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Wednesday 19 Sep 2018

खुली खिड़कियों पर बैठी गौरैया !

1)

फलटन में जबरेश्वर महादेव का बहुत पुराना मंदिर है...लगभग 500 साल पुराना ....मुझे प्रियंका ने जब बतलाया ...इतने पुराने बने मंदिर को देखने का मेरा मन कर आया। पिछले सोमवार हम दोनों उस मंदिर में गए ....प्रियंका मंदिर में चलने के लिए जब अपने घर से आयी, शिवलिंग पर चढ़ाने के लिए अपने बगीचे से तोड़ कर गुड़हल के फूल भी साथ ले आयी। कुछ फूल उसने मुझे भी दिए। फूलों को टोकरी में रख कर हम दोनों मंदिर के लिए उसकी स्कूटी पर निकल पड़े।

  टोकरी में हमने पानी से भरी एक बोतल भी रख ली थी। यहाँ शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए लोग अपने घर से पानी की बोतल ले जाते हैं। सभी मंदिरों में जल चढ़ाने की व्यवस्था नहीं है ..किसी मंदिर में जल से भरी बाल्टी नहीं होगी, किसी में जल चढ़ाने वाला लोटा और किसी शिवलिंग पर तो जल चढ़ाना भी मना है। एक बात यहाँ और मैंने देखी शिव के मंदिरों में, शिवलिंग होता है और उसके बाहर नंदी भी ...शिव परिवार नहीं होता।

  यहाँ के लोग शिव को बहुत प्यार से शम्भो कहते हैं, ज़ोर से ताली बजाते हुए ...शम्भो बोलते हुए मंदिरों में प्रवेश करते हैं... बहुत भक्ति-भाव और आस्था से उनकी पूजा करते हैं। खैर! मैं जबरेश्वर मंदिर की बात कर रही थी। स्थापत्य कला बेहद खूबसूरत है इस मंदिर की ....छोटी-छोटी मूर्तियों से सुसज्जित दीवारें बहुत आकर्षक हैं।

 सीढिय़ाँ चढ़ कर जब मैंने मंदिर के अंदर प्रवेश किया, वहाँ उस वक्त शिवलिंग के पास छोटी सी एक बच्ची को मैंने बैठे हुए देखा, वक्त रहा होगा दोपहर के बारह बजे से कुछ मिनट पहले का, शायद इस वजह से मंदिर में लोग दिखे नहीं। मंदिर में ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप चल रहा था टेप रिकॉर्डर पर।

 मैंने देखा उस छोटी सी बच्ची ने गुलाबी रंग का प्रिन्टेड फ्रॉक पहना हुआ था। उसके बाल छोटे कटे हुए थे। उम्र होगी लगभग चार साल। उसके हाथ में पानी से भरी एक बोतल थी। वह शिवलिंग के पास बड़े इत्मीनान से बैठी हुई थी। पूजा में एकदम ध्यानमग्न। उसकी इसी बात ने मेरा ध्यान उसकी ओर खींचा ...मैंने देखा ..जब ऊँ नम: शिवाय का जाप हो रहा था उस वक्त वह बोतल से शिवलिंग पर जल चढ़ाती थी, जब बीच में संगीत बजता, वह हाथ रोक लेती। फिर जाप होता ...जल चढ़ा देती। उसके हाथ सधे हुए थे, और ध्यान पूरा शिव की ओर था।

 उसे देखते हुए मैंने और प्रियंका ने भी शिवलिंग पर जल चढ़ा दिया। इसके बाद हमने टोकरी से गुड़हल के फूल निकाले। हम दोनों शिवलिंग पर उन्हें चढ़ाने ही जा रहे थे कि हमारे आगे बढ़े हुए हाथ उस बच्ची ने मराठी भाषा में यह कहते हुए रोक दिये  - इथे जासवंती चा पुष्प नक्को ठेवा ....बोलते हुए उसकी बोली में मुलायमियत नहीं थी, उसके स्वर में आदेश था।

 प्रियंका ने उसकी कही हुई बात मुझे हिन्दी में बतलायी - बच्ची कह रही है,गुड़हल का फूल यहाँ नहीं चढ़ाना है। सुन कर मुझे हैरत हुई। हमारे पास सिर्फ गुड़हल का ही फूल था चढ़ाने के लिए, और हम शिवलिंग के इतने पास खड़े हुए चाह कर भी गुड़हल नहीं चढ़ा सकते थे। छोटी सी वह बच्ची मुझे रोक -टोक लगाने वाली दादी अम्मा लग रही थी। उसे देखते हुए मैंने प्रियंका से कहा- इससे पूछो जऱा - हम गुड़हल यहाँ क्यों नहीं चढ़ा सकते? पूछने पर लड़की ने कहा- यह शिव का फूल नहीं है, यह गणपति का फूल है, मंदिर में गणपति की भी मूर्ति है, वहाँ जाकर चढ़ाओ।

