Monthly Magzine
Sunday 21 Oct 2018

मृगदाव

‘चैती’ आज अलसुबह ही जाग उठी थी। उसके लिये तो अलार्म घड़ी चिडिय़ों की चहचहाहट, कबूतरों की गुटरगूं ही हुआ करती थी। चैत मास में जन्म लेने के कारण ही शायद उसके अभिभावकों ने उसका नाम चैती रखा होगा। हिरनी जैसी आंखे, हिरनी जैसी त्वचा, धूप में तपकर भूरी, हिरणी जैसे ही ध्वनि के प्रति चौकन्नापन। इतना ही नहीं हिरणी जैसे अपने ही गुणों के कस्तूरी से अनभिज्ञ थी चैती...। गप्पा (बांस की बड़ी टोकनी) उठाये मुंह में दातुन दबा वह चल पड़ी जंगलों की ओर..। कौन कहता है कि चैती ही मरी जाती है जंगल जाने के लिये। जंगल भी आकुल, व्याकुल होकर चैती की प्रतीक्षा करते थे...। जरा सी देर हुई नहीं कि सरगी के पत्तों की खुसुर पुसुर शुरु हो जाती थी। महुआ गदबद-गदबद, टप्प-टप्प कर अपना गुस्सा दिखाते थे। अब सागौन की बारी थी जो लहराते हुए हवाओं से संदेशा भेजे जा रहा था, कि चैती जल्दी आओ। मूक, नि:शब्द प्रकृति की बोली से चैती भली भांति परिचित थी। पूरा बचपन इन्हीं की पनाह लेकर बीता था। अब तो कैशोर्य भी धमकता आ पहुंचा था। चैती जैसे ही जंगल पहुंची। महुआ गदबद-गदबद गिरने लगा...। सरई के पत्ते मानो खुशी से ललछौवें हो गये। और क्या यह ललछौव्वापन अब चैती के गालों तक आ पहुंचा था। इसी बीच किसी के कदमों की आहट आई। चैती ने चौकन्ना होकर उस ओर देखा। पेड़ के पीछे से घात लगा कर देखने लगी। कोई घातक जंगली पशु तो नहीं है।

अपनी कमर में खोंचे कडरी (चाकू) को इसने कस कर पकड़ लिया। चैती के मुंह से निकला आया गो... (ओ माँ) एक नन्हा सा शावक हिरण का शायद अपने दल से बिछड़ कर या अपनी माँ से छिटक कर इस ओर आ पहुंचा था। चैती की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पर शावक की नन्ही कंचे सी आंखें, कान का एंटिने के जैसे खड़ा हो जाना और छोटी सी पूंछ का खड़ा हो जाना। उफ... त्वचा कितनी नरम बिल्कुल टेसु के फूल जैसी...। चैती ने उसे पकड़ कर गोद में जकड़ लिया।

गर्भस्थ शिशु जैसे ही मां की कोख से निकल कर कपड़ों की पोटली के बीच अपने आपको पाकर सुरक्षित महसूस करता था। वैसे ही हिरण ने भी अपने सिर चैती की गोद में रख दिया। चैती बिल्कुल उस नौसिखिये मां की तरह उसे कस कर पुचकारे जा रही थी।

दिन चढ़ आया था। अब चैती को चिंता होने लगी। घर देर से पहुंचेगी तो घर वाले के प्रश्नों का जवाब वह कैसे देगी? और शावक को घर ले जायेगी। तो पूरा गांव उस शावक के गोश्त का उत्सव मनायेगा। चैती ने बेल के तने से रस्सी बनायी शावक के गले के बांध, उसे एक सुरक्षित जगह पर झाडिय़ों के ढेर के बीच छुपा दिया। चारों ओर कटीली बाड़ फैला दी। कुछ घास रख दी। चैती ने अब विदा ली। आमी काली आसबू (मैं कल आऊंगी)। यह क्या बिन ब्याही माँ की पीड़ा सदृश्य चैती की आंखे अपने शिशु हिरनके लिये भीगने लगी थी।

