर प्रत्येक प्राणी उसी तरह संतुष्ट होता है जैसे हाथ पर बैठे सर्प का त्याग कर देने से वह निर्भय हो जाता है (वा.रा.यु.कां. 87.20-21) ।          

यहां उल्लेखनीय है कि भतीजे के इतने कड़वे बोल सुनने के बाद भी विभीषण ने अपनी ओर से मेघनाद पर प्रहार नहीं किया। अवश्य मेघनाद ने कई बार चाचा पर घातक अस्त्र चलाये पर लक्ष्मण ने हर बार विभीषण की ढाल बनकर रक्षा की किंतु जब विभीषण को मारने का अवसर मिला तो उनसे यह करते नहीं बना। वे वानरों से कहते हैं-मैं इसके पिता का भाई हूं इस नाते यह मेरा पुत्र है। अत: मेरे लिये इसका वध करना उचित नहीं है। तथापि श्रीराम के लिये दया को तिलंाजलि दे मैं इसे मारने उद्यत होता हूं किंतु इस पर हथियार उठाते ही मेरे अंासू मेरी दृष्टि बंद कर देते हैं अत: महाबाहु सौमित्र ही इसका वध करेंगे, मैं नहीं (वा.रा.यु.कां.89.17-18)। जहां तक भाई के वध में सहायता की बात है, परवर्ती रामायणों में रावण-वध हेतु विभीषण रावण की मृत्यु का रहस्य बताकर राम की सहायता करते हैं। जैसे अध्यात्मरामायण में वह कहते हैं-इसके नाभि में कुण्डलाकार से अमृत रखा हुआ है। इसे आप आग्नेयअस्त्र से सुखा लीजिये तभी यह मरेगा।  तुलसीदास भी मानस में यही लिखते हैं-नाभिकुंड पियूष बस याके। नाथ जिअत रावनु बल ताकें।। किंतु वाल्मीकि-रामायण में इस तरह का उल्लेख नहीं है।       

विभीषण के आलोचक -प्रारंभ में हमने लिखा है कि आधुनिक युग में रावण के पक्षधर विभीषण का विरोध करने से नहीं चूकते हैं। अवश्य 'घर का भेदी लंका ढाएÓ, कहावत लोक में प्रसिद्ध है किंतु यह सामान्य जनों के द्वारा प्रचारित की गई है, जो अपने स्वार्थ के प्रति सदा जागरुक रहते हैं तथा कुटुंब-जनों से प्रेम का मतलब ही समझते हैं कि परिवार में कोई कितना भी बुरा भी कृत्य क्यों न करें, उसका ही साथ देना है। किंतु बृहत् दृष्टि में उच्चजीवन मूल्य अपना स्थान रखते है जहां वसुधा ही कुटुंब है। यहां अपने व्यक्तिगत कुटुंब से बढ़ कर मानवमात्र की चिंता है। महाभारत में विदुर दुर्योधन को धृतराष्ट्र द्वारा त्याग देने के लिये प्रेरित करते हुए कहते है- त्यजेदेकं कुलस्यार्थे गामस्यार्थे कुलं त्यजेत। ग्राम जनपदास्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत।। अर्थात् कुल के हित के लिये कुल के एक व्यक्ति का त्याग करें। गांव के हित के लिये एक कुल को छोड़ दें। जनपद के लिये एक गंाव की उपेक्षा कर दें और आत्मकल्याण के लिये सारी पृथ्वी का त्याग कर दें।।

अस्तु, इतनी बड़ी बात सामान्य जनों के लिये समझना कठिन होता है इसलिये वे यदि घर के भेदी को विभीषण कहते हैं तो ठीक है किंतु अनेक कवियों और आलोचकों को भी विभीषण का छिद्रान्वेषण करते आधुनिक युग में देखा जाता है। फिर, केवल विभीषण अकेले नहीं थे जिन्होंने रावण को सीता को लौटाने कहा था। यह तो विभीषण की ही हिम्मत थी कि रावण को परिवार और देश के विनाश से अधिक अपनी कामवासना को महत्व देते देख अंतत: वह लंका का त्याग कर राम की शरण लेते हैं। यहां हम विभीषण की तुलना महाभारत के धृतराष्ट्रपुत्रों में से एक युयुत्सु (जो धृतराष्ट्र की एक दासी से उत्पन्न हुआ था) से कर सकते हैं जो ऐन युद्ध के प्रारंभ होते समय पंाडवों के पक्ष में आ गया था क्योंकि यह धर्म का पक्ष था। महाभारत का यह एक अत्यंत सुंदर चरित्र है किंतु इस पर भी लंाछन लगाने वालों की कमी नहीं। (विस्तार से लेखिका की महाभारत पर आधारित रचना 'व्यासकथा' में देखिये)

आधुनिक हिंदी कवि हरदयालुसिंह रावण-महाकाव्य में विभीषण के चरित्र के कटु आलोचक हैं। कवि कहते हैं-विभीषण के व्यवहार से हम सर्वथा असंतुष्ट हैं। राम के आपदबंधु होने के नाते गोस्वामीजी इनकी तथा सुग्रीव की चाहे जितनी प्रशंसा करें किंतु वे उनके विश्वासघात, बंधु-विद्रोह इत्यादि दुराग्रहों पर कभी पर्दा नहीं डाल सकते। आजकल का इतिहास तथा साहित्य का विद्यार्थी इन्हें जयचंद की नीति का पथ-प्रदर्शक कहकर ही स्मरण करेगा। इसके उत्तर में कुबेरनाथ राय द्वारा की गई टिप्पणी उल्लेखनीय है। वे लिखते हैं, विभीषण ने उच्चतर मूल्यों का पक्षधर होकर भातृपक्ष का त्याग दिया। वह त्याग उनकी श्रेष्ठतर मनुष्यता और श्रेष्ठतर शील का परिचायक है। महाभारत के संदर्भ में भीष्म और कर्ण यही नहीं कर पाये और हीनतर मूल्यबोध के पक्षधर होकर अपने को ट्रैजिक चरित्र बना डाला। इधर राम को गालियां देना प्रगतिशील कर्म माना जाता है सच यह कि ऐसे लोगों के मन में अतृप्त और उद्दीप्त रावण बसा हुआ है राम को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं।

गुणवंत शाह अपने मानवता का महाकाव्य नामक ग्रंथ में विभीषण के संबंध में सुंदर बात लिखते हैं कि विभीषण आज भी जीवित है। विभीषण यानी सत्य का पक्ष लेने वाला सज्जन। विरोधी-पक्ष में रहने वाले सत्य स्वीकार करें और फिर उसका समर्थन करने के बदले में जो भी सहन करना पड़े ,उसे सहन करें तथा सत्य का पल्ला न छोड़े, उसका नाम विभीषण है ...यही विभीषणवृत्ति है।

 -लेखिका सेवानिवृत्त प्राचार्य हैं। भारत सरकार के संस्कृति विभाग के सीनियर फैलोशिप के अंतर्गत उन्होंने रामायण पर शोधकार्य किया है।