 उसके आदेशात्मक लहज़े पर मैं हैरान थी और उसे देख कर ऐसा भी लगा कि हमारी बातों से उसकी पूजा में व्यवधान पड़ रहा है। मैंने उससे उसका नाम जानना चाहा। उसने बतलाया नहीं और शिवलिंग पर चढ़े फूल पत्ती चावल एक तरफ समेटने में लगी रही। बच्ची के हठ के आगे हमारी एक नहीं चली। बहुत मन से शिव के लिए लाए हुए गुड़हल के फूलों की टोकरी आखिरकार हमने उठायी और फिर गणपति को समर्पित कर दी। तभी हमें मंदिर के अंदर साफ-सफाई करती हुई एक महिला वहाँ दिखी। मैंने उस महिला से छोटी बच्ची की ओर इशारा करते हुए पूछा - क्या वह आपकी बच्ची है? उसने उसे देखते हुए मुस्कुरा कर कहा - हाँ !.कहने को तो बेटी है, वैसे सास है मेरी।

        5 नवम्बर 2016

2)

फलटन में नागेश्वर मंदिर है लगभग 400 साल पुराना। शिव के मंदिर यहाँ और भी हैं। एक जबरेश्वर मंदिर भी है लगभग इतना ही पुराना, पर नंदा के कदम नागेश्वर की ओर ही बढ़ते हैं। शिव की पूजा बहुत प्रेम से करती हैं नंदा। शम्भू से उनका पुराना नाता  है ...नंदा की उम्र होगी लगभग साठ, लेकिन शम्भू उनके लिए जैसे छोटा बच्चा हो। पुकारती तो वह उसे लॉर्ड शिवा हैं पर प्यार उन्हें बेबी शिवा की तरह करती हैं।

 आज उन्हें नागेश्वर मंदिर जाना था। जल, बेलपत्र, फूल सूर्योदय से पहले अर्पित करना था, जैसा कि बीती शाम उन्होंने मुझे बताया। आज शनिवार प्रदोष का दिन है, इसे बैकुंठ चतुर्दशी कहते हैं। 365 दिनों में एक दिन ऐसा आता है जब सूर्योदय से पहले शिवलिंग पर जल चढ़ाना होता है, नंदा ने बतलाया ।

 वह मुझे अपने साथ लेकर जाना चाहती थीं, मैं सहर्ष तैयार हो गई । हर दिन वह मेरा ख्याल रखती हैं ...महाराष्ट्री पद्धति से बने व्यंजन खिलाती हैं। गर्मागर्म रोटी जिसे यहाँ चपाती कहते हैं, अपने खेत के उगे गेहूँ, घर की चक्की के पिसे आटे की मुलायम रोटी; वह मेरे हाथ में मुलायमियत से थमा देती हैं। उनका प्यार मुझे फलटन से जोड़े रखता है ...वह पूरी कोशिश करती हैं कि मुझे दिल्ली-इलाहाबाद की याद न आए। ऐसी नंदा भाभी के लिए मंदिर तक जाने का साथ तो देना ही पड़ेगा। मनाही का सवाल कहाँ उठता है।

 सुबह-सवेरे मंदिर पहुँच कर पहले तो नंदा ने मंदिर के किवाड़ खटखटाए, पुजारी ने दरवाजा खोला और नंदा बढ़ चलीं शिवलिंग की ओर। शिवलिंग की ओर देख कर मुझसे कहा कि यह स्वयंभू हैं और इत्मीनान से जाकर बैठ गईं मंदिर के फर्श पर स्वयंभू के पास। भोर का समय था मंदिर के अंदर अभी ट्यूब लाइट जल रही थी। उजले प्रकाश में मैंने देखा मंदिर की भीतरी दीवारों का रंग गुलाबी था यही रंग नंदा की साड़ी का भी था पूरी तरह से वे एक-दूसरे के रंग में रंगे हों जैसे।

 सबसे पहले उन्होंने शिवलिंग पर से बीती रात के चढ़े फूलों को एकत्रित कर एक तरफ़ रखा। स्वयंभू के स्नान के लिए जैसे तैयारी करने लगी हों। साथ लाए पूजा की सामग्री में से उन्होंने छोटा सा पाइपनुमा कुछ निकाला, एक हाथ से जल भरे कलश को थाम कर उसका जल पाइप में डालती गईं, पाइप के नीचे एक छेद था जिसमें से जल निकल कर शिवलिंग पर चढ़ता रहा। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया -यह हिरण का सींग है। मैंने कहा- इससे जल क्यों डाल रही हैं? नंदा कहती हैं- शम्भू को पसंद है।

 ढेर बेलपत्र लेकर वह शिवलिंग पर चढ़ाती रहीं। बेलपत्र शायद एक किलो से भी ज्यादा थे उनके पास, लगा कि नंदा ने घर में बेलपत्र का पेड़ रहने कैसे दिया होगा, बस चलता तो पूरा पेड़ ही ले आतीं अपने साथ और स्वयंभू को बिठा देतीं उसकी छाँव में। एक माँ ही दे सकती है बच्चे को ऐसे आँचल की छाँव। प्रेम होता ही ऐसा है कि क्या न दे दिया जाए ।