गोरस (दूध) भी उसकी काया में होता तो वह उसका पान भी करा देती उस शावक को।

घर पहुंचते ही आया (अम्मा) पूछा कहां जाऊन रलीस लेकी (कहाँ गई थी लड़की)। टालमटोल कर चैती ने बात संभाली....। पूरा दिन उथल-पुथल से भरा रहा चैती के लिये....। कैसे रात बीते और कैसे वह शावक के पास पहुंचे....। सुबह हुई सिर पर टोकनी लिये दौड़ पड़ी जंगल की ओर चैती...। जैसे ही पहुंची जंगल। शावक की पनीली कंचे जैसे आंखों को देख उसका मन कैसा कैसा तो हो आया। रात भर के विछोह ने उस किशोरी माँ को बेचैन कर दिया था। चैती ने उसे पुचकारा और गोद में लेकर जंगलों के भीतर चल पड़ी। उसने शावक को गोद से उतारा और कौड़ी गूंथा धागा उसके गले में बांध दिया।

अरे यह क्या शायद उसकी माता ने रात दिन एक किया होगा। वह भी आ पहुंची थी। और यह क्या पूरा दल आ पहुंचा था। चैती जान गई थी अब विदा की घड़ी आ पहुंची है। शावक को उसका दल, उसकी मां मिल चुकी है। उसे अब जाना ही होगा...। आज चैती का मन अच्छा नहीं था...। बार-बार हिरण के शावक का चेहरा उसके सामने आ जाता था। सुबह हुई यह जान कर कि वहाँ जंगल में कोई नहीं होगा। फिर भी उसके कदम अनायास ही जंगल की ओर उठ चले। सच है ना मानव मन का अवचेतन और उसके दिमाग का द्वंद कभी खत्म ही नहीं होता। अनायास ही बेकार बिना उद्देश्य के अपनी पुराने यादों के कदमों के निशान पर हम पुन: पांव जमाते चलते है। चलते ही जाते हैं। कदमों के निशानों की जुगल बंदी सिर्फ वर्तमान के कदमों से होती है। नहीं इनके निशान तो हृदय के भीतर तक अंकित हो चलते हैं। और रिसता हृदय लहूलुहान अश्कों के मार्फत बहता रहता है।

सुबह जंगल जाकर वह उस स्थान पर जाने से खुद को नही रोक पाई। आज चैती ने शीशम, सरगी, सागौन, महुआ की भी बात नहीं सुनी। वहाँ पहुंच कर देखा तो कुछ दूर ही उसे हिरणों का मुंह मिला। कौड़ी बंधा शावक भी। वह उसकी ओर आने लगी। चैती हतप्रभ। मूक पशु भी क्या कभी वात्सल्य की बोली समझते हैं। पूरा झुंड बिना डरे चैती के आगे पीछे मंडराने लगा।

दिन बीतते गये चैती की निर्भीकता बढ़ती गई। और भीतर और भीतर वह जंगलों के बीच मृगदाव (हिरणों के जंगल) के बीच पहुंच चुकी थी। सैकड़ों हिरणों की संख्या...। मानव की लालायित नजरों से अछूता था यह मृगदाव। घर में चैती की हरकतें अब संदिग्धता के दायरे में आने लगी। ''लखमू'' से उसकी कभी नहीं पटी। निरीह पक्षियों को जब वह गुलेल से मारता तो चैती घायल हिरनी सी विरोध करती। जिंदा परिंदों को मारकर, उसके पंख से अपने साफे (पगड़ी) को सजाता था लखमू। सल्फी के सरुर में बहता, चैती के पास आया। कहाँ जाउन रलीस लेकी? (कहां गई थी लड़की) लखमू से चैती का ब्याह पक्का हो चुका था। तूके काय आय (तुझे क्या है) चोप्प... तुचो मोचो मंगनी होला (तेरा मेरा ब्याह तय हो चुका है।) अब ज्यादा चुं चुपड़ ना कर। चैती को उबकाई आने लगी जब उसने लखमू के कंधे पर बटेर (पक्षी) टंगा देखा।

