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Saturday 20 Oct 2018

सुशासन की नौका से विकास की यात्रा

विकास के बारे में सोचते हुए सर्वप्रथम हमारा ध्यान सामाजिक-आर्थिक विभेद की ओर आकृष्ट होता है, तब हम पाते हैं कि जहां विकास की स्थिति में व्यक्ति को अपनी सुविधा के अनुसार जीने की छूट होती है वहीं विकास के अभाव में समाज पिछड़ जाता है। विकास की प्रक्रिया व्यक्ति के स्तर पर मानव अधिकारों के विस्तार और स्थापना को रेखांकित करती है। विकास, स्वातंत्र्र्य और विकल्पों की उपलब्धता से जुड़ा होता है, तभी सामथ्र्य आ पाती है। एक समृद्ध और समर्थ समाज का निर्माण ही प्रजातंत्र का उद्देश्य होता है। अत: जनकल्याण के लिए प्रतिबद्ध भारत राष्ट्र के लिए यह प्रथम चुनौती बन जाती है कि किस भांति समवेत प्रयास किया जाए ताकि समता और समानतामूलक समाज स्थापित हो जिसमें हर नागरिक, स्वतंत्रता और सामथ्र्य की अनुभूति कर सके।

'विकासÓ आवश्यक तो है पर स्वतंत्र रूप से आत्यंतिक रूप में नहीं हो सकता। विकास सिर्फ  विकास के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता। इसका माध्यम सुशासन ही होगा। सुशासन की प्रक्रिया देश के शासन-संचालन की वह संवेदनशील विधा है जिसके द्वारा अपने आदर्श रूप में लोक-हित प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है क्योंकि सुशासन किसी को बड़ा नहीं देखता, किसी को छोटा नहीं देखता, बल्कि वह सबके शील व स्वभाव में बड़प्पन ढूंढता है।

विकास और सुशासन दोनों के लिए मानक या निकष क्या हो? जब इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो हमारे सामने मानवाधिकार के आयाम ही उपस्थित होते हैं। मानव अधिकारों तक सबकी पहुंच और उपलब्धता सुनिश्चित करने के द्वारा ही सुशासन और विकास संभव है। सामाजिक और आर्थिक ही नहीं मानसिक रूप से भी समाज के हर वर्ग को आश्वस्ति मिलनी चाहिए। विकास के तमाम प्रयासों के बावजूद भारत के समाज में विभिन्न समुदाय अभी भी बराबरी के स्तर पर पहुंच चुके हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह समाज के प्रत्येक वर्ग को खास तौर पर वंचितों और हाशिए के लोगों को उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने से ही आ सकेगा। ये लोग सदियों से कठिनाई और अभाव का जीवन जीते आ रहे हैं। सामाजिक भेदभाव, अंधविश्वास और कुरीतियों के कारण इन लोगों को अनेक तरह की त्रासदियां झेलनी पड़ी है। इनके संचित प्रभाव, कठोर और दृढ़ होने के कारण इतने गहरे पैठे हुए हैं कि इनके लिए विशेष रूप से व्यवस्था जरूरी है। इसे ध्यान में रख कर ही देश के संविधान में इस हेतु आरक्षण का प्रावधान किया गया। साथ ही, पूज्य गांधी जी के साथ अनेक समाज सुधारकों द्वारा छुआछूत या अस्पृश्यता को दूर करने के अनेकविध प्रयास हुए परन्तु जाति प्रथा और आर्थिक विषमता के चलते यह सामाजिक बुराई बनी हुई है और नए रूप ले रही है। हां शिक्षा के विस्तार, विस्थापन और क्षेत्रीय गतिशीलता के कारण इन वर्गों की परिस्थिति में अवश्य कुछ सुधार हुआ है पर अभी भी हमें लम्बी दूरी तय करनी है। गरीबी, बेरोजगारी और नागरिक सुविधाओं के अभाव को लेकर भी स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं कही जा सकती। महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

