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Tuesday 16 Jan 2018

सरकार चल रही है

बंटी, बबली और भोला मेले में गये। मेले में उन्होंने तरह-तरह के खिलौने खरीदे। एक ने खरीदा घोड़ा, एक ने हाथी और एक ने नेता की मूर्ति ली। उनकी योजना थी कि नेताजी को आसन पर बिठा देंगे और घोड़े-हाथी सेवा में हाजिऱ। बबली आठवीं में थी। उसने नागरिक शास्त्र पढ़ा था बोली-- नेताजी आसन पर तभी बैठ सकते हैं जब मंत्री बन जायें।

      समस्या का समाधान हो गया नेताजी के सर पर एक गांधी टोपी डाल दी गई जो घर के एक कोने में कब से धूल खा रही थी। बंटी मंत्रीजी के आसन पर बिठाने की तैयारी कर रहा था। आसन कितना बड़ा हो? कितना ऊंचा हो ? मंत्री आखिर राजा लगे तो कैसे ? मंत्री यदि आम आदमी की तरह लगने लगेगा तब तो उसका भारी अपमान होगा। बच्चों के सामने विकट प्रश्न था। उन्होंने रहीम चाचा को पकड़ा। चाचा के सामने सवाल रख दिये- अरे बदमाशो, मंत्री लाये तो ठीक, जनता कहां है? जनता होगी तभी तो मंत्री उनपर राज करेगा। उनकी चिंता में घुलेगा। पहले जनता की मूर्ति लाओ।

     बच्चे परेशान। पूरे मेले में जनता की तो कोई मूर्ति कहीं दिखी ही नहीं। उन्होंने रहीम चाचा से ही पूछ लिया-  चाचा ! जनता की भी मूर्ति बनती है?

         चाचा माथा खुजाने लगे। उन्होंने कभी नहीं सुना था कि जनता की मूर्ति बनती है। वह तो केवल सरकार को टैक्स और वोट देने के लिए रहती है। देश पर शहीद होने के लिए जनता की जरूरत होती है। मूर्ति भला किस बात के लिए बनेगी? मूर्ति तो तब बनती है जब कोई चमत्कार करे। आम आदमी क्या चमत्कार करेगा? रोजी-रोटी में उलझा रहता है और मर जाता है, कभी समय आने पर कभी समय के पहले। उन्होंने बच्चों को सलाह दी- आम आदमी को ही जनता कहते हैं, बच्चो। एक काम करते हैं कुम्हार से कहकर आम आदमी की मूर्ति बनवाते हैं। एक मंत्री है तो कम से कम सौ आदमी चाहिए इसके मनोरंजन के लिए। कुम्हार से बात करते हैं, वह बना देगा। रहीम चाचा बच्चों को लेकर कुम्हार के पास गये। उसे समझाया-  चाचा, बच्चों की एक समस्या है। बेचारे मेले से मंत्री की मूर्ति लाये हैं। उसे स्थापित करना चाहते हैं लेकिन मंत्री को राज करने के लिए कम से कम सौ आम आदमी तो चाहिए। आम आदमी की मूर्ति मिल नहीं रही है तो आपके पास आये हैं।

मेरे पास तो लक्ष्मी,गणेश और हाथी की मूर्ति है। उसमें से तो कोई आम आदमी नहीं है। मुझे तो यह भी नहीं मालूम की आम आदमी कैसा होता है। दिखता कैसा है ? उसका कद कैसा होता है।

 रहीम चाचा ने समझाने की कोशिश की- आदमी ही समझो उसे। हमारी तरह ही दिखता है, कद-काठी तो हमारी ही होती है लेकिन कभी खास हो जाता है, तो कभी आम। चुनाव के दिनों में वह खास आदमी हो जाता है और फिर उसके बाद आम आदमी ही रहता है।  खैर छोड़ो, तुम सौ आदमी बना दो।

 कीमत ?ÓÓ कुम्हार ने व्यापारिक बुद्धि का परिचय दिया। रहीम चाचा हंसे- आम आदमी की क्या कीमत ? उसकी कीमत तो समय और सुविधा से बदलती रहती है। आप मूर्ति बना दीजिये। कीमत आप जो कहेंगे हम दे देंगे।

दूसरे दिन ही सौ आदमी बनकर तैयार।

          कमरे में टेबुल पर मंत्री जी को रखा गया और नीचे जनता खड़ी की गई। कुम्हार ने इतनी चालाकी की थी कि आधे लोगों के हाथ ताली पीटते दिखा दिये थे और आधे के खुले थे। मंत्री को जनता के खूब ऊपर रखा गया ताकि वह सचमुच का राजा दिखने लगे। तभी चाचा ने एक बात पकड़ी- बच्चो ! मंत्री की हिफाजत के लिए सैनिक चाहिए।

 क्यों ? वह तो इतना ऊपर है ! वहां तक तो कोई आम आदमी पहुंच ही नहीं सकता फिर क्यों डरता है ?

