Monthly Magzine
Thursday 19 Jul 2018

समकालीन व्यंग्य की भाषा

मेरी भाषा सपनों की सहयात्री है

जैसे कल देखा मैंने सपना

बरस रही थी आसमान से आग

आज मेरी भाषा यह पौधा रोप रही है !

       -लीलाधर मंडलोई की कविता (भाषा)

 

व्यंग्य हो या साहित्य की कोई अन्य विधा भाषा रचना की प्राथमिक जरुरत है। यह भाषा ही है जो हमें बता देती है कि कौन कहाँ से चलकर आ रहा है।

प्रेम जन्मेजय, सुशील सिद्धार्थ, ज्ञान चतुर्वेदी, कैलाश मंडलेकर की परिपक्व व्यंग्यभाषा बताती है कि उन्होंने अपनी भाषा को दीर्घ अध्ययन व व्यापक सामाजिक अनुभवों से अर्जित किया हुआ है। शांतिलाल जैन की भाषा भी कुछ इसी तरह की है। उनमें प्रयोग अधिक हैं। सुशील जी की भाषा में लालित्य और खिलंदड़ापन अधिक है। वे भाषा से बहुत निकटता प्राप्त कर लेते हैं और फिर भाषा और लेखक एक दूसरे के साथ खेलने लग जाते हैं। उनके व्यंग्यों का केन्द्रीय विचारतत्व रचना का संतुलन बनाये रखता है जहाँ पर उनका व्यंग्य कौशल चुपचाप अपना काम करता रहता है। निर्मल जी की भाषा बताती है कि वे कविता से चलकर व्यंग्य तक आये हैं। आलोक पुराणिक और विष्णु नागर के व्यंग्यों में पत्रकारिता की भाषा का प्रभाव दिखता है। बुलाकी शर्मा और नीरज दैया की व्यंग्य रचनाओं में भाषा का राजस्थानी रंग चढ़ा हुआ मिलता है। इंदरजीत की भाषा में पंजाबी टोन मिलता है। पल्लवी की भाषा में बुन्देलखंडी ठसक, तो वहीं अभिषेक अलंकार की भाषा पर महानगरीय जीवनशैली का प्रभाव दिखता है। मलय जैन के पास भी एक मुकम्मल व्यंग्य भाषा है, तो वहीं पंकज प्रसून की भाषा दूर से ही गवाही देती मिलती है कि वे व्यंग्य की वाचिक परम्परा से आ रहे हैं।

भाषा की रवानगी का पठनीयता से सीधा सम्बन्ध है। इसलिए व्यंग्य में भाषा का प्रश्न एक जरुरी प्रश्न है जिसका उत्तर खोजा जाना चाहिए। ऊपर कुछ लेखकों की भाषाई विशेषताओं को रेखांकित करने से मेरा मतलब यह नहीं कि इससे कोई किसी से कमतर या श्रेष्ठ होता है बल्कि यह है कि आप देख सकें कि किस तरह तमाम व्यंग्यकार अपनी-अपनी भाषा और लहजे के विविध रंग व्यंग्य में बिखेर रहे हैं। ये सभी गुण व्यंग्यकारों की अपनी-अपनी निजी विशेषताएं हैं, उनका अपना परिचय है। यह परिचय जब पाठकीय संवेदना से जुड़कर गहरा हो जाता है तो फिर भाषा ही आपकी पहचान बन जाती है। कोई सिर्फ कुछ पंक्तियाँ पढ़कर ही बता देगा कि अमुक रचना अमुक लेखक ने लिखी है।