सुशासन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इसके अंतर्गत पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी कामकाज का ढंग(ब्यूरोक्रेसी) सम्मलित है। भारत में सुशासन के सामने अनेक चुनौतियां उपस्थित हैं। इनमें औपनिवेशिक इतिहास से भी जुड़ी कई चुनौतियां हैं। अंग्रेजों ने अपने अधीन शासित लोगों के लिए कानून और व्यवस्था का निर्माण किया था। शासन के लिए उनका उद्देश्य भिन्न था। हम अभी भी बिना मौलिक बदलाव के सिर्फ  थोड़े से फेरबदल के साथ उसका उपयोग करते चले आ रहे हैं। यह देश और समाज की आकांक्षा के अनुरूप नहीं हैं। अनेक आयोग और समितियों ने इनकी खामियों पर विचार किया है और संस्तुतियां दी हैं परन्तु हम उन्हें लागू करने में पीछे हैं और स्थितियां कमोबेश पूर्ववत या कहें जस की तस बनी हुई हैं। साथ ही, समस्याओं का जनसंख्या विस्फोट के कारण आकार भी बढ़ा है और दूसरे तरह की जटिलताएं भी बढ़ी हैं। नीतिगत प्राथमिकताओं में भी परिवर्तन हुआ है। उदारीकरण और वैश्वीकरण के प्रभाव में पिछले तीन दशकों में हमारा ध्यान खेती किसानी और अंदरूनी व्यवस्था से कहीं ज्यादा उद्योग, व्यापार और व्यवसाय की तरफ गया है। विदेशी पूंजी निवेश को लेकर बड़ा प्रयास हुआ है जिसके कुठ अच्छे परिणाम दिख रहे हैं। पर साथ ही, समस्याएं भी खड़ी हो रही हैं। जन कल्याणकारी क्षेत्रों में पूंजी निवेश और आधार संरचना बनाने के काम में ढीलापन बढ़ा है। तकनालजी का उपयोग कितना और कैसे किया जाए यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है, जिस तरफ हमने ध्यान नहीं दिया है और उससे असंतुलन बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि हम शासन की प्राथमिकता तय करें और अपनी जरूरतों का उचित रूप से आकलन करें।

सुशासन, शासन करने का तरीका या पद्धति भी है और उस पद्धति का परिणाम भी। यह प्रोसेस भी है और प्रॉडक्ट भी। लक्ष्य के रूप में सुशासन का मतलब एक सशक्त और समृद्ध जीवन से है जिसमें किसी को कोई कष्ट न हो, कोई दु:खी न हो। ऐसा हो जाए तो सुशासन है, जिसे 'राम राज्यÓ भी कहा जाता हैे। यदि हम आप्त वचन को उधार लेकर कहें तो सुशासन का लक्ष्य 'बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय' से जुड़ा होता है।

सुशासन और विकास परस्पर सम्बद्ध होते हैं। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बगैर सुशासन के सच्चे मायने में विकास नहीं हो सकता और विकास के मार्ग पर चले बिना दीर्घ अवधि तक सुशासन भी कायम नहीं रह सकता। आज सोचने की जरूरत यह है कि सुशासन और विकास दोनों को टिकाऊ और जीवंत कैसे बनाया जाए। किस राह पर हमारा राष्ट्र चले ताकि विकास और सुशासन का लक्ष्य पूरा हो सके। इसे एक बिम्ब के जरिए समझने में सहूलियत होगी। कोई भी नदी पार करने के तीन तरीके होते हैं। एक, हम पुल के जरिये पार करें। दो, नाव या किसी साधन की सहायता लें। तीन, हम तैरकर पार करें। तीनों माध्यम से हम नदी पार कर लेंगे लेकिन इनमें बुनियादी फर्क है, जिसे नजऱअंदाज नहीं किया जा सकता। पुल के जरिये नदी पार करने पर हम नदी के ऊपर से गुजर जाते हैं। नदी से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं बन पाता। हम देखते हुए गुजर जाते हैं। वहीं, जब हम नाव आदि को जरिया बनाते हैं तब पुल की तुलना में हमारा सम्बन्ध नदी से अधिक बनता है। हम नदी के ज्यादा पास होते हैं। नदी को करीब से देखते हैं। तीसरी स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन आता है। तैरकर पार करने में नदी में हम होते हैं और हममें नदी होती है। इस दौरान नदी के साथ जो रिश्ता बनता है वह अन्य दो स्थितियों में मुमकिन नहीं। इस प्रक्रिया में हम नदी के गुण-गंध में सरोबार रहते हैं। हम नदी को पूरी तरह महसूस करते हैं। मैं इस बिम्ब को लोकतांत्रिक प्रणाली के दौर में विकास और सुशासन को समझना और समझाना चाहता हूं। विकास और सुशासन को अगर लक्ष्य मान लें तो तरीका क्या अपनाना होगा जो सबसे कारगर हो।

