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Wednesday 19 Dec 2018

साँझ की धूसरता

हॉस्पिटल की ड्रेस में इधर-उधर भागती नर्सें, हाथों में ऑपरेशन के औजार की ट्रे लेकर जाते वार्ड बॉय और मुंह बांधे डॉक्टर, जिनके पतली फ्रेम के चश्मे में झाँकतीं आँखें, बाहर बैठे गाँव के अब्दुल को समझ में नहीं आती कि उसकी पत्नी को आखिर हुआ क्या। बस भागती नर्सें दवाइयों की स्लिप पकड़ा देती हंै वो इतनी ही जल्दी से मेडिकल से दवाई लाकर पकड़ा देता है। रमजान के पाक महीने में रोजे के कारण थकावट और ऊपर से हॉस्पिटल की चौथी मंजिल। लिफ्ट है, मगर चलाना नहीं आता, पता नहीं कहीं अंदर फंस न जाये इस डर से सीढिय़ाँ चढ़ते-चढ़ते अब्दुल की सांसे फूल जाती। एक दवाई लाकर दे, तब तक वार्ड बॉय जाँच की दूसरी पर्ची पकड़ा देता। उसे समझ नहीं आता कैसी जाँच और कहाँ करवानी। एक तो अनपढ़ आदमी ऊपर से पैसों से हाथ तंग। दसियों जगह पूछता तब सही जगह तक पहुंच पाता। किसी से पूछता तो अंग्रेजी के राईट लेफ्ट में ऐसे समझाते कि उसके कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता। क्या शहर है यहाँ कोई भी घड़ी भर के लिए रुकने को तैयार नहीं। यह हॉस्पिटल में भी भागकर कहाँ जा रहे हंै, वो बीच बीच में सोचता और गाँव से तुलना कर बैठता।

    कभी-कभी मन को बहलाने नीचे चला जाता, चाय की केंटीन में। हॉस्पिटल की चाय केंटीन अपने आप में एक संसार है, हर तरह के लोग। बीड़ी के धुँए में गुम चौहटन का  देराम हो या नई सड़क पर इलेक्ट्रोनिक की दुकान पर बैठने वाला इब्राहीम हो या फिर खद्दर की बनियान की जेब से तुड़े-मुड़े पैसे निकालते सांडेराव का कुटला राम हो या दादाजी को देखने आई पम्मी आंटी को पिलाने के लिए पानी की बोतल और ज्यूस खरीदता श्रेयांश हो। सभी का एक ही दु:ख व शिकायत है मगर सभी का दु:ख बयाँ करने का तरीका अपना अपना है, बस कोई सुनने वाला हो या फिर चुप्पी से उन्हें देखने वाली आँख हो। जो कभी भीग जाती है तो कभी गुस्से में लाल हो जाती है तो कभी अपने आसुंओं के खारे घूँट बिन बोले ही पी जाती है।

वो अक्सर अपनी पत्नी के पास ही बैठा रहता और वो हॉस्पिटल की छत और पंखे को ताकती रहती। वो भी वार्ड में भर्ती मरीजों को देखता रहता उनकी बातें सुनता और खुद ही कयास लगाकर कोशिश करता कि किसको क्या बीमारी है कौन बड़ा बेटा है या बहिन है। जब भी किसी मरीज को रिलेटिव देखने आते तो गार्ड उनसे अड़ जाता कि डॉक्टर की विजिट है एक को ही जाने दूंगा, थोड़ी देर बाद सब अंदर घुस जाते और गार्ड कुढ़ते हुए अगले लोगों से उलझ जाता। प्राइवेट हॉस्पिटल में सफाई अच्छी होती है, उसे गाँव के मोहनजी ने बताया था। यहाँ पर दिन में दो बार सफाई होती थी। जब पोंछा लगता था उसे अजीब सी गंध आती थी, उसने कभी इसे गाँव में महसूस नहीं किया, इसलिए वो अक्सर बाहर चला जाता था।

मगर बाहर भी चारों तरफ लोग भिनभिनाते रहते। बैठने के लिए लड़ते या फिर परेशान होते। दिन में थके मरीजों के साथ आये लोग यत्र तत्र सोये मिलते या फिर सामूहिक खाना खाते हुए या फिर वेटिंग रूम में ऊँघते से बिना आवाज की टीवी देखते। रिसेप्शन पर एक केरल की नर्स बैठी हुई थी जो कि अब मारवाड़ी बोलने का अजीब प्रयास करती और नये पुराने मरीजों को समझाते हुए झुँझला रही थी। बीच बीच में फोन की घंटियाँ बजती या फिर लोगों के मोबाइल में गीत बजने लगते।

