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Sunday 21 Oct 2018

और पुजापा रहीम को

गाड़ी धीमी हो कर रुक गयी थी। बगल के कंपार्टमेंट से किसी महिला के लगातार बोलने की आवाज़ से ही शायद मेरी नींद टूटी थी। उसकी आवाज़ में अजीब सी तल्खी थी। बोलते-बोलते कभी उसका स्वर रुआँसा हो जाता तो कभी कठोर। उसके सामने की सीट पर बैठा यात्री केवल हाँ, हूँ के प्रत्युत्तर में उसे सुनता जा रहा था। मैंने घड़ी देखी सुबह के दस बज रहे थे। मुंबई-फैजाबाद साकेत एक्सप्रेस के फैजाबाद पहुँचने का यही समय था। गाड़ी स्टेशन से कुछ ही दूर पुल के पास खड़ी थी। अब सोने का कोई मतलब नहीं था। मैं नीचे उतर आई और साइड वाली बर्थ पर बैठ गयी। पापा -मम्मी उतरने के लिए तैयार बैठे थे। अचानक याद आया कि आज गणेश चतुर्थी है। मुंबई का बेहद खास दिन! चारों ओर बाजे-गाजे के धूम धड़ाके के साथ छोटे-बड़े सार्वजानिक पंडालों तथा गणेश भक्चों सहित अन्य कई मुंबईकरों के घरों में गणपति प्रतिमा का आगमन हो चुका होगा। जय देव, जय देव, जय मंगल मूर्ति के सामूहिक स्वर घोष के साथ स्वादिष्ट मोदकों का भोग लग चुका होगा। पंडालों में जगह-जगह दर्शनार्थियों का ताँता लग रहा होगा। हर साल कॉलेजों में केवल एक ही दिन की छुट्टी मिलती थी लेकिन इस बार गणेशोत्सव की पूरे साथ दिनों की छुट्टी मिली थी। मैं इस लंबी छुट्टी और ट्रेनों में न के बराबर की भीड़ का पूरा फायदा उठा लेना चाहती थी। इसलिए छुट्टी का पता चलते ही पापा-मम्मी के साथ मुंबई से अयोध्या, अयोध्या से नैमिषारण्य और फिर नैमिषारण्य से मथुरा-वृन्दावन की यात्रा का पूरा नियोजन कर चुकी थी। मैं खुश थी कि हर बार माँ के कहने पर उन्हें अयोध्या-वृन्दावन ले जाया करती हूँ पर इस बार तो पापा को भी साथ लेकर भगवान श्री राम और श्री कृष्ण की जनभूमि के दर्शन का एक साथ लाभ उठा सकूँगी।  मैं मन ही मन माता-पिता को साथ ले कर तीर्थ यात्रा कराने की श्रवण कुमार वाली फीलिंग से भी काफी खुश थी।

     मै मम्मी से कुछ हलकी-फुलकी बातें करने लगी। सहसा मेरा ध्यान उस महिला की ओर खींचा चला गया। वह रोते हुए उस सामने वाले यात्री से अपनी व्यथा सुना रही थी। उसका दस वर्ष का बेटा उसकी गोद में सिर रख कर चुपचाप लेटा मेरी ओर देख रहा था। थोड़ी देर पहले उसकी कर्कश सी आवाज से मुझे चिढ़ सी हो रही थी। परंतु अब उन दोनों को देखने के बाद मैं अपने आप को उनकी ओर देखने से रोक नहीं पायी। वह दुपट्टे के आँचल से अपने आँसू पोंछते हुए कह रही थी, मैं और मेरा बेटा कल से भूखे हैं। रात को सोचा किसी से खाना माँग लूँ लेकिन हिम्मत नहीं हुई। यहाँ जो दो आदमी बैठे थे वे मेरे बेटे को अपनी ओर देखता देख मुँह फेर कर उस ओर खाना छिपा कर खाने लगे। उसकी बातों से मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। क्या थर्ड एसी में भी कोई ऐसा व्यक्ति सफर कर सकता है जिसके पास खाने तक को रोटी भी न हो? इस कोच में  मुंबई से फैजाबाद के एक बर्थ का किराया सोलह -सत्रह सौ रुपयों के आस-पास था और उसके साथ तो उसका बेटा भी! फिर भला उसने थर्ड एसी का टिकट कैसे लिया होगा? यदि इतने पैसे थे तो खाने भर को क्यों नहीं? और यदि खाने तक के लिए भी नहीं, तो फिर वो यहाँ कैसे? कल टीटीई आया भी तो था, यदि इसके पास टिकट न होता तो अवश्य ही इसे यहाँ से किसी दूसरे डिब्बे में भेज देता! वे दोनों देखने में बेहद गरीब लग रहे थे। उनकी स्थिति, उसकी बातें तथा एसी का टिकट इन बातों का आपस में कोई मेल नहीं था। मेरे मन में कई सवाल एक साथ घूम रहे थे।