ब्यूराक्रेसी के माध्यम से सुशासन और विकास का प्रयास पुल से नदी पार करने सरीखा है। जिसमें जनता से खास सम्बन्ध नहीं बन पाता। वहींजनता के प्रतिनिधियों के माध्यम से जब सुशासन और विकास का लक्ष्य पाने का प्रयास होता है तो नाव से नदी पार करने जैसी स्थिति बनती है। जब जनता को सुशासन और विकास में सीधे तौर पर सहभागी बनाया जाता है तो नदी तैरकर पार करने जैसा रिश्ता निर्मित होता है। यह ज्यादा टिकाऊ होता है और विश्वसनीय भी। सहभागिता सुशासन और विकास को कारगर बनाती है साथ ही, लोकतंत्र को भी व्यापकता और गहराई प्रदान करती है।

जनता की उन्नति हो और कष्ट न हो इस आदर्श को पाना आसान नहीं है। इसको पाने के लिए शासन व्यवस्था के सभी पक्षों को एक दूसरे का ध्यान रखना होगा। कोई भी अकेला पर्याप्त नहीं है। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका तीनों के बीच सामंजस्य आवश्यक है। हालांकि एक दृष्टि से देखें तो सुशासन का प्रत्यक्ष संबंध कार्यपालिका से है। आज आम आदमी को सरकारी महकमों में अच्छे अनुभव नहीं होते हैं। उसे शिकायत रहती है कि काम समय पर नहीं होते या फिर काम कराने के लिए 'सुविधा शुल्क' देना पड़ता है या फिर ऑफिस के अनेक चक्कर लगाने पड़ते हैं। 'कोई काम आसानी से नहीं होता है' उसमें अड़ंगे लगाए जाते हैं।' ऐसा अक्सर अनुभव किया जाता है। व्यवस्था की संवेदनशीलता, सक्रियता और उसके प्रभावी कार्यालय को लेकर प्रश्न खड़े किए जाते हैं। व्यवस्था की खामियों को लेकर काफी कुछ कहा गया है और लिखा गया है। उसे लेकर असंतोष व्यक्त किया जाता रहा है और आम आदमी की आशाएं भी बढ़ी हैं। उदारीकरण के दौर में आदमी नये-नये सपने देख रहा है। उसकी महत्वकांक्षा पर कोई अंकुश नहीं है। ऐसे में सुशासन के मार्ग में उभरते नवधनाढ्य वर्ग द्वारा अच्छे-बुरे किसी भी तरीके से ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करना लक्ष्य हो गया है। इस तरह के लोग अपराध जगत और राजनीति से जुड़ कर कुछ भी करने के लिए तत्पर रहते हैं। इस तरह के गठजोड़ के कारण पिछले दशकों में कई बड़े पैमाने पर आर्थिक घोटाले हुए हैं। बहुत सारे राजनैतिक निर्णय किसी खास व्यक्ति या समुदाय को लाभान्वित करने हेतु लिए जाते हैं।