 ऊँ नम: शिवाय का जाप वह करती रहीं, बेलपत्र बारी-बारी चढ़ाती रहीं। मैं मंदिर की सीढिय़ों पर इत्मीनान से बैठी उनका प्यार देखती रही। छोटी डिब्बी में से उन्होंने भस्म निकाली और स्वयंभू के माथे पर उससे टीका लगा दिया फिर सजाने लगीं उस पर नीले फूल। मुझसे कहा - शम्भू को नीले फूल पसंद है, हल्दी-कुमकुम भी लगाया जैसे उसे हर रंग में देखना चाहती हों। चावल का भोग लगाया, कहा कि शम्भू को चावल पसंद है। जैसे माँ को बच्चे की हर पसंद का ख्याल रहता है।  दिया- बाती जब की, उस वक्त लगता रहा कि जैसे अपने लिए नहीं , स्वयंभू की लंबी उम्र की प्रार्थना कर रही हों। ताली बजाते हुए आरती करते हुए लगा ... लोरी सुना रही हों, ताली बजा कर बच्चे को रिझा रही हों। बीच में मेरी तरफ देख कर वह बोलीं- मेरा जीव-प्राण बसता है इनमें। जग जाहिर सी बात है एक माँ के प्राण बच्चे में ही बसते हैं। आरती के बाद अधलेटी मुद्रा में होकर उन्होंने स्वयंभू के माथे को छुआ, उस स्पर्श की भाषा को कहाँ लिखा जा सकता है। प्रेम को कभी लिपिबद्ध नहीं किया जा सकता।

 मंदिर की सीढिय़ों पर बैठी मैं नंदा और स्वयंभू को देखती रही। प्रार्थना में जुड़े नंदा के हाथ किसी पुजारिन के हाथ नहीं लग रहे थे, वे हाथ थे एक माँ के, वहाँ स्पर्श था ममता का। वह अटूट प्यार कर रही थीं अपने स्वयंभू को। मंदिर मुझे नदी में तब्दील होता सा लगा। लगा... यहाँ प्रेम की नदी बह रही है और डूब रही है नंदा और मैं किनारे पर बैठी नंदा को उस नदी में डूबते देख रही हूँ। हाथ बढ़ा कर उसे नदी से बाहर लाने का प्रयास नहीं कर रही। किनारे पर बैठी मैं सोचती रही ....नदी में डूबना हर बार डूबने जैसा नहीं होता है और हर डूबना ....डूबना भी नहीं होता।

       - 12  नवम्बर 2016

3)

फलटन में तितली को फूल पाखरु कहा जाता है। मुझे भी अच्छा लगता है उसका नाम... फूल पाखरु। लगता है किसी बच्चे को प्यार से आवाज़ दी जा रही हो। तितलियाँ होती भी हैं बच्चों जैसी कोमल, निश्छल -अलमस्त। फरीदाबाद में आठवें माले में जब मैं रहा करती थी तो उतनी ऊँचाई पर तितलियाँ नहीं आ पाती थीं मुझसे मिलने, पर यहाँ फलटन में गेट से सीधे अंदर चली आती हैं, पँख फैलाए घर के आँगन में। आँगन में लगे नारियल के पेड़ के तने के पास आकर मंडराती रहती हैं और पेड़ से बतिया कर, मुझे शक्ल दिखा कर फिर उड़ जाती हैं; गली में बाहर।

 घर के गेट से बाहर जो गली है, उसकी सड़क के किनारे कुछ पेड़-पौधे लगे हुए हैं। उनमें कहीं-कहीं फूल भी दिखते हैं। वहाँ उस बिखरी हुई हरियाली पर रंग-बिरंगी तितलियाँ उड़ती रहती हैं। मैं रोज़ देखती हूँ उन्हें उड़ते हुए। मुझे यह दृश्य खुले एक्वेरियम के जल में, तैरती हुई रंग-बिरंगी मछलियों सा लगता है।

 रंग-बिरंगी तितलियों के रंग मुझे हैरत से भर देते हैं और उनके परों पर धारियाँ और गोले जैसे ज्यामिति के सुंदर-सधे हुए डिज़ाइन। ऐसी कलात्मक सज्जा मेरे लिए खोज का विषय बन जाती है कि यह कौन चित्रकार है जो अपने कौशल से, प्रेम से, कोमलता से इनके परों को हल्के हाथ से थाम कर ; इनमें रंग और तमाम शेड भर देता है। कहाँ से लाता है वह इतने सारे मैटेलिक और पेस्टल रंग। मैंने तो चुनिंदा रंग ही देखे हैं अपने पास कैमलिन के डिब्बे में। रंगों में रंग मिला कर कुछ नए रंग और शेड भी तैयार करके देखे हैं जब रंगा करती थी फूल-पत्तियाँ आर्ट की क्लास में पर इतने सारे नैसर्गिक रंग और शेड नि:संदेह किसी की कुशल कारीगरी का अनूठा नमूना है।

