Monthly Magzine
Friday 27 Apr 2018

अफसोस

मेरी हमेशा से ख्वाहिश रही है कि अपने यार-दोस्तों के बारे में लिखूं। उनकी कही बातों को नोट करुं। इसलिए मेरी डायरी में मेरी कम और मेरे दोस्तों की ज्यादा बातें लिख होती हैं।

अब जो कहानी मैं लिखने जा रहा हूं वह भी मेरे एक दोस्त के बारे में ही है। कहानी में हम उसे उस्ताद जी कहेंगे।

सबसे पहले तो मैं उस्ताद जी के बारे में एक बात कहना चाहूंगा। उस्ताद जी मनुष्य के बोलने और वह भी समय पर बोलने का बहुत बड़े समर्थक है। इस बारे में उसका कहना है- आपको जो भी कहना है... जिससे भी कहना है, बिना अंजाम की परवाह किए... कह दीजिए। यह वक्त दोबारा लौट कर नहीं आएगा। यदि आप आज अपनी बात कहने से चूक गए और भविष्य में उसका पक्ष आपकी ओर हुआ तो... उस वक्त सिवाए अफसोस के कुछ नहीं बचेगा।

उस्ताद जी जिससे भी मिलता है उससे यह बात ज़रूर कहता है। उस्ताद जी के ऐसा कहने के पीछे भी कारण है... एक बहुत बड़ा कारण।

उस्ताद जी और मैं स्कूल में मिले थे। कॉलेज में भी हम साथ ही थे। स्कूल के दिनों में उस्ताद जी बड़े ढीठ किस्म का प्राणी हुआ करता था। वह क्लास में सबसे पीछे की सीट पर खामोश बैठा रहता था। उसका काम कभी पूरा नहीं होता था और टीचर्स हर वक्त उसे डांटते रहते थे। उसके बारे में उनकी राय थी कि वह कभी अपनी जिंंदगी में कुछ नहीं कर पाएगा।

पर स्कूल से निकलकर जब हम कॉलेज आए तो उस्ताद जी की तो जैसे काया ही पलट गई थी। वह पढऩे लगा था। वह उपन्यास, कहानियां पढ़ता। कविताएं लिखता। उन्हें मंच पर पढ़ता। उन्हीं दिनों उस्ताद जी को अभिनय का शौक चढ़ा। उसने कॉलेज का थियेटर ग्रुप जॉइन कर लिया। शुरु में उसने चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों के लिए नुक्कड़ नाटक किए। फिर वह कॉलेज की टीम के साथ शो के लिए जाने लगा।

टीम से जुडऩे के बाद शुरु-शुरु में उसे छोटे-मोटे रोल ही करने को मिले। कभी चाय वाले का तो कभी पंडित जी का। कभी भिखारी का तो कभी पागल का...। तो भी उसने उन छोटे किरदारों को इतने शानदार तरीके से निभाया कि देखने वालों को यकीन ही नहीं होता था कि यह उस्ताद जी है।

उस्ताद जी के चेहरे का हाव-भाव हो, बॉडी लैंग्वेज हो, आवाज़ का उतार-चढ़ाव हो या शब्दों का उच्चारण... उसकी एक्टिंग का हर पहलू अपने किरदार के साथ पूरा-पूरा न्याय करता। उसकी आँखों की खामोशी, गर्दन झुकाने से लेकर आँखें उठाने तक की हर अदा ऐसी कि बिना कुछ कहे सब कुछ कह जाए। किरदार में उसे देखकर लगता ही नहीं था कि उसके अलावा कोई और उस किरादर को निभा पाता। और अगर निभा भी देता तो उसके जैसा तो कभी नहीं कर पाता।