सिटीजन चार्टर और लोकपाल बिल को लेकर बड़ी बहस आजकल चल रही है जिसका उद्देश्य सुशासन लाना है। सुशासन के लिए सकारात्मक पहल भी आवश्यक है हमें ऐसी परिस्थिति का निर्माण करना होगा जो व्यक्ति और समाज के लक्ष्यों के बीच सार्थक तालमेल बिठा सके। स्मरणीय है कि केवल संसाधनों को उपलब्ध करा देना ही पर्याप्त नहीं होता है। आज देश में तमाम योजनाएं चल रही हैं पर उनमें से कितनी ठीक से चल रही हैं और अच्छे परिणाम दे रहीं हैं यह एक यक्ष प्रश्न है। यह बात अब आम हो चली है कि विभिन्न योजनाओं के लाभ उन लोगों तक पहुंच ही नहीं पाते जिनके लिए उन्हें बनाया गया था। साथ ही, बहुत सी योजनाएं शुरु ही नहीं हो पाती हैं। जब हम सुशासन की बात करते हैं तो हमें अपने प्रयासों की शुचिता और उपयुक्तता पर भी ध्यान देना होगा।

सुशासन के अभाव में सबसे बड़ा आघात मानव अधिकारों पर होता है। हमारे सामाजिक जीवन में अभी भी बड़ी विसंगतियां हैं। विभिन्न जातियों, जनजातियों और पिछड़ी जातियों के लोग अभी भी समाज में हाशिये पर हैं। वे वंचित हैं और अनेक प्रकार के कष्ट सह रहे हैं। जब तक विकास की धारा में उनका समावेश नहीं हो जाता तब तक हम विकास को न्याय के तराजू पर नहीं रख सकते। क्योंकि सुशासन के लिए चुनौती इसी वर्ग से आती है। जो साधन संपन्न हैं वे तो अपना काम किसी भी तरह सिद्ध कर लेते हैं पर जो दलित और उपेक्षित हैं उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।

न्याय व्यवस्था की जटिलता और व्यय साध्य होने से उसकी उपलब्धता का क्षेत्र बड़ा सीमित हो जाता है और इसका लाभ सबको नहीं मिल पाता है। न्यायपालिका को यह विचार करना होगा किस तरह शीघ्र, उचित और कम खर्च में न्याय मिल सके। अभी तक इस दिशा में किए गए प्रयास सीमित रहे हैं और गंभीर पहल की आवश्यकता है।        सुशासन और विकास में आम आदमी की भागीदारी बहुत थोड़ी रहती थी। प्रजा का हित या अहित शासक की पसन्द-नापसन्द पर निर्भर करता था। प्रजा को प्रजा की दृष्टि से समझ पाना या न समझ पाना राजा की समझदारी और सहानुभूति का मोहताज रहता था। इसके विकल्प के रूप में जनतंत्र की व्यवस्था का बनना और उसका प्रयास मनुष्य के सामाजिक जीवन की महती उपलब्धि थी। जनतंत्र का दूसरा नाम 'लोकतंत्रÓ भी है जिसमें लोगों द्वारा, लोगों के लिए व्यवस्था बनाई जाती है, लागू की जाती है और उसकी सीमा में कर्तव्यों का संचालन और निगरानी की जाती है। राजशाही से प्रजातंत्र तक यात्रा आसान न थी और आज भी विश्व के कई देश इस व्यवस्था से वंचित हैं। उन देशों की जनता अनेक प्रकार की यातनाएं सह रही हैं। 

       आज की तमाम समस्याओं और चुनौतियों को देख कर हम यह दावा नहीं कर सकते कि हमारी वर्तमान व्यवस्था सुशासन अर्थात अच्छे शासन की कसौटियों पर खरी उतरने वाली है। लोलुपता, ऊंची होती लालसाओं के कारण लोग नागरिकता के तकाजों को भूलते जा रहे हैं। वे अच्छे बुरे किसी भी तरीके से अपने लिए लाभों को सुरक्षित रखना अपनी पहली प्राथमिकता मानते हैं। जहां सशक्त और समर्थ लोग इस तरह की जीवन शैली को अपनाते जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर गरीब लोग उन मूलभूत अधिकारों से भी वंचित हैं जो उन्हें एक नागरिक और मनुष्य के रूप में स्वाभाविक रूप से सहजता से प्राप्त होनी चाहिए। इन अधिकारों की स्वीकृति और उपयोग सुशासन और विकास के सामने एक बड़ी चुनौती है।