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Thursday 19 Jul 2018

इतिहास और मिथक के जरिये वर्तमान को देखने वाले आत्मजयी कवि कुंवर नारायण

एक ऐसे दौर में जहाँ आधुनिक कविता भूमण्डलीकरण के द्वंद्व से ग्रस्त है और जहाँ बाजारू प्रभामण्डल एवं चमक-दमक के बीच आम व्यक्तिके वजूद की तलाश जारी है, वहाँ वाद के विवादों से इतर और लीक से हटकर चलने वाले कुंवर नारायण की कविताएं अपने मिथकों और मानकों के साथ आमजन को गरिमापूर्ण तरीके से लेकर चलती हैं। वर्ष 2009 में जब उन्हें वर्ष 2005 के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किये जाने की घोषणा की गई थी, तब  उन पर एक टिप्पणीनुमा लेख लिखा था, जिसे बाद में अपनी पुस्तक 16 आने 16 लोग में भी मैंने शामिल किया। विकिपीडिया पर उनके ऊपर लिखे गए लेख में भी इस लेख को संदर्भित किया गया है। कई बार सोचता था कि एक दिन उनके साथ आमने-सामने बैठकर बात करूँगा, कुछ नया सिखने को मिलेगा, पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। 

नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर कवि कुंवर नारायण को अपनी रचनाशीलता में इतिहास और मिथक के जरिए वर्तमान को देखने के लिए जाना जाता था। यही कारण था कि वे एक साथ ही अपनी कविताओं में वेदों, पुराणों व अन्य धर्मग्रंथों से उद्धरण देते थे तो समकालीन पाश्चात्य चिंतन, लेखन परम्पराओं, इतिहास, सिनेमा, रंगमंच, विमर्शों, विविध रूचियों एवं विशद अध्ययन को लेकर अंतत: उनका लेखन संवेदनशील लेखन में बदल जाता है। आरम्भ में विज्ञान व तत्पश्चात साहित्य का विद्यार्थी होने के कारण वे चीजों को गहराई में उतरकर देखने के कायल थे।

 कवि कुंवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के प्रमुख कवियों में रहे हैं। आज जब कविता के लिए यह रोना रोया जाता है कि कविता पढऩे और समझने वाले कम हो रहे हैं और पत्र-पत्रिकाओं में इसका इस्तेमाल फिलर के रूप में हो रहा है, वहां कवि कुंवर नारायण दूरदर्शिता के साथ हिन्दी कविता को नये संदर्भों में जीते नजर आते थे-कविता एक उड़ान है चिडिय़ा के बहाने, कविता की उड़ान भला चिडिय़ा क्या जाने। उनकी यह सारगर्भित टिप्पणी गौर करने लायक है- जीवन के इस बहुत बड़े कार्निवाल में कवि उस बहुरूपिए की तरह है, जो हजारों रूपों में लोगों के सामने आता है, जिसका हर मनोरंजक रूप किसी न किसी सतह पर जीवन की एक अनुभूत व्याख्या है और जिसके हर रूप के पीछे उसका अपना गंभीर और असली व्यक्तित्व होता है, जो इस सारी विविधता के बुनियादी खेल को समझता है।

कवि कुंवर नारायण ने कविता को सफलतापूर्वक प्रबंधात्मक रूप देने के साथ ही मिथकों के नये प्रयोगों का अतिक्रमण करते हुए उन्हें ठेठ भौतिक भूमि पर भी स्थापित किया। उन्होंने अपने प्रबंध काव्य आत्मजयी में मृत्यु संबंधी शाश्वत समस्या को कठोपनिषद का माध्यम बनाकर अद्भुत व्याख्या के साथ हमारे सामने रखा। तभी तो अपनी सहज बौद्धिकता के साथ वे आमजन के कवि भी बने रहे। उनके कविता संग्रह में चक्रव्यूह, परिवेश हम तुम, आत्मजयी, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों, वाजश्रवा के बहाने, हाशिये का गवाह प्रमुख हैं। उनके पास भाषा और अंतर्कथ्य का जितना सुघड़ समन्वय था, वह हिन्दी कविता में दुर्लभ है। तुकों और छंद पर उनके जैसा अधिकार नए कवियों के लिए सीख है। नई कविता आन्दोलन के इस सशक्त हस्ताक्षर के लिए कभी विष्णु खरे जी ने कहा था कि- कुंवर नारायण भारतीय इतिहास में एक विशिष्ट नागरिक के रूप में नहीं, बल्कि एक आम आदमी के रूप में प्रवेश करते हैं।