जब वह मंच पर आता तो मजाल है कि किसी और अभिनेता पर नजऱ जा सके। वह सब की मौजूदगी को शून्य कर देता और उस पूरे दृश्य पर खुद छा जाता। उपन्यास-कहानी पढऩे के कारण उसकी संवाद अदायगी भी इतनी जानदार होती थी कि लगता ही नहीं था कि वह कोई रटे हुए संवाद बोल रहा है। ऐसे लगता था जैसे कि वह संवाद खुद-ब-खुद वक्त और परिस्थिति के अनुसार उसके मुंह से निकल रहे हैं। उन्हें सुनकर लगता था कि हकीकत में भी कोई भी इंसान ऐसी परिस्थिति में ऐसी ही बात बोलेगा... ऐसे ही व्यवहार करेगा। इसी तरह चलेगा और इसी तरह खाएगा। एक बार को तो उसके अभिनय को देखकर लगता ही नहीं था कि यह कोई नाटक है... बल्कि लगता था कि जैसे सब हकीकत है। हमारी आंखों के सामने घटित हो रहा है।

अपने दमदार अभिनय और लाजवाब संवाद अदायगी के कारण उस्ताद जी जल्दी ही कॉलेज के साथ-साथ पूरी यूनिवर्सिटी में मशहूर हो गया था। उसे लंबे-लंबे रोल मिलने लगे। दर्शक उसे पहचानने लगे। वह जब मंच पर आता तो तालियों की गडग़ड़ाहट से पूरा हॉल गूंज उठता। नाटक खत्म होने के बाद लोग उसे घेर लेते। कोई उसकी तारीफ करता तो कोई उसे दाद देता। कोई हाथ मिलाता तो कोई गले लगता। कोई-कोई तो ऑटोग्राफ के लिए अपनी डायरी ही आगे बढ़ा देता।

दर्शकों के बीच बैठा मैं, जब उसे मंच पर अभिनय करते, संवाद बोलते देखता और फिर बाद में लोगों से उसे घिरे पाता तो मुझे यकीन ही नहीं होता था कि यह वही लड़का है जो स्कूल के दिनों में क्लास में सबसे पीछे की सीट पर खामोश बैठा रहता था। वह जो इतना ढीठ था कि उस पर किसी की, कैसी भी बात का कोई असर नहीं होता था, चाहे कोई कुछ भी कहता रहे। और जिसने कभी अपना होमवर्क पूरा नहीं किया। जो हमेशा टीचर की डांट खाता रहता था और जिसके बारे में टीचर्स की राय थी कि यह लड़का अपनी जि़ंदगी में कभी कुछ नहीं कर सकता।

उस वक्तमुझे अपने वे महान टीचर्स पूरी तरह गलत लगते। और उस्ताद जी इस बात को चरितार्थ करते हुए दिखाई देते कि, 'जो लोग कुछ नहीं करते, वह कमाल करते हैं...!Ó

उन दिनों उस्ताद जी अपने ग्रुप के बेस्ट एक्टर हुआ करता था। उसका ग्रुप हर हफ्ते किसी न किसी कॉलेज, किसी न किसी शहर शो के लिए जाता रहता था। लगातार शो होने के कारण वह छुट्टी के दिन भी कॉलेज में प्रैक्टिस किया करता था।

उन्हीं दिनों उस्ताद जी को एक लड़की से प्यार हो गया। वह लड़की तभी नई-नई ही ग्रुप में शामिल हुई थी। उसे एक दूसरे लड़की की जगह ग्रुप में लिया गया था जो अचानक ही ग्रुप छोड़कर चली गई थी। उस वक्तग्रुप आगामी नाटक की प्रैक्टिस कर रहा था। उसमें उस्ताद जी एक घरेलू नौकर का किरदार निभा रहा था और वह लड़की उसकी मालकिन का। उन्हें प्रैक्टिस करते हुए कई दिन बीत गए थे और इस दौरान वह अपने किरदार को अच्छी तरह समझ भी गए थे कि तभी वह ग्रुप छोड़कर चली गई। उसके यूं अचानक चले जाने से उस्ताद जी परेशान हो उठा। उसकी समझ नहीं आ रहा था कि अब उसकी मालकिन का किरदार कौन निभाएगा..? और अगर कोई दूसरा आ भी गया तो क्या वह इतने कम समय में अपने किरदार को समझ पाएगी..? उसी दौरान नाटक के निर्देशक आए और उन्होंने उस्ताद जी से कहा- उस्ताद जी, ये रही तुम्हारी नई मालिकन।