 आज सुबह उन पौधों पर मैंने जिस तितली को उड़ते हुए देखा उसका रंग काला था और परों के किनारों पर फ्लोरोसेंट लेमन कलर के गोले एक कतार में जड़े हुए थे। एक समान एक आकार में, न कोई गोला छोटा न बड़ा, न अपनी जगह से ऊपर न नीचे जैसे काले कपड़े पर लेमन कलर के पोल्का डॉट की करीने से लगी हुई लेस हो। मैं तितली को उस लिबास में फूल से पत्तियों पर पत्तियों से फूल पर उड़ते जाते देखती रही। उसकी उड़ान, उसके पंखों से मेरी नजऱ नहीं हटती थी।

उस तितली को उड़ते हुए देख कर, मुझे ख्याल आया कि अभी यहाँ फूल पौधों पर रोज़ की तरह और भी कई रंगों की तितलियाँ आएंगी पर वे इस काली तितली से एकदम जुदा होंगी। उनका रंग अलग होगा, उन रंगों पर डिज़ाइन अलग होगा पर वे तितलियाँ ठीक इस काली तितली जैसी नहीं होंगी। वह काली तितली लगातार पत्तियों और फूलों के बीच घूमती थी और छुप जाती थी जाकर पत्तियों के झुरमुट में।

 उसका इस तरह से घूमना मेरे लिए मंडराने से अधिक नहीं था। शायद मैं इतना ही जानती थी कि तितलियाँ कहीं दूर से उड़ कर आती हैं, रंग-बिरंगे फूलों से मिलने और उनके रंगों के संग घुल -मिल जाती हैं पर इस तितली को जब पत्तियों के झुरमुट से मैंने बाहर निकलते हुए देखा तो मैंने गौर किया कि उसका घूमना सिर्फ मंडराना नहीं था। उसकी उड़ान में एक तलाश थी; किसी की प्रतीक्षा थी और मेरे देखते-देखते काली तितली की वह तलाश ... इंतज़ार खत्म हो गया। मैंने देखा ठीक उसके जैसी ही एक और काली तितली जिसके परों पर ठीक वैसे ही लेमन फ्लोरोसेंट रंग के गोले थे, उड़ कर चली आयी थी इस तितली के पास और इसे देखते ही आकर ठहर गई।

 यह बात मेरे लिए आश्चर्य से कम नहीं थी कि तितलियाँ भी खोज लेती हैं अपना जोड़ा। दोनों तितलियाँ फिर हवा में साथ-साथ उडऩे लगीं। अब उनकी उड़ान में जश्न का आनंद था जैसे किसी तलाश का पूरा होना हो। मुँह माँगी मुराद का पूरा होना हो। वे दोनों खुशी से झूम रही थीं। पँख फैला कर नृत्य कर रही थीं ।

 युग्म तितलियों को इस तरह साथ-साथ उड़ते जाते देख कर, मैंने जाना कि तितलियाँ भी इंसान सी हैं। उनकी भी ख्वाहिशें हैं। घर-संसार है। उन्हें भी तलाश होती है सहचर की। ठीक इंसानों की तरह प्रेम की खोज में पहुँच जाती हैं अपनी मंजि़ल तक और आगे बढ़ कर हाथ थाम लेती हैं अपने साथी का; जीवन की डगर पर साथ चलने के लिए। बिना कुछ कहे, मौन की भाषा में तितलियाँ मुझे बता गईं, उड़ते जाते हुए कि जीवन रथ के दो पहिए होते हैं और इस रथ पर सवार चाहे इंसान हों, पशु-पक्षी हों या तितलियाँ सभी को हमसफऱ की, सभी को प्रेम की तलाश होती है क्योंकि प्रेम ही तो जीवन है। जीवन है तो प्रेम रहेगा। जीवन चक्र ऐसे ही चलता है प्यार के पंखों से...

       - 30 नवम्बर 2016

4)

आज सुबह मैंने गली से जिस औरत को गुजऱते हुए देखा उसकी दुबली-पतली काया, रंग सांवला, हरी फूलदार साड़ी पहने हुए, गले में काले मोतियों का मंगलसूत्र, माथे पर कुमकुम की बड़ी सी बिन्दी थी। उम्र होगी लगभग पचास। पीठ पर उसके बहुत बड़ा सा सफेद प्लास्टिक वाली पन्नी का ग_र था जिसे मजबूती से उसने गाँठ लगाई हुई थी और उस गाँठ को माथे और सिर से टिकाते हुए जैसे छोटे बच्चे स्कूल का भारी बस्ता पीठ पर टांग कर उसके स्ट्रैप को सर पर लिए झुके चलते हैं वैसे ही वह भी झुकी हुई चलती चली जा रही थी।

 मैं उस वक्त घर के गेट के पास खड़ी थी। उसे इस तरह चलते जाते देख कर मैंने उसे आवाज़ दे दी। हालांकि बात करने में यहाँ मुश्किल होती है। फल्टन में कोई हिन्दी नहीं बोलता और मुझे मराठी नहीं आती है पर बीच की टूटी-फूटी भाषा से काम चल ही जाता है। उसी काम चलाऊ भाषा में मैंने इशारों की मदद के साथ उससे पूछा - तुम ग_र में क्या लेकर जा रही हो। मेरे पूछते ही उसने ग_र सिर से पीछे की तरफ उतारते हुए ज़मीन पर रख दिया और उसकी गाँठ खोल दी।