इन सबसे वह उकता गया था न उसे होटल की चाय भा रही थी न ही ढाबे का खाना। वो बार-बार दोहरा रहा था अल्लाह दुश्मन को भी हॉस्पिटल नहीं बताये। उसे आपने गाँव की ढाणी याद आ गई जहाँ 200 बकरियां और ऊँट इन्तजार कर रहे थे । सब खुला-खुला होता है वहां। उसे जल्द घर जाने की बेचैनी होने लगी। आज हॉस्पिटल में तीसरा दिन है। सुबह डॉ ने रिपोर्ट देख कर कहा कि फातमा के पेट मे अपेंडिक्स है, ऑपरेशन करवाना पड़ेगा।

कितो खर्चो व्हेला डा. साब्ब, उसने ऑपरेशन का नाम सुनते ही खर्चा पूछा।

अभी तो जाँचे अहमदाबाद भिजवानी है उसके बाद पता चलेगा कि कितना खर्चा आएगा, कहते हुए डॉ अगले मरीज की रिपोर्ट देखने लग गया।

फिर भी वो मोटा मोटा अंदाजा चाहता था।

 अभी आप 50 हजार जमा करवा दो, जांचों के बाद ऑपरेशन करेंगे तब सब हिसाब करेंगे। डॉक्टर ने धीरे से कहा।

डा. साब्ब मेरी फातमा ठीक तो हो जायेगी। अब उसे बीमारी की चिंता होने लगी।

इलाज के बाद सब ठीक हो जायेगा। अब आप बाहर जाओ। डॉ अपनी मेन्युप्लेटड साफ्टनेस भूलते हुए बोला। सुबह से ही घर में बेटे के मामले ने उलझा रखा है, ऊपर से इन मरीजों के अजीबो गरीब सवालों ने उलझा कर घनचक्कर बना दिया था।

बड़े बेटे की प्रेमिका ने उस पर शादी करने के दबाव बना रखा था वरना सेक्सुअल हेरासमेन्ट और रेप के केस में अंदर करने के लिए धमकी दे रही थी। उसे किसी दलाल को 30 लाख देकर निपटाने का तय करने का विचार चल रहा था।

इधर छोटा वाला लड़का तीसरी बार मेडिकल की एंट्रेंस टेस्ट में फेल हो गया तो इस साल बाहर पढऩे भेजना है ताकि कम से कम डॉ की डिग्री तो लाये जिससे यह जमा जमाया हॉस्पिटल संभाल सके। मगर उसके लिए साल की फीस 15 लाख रूपये की व्यवस्था करना भारी पड़ रहा है।

उपर से नोटबन्दी के कारण लोगों के पास पैसे नहीं होने के कारण ऑपरेशन कैंसिल करवा रहे हैं या डेट आगे खिसकवा रहे हैं। उसे समझ नहीं आ रहा है कि पैसों की व्यवस्था कर परिवार पर आये संकट को कैसे उबारा जाये। फातमा की रिपोर्ट देख उसके दिमाग में आईडिया आया। उसने हर आने वाले पांचवें मरीज को ऑपरेशन सजेस्ट कर दिया। उसे उम्मीद थी कि इस तरह महीने भर में इस मंदी से उभर जाऊंगा।

अब्दुल फातमा के पास गया तो वो पूछने लगी कि क्या कहा डॉ ने?

डॉ ने अफेन्डी बताई है और ऑपरेशन करना पड़ेगा। उसे अपेंडिक्स का सही उच्चारण भी पता नहीं था। गाँव में सभी यही बोलते थे। इतने पैसे कहाँ से लायेंगे? ऑपरेशन के नाम से फातमा बीमारी भूल पैसों का हिसाब किताब लगाने लगी। अभी तो 50 हजार बकरे बेचने पर आये थे वो नोट तो बैंक में जमा करवा दिए और इलाज के लिए 10 हजार तो मौलवी जी से उधार लाये थे।

उसने गाँव में सभी स्रोत से पता करवाया मगर इन दिनों किसी के पास पैसा नहीं है। उसने अपनी रेवड़ बेचने की सोची मगर कोई खरीदार ही नहीं जो रोकड़ दे सके।

उसने बेटे रहीम को सेठजी के पास दो चार गहने देकर भेजा मगर वहां से भी 30 हजार की ही व्यवस्था हो पाई। उसने सब नोटों को गिनकर रिसेप्शन जमा करा दिए। और केरल की नर्स से पूछा मेरी फातमा ठीक तो हो जाएगी?