      वह मेरी ओर देख कर बोली, रात में मन हुआ कि दीदी से ही दो पराठे माँग लूँ। पर सोच कर ही रह गयी। मेरा बेटा भूखा ही सो गया। उसकी बातें मेरे मन पर गहरा आघात कर गयी। जिस पर मैंने कल से अभी तक कोई ध्यान ही नहीं दिया था वो माँ कल रात से ही मुझसे आस लगाये बैठी थी!! उसका छोटा सा बेटा भूखा सो गया? कल रात जब मैं टिफिन खोल कर मम्मी-पापा को पराठा, सब्जी, अचार परोस रही थी तब वो खाना पाने की लालसा से मेरी ओर देख रहा था!!! इस कल्पना से ही मेरा ह्रदय छलनी हो गया। ओह! मुझे इसका आभास क्यों नहीं हुआ? और होता भी तो कैसे? क्या इस डिब्बे में कोई ऐसा भी होगा? मैं कभी सोच भी तो नहीं सकती थी। मन में भारी पछतावा और कई सवाल लिए मैं उसकी ओर देखने लगी और ध्यान से उसकी बातें सुनने लगी।

     वह बता रही थी कि वह पिछले दस सालों से हर पंद्रह दिन में लगातार फैजाबाद से मुंबई आ जा रही है। जब से उसका यह बेटा पैदा हुआ है लगभग तभी से। तीन लड़कियों के बाद हुआ था वह। जब से पैदा हुआ बीमार ही रहता था। उसने फैजाबाद के कई डॉक्टरों को दिखाया पर कोई दवा काम न आई। बच्चे की स्थिति बद से बद्तर होती चली गयी। किसी डॉक्टर की सलाह पर गाँव के मुखिया से कर्ज माँग कर वह उसे दिल्ली ले गयी। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में कई चक्कर लगाये पर बच्चे की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। उसकी गरीबी को देखते हुए वहीँ के एक डॉक्टर ने उसे मुंबई के सरकारी अस्पताल में जाने की सलाह दी। जहाँ उसके बेटे का मुफ्त इलाज हो सकता था। महिला कहती जा रही थी कि फैजाबाद से दिल्ली तक कोई ऐसा व्यक्ति अथवा डॉक्टर न हुआ जिसके आगे वह रोई न हो। उसका बेटा बहुत छोटा था जब उसके पति की मृत्यु हो गयी। फैजाबाद के किसी गाँव में उसका कच्चा सा मकान है। तीन छोटी बेटियाँ और यह एकलौता बीमार बेटा। जिसके बीमारी की कोई थाह न पा कर गाँव की यह गरीब, असहाय मुसलमान महिला घर की दहलीज पार कर फैजाबाद से बाहर दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में अपने बेटे को जिलाए रखने की आस में हर पंद्रह दिन में अस्पतालों के चक्कर काट रही थी।

     दिल्ली के डॉक्टर ने उसे बताया तो कुछ नहीं लेकिन एक पर्ची लिख कर पकड़ाने के साथ उसे मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में जल्द से जल्द पहुँचने की सलाह दी। पर्ची में लिखी बातों से पूर्णत: अनभिज्ञ गाँव की वह अनपढ़ स्त्री बच्चे को लेकर घर लौट आयी। उसकी पंद्रह व तेरह वर्ष की दोनों बेटियाँ आस-पड़ोस के घरों में काम कर जैसे-तैसे रोटी का जुगाड़ कर लेती थीं। बेटियों को पड़ोसिनों के भरोसे छोड़ तथा टिकट के पैसों का इंतजाम कर वह बेटे के साथ मुंबई पहुँची। उसे मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में आने के बाद यह ज्ञात हुआ कि उसके बेटे को ब्लड कैंसर की बीमारी है जिसके लिए उसे हर पंद्रह दिन में रक्त बदलवाने के लिए मुंबई आना जरुरी है। वह बताती जा रही थी कि वहाँ इलाज मुफ्त है। लेकिन हर पंद्रह दिन में मुंबई से फैजाबाद की यात्रा का भार उठा पाना उसके लिए कहीं से भी सरल न था। उसके गाँव में कई पढ़े-लिखे लोग हैं। जो उसकी लाचारी से वाकिफ थे। गाँव की ग्रामपंचायत भी है जिससे उसे कई उम्मीदें थीं परंतु किसी ने उसे सहानुभूति के सिवा कुछ न दिया। कहते-कहते उसका आक्रोश फूट पड़ा, सब बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। ऊँचे-ऊँचे लोगों तक अपनी पहुँच का बखान करते हैं। सौ प्रकार के सलाह देते हैं पर, मदद कोई नहीं करता। भला हो मुंबई के अस्पताल के उस डॉक्टर का जिसने एक माँ की परिस्थिति तथा उसके दर्द को समझा। कानूनी मदद से सरकारी कोष से कुछ रुपये दिलाये तथा आवश्यक कागदी कार्यवाही से रेलवे से हर पंद्रह दिन की यात्रा का पास बनवाने में मदद की।