  वहाँ कबाड़ था ...बिसलेरी की खाली बोतलें ...दफ्ती और गत्ता जो कि सड़कों और गलियों में घूम कर उसने इक_ा किया हुआ था। मैंने पूछा- इसका क्या करोगी? वह बोली- जाकर बेच दूंगी। मैंने कहा- कहाँ, क्या इन बोतलों में फिर से पानी भर कर बिकेग। उसने कहा- मैं नहीं जानती, मैं तो एक दुकान में जाकर दे दिया करती हूँ।

 मैंने पूछा - तुम क्या रोज़ आती हो या कभी-कभी? वह बोली- पेट के लिए रोज आना होता है। इसको बेच कर 50-60 रुपए मिल जाते हैं। उसने बताया उसकी दस लड़कियाँ और उनके बाद एक लड़का भी है। उसका आदमी गरम मसाले पैक करके बेचता है ...इस तरह से उनका घर चलता है।

  जब वह जाने लगी, मैंने कहा - सुनो! तुम्हारा नाम क्या है? वह बोली- सीता। मुझे नाम सुनने में महाराष्ट्रियन सा नहीं लगा। मैंने जानना चाहा कि क्या वह सीता के नाम से परिचित है। यह सोच कर मैंने उससे पूछा - क्या तुम सीता को जानती हो। उसने सिर हिलाते हुए कहा - हाँ ! मैं ही सीता हूँ। अब मेरे पास कोई और तरीका नहीं था सीता के बारे में पूछने के लिए तो मैंने पूछा - राम का नाम सुना है। राम को जानती हो? वह बोली - हाँ ! जानती हूँ। राम मेरा भाई है।

 बोलते हुए उसके चेहरे की चमक और आत्मविश्वास के आगे अब पूछने को कोई और सवाल नहीं रह गया था। बहुत से उत्तर दे दिए थे उसने मुझे। उन प्रश्नों के भी जो मैंने उससे पूछे नहीं थे। वह ग_र उठा कर चली गई और मैं गेट पर खड़ी सोचती रही कि क्यों ढूंढते हैं हम सीता और राम को उन्हीं के स्वरूप में। उनके बने हुए स्थान मंदिरों में और उसी रिश्ते की जोड़ी के रूप में। दुनिया में ऐसे भी तो होते हैं सीता - राम।

       -  19 दिसम्बर 2016

5)

समय रहा होगा कल सुबह नौ के आस-पास। एक गुडिय़ा लगभग दस साल की, गली की सड़क पर धीमी चाल से टहलती हुई दिखी। फालसाई रंग के सलवार-कुर्ते में, उसके कुर्ते के गले पर सफेद धागे से मशीनी कढ़ाई हो रखी थी चेन स्टिच की। उस बच्ची का रंग था... रंग के बारे में अब क्या कहूँ आपसे...उस बच्ची पर बच्ची का ही रंग था। कटे छोटे बाल, एक तरफ की माँग निकाल कर करीने से कढ़े उन बालों में, उसने एक जोड़ा फालसाई क्लिप का लगा रखा था, पैरों में थी हवाई चप्पल और चाल थी उसकी मस्त मगन।

 बच्ची के हाथ में एक फूल नरगिस का भी था जिसे वह डंडी से थाम कर चकरी की तरह गोल-गोल हिलाते हुए चलती चली जा रही थी। चलते जाते अपनी धुन में वह बच्ची उस फूल के साथ थी। कभी हवा में चकरी की तरह उस फूल को घुमाती, अगले पल उसे नाक के समीप ले जाती ....उस वक्त वह बच्ची सोख्ता वाला कागज़ लगती थी और फूल जैसे कि स्याही हो कोई।

 बच्ची फूल की सारी सुगंध अपने भीतर उतार लेना चाहती थी। इस कोशिश में उसने फूल को लगातार अपनी छोटी सी नाक के पास टिका रखा था। वैसे तो फूल छोटा था पर इतना भी नहीं था कि नाक के ज़रिए उसे वह अपने भीतर में उतार लेती। बच्ची की यह कोशिश बहुत भोली थी।

 मुझे उस वक्त किसी काम से बाहर जाना था। मैं घर के गेट से जब निकली तब तक वह गुडिय़ा चलते हुए मेरे सामने आ चुकी थी। अब भी वह उस फूल के साथ ही थी, सबसे बेखबर। मैंने उसे गुडिय़ा कह कर रोकना चाहा। बच्ची ने सुना और रुक गई, हैरत से मुझे देखने लगी। मैंने पूछा नाम क्या है तुम्हारा? वह बोली-  हर्षिता और इस फूल का नाम? उसे नहीं मालूम था । इस फूल का क्या करोगी तुम? मेरे पूछने पर उसने बताया-  देवा के लिए ले जा रही हूँ।

 बच्ची को उसकी माँ ने पूजा के लिए फूल लाने के लिए भेजा था। तभी वह अपनी पसंद का फूल चुन कर घर लौट रही थी, लौटते वक्त रास्ते में उसने नरगिस की सारी सुगंध अपने पास रख ली और देवा के लिए रख लिया नरगिस का रंग। वैसे तो उस फूल का रंग भी उसके हाथ में आ चुका था। देवा के लिए अब केवल फूल ही बचा था। यह देवा की खुशकिस्मती थी कि बच्ची की नाक बहुत छोटी थी। फूल इसी कारण बच गया था।