कुछ व्यंग्यकार अपने व्यंग्यों में भाषा का आतंक फैलाते हैं तो कुछ व्यंग्यकार भाषा को बड़ी सावधानी से बरतते हैं। कभी-कभी रचना लिखने में रखी गयी ज्यादा सावधानी भी रचना की आत्मा को मार देती है। इससे व्यंग्य तो उपजता है लेकिन वह अस्वाभाविक भाषा में लिखा गया कृत्रिम व्यंग्य होता है। इसके अलावा रचना के ऊपर सपाटबयानी का खतरा भी मंडराने लगता है। व्यंग्य तो जैसे तैसे पूरा हो ही जाता है लेकिन उसका प्राणतत्व भाषा का स्वाभाविक तेवर खोकर निस्तेज हो जाता है। निस्तेज व्यंग्य समय याद नहीं रखता। ऐसे व्यंग्यकारों को समझना चाहिए कि शुष्क भाषा से प्रभावी व्यंग्य पैदा नही होता। हिंदी का पाठक बहुत समझदार होता है,, लेखक की भाषाई चालाकी या अक्षमता उससे छुप नहीं सकती। वह रचना में उसे फौरन भांप लेता है।

हिंदी व्यंग्य में आप शरद जोशी की भाषा देखें, नरेंद्र कोहली की भाषा देखें। श्रीलाल शुक्ल तो जैसे व्यंग्यभाषा रचने में माहिर ही हैं। उनकी चर्चित कृति रागदरबारी में मुखर हुआ व्यंग्य ठेठ अवधी के ठाठ के दर्शन कराता है। परसाई की पारसाई उनकी विशिष्ट व्यंग्यभाषा का ही नाम है। समकालीन व्यंग्यकारों में अगर कुछ और नाम लूँ तो संतोष त्रिवेदी के पास बैसवारे का प्रखर लहजा मौजूद है। उप्र से एक वे तथा मप्र से श्री विजी श्रीवास्तव कभी-कभी अपनी भाषा से हैरान कर देते हैं तो कभी-कभी निराश करते हैं। अभी तक मैं उन पर एक राय नही बना पाया हूँ। युवा व्यंग्यकारों में अनूपमणि, सुरजीत, शशिकांत सिंह के पास बेहतरीन व्यंग्यभाषा है।

अब प्रश्न यह उठता है कि व्यंग्य में भाषा को परखने का मापदंड क्या हो? मेरे विचार से व्यंग्य में भाषा की परीक्षा दो तरह से की जा सकती है अर्थात इसकी परख के दो आलोचनात्मक प्रश्नपत्र हो सकते हैं। पहला छोटी निबंधात्मक रचनाओं के माध्यम से दूसरा कथात्मक या औपन्यासिक रचनाओं के माध्यम से। मैंने दो प्रश्नपत्र क्यों रखे हैं यह आगे आपको स्पष्ट हो जाएगा। विषयानुकूल भाषा कहना रचना में भाषा के प्रश्न को चलताऊ तरीके से निपटा देना है। विषय के प्रतिकूल लिखने की कोशिश कोई नहींकरता। पात्रानुकूल भाषा कहना सही है, लेकिन यह दूसरे प्रश्नपत्र की जाँच के अंतर्गत आएगा। कई बार रचना में सब कुछ कहा नहीं जाता बल्कि अनकहा छोड़ दिया जाता है। जिस स्पेस को पाठक अपने मानवीय विवेक के अनुसार भरता है। एक सटीक व्यंग्य भाषा में अतिरिक्त उपदेशात्मकता व नारेबाजी नहीं जमती।