भोली चैती को कहां मालूम था कि उसकी दुनिया में उसकी गतिविधियाँ अब संदिग्ध हो चली थी। लखमू लगातार उस पर नजर रखे हुए था। अब तो लखमू की गतिविधियाँ भी संदिग्ध हो चली थी। रोज रोज पान खाना। रोज सल्फी पीना। और तो और शहर के कमांडर जीप में चार लोगों के साथ घूमने फिरने भी लगा था। लखमू की फुसफुसाहट बढऩे लगी। शहर-शहरी लोग चैती व लखमू के बीच आ चुके थे। चैती ने लखमू से पूछा ये जीप वाले हमारे गांव में क्यों आये हैं? उनके पास फटफटी (मोटर सायकल), दुइफटका (रायफल) क्यों है? चुप तेरे को क्या करना है। इतना सुन कर वह शांत हो गई। अगले रविवार को दूसरे गांव की मड़ई में शामिल होने लखमू दूसरे गांव जायेगा। यह सोच चैती ने सुकून की सांस ली। अनमना सा रिश्ता, जहाँ आदिवासी समाज में कोई खास महत्व नही रखता था। वहां लखमू को अस्वीकार करने की कोई ठोस वजह भी चैती के पास नहीं थी।

अब वह चैन से जंगल जायेगी और मृगदाव (हिरणों के जंगल में) कौड़ी वाले शावक के साथ घंटों खेलेगी। पर यह क्या धड़धड़ाते जीप की आवाज सुनकर हिरणों की बीच खलबली मच गई। ताबड़ तोड़ फंदे फेंके जा रहे थे। गोलियां चल रही थी। चैती हतप्रभ, औचक, भौचक, हताश। उफ विधाता इतना बड़ा धोखा। चैती चीखने लगी चिल्लाने लगी, कौड़ी वाले शावक को हृदय से कस कर वह जड़ हो चुकी थी। लखमू जीप से चिल्ला रहा था। छाड़ून देस (छोड़ दे उसे) नहीं तो गोलियों से तू भी नहीं बच पायेगी। भयानक खदबदाहट, बौखलाहट, अफरा- तफरी। कौड़ी वाला शावक आगे आगे, चैती पीछे पीछे, उनके पीछे दुनाली ताने जीप सवार। कभी शावक आगे कभी चैती आगे। शिकारियों का दल आज कोई भी मौका नहीं गंवाना चाहता था। ताबड़तोड़ गोलियाँ चली...। हिरणों के झुंड से दो चार हिरण जमीन पर गिर चुके थे। कौड़ी वाला हिरण दौड़ रहा था। उसे अपने तन की आड़ में बचाने की कोशिश करती चैती। गोली चल चुकी थी। मृतपाय चैती का शरीर लहूलुहान होकर बस्तर की माटी को लाल कर गया। कौड़ी वाला हिरण हाँ, वह जाने कहाँ जंगलों में जा छिपा। लखमू चैती के मृत शरीर का हिला डुला रहा था। उस मृगदाव से दूर तने के पीछे से कौड़ी वाला हिरण अपलक चैती निहार रहा था। हाँ चैती के प्राण हिरण-छू.... हो चले थे।

कहते हैं आज भी चैती उस कौड़ी वाले हिरण के साथ मृगदाव (हिरण के जंगल) में विचरती है। कई बरसों बीत गये उस मृगदाव की घटना को। कहानियां दोहराती हैं शीशम, सागौन, सरगी के पत्ते और खदबद खदबद महुआ। हाँ कभी कौड़ी वाला हिरण मृगदाव में दिखे तो समझना चैती की 'मृगआत्माÓ वही मृगदाव ने आसपास ही होगी। चुपचाप... शाश्वत...