 हर्षिता से मैंने जानना चाहा कि क्या यही एक फूल देवा को चढ़ाओगी, तो उसने अपने दूसरे हाथ की मु_ी हाथ बढ़ा कर खोल दी, वहाँ दो छोटे-छोटे गुलाब थे। मु_ी में तुड़े-मुड़े, रूखे-सूखे, मुरझाये हुए फूल जिनकी लाल रंगत भी बासी हो चुकी थी। इतने पुराने थे फूल, सच कहूँ वे शक्ल से कहीं से भी गुलाब नहीं दिखते थे। फूल के नाम पर फूल ही नहीं। वैसे बच्ची के हाथ में कुल जमा तीन फूल थे। एक था सफेद नरगिस का फूल, जो अब गंधहीन था, दो लाल गुलाब थे जो थे रूखे -सूखे और मुरझाये हुए। हर्षिता उन्हें हाथ में लेकर इत्मीनान से घर की ओर लौट रही थी, अपनी उसी मस्त मगन चाल से, मैं उसे जाते हुए देखती रही।

  उसकी जाती हुई पीठ को देख कर सोचती रही कि लोग तरोताजा फूल चुन कर ईश्वर को अर्पित करते हैं। हल्के हाथों से फूलों को पूजा के लिए सहेज कर रखते हैं कि उसकी कोई पत्ती न कहीं टूट जाए। फूल की सुगंध भी पूरी बरकरार रखते हैं, और इस भोली-मासूम बच्ची ने इसके विपरीत फूल चुन रखे हैं। मैं सोचने लगी कि देवा को इस तरह के भी फूल चढऩे चाहिए, उन्हें भी तो मंदिर के अंदर बैठे हुए पता चले कि मंदिर के बाहर लगे सभी फूल ताजा नहीं होते हैं। सभी फूलों के चेहरे खिले हुए नहीं होते हैं और सभी फूल सुगंधित भी नहीं होते। फूल ऐसे भी होते हैं जैसे हर्षिता के हाथ में हैं। ऐसे फूल भी ईश्वर की झोली में जाकर गिरने चाहिए जिन पर देवा की दृष्टि नहीं जाती है, मंदिर की चौखट से बाहर निकल कर।

       - 20 दिसम्बर 2016

6)

वक्त वक्त की बात होती है ...गर्मी के दिनों में सुबह के आलता रंगे पाँव पड़ी पायल के घुँघरूओं की खनक बंद दरवाजे की झिर्री से भी घर के अंदर चली आती है तड़के चार बजे और आकर ठहर जाती है आँगन में तुलसी चौरा के पास, बीती रात की उसे बातें बताने ...जहाँ तुलसी बैठी मिलती है उसे उसके इंतज़ार में।

 वही सुबह सर्दी के दिनों में तब तक अपनी आँखें नहीं खोलती जब तक सूरज खुद नहीं चला आता है उसके सिरहाने, आकर अपने गुलाबी होठों से उसका जिद्दी माथा नहीं चूम लेता, सुबह अलसायी सी छ: बजे तक बिस्तर पर पड़ी रहती है मुँह ढाँपे।

ऐसी रूठी सुबह का चेहरा मुझे देखना अच्छा लगता है और उससे भी अच्छा लगता है सुबह चार-पाँच बजे के बीच छत पर खड़े होकर आसमान की सड़क पर टहलते चाँद को देखना।

 चाँद के साथ टहलने का मज़ा ही कुछ और होता है। एक बार आप चाँद का साथ तो माँग लीजिए फिर तो आप जिस सड़क जिस गली भी जाएँगे, हमकदम चाँद आपके साथ-साथ चलेगा।

 एक अकेला चाँद दुनिया में सबका साथ देता है। कितना बड़ा दिल है उसका। साथ देने के लिए किसी को भी इंकार नहीं करता, और हम सब उसके दिल को न देख कर उसका सिर्फ चेहरा ही देखते रहते हैं। हम सब क्या, आसमान के सभी तारे भी सारी रात उसे ही तो बैठे हुए तकते हैं।

 जो चाँद नजऱ न आए नील गगन में ....ऐसा लगता है जैसे किसी ने आसमान के पलंग पर रुपहले सितारों वाली कढ़ाई की चादर तो बिछा दी है पर रुपहले चाँद का गाव तकिया वहाँ रखना भूल गया है।

 कुछ दिनों से मुझे घर की ओर लौटते जाते सुबह के चाँद को देखना अच्छा लगता है। अच्छा लगता है उसके जाते हुए कदमों के निशान देखना। उन निशानों को गिनना, जबकि मुमकिन नहीं होता है तारों की तरह उन्हें उंगलियों पर गिनना।

 मैं छत पर खड़ी देखती रहती हूँ चाँद को दूर जाते हुए। मेरी नजऱ पीछा करती रहती हंै जाते हुए चाँद का। हालाँकि चाँद जानता है कि उसकी पीठ पर मेरी आँखें लगी हुई हैं पर मुड़ कर एक बार भी मुझे नहीं देखता ...मेरे मोह में पड़ जाने का उसे खतरा लगता है।