अरे! हम कोशिश कर रहे है गॉड पर विश्वास रखो।

बेनजी ब़ेमारी की है? उसने डरते पूछा।

अरे तुम्हारी तरह कई मरीज आते हैं किस-किस को जवाब दूँ। जाओ डॉ से पूछो। हेड नर्स के गुस्सैल स्वभाव से सभी परिचित थे इसलिए सभी ने अब्दुल को वार्ड में जाने को कहा।

आज 5वां दिन है फातमा नार्मल है जब से भर्ती हुई उसके दूसरे दिन से उसका दुखता पेट ठीक हो गया। मगर पेट के साइड में अभी भी हल्का-हल्का दर्द हो रहा था। वो दवाइयां ले रही थी खाना भी सही खा रही थी मगर उसे घर जाने की जल्दी थी वो बेड पर पड़े-पड़े उकता गई थी।

सुबह शाम कम्पाउंडर आते बीपी चेक करते और चले जाते ।

छुट्टी कदे देसी, फातमा ने आज रट लगा रखी थी। उसे अपने बेटे रहीम और बेटी मरियम की याद आ रही थी। पीछे अकेले है कैसे रहते होंगे हालाँकि चाचा लुकमान सब संभाल लेगा फिर भी माँ का जी अपने टाबरों में अटका हुआ पड़ा था।

फातमा के सवालों से तंग होकर वो डॉ के चेम्बर की ओर चल दिया।

डॉ साहब चेम्बर में नहीं थे, वो घर पर ही उलझे हुए थे। दलाल कह रहा था कि वो 30 लाख में राजी नहीं हो रही है कोई दूसरा रास्ता देखना पड़ेगा। दलाल को पता था डॉ बड़ा मुर्गा है और इस मौके पर जितने भी वसूल किये जाये वो पक्की मजूरी है।

यार कोई भी हो, कुछ भी हो बताओ तो सही। डॉ. कुछ रास्ता चाहता था।

यह लड़की फलाँ ठेकेदार की बेटी है। दलाल ने बताया

हाँ तो? यह तो मुझे भी पता है। डॉ बात-बात पर झुंझला रहा था।

अरे यह ठेकेदार उस नेता का खास आदमी है। दलाल ने अपना पत्ता खोलते हुए कहा।

डॉ साहब की बांछे खिल गई सीधे गणेश मन्दिर जाकर प्रसाद चढ़ा कर फिर हॉस्पिटल गये।

दोपहर को वही नेताजी उस हॉस्पिटल में भर्ती बहिन को देखने आये थे।

डॉ ने बड़ी आवभगत की। नेताजी को बहिन के किडनी ट्रांसप्लाट के साथ खर्चा भी बता दिया। नेताजी का भी नोटबंदी में हाथ तंग था। आगे अगले महीने नगरपालिका का चुनाव भी लडऩा है तो इतने रूपये  की व्यवस्था करना मुश्किल लग रहा था।

तभी मौका भांपते ही डॉ साहब ने अपनी तकलीफ  बता दी। नेताजी के चेहरे पर कुटिल मुस्कराहट फैल गई। जीभ होठों पर फेरते हुए बोले डॉ. साहब वो तो मेरी बेटी ही समझो, मैं उसे समझा बुझा दूंगा आप चिंता न करो। नेताजी को पता था ठेकेदार को अगले चुनाव के बाद ठेकों के लिए उसके पास ही आना है, इसलिए भरोसा था कि उसकी बात नहीं टालेगा।

डॉ को कुछ राहत मिली मन ही मन बालाजी की सवामणी बोल दी।

नेताजी धीरे से बोले मगर हमें क्या मिलेगा डॉ साहब?

अब उदास होने की बारी डॉ साहब की थी।

आप मेरी बहन को ठीक कर दो और मैं आपके बेटे को। नेताजी जाते-जाते समाधान भी खुद ही बता गये।

डॉ साहब अपने चेम्बर में इस उलझन में बैठे ही थे कि अब्दुल ने अंदर आकर पूछा डॉ साहब ऑपरेशन जल्द करो ईद को घर भी जाना है।

डॉ ने रिसेप्शनिस्ट को बुला कर पूछा कि इसने कितने रूपये जमा करवाए।

50 हजार और करवाओ फिर ऑपरेशन होगा, कह कर डॉ साहब फिर दलाल को फोन करने लगे।

अब्दुल भारी कदमों से बाहर आकर हॉस्पिटल में बने मन्दिर के आगे खड़ा हो गया।

उसके संस्कार तो कह रहे थे कि यह बुत इसका खुदा नहीं है पर परिस्थितियाँ यह कह रही थीं खुदा भी इस तरह का बुत ही होगा तभी तो उस जैसे लोगों की अर्जियां कबूल नहीं होती।