अपने आप में खोए बैठे उस्ताद जी ने जब नजऱ उठाकर देखा तो उनके सामने एक सांवली सी पतली लड़की थी। लंबे कद की। उसके बाल लंबे और घने थे। उसे देखकर उस्ताद जी के मन में जो पहला ख्याल आया, वह यह था कि यह मालकिन के किरदार में अच्छी लगेगी? मालिकन तो गोरी होती है... जबकि यह सांवली है। और सांवली लड़कियां मालकिन नहीं, नौकरानी होती हैं।

लेकिन सुघड़ नाक-नक्श वाली वह लड़की सांवले रंग में भी अच्छी दिखती थी। एक्टिंग भी ठीक-ठाक कर लेती थी। संवाद बोलने में भी उसे किसी तरह की कोई हिचक या झिझक नहीं हुई। दो ही दिन की प्रैक्टिस के बाद जब उस्ताद जी अपनी नई मालकिन के साथ मंच पर उतरे तो उन्हें देखकर लगा ही नहीं कि यह लोग महज दो दिन पहले ही मिले हैं। उनके किरदारों में इतना बेहतर तालमेल था कि ऐसा लगता था कि जैसे उन्होंने महीनों से उसकी प्रैक्टिस की होगी।

उसके साथ अपने उस पहले नाटक में ही उस्ताद जी उसकी ओर आकर्षित हो गया था। इसके बाद उन्होंने साथ में कई और नाटकों में छोटे-मोटे रोल किए। फिर साथ में रहने, प्रैक्टिस करने और शो के लिए साथ में आने-जाने के दौरान उस्ताद जी ने उसके साथ इतना वक्त बिताया कि उसे पता ही नहीं चला कि वह उसे कब पसंद करने लगा और कब चाहने लगा।

वह उससे मोहब्बत करने लगा था, पर उसकी समझ नहीं आ रहा था कि वह उसके सामने अपनी मोहब्बत का इज़हार कैसे करे? हालांकि ऐसा नहीं था कि लड़की उस्ताद जी से बात नहीं करती थी या उससे दूरी बनाकर रखती थी। उसे देखकर तो ऐसा लगता था कि ग्रुप में वह सबसे ज्यादा वक्त उस्ताद जी के साथ ही बिताती है। वह उसके साथ ही चाय पीती थी, लंच भी वह दोनों साथ ही करते थे। कॉलेज में भी क्लास के बाद पार्क और कैंटीन में भी वह दोनों साथ ही देखे जाते थें। पर वह उससे कह नहीं पा रहा था।

उस्ताद जी सोचता बहुत था। हर बात को कहने से पहले उस पर हफ्तों विचार-विमर्श किया करता। इसलिए वह उससे कह नहीं पा रहा था। कभी वह सोचता कि उसे अकेले में कहूंगा। पर जब वह उनके साथ अकेले में होती तो वह सोचता कि अकेले में इस तरह सामने ही कह देना अच्छा नहीं लगेगा। अगर वह बुरा मान गई या उसने कोई जवाब नहीं दिया... फिर! इसके बाद वह सोचता कि वह उसे खत लिखेगा। पर जब खत लिखने बैठता तो सोचता कि अगर उसने खत बिना पढ़े ही फाड़ कर फेंक दिया तो... या फिर खत किसी दूसरे के हाथ लग गया तो... तब क्या होगा? लोग क्या कहेंगे? बदनामी होगी। मेरी तो चलो कोई बात नहीं जो होगी सो होगी, पर उसका क्या? दोस्त मज़ाक बनाएंगे। नहीं, नहीं... खत लिखना भी सही नहीं है।

कई बार उसने सोचा कि वह उसकी किताब के पिछले पन्ने पर लिख दे। और उसने लिख भी दिया था पर फिर काट दिया। उसे लगा कि अगर उसके भाई या किसी और न उसकी उस किताब को देख लिया और लिखा पढ़ लिया तो फिर मुसीबत होगी...?