 आसमान की सड़क के किनारे लगे बोर्ड पर लिखी सख्त हिदायत चलते जाते वह पढऩा नहीं भूलता, सावधानी हटी दुर्घटना घटी। प्यार में नजऱें मिलने पर भी तो ऐसा ही होता है। यही सोच कर चाँद मुझसे निगाहें नहीं मिलाता। प्यार में मेरे घर की छत उसे डेंजर ज़ोन सी नजऱ आती है।

 हालांकि डॉक्टर ने मुझे भी हिदायत दे रखी है कि चार से पांच बजे के बीच छत पर नहीं जाना है सुबह के चाँद से मिलने। उसने बताया है मेरी नब्ज़ देख कर कि आठ भुजाओं वाले चाँद के ऑक्टोपस ने इन दिनों मुझे अपनी बाज़ुओं में जकड़ रखा है। मैं इस बात पर डॉक्टर से कहती हूँ कि बाँहें तो सूरज के पास होती हैं। चाँद तो निहत्था होता है, उसके पास तो सिर्फ पाँव होते हैं जो आता है आसमान की सड़क पर तलाशने अपना हमकदम और जाते हुए भी तो वह अकेले ही लौटता है।

 जो होते चाँद के हाथ तो क्या वह हाथ नहीं बढ़ा देता मेरी ओर, अपना हाथ आगे बढ़ा कर मुझे छत से नहीं खींच लेता। अपने गले से नहीं लगा लेता क्या। मेरी बात सुन कर डॉक्टर मेरे हाथों में एक कागज़ थमा देता है। जहाँ रोग का नाम नहीं लिखा होता, चंद गोलियाँ लिखी होती हैं। गोल-गोल, मुझे उन गोलियों में दवाई नहीं दिखती। नजऱ आता है सुबह का चाँद।

- 25 जनवरी 2017

7)

उमा मावशी लगभग साठ साल की हैं। रंग गहरी साँझ सा है उनका। माथे पर गोदना, काले बाल कसे जूड़े में रहते हैं हरदम, इकहरी काया तो नहीं पर सामर्थ्य से अधिक काम करने वाला तन-मन है उनका, चेहरा ऐसा कि आप उनसे बात करते रहें और बदले में पाते रहेंगे उनके चेहरे पर आते -जाते नौ रस।

 हिन्दी न के बराबर तो नहीं न से ज्यादा ही समझ लेती हैं। एफ़ एम पर गाने सुनना बहुत पसंद है। जितना पसंद उन्हें अमिताभ बच्चन है, कालिया, कुली, शराबी के गाने सुनने के लिए रेडियो पर हर शाम पुणे आकाशवाणी केंद्र लगा लेती हैं। थका-हारा शरीर गीत सुनते हुए नींद की गोद में लुढ़क जाता है।

 एकाकी हैं उमा मावशी। पति रहे नहीं, बच्चों की आस में पति ने तीन ब्याह भी किए। उमा तीसरे नंबर की ब्याहता रहीं उनके पति की दूसरी पत्नी उमा की बड़ी बहन थीं ..घर-परिवार पर ज़ोर डाल कर पति के लिए छोटी बहन उमा को अपने ससुराल ले आयीं उनकी बहन।  उमा छोटी थीं, मासूम और आर्थिक तौर पर इतनी मजबूर कि न चाहते हुए भी इस रिश्ते में उन्हें बाँध दिया गया, पति से सुख यही मिला कि नशा-लाटरी में पति ने सब कुछ गँवा दिया, यहाँ तक कि खुद को भी।

 पति के न रहने पर आजीविका के लिए उमा मावशी ने साफ-सफाई, बर्तन धोने का काम अपने हाथ में ले लिया। काम पर जब पहले दिन आयीं, मेरे अम्मा कहने पर बोल पड़ीं- मला मावशी सांगा (मुझे मौसी पुकारो)और मेरे लिए भी उमा मावशी हो गईं। हाल-फिलहाल ही उमा मावशी ने घर आना शुरू किया है। हिन्दी में ठीक से बात तो नहीं हो पाती उनसे, वह मराठी बोलती हैं टूटी-फूटी हिन्दी के साथ, मैं टूटी-फूटी मराठी बोलने की कोशिश कर लेती हूँ। बात फिर भी बन ही जाती है। बात तो बिना बोले भी बन जाती है, बातों का क्या।  वह काम पर आती हैं और मुझे रसोई में खड़ा जब देखती हैं, पास आकर अपनी एक उंगली मेरे गाल पर धर देती हैं। स्पर्श मौन से मुखर होता है। सब कह जाता है। उनकी एक उंगली का प्रेम भरा स्पर्श दिल की भीतरी तहों में उतरने लगता है। मेरे पास खड़े हुए वह बातों-बातों में छोटी-मोटी हिदायतें भी देती रहती हैं, खाँसी आने पर कहेंगी दूध में हल्दी -नमक डाल कर पियो खांसी जाएगी तुम्हारी, अपना वजऩ संभालो, गर्म पानी में शहद डाल कर पिया करो। चावल कम खाया करो, खाने में तेल कम डाला करो, पार्क में टहल आओ, घर के आँगन में ही टहल लो जाकर।