व्यंग्यकार एवं आलोचक सुरेशकांतजी अपने वक्तव्यों में अक्सर भाषा की शुचिता बनाये रखने का आग्रह करते हैं। वे रचना में गालियों में प्रयोग को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं। मैं उनकी बात को कुछ ही हद तक स्वीकार करता हूँ। भाषा की शुचिता को प्रथम प्रकार की रचनाओं में पूरी तरह स्वीकार किया जा सकता है क्योंकि भाषा में लेखक के विचार सीधे-सीधे प्रस्तुत हो रहे होते हैं। दूसरे प्रकार की व्यंग्य रचनाओं में भाषा की शुचिता के सवाल को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि बड़ी व्यंग्य रचनाओं में देशकाल तथा पात्रों के आपसी संवाद भाषा के माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं। वह भाषा कृति के पात्रों की भी भाषा होती है केवल लेखक की ही भाषा नहीं। वहाँ लेखक केवल अप्रस्तुत रूप में साक्षी के तौर पर मौजूद रहता है। गालियों के प्रयोग वाली भाषा में घटनाओं, अंचलों तथा पात्रों के मुताबिक लेखक पात्रों की जुबान बोलने लगता है। वास्तव में ऐसा करते हुए लेखक यथार्थ को ही रचना के रूप में लिख रहा होता है इसलिए आलोचना करते वक्त लेखक पर भाषा को खराब करने के आरोप को मैं एक गैर जरुरी आरोप मानता हूँ। इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध कथाकार राही मासूम रजा ने अपने उपन्यास ओस की बूँद की भूमिका में बहुत अच्छी तरह से स्पष्ट करते हुए लिखा है- वे लिखते हैं, मेरे पात्र यदि गीता बोलेंगें तो मैं गीता के श्लोक लिखूंगा और वह गालियाँ बकेंगें तो मैं अवश्य ही उनकी गालियाँ भी लिखूंगा। मैं कोई नाजी साहित्यकार नही हूँ कि अपने उपन्यास के शहरों पर अपना हुक्म चलाऊं और हर पात्र को एक शब्दकोष थमाकर हुक्म दे दूँ कि जो एक शब्द भी अपनी तरफ  से बोले तो गोली मार दूंगा। कोई बड़ा बूढ़ा यह बताये कि जहाँ मेरे पात्र गाली बकते हैं वहाँ मैं गालियाँ हटाकर क्या लिखूं, डाट...डाट...डाट। यदि आपने कभी गाली सुनी ही न हो तो आप यह उपन्यास न पढि़ए। मैं आपको ब्लश करवाना नहीं चाहता। व्यंग्य में मेरे द्वारा भाषा के दो प्रश्नपत्र रखने का आशय अब स्पष्ट हो गया होगा।

वास्तव में भाषा तो बहता नीर है उसे उसके उन्मुक्त भाव से बहते रहने देना होगा। उस पर बाँध बनाने की कोशिश निरर्थक है क्योंकि भाषा जीवन से निकलती है। यह सही है कि सरल भाषा ज्यादा दूर तक पहुँचती है लेकिन इससे कठिन या अपेक्षाकृत परिष्कृत भाषा का महत्त्व कम नहीं हो जाता। कुछ बातें ऐसी भी हो सकती हैं जिन्हें हो सकता है उतनी अच्छी तरह से अभिव्यक्त नहीं किया जा रहा हो। व्यंग्य के लिए बहुत सीधी-सपाट भाषा से काम नहीं चलता। उसमें वे पेंचोखम होने ही चाहिए जो भाषा की व्यंजना शक्ति को वेग प्रदान कर सकें। मुख्य बात यह है कि लेखक अपनी अभिव्यक्ति में कितना सहज है। अगर वह लिखने के दौरान असहज है तो निश्चित रूप से उसे पढऩे वाला पाठक भी असहज होगा। भाषा का कोई चमत्कार ऐसे व्यंग्य को कालकवलित होने से बचा नहीं सकता। व्यंग्य आनंदवादी रास्ते से यथार्थवादी भूमि का दर्शन कराता है। भाषा की व्यंजनाशक्ति का जितना प्रयोग व्यंग्य करता है उतना कोई अन्य विधा नहीं। इसलिए उसकी भाषा पर ज्यादा बल दिए जाने की आवश्यकता है। तमाम विसंगतियों पर भरपूर प्रहार कर व्यंग्य समाज में मनुष्य को और मनुष्य बनाये जाने की पैरवी करता है। तदनुसार उसकी अपनी भाषा का चयन भी होता है। व्यंग्यबोध एक नैसर्गिक चीज भी है। जब तक अपने चारों तरफ  एक प्रतिबद्ध, ईमानदार और सजग व्यंग्यदृष्टि न हो, व्यंग्यानुकूल भाषा न हो, समाजार्थिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक समझ और अभिव्यक्ति कौशल न हो सार्थक व्यंग्य की रचना संभव नहीं है।