   वह यह नहीं जानती थी कि डॉक्टर तथा अस्पताल द्वारा दिए उस कागज में क्या लिखा है? पर उसे इतना ज्ञान अवश्य था कि उसके बेटे के इलाज के लिए, उसके जीवन की उम्मीद के लिए, उस अनिश्चित काल की नियमित यात्रा के लिए यह कागज बेहद जरुरी है। उसको दिखा देने मात्र से ही उसे यात्रा का टिकट मिल जाता था तथा टीटीई कभी उसे इस डिब्बे से बाहर नहीं करता। वह लाचार माँ जो अपने आस-पास के गाँव के लोगों को जहाँ एक ओर जी भर कर कोस रही थी वहीं मुंबई के उस अस्पताल के डॉक्टर को पनियाई आँखों से लाखों दुआएँ देती जिसकी बदौलत उसे बेरोकटोक इलाज चलते रहने तक साकेत एक्सप्रेस के थर्ड एसी कोच में दो सीटों का आरक्षण मिला था।

    सालों से परिचित अस्पताल के कर्मचारी उस दुखियारी माँ को भी रोगियों के लिए आने वाले मुफ्त भोजन में से दोनों समय का भोजन दिलवा दिया करते थे। उनमें से कुछ उसके हिम्मत व हौसले की दाद देते नहीं थकते, तो कुछ चाय-बिस्किट के नाम ही पर सौ-पचास रूपये दे दिया करते थे। उसकी दु:ख भरी दास्तान सुन कर कई बार लोकमान्य तिलक टर्मिनस से अस्पताल तक ले जाने वाले टैक्सी वाले टैक्सी का किराया तक छोड़ दिया करते थे। जिसने दस वर्षों से गरीबी, बीमारी और लाचारी का यथार्थ भोगा था उस मुस्लिम माहिला से यह जान कर मुझे बेहद गर्व महसूस हो रहा था कि भारत में और कहीं हो न हो पर मेरे शहर के लोगों में आज भी मानवता जिंदा है। भारत का यह महानगर जाति, धर्म से परे मानव धर्म को ही सर्वश्रेष्ठ मानता है इसलिए हर जाति, हर भाषा, हर धर्म के लोगों को अपनी गोद में समेटे हुए है। इसी कारण लोग मुंबई को मिनी इंडिया की संज्ञा दिया करते हैं। पिछले दस वर्षों का उसका अनुभव कह रहा था कि मुंबई केवल चकाचौंध और व्यस्तता का ही शहर नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं को समझने तथा निराशा में भी आशा दे कर संघर्ष के साथ जीवन जीने की कला सिखाने वाला शहर है।  

     जहाँ अपने शहर की इस मानवता पर मैं गदगद थी। वहीं मन में ये टीस भी रह -रह कर उभर रही थी कि मैं उसके बच्चे को रात में खाना न दे सकी। मैं मन में कोई पछतावा ले कर आगे बढऩा नहीं चाहती थी। हम एक सप्ताह की यात्रा पर चले थे। अत: मेरे पास खाने-पीने की कई चीजें थी। मैंने झटपट कई तरह के नमकीन, चिप्स और बिस्किट के पैकेट्स उस नन्हे से रहीम को पकड़ा दिए और उसकी माँ को अगली यात्रा के सहयोग के लिए पाँच सौ रूपये का नोट। अब तक माँ की गोद में चुपचाप पड़ा रहीम खाने की कई चीजें पा कर खुश हो गया था और उसकी माँ हाथ जोड़ आभार की मुद्रा में खड़ी हो गयी। स्टेशन आ चुका था। हम सामान ले कर नीचे उतर आये। अवधबिहारी की भूमि पर कदम रखते ही मुझे यह आभास हुआ कि राम की सच्ची सेवा यही है कि उनके कोष का पुजापा उस नन्हे से रहीम को मिले जिसे इस समय उसकी बेहद आवश्यकता है।