 मेरी तबियत ढीली देखती हैं तो रसोई में मसालेदानी से नमक निकाल कर नजऱ उतारने बैठ जाती हैं। कभी अपने घर से आते हुए रास्ते से एक नींबू खरीदती लाती हैं मेरे लिए। मेरे पूछने पर इसका क्या करोगी मावशी? कहती हैं दृष्टि उतारूँगी। मैं बोल पड़ती हूँ - मावशी ताप ही तो है उतर जाएगा, नींबू और किसी काम आ जाएगा।

 मावशी पूरी नीम हकीम हैं। सभी टोटके आते हैं उनको। अक्षर ज्ञान नहीं है तो क्या, सब समझती हैं। उनके जाने पर जब तक मैं उठूँगी नहीं घर का दरवाज़ा बंद करने के लिए, वह मेरे कमरे में आकर खड़ी कहती रहेंगी - उठो ! दरवाजा बंद करो ...लैपटाक मेज पर पड़ा है ...घर बंद कर लो। लैपटाक सुन कर मैं हँस पड़ती हूँ। मावशी लैपटॉप बोलो, वैसे यह बताओ - मावशी! लैपटाक होता क्या है? वह सोच-विचार में पड़ जाती हैं जैसे गणित का कठिन सवाल मिल गया हो हल करने के लिए ...बुद्धि-चातुर्य का इस्तेमाल करते हुए बोलीं  - लैपटाक से यह पता चलता है कौन कहाँ जाता है कौन कहाँ आता है। मैं समझ गई कि मावशी कहना चाह रही हैं इस डिब्बे में दुनिया की सारी जानकारी कैद रहती है।

 इतना सब कुछ जानने वाली मावशी मुझमें हैरत भर देती हैं। बहुत सी बातें आदमी ऐसे ही सीख जाता है आस-पास की दुनिया को देखते हुए। अनुभव बहुत कुछ सिखा जाते हैं। लेकिन ज्यादातर ऐसा होता है आदमी उन्हीं बातों पर चलता चला जाता है जीवन भर जो माहौल देख कर बड़ा हुआ है। जो सीख उसे बचपन से मिली है। वह कारगर है या नही, सोच नहीं पाता। उससे पहले ही उसकी सोच बना दी जाती है। पुरानी प्रचलित मान्यताएँ, अंधविश्वास ने सोच को इतना जकड़ रखा है कि किसी की सोच को बदल पाना दुनिया के कठिन कामों में से है। उमा मावशी की एक बात ने मुझे यह बात सोचने के लिए मजबूर कर दिया।

 मंगलवार को उमा मावशी का व्रत होता है। शाम का काम निबटा कर जब वह घर जाने लगीं तो बोल पड़ीं - अब मुझे घर जाते हुए भाजी खरीद कर जाना है, आटा मल कर आयी हूँ। घर जाकर उपवास का खाना बनाना है । सुन कर मैं बोल पड़ी- मावशी! इतना काम करती हो, सारा दिन काम में निकल जाता है, पेट भर खाने को मिलता नहीं तुम्हें, उपवास क्यों रख लेती हो, उम्र निकल गई है उपवास रखते हुए, सेहत भी देखो ....।

 उमा मावशी आँखों पर हाथ रख कर बोलीं- उपवास रखना पड़ता है इन डोलों (आँखें) के लिए। मैंने कहा- आँखों के लिए उपवास, वह कैसे? उमा मावशी बोलीं- नहीं रखूँगी तो दृष्टि चली जाएगी मेरी। मुझे अंधे नहीं होना, आँखों के साथ ही जीना और मरना है। मैंने कहा- उपवास का आँखों से कोई सम्बन्ध नहीं है कि तुम नहीं रखोगी और आँखें खो बैठोगी। ऐसा नहीं होगा। ऐसा नहीं होता है। मावशी बोलीं- नहीं! हमारे में ऐसे ही होता है। हमें उपवास रखना ही पड़ता है। हमारा देव गुस्सा हो जाएगा, हमारा देव बहुत कड़क है।

 कह कर मावशी तो घर चली गईं। मुझे सोच में डाल गईं कि कितना कठिन है सोच को बदल पाना। और मुझे याद आने लग गए राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, ज्योतिबा फुले, अम्बेडकर, मदर टेरेसा, गाँधी, विनोबा भावे, बाबा आम्टे, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ऐसे बहुत से नाम मेरे ज़ेहन में उतरते चले गए जिन्होंने अपना सारा जीवन सामाजिक सुधार में लगा दिया। भारतीय पुनर्जागरण में लगा दिया, सोच को बदलने में लगा दिया। देश की कितनी तस्वीर बदल दी है इनके सामाजिक कार्यों ने, पर बदलाव की तस्वीर अभी मुकम्मल नहीं हुई है। हम ऋणी रहेंगे उनके

- 30 जनवरी 2017