उस्ताद जी सोचता रहा। मौके की तलाश करता रहा कि वह कैसे उससे बिना इन सब के और बिना झिझक और हिचक के उसके सामने अपने दिल की बात कहे दे। पर मौका था कि मिलने का नाम ही नहीं ले रहा था। कई बार शो खत्म होने के बाद, उसे मेट्रो स्टेशन तक छोडऩे के दौरान उसने सोचा कि वह उसे कह दे। यह अच्छा मौका है। पर जब वह उसे कहने वाला होता और वह सुनने के लिए अपनी चमकदार आंखों से उस्ताद जी के चेहरे को देखती तो उस्ताद जी हिचक जाता... रुक जाता...। दिल की बात कहने के बजाय कोई दूसरी बात कह देता। पर उससे अपने प्यार का इज़हार न कर पाता। 

उसे लगता कि अगर उसने उससे कह दिया तो फिर क्या होगा? उसकी प्रतिक्रिया कैसी होगी? अगर उसने मुंह बना लिया या वह नाराज़ हो गई तो यह जो दोस्ती के नाम पर मिलना-जुलना है वह भी खत्म हो जाएगा। जो अब थोड़ी-बहुत बातचीत होती है यह भी बंद हो जाएगी। पर हो सकता है कि मान जाए? तो मज़ा आ जाएगा। लेकिन अगर नहीं मानी और उसे मेरी बात बुरी लगी और वह चीख पड़ी... यहीं हजारों लोगों से भरे इस परिसर में तो... खामखाह तमाशा बन जाएगा। नहीं... नहीं, मैं उससे यहां नहीं कहूंगा। फिर कभी कहूंगा... कहीं और।

उस्ताद जी सोचता रहा और वक्त निकलता रहा। कॉलेज का आखिरी साल खत्म होने लगा। फेयरवेल पार्टी की तैयारी जोर-शोर से चल पड़ी। उस्ताद जी ने भी अपना पक्का मन बना लिया कि वह पार्टी में उसे ज़रूर अपने दिल की बात कह कर रहेगा। चाहे कुछ भी हो जाए... अगर वह नाराज़ भी होगी, हालांकि नाराज होना तो बाद की बात है तो भी वह उसे कहकर रहेगा।

पार्टी के लिए उस्ताद जी ने विशेष तौर पर कपड़े सिलवाए थे। नया सूट। वह भी सफेद हल्की गुलाबी और सफेद रंग की साड़ी पहनकर आई थी। उसी तरह का नेकलेस और झुमके। उसका लिबास उसके रंग पर खिल रहा था। उस्ताद जी ने जब उसे देखा तो वह देखता ही रहा गया था। उसे वह इतनी अच्छी लगी कि अगर वहां लोग न होते तो वह उसे अपनी बांहों में भर लेता। पूरा ग्रुप एक जगह ही खड़ा था। फिर जब बाकी लोग इधर-उधर हुए तो उस्ताद जी उससे अपनी बात कहने के लिए आगे बढ़ गया। वह उसके करीब जाकर खड़ा हो गया और उससे कहने वाले शब्दों को मन ही मन दोहराने लगा। फिर उसने कहने के लिए मुंह खोला पर तभी उस लड़की ने अपनी सांवली और लंबी अंगुलियों से उसका मुड़ा हुआ कॉलर ठीक करते हुए कहा- हमारा कॉलेज खत्म हो रहा है... पर इसका यह मतलब नहीं कि हमारा साथ यहीं तक है। हम अच्छे दोस्त हैं... कॉलेज के बाद भी हम मिलते रहेंगे।