वह मंत्री है उसके पास डरने और डराने का अधिकार है। यदि उसके चारों तरफ बीस-पच्चीस बंदूकधारी न हो तो किस बात का मंत्री ?

    बच्चे अवाक। बंदूक और सैनिक कहां से आयेंगे? बबली ने पूछा-  सैनिक तो हम आम आदमियों में से बना देंगे लेकिन उनको वेतन कौन देगा ?

वेतन, बंदूक, वर्दी, सब जनता ही देगी और कौन देगा ?

हां, इसे लोकतंत्र कहते हैं जिसमें लोक का काम तंत्र की रक्षा करना है। रहीम चाचा ने बात साफ  की। बच्चे समझ गये और खुश हो गये। पांच आदमियों के हाथ में लकड़ी पकड़ा कर मंत्री जी के आगे खड़ा कर दिया गया।  टेबुल पर पीछे मंत्री जी, आगे सैनिक। बंटी चिंतित- आगे से गोली चली तो सैनिक बेचारे मारे जायेंगे ?ÓÓ

   रहीम चाचा हंसे- सैनिक मरने के लिए ही होते हैं। मरते ही उनको शहीद कहेंगे, फिर उनके शव पर फूल चढ़ाया जायेगा। उनकी विधवा को मुआवज़ा दिया जायेगा। फिर, उस सैनिक की जगह दूसरा सैनिक आ जायेगा।

यह तो ठीक है लेकिन विधवा होने के लिए तो अपने पास औरत है ही नहीं- बबली परेशान हो गई।

    बंटी ने ही तरकीब बताई-  तीन मूर्तियों को साड़ी में लपेट देते हैं।

 रहीम चाचा चाय पीने गये थे। बच्चों ने उनको आवाज दी। दौड़े आये। सारी तैयारी मुकम्मल थी। अब शासन शुरू होगा। बबली ही फिर बोली-  चाचा ! मंत्री किस पर शासन करेगा? ये किसान या मजदूर तो लग नहीं रहे।

        तुरंत दस मूर्तियों के कंधे पर गमछा रखा गया और उन्हें पहनाया गया धोती का टुकड़ा। दस मूर्तियों को फटी बनियान पहनाकर मजदूर की धज दी गई।

बबली बोली- अब ये किसान बन ही गये हैं तो इन्हें आत्महत्या भी करनी पड़ेगी। मजदूर को इसकी जरूरत नहीं है, वह धीरे-धीरे मरता है।

हां, किसान का मरना भी जरूरी है, नहीं ंतो मंत्री किसके नाम पर मुआवजा घोषित करेगा? किसान आत्महत्या करेगा तभी टी वी और अखबार वाले चिल्लायेंगे। मरेगा तभी तो लेखक और कवि उसपर लिखेंगे। नहीं तो स्कूल के निबंध तक ही किसान रह जायेगा।

 नहीं मेरा किसान मरेगा नहीं लड़ेगा। बंटी बोला। बच्चे चौंके, तो अब किसान भी लड़ेगा। चाचा ने सोचा यह तो देशद्रोह हो गया। यदि सचमुच का मंत्री होता तो बंटी को जेल जाना ही था। किसान का काम लडऩा नहीं है खेती करे और महाजनों का सूद चुकाये। देश चलाने का काम नेता का है बाकी लोग उसे तंग न करें।

        रहीम चाचा को अचानक याद आया, किसान की समस्या तो सुलझ गई लेकिन सरकार के जुमलों को जनता तक पहुंचाने का काम कौन करेगा ? जनता के बीच प्रचार कौन करेगा कि सरकार बहुत अच्छा काम कर रही है।  मीडिया की जरूरत तो है। बच्चे भी सोच में पड़ गये। चार चमकती हुई मूर्तियां उठाई गई और उसे टेबुल के एक कोने में डालकर उसके सामने लकड़ी की माईक लगा दी गई। बबली ने विरोध किया- मंत्री और पत्रकार एक ही टेबुल पर कैसे बैठ सकते हैं? मंत्री ऊंचाई पर बैठेगा।