नई कविता से शुरूआत कर आधुनिक कवियों में शीर्ष स्थान बनाने वाले कुंवर नारायण का जन्म 19 सितम्बर 1927 को फैजाबाद में हुआ। उन्होंने इण्टर तक की पढ़ाई विज्ञान विषय से की और फिर लखनऊ विविद्यालय से 1951 में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। पहले माँ और फिर बहन की असामयिक मौत ने उनकी अन्तरात्मा को झकझोर कर रख दिया, पर टूट कर भी जुड़ जाना उन्होंने सीख लिया था। पैतृक रूप में उनका कार का व्यवसाय था, पर इसके साथ उन्होंने साहित्य की दुनिया में भी प्रवेश करना मुनासिब समझा। इसके पीछे वे कारण गिनाते  कि साहित्य का धंधा न करना पड़े इसलिए समानान्तर रूप से अपना पैतृक धंधा भी चलाना उचित समझा। जब वे अंग्रेजी से एम.ए. कर रहे थे तो उन्होंने कुछेक अंग्रेजी कविताएं भी लिखीं, पर उनकी मूल पहचान हिन्दी कविताओं से ही बनी। एम.ए. करने के ठीक पांच वर्ष बाद वर्ष 1956 में 29 वर्ष की आयु में उनका प्रथम काव्य संग्रह चक्रव्यूह नाम से प्रकाशित हुआ। अल्प समय में ही अपनी प्रयोगधर्मिता के चलते उन्होंने पहचान स्थापित कर ली और नतीजन अज्ञेय जी ने वर्ष 1959 में उनकी कविताओं को केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और विजयदेव नारायण साही के साथ तीसरा सप्तक में शामिल किया। यहाँ से उन्हें काफी प्रसिद्धि मिली। 1965 में आत्मजयी जैसे प्रबंध काव्य के प्रकाशन के साथ ही कुंवर नारायण ने असीम संभावनाओं वाले कवि के रूप में पहचान बना ली। फिर तो आकारों के आसपास (कहानी संग्रह-1971), परिवेश, हम-तुम, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों, आज और आज से पहले (समीक्षा), मेरे साक्षात्कार, आत्मजयी और हाल ही में प्रकाशित वाजश्रवा के बहाने सहित उनकी तमाम कृतियाँ आईं।

कुंवर नारायण का रचना संसार इतना व्यापक एवं जटिल है कि उस पर कोई एक लेबल लगाना सम्भव नहीं। यद्यपि कुंवर नारायण की मूल विधा कविता रही है पर इसके अलावा उन्होंने कहानी, लेख व समीक्षाओं के साथ-साथ सिनेमा, रंगमंच एवं अन्य कलाओं पर भी बखूबी लेखनी चलायी है। इसके चलते जहां उनके लेखन में सहज सम्प्रेषणीयता आई वहीं वे प्रयोगधर्मी भी बने रहे। उनकी कविताएं सहजता और विचार परिपक्वता के सम्मिलन से शुरू होती हैं। उनकी कविताओं-कहानियों का कई भारतीय-विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है। तनाव पत्रिका के लिए उन्होंने कवाफी तथा ब्रोर्खेस की कविताओं का भी अनुवाद किया है। वे एक ऐसे लेखक थे  जो अपनी तरह से सोचता और लिखता है। बताते हैं कि सत्यजित रे जब लखनऊ में शतरंज के खिलाड़ी की शूटिंग कर रहे थे तो वे कुंवर नारायण से अक्सर इस पर चर्चा किया करते थे।

कुंवर नारायण न सिर्फ आम जन के कवि थे बल्कि उतने ही सहज भी थे। आत्मजयी में कुंवरनारायण जी ने अगर मृत्यु जैसे विषय का निर्वचन किया तो वहीं इसके ठीक विपरीत वाजश्रवा के बहाने कृति में अपनी विधायक संवेदना के साथ जीवन के आलोक को रेखांकित भी किया है। यह कृति आज के इस बर्बर समय में भटकती हुई मानसिकता को न केवल राहत देती है, बल्कि यह प्रेरणा भी देती है कि दो पीढिय़ों के बीच समन्वय बनाए रखने का समझदार ढंग क्या हो सकता है। वाजश्रवा के बहाने में उनकी कुछेक पंक्तियाँ इसी सहजता को दर्शाती हैं-

कुछ इस तरह भी पढ़ी जा सकती है

एक जीवन दृष्टि

कि उनमें विनम्र अभिलाषाएँ हों

बर्बर महत्वाकांक्षाएँ नहीं

वाणी में कवित्व हो

कर्कश तर्क-वितर्क का घमासान नहीं

कल्पना में इन्द्रधनुषों के रंग हों

ईष्र्या द्वेष के बदरंग हादसे नहीं

निकट संबंधों के माध्यम से बोलता हो पास-पड़ोस

और एक सुभाषित, एक श्लोक की तरह

सुगठित और अकाट्य हो

जीवन विवेक..........।''

   साहित्य अकादमी पुरस्कार, व्यास सम्मान, कुमार आशान पुरस्कार, प्रेमचंद पुरस्कार, कबीर सम्मान, हिन्दी अकादमी का शलाका सम्मान, मेडल ऑफ वॉरसा यूनिवर्सिटी, पोलैंड और रोम के अंतरराष्ट्रीय प्रीमियो फेरेनिया सम्मान, पद्मभूषण सम्मान (2009), वर्ष 2009 में वर्ष 2005 के 41वें ज्ञानपीठ पुरस्कार, 20 दिसंबर 2010 को साहित्य अकादमी द्वारा महत्तर सदस्यता जैसे तमाम सम्मानों से विभूषित कुंवर नारायण इन पर इतराते नहीं बल्कि इसे एक जिम्मेदारी और ऋण की तरह देखते थे। जब उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया तो समालोचकों ने यही कहा कि यह सिर्फ इसलिए नहीं महत्वपूर्ण है कि यह एक ऐसी शख्सियत को मिला है जो वाद और विवाद से परे है बल्कि कविता के बहाने यह पूरे साहित्य का सम्मान है। हिन्दी को तो यह अवसर लगभग 8-9 वर्षों बाद मिला और कविता को तो शायद और भी बाद में मिला। इन तमाम पुरस्कारों-सम्मानों के बाद भी कुंवर नारायण अपने को चुका हुआ नहीं मानते थे, बल्कि नए सिरे से अपने लेखन को देखना चाहते थे और उसकी पुनर्समीक्षा भी चाहते थे ताकि जो कुछ छूटा है, उसकी भरपाई की जा सके।