उस्ताद जी ने उसकी पूरी बात को सुना। पर ध्यान दिया इस पर कि 'हम अच्छे दोस्त हंैÓ। उस्ताद जी ने सोचा, वह मुझे अपना अच्छा दोस्त मानती है। अगर मैं उससे यह सब कहूंगा और उसके मन में मेरे लिए ऐसा कुछ न हुआ तो फिर क्या होगा? वह इंकार करेगी... और एक छोटा सा इंकार इस दोस्ती को तो क्या रखेगा बरकरार, वह तो इस पार्टी का भी सत्यनाश करा देगा। फिर मैं सारी उम्र पछताता रहूंगा कि मैंने अपनी बेवकूफी और स्वार्थपन के चक्कर में आकर एक अच्छा दोस्त खो दिया। मैं उसे खोना नहीं चाहता। मैं उससे प्यार करता हूं... इसमें कोई शक़ नहीं। पर उसका इज़हार करके मैं उसे खोना नहीं चाहूंगा। प्रेमिका न सही वह कम से कम मेरी दोस्त तो है। और यह सब सोचकर उसने उसके प्रति अपने प्रेम को अपने सीने में ही रहने दिया।

इस बात को पांच साल बीत गए। इन पांच सालों में बहुत कुछ बदल गया। उस्ताद जी ने भी एक अखबार में नौकरी कर ली। पर नौकरी के दौरान भी वह थियेटर से भी जुड़ा रहा। समय-समय पर वह अपने ग्रुप के साथ अलग-अलग शहरों में शो करने के लिए जाता रहता।

उनका वह शो मुंबई में था। शो काफी शानदार हुआ था। शो के बाद लोग कलाकारों से मिल रहे थे। उन्हीं लोगों में उस्ताद जी ने उसे देखा... अपने पहले प्यार को... वह भी पूरे पांच साल बाद।

लड़की उस्ताद जी को देखते ही मुस्कुराने लगी। पुराना दोस्त होने के नाते उसने उस्ताद जी का हाथ पकड़ा और उसे कैंटीन में ले गई। वहां उसने दो चाय का ऑर्डर दिया और फिर बातें करने लगी। बातों ही बातों लड़की ने उस्ताद जी से पूछा- शादी हो गई?

नहीं।

क्यों?

उस्ताद जी ने उसके सवाल के जवाब में सवाल करते हुए पूछा, तुम्हारी हो गई?

हां, एक बेटी भी है।

अरे वाह! मुबारक हो।

थैंक्यू...। वैसे तुम बताओ तुमने अभी तक शादी क्यों नहीं की?, लड़की ने पूछा।

मैंने शादी क्यों नहीं की?, उस्ताद जी ने दोनों होठों को आपस में रगड़कर लंबी सांस लेते हुए कहा, अब मैं तुम्हें क्या बताऊं कि मैंने शादी क्यों नहीं की? मैंने शादी नहीं कि..., इसलिए कि मैंने जिसे चाहा वह नहीं मिला... और जब वह नहीं मिला तो फिर किसी और से शादी करने का क्या फायदा?

कौन नहीं मिला?

तुम...।

मैं...?, उसने हैरानी में निकली अपनी चीख दबाते हुए कहा।

हां तुम।, उस्ताद जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

मैं नहीं मिली? पर तुमने मुझसे कहा ही कब...? मैंने कॉलेज के पूरे तीन साल तुम्हारा इंतज़ार किया। तुम्हारे लिए ही थियेटर जॉइन किया। तुमसे दोस्ती की। सोचती रही कि तुम मुझसे कुछ कहोगे। अपने प्यार का इज़हार करोगे। पर तुमने कभी कुछ नहीं कहा। और मेरे अंदर इतना साहस नहीं था कि मैं तुमसे खुद अपने....,

वह आगे भी बोलती रही थी। पर उस्ताद ने कुछ नहीं सुना। उसे सुनाई ही नहीं दे रहा था। उसे तो जैसे अटैक पड़ गया था। उसकी बात खत्म होने के बाद भी वह कुछ नहीं बोला। बोलता भी क्या? उसके पास कुछ बचा था... सिवाए अफसोस के।