 रहीम चाचा मुस्कराये- भाई, पत्रकारों को दस बार सरकार से डिक्टेशन लेने जाना पड़ सकता है। वह तो चाहते ही हैं कि सरकार की टेबुल पर बैठे रहें। टेबुल क्या उनकी प्लेट में ही रहें तो ज्यादा अच्छा है।

        लगभग सारी तैयारी हो चुकी थी। बंटी बेचारा खुश था कि उसका खेल हिट हो गया लेकिन मुहल्ले में इस खेल की चर्चा कैसे होगी? उसने रहीम चाचा से पूछा तो वह भी माथा ठोक कर रह गये। अभी तक इस बात का ख्याल उन्हें क्यों नहीं आया था कि सरकार के कामों को अमर करने के लिए कुछ बुद्धिजीवी भी चाहिए। मंत्री जी की जीवनी कौन लिखेगा? उन पर चालीसा भी लिखने का फैशन है। इन्हीं आम आदमियों में से कुछ तेज-तर्रार लेखक निकालने पड़ेंगे जो मंत्री का दरबार करें और उनकी स्तुति गायें।              

         बंटी खुश हो गया। उसने पढ़ा था कि लेखक जो होते हैं बड़े ही निष्पक्ष और साहसी होते हैं। उसकी मूर्ति लेखक बन जाये तो अच्छा ही है। चार मरियल-सी मूर्तियों को भी ले जाकर टेबुल पर रख गया। बबली ने फिर विरोध किया- लेखक मंत्री जी की टेबुल पर कैसे बैठ सकते हैं ? उनकी और मंत्री की क्या बराबरी? बराबरी के लिए ही तो अपनी कलम गिरवी रखकर सरकार की जयकार करते हैं। यदि उनको लाभ न मिले तो क्या पड़ी है किसी मंत्री का जयगान करने की। उसे पद और कद तो चाहिए न। चारों मूर्तियों को मंत्री जी के ऐन पीछे टेबुल के कोने पर लगा दो।

       बिल्कुल दरबार का सा दृश्य हो गया। नीचे जनता ऊपर बुद्धिजीवी, पत्रकार और सरकार। बंटी की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था। मुहल्ले के दो-तीन दोस्त भी आ गये। खेल का नाम रखा गया- सरकार चल रही है। एक लड़का जिसके पिताजी अफसर थे, बोला- मंत्री जी क्या खाक चलायेंगे सरकार, यदि अधिकारी न हो।

     हां, इस बात की ओर तो किसी का ध्यान अब तक नहीं गया था। सरकार की हर बात में Óजी सरÓ कहने वाले लोगों को चुनकर टेबुल के  चारों किनारों पर लगाया जाये। तभी बबली जो बहुत देर से चुप थी। उसका नागरिक शास्त्र फिर बोला- अधिकारी मंत्री के नीचे ही होंगे। एक टेबुल पर तो हो ही नहीं सकते।

   इस समस्या का भी समाधान निकाला गया। एक दूसरी टेबुल बराबर में बिछाकर उसपर जितने भी खुले हाथ के आदमी थे उनको रख दिया गया। बंटी बोला- नीचे तो केवल वही रह गये जिनके हाथ ताली की मुद्रा में हैं। खुले हाथ वाले सभी ऊपर चले गये।

     रहीम चाचा ने समझाया- जनता नीचे है। उसका काम ही है ताली बजाना। उसकी यही मुद्रा सबसे अधिक पसंद की जाती है। हमने अधिकारी ऊपर रख दिये हैं उनके हाथ खुले होने ही चाहिए। सरकार की नीतियों को जनता पर थोपने के लिए खुले हाथ का ही अधिकारी चाहिए। नहीं थोपेगा तो उसका तबादला होगा। उसे उठाकर फेंक देंगे। उसका काम ही है, सरकार के हर सही-गलत फैसले को सलाम करना और दोनों हाथों से उसका स्वागत करना। उसके हाथ खुले होने ही चाहिए ताकि वह जनता को समझा सके कि देश विकास कर रहा है।

 मूर्तियां सज गई थीं। बबली, बंटी, भोला और रहीम चाचा दूर खड़े होकर देखने लगे। दूर से सचमुच लग रहा था कि सरकार चल रही है।