यार इस नेता ने तो मुझे दूसरी उलझन में फंसा दिया, चलो ऑपरेशन का खर्चा नहीं लूँ, मगर इसकी बहन के लिए किडनी की व्यवस्था कहाँ से करवाऊँ? चेम्बर के अंदर डॉ बाल नोचते हुए दलाल से बातें कर रहा था।

अरे! डॉ. साहब आपके हॉस्पिटल में तो कई मरीज पेट के इलाज के लिए आते होंगे किसी का भी ऑपरेशन कर दो कौन देखता है कि क्या निकाला और क्या लगाया, वैसे भी एक किडनी से काम चल जाता है। थोड़ी बहुत कमजोरी आये तो कह देना कुछ दिन तक ऑपरेशन की वजह से रहेगी।

डॉ साहब को समाधान मिल गया।

उसने नर्स को कहा कि फातमा के ऑपरेशन की तैयारी करो। अब्दुल को भी समझ नहीं आया अचानक यह क्या और कैसे हो रहा है। अनायास ही मन्दिर के बुत के आगे सजदे में हाथ उठे मगर उसके संस्कार आड़े आ गये और खुशखबरी देने फातमा के पास जाने के लिए सीढिय़ाँ चढऩे लगा।

उसके दूसरे दिन फातमा को ऑपरेशन थियेटर में ले जाया गया। जूनियर डॉ. ने एनस्थिसिया के बाद पेशेंट की रिपोर्ट पढ़ते हुए पूछा कि इस मरीज के तो अपेंडिक्स है और किडनी को ओपरेट क्यों कर रहे हैं?

बड़े डॉ साहब ने उसे तुरंत बाहर भेज दिया और कुछ ही घंटों में किडनी ट्रांसप्लांट हो गई।

फातमा को देर रात होश आया तो उसे दर्द हो रहा था। शुरू के दिनों में केवल पानी ही पिलाया, फिर लिक्विड, फिर दलिया और फल मगर कुछ भी खाए तो उल्टियाँ ही उल्टियाँ।

अब्दुल को नर्स और वार्ड बॉय समझा रहे थे कि यह तो ताजा टांकों की वजह से हो रहा है।

और छुट्टी कब मिलेगी? हर बार अंतिम सवाल यही होता।

अरे जल्द डिस्चार्ज कर देंगे। वही रटा हुआ जवाब था।

कुछ दिनों बाद शाम को छुट्टी मिलने पर बस में हिचकोलों से ताजा टांके टूटे नहीं और फातमा को नुकसान नहीं हो इसलिए उसने किराये की गाड़ी में फातमा को सुला रखा था। पास खड़ी एम्बुलेंस में नेताजी की बहिन का शव रखा जा रहा था किडनी ट्रांसप्लांट सफल नहीं रहा और वह चल बसी।

उधर डॉ साहब चेम्बर से भागते हुए गाड़ी में बैठ थाने की ओर भागे जा रहे थे। ठेकेदार की लड़की ने सच्चा प्यार किया था, रुपयों पर नहीं बिकी। बेवफाई से तिलमिला कर मुकदमा कर दिया इसलिए डॉ. साहब के बड़े लड़के को पुलिस गिरफ्तार कर ले गई। दलाल फोन नहीं उठा रहा था क्योंकि अब कुछ भी नहीं मिलेगा, सिवाय गालियों के, तो वह वैष्णो देवी दर्शन के लिए चला गया। साँझ की धूसर फैल चुकी थी। हॉस्पिटल के बाहर अजीब खट्टा सा माहौल था। मगर इन सब से अनजान मरीज और उनके रिश्तेदार, चाय वाला,पार्किंग वाला और और गार्ड अभी भी किसी न किसी से उलझे हुए थे।

शाम की सफाई वाली बाई लगाये हुए पोछे पर चलने पर झिझक रही थी और जूनियर डॉक्टर प्रोफेशनल एथिक्स के नाम पर अपना इस्तीफा लिख रहा था। साँझ की धूसरता फैल रही थी। रोड लाइट लग चुकी थी, शाम के पोछे की गंध, मन्दिर के धूपबत्ती की खुशबू और पड़ोस में मस्जिद से उठती अजान की आवाज के बीच एम्बुलेंस चल पड़ी और इनके पीछे ठीक होने का विश्वास लिए जल्द घर पहुँचने की धूसर उम्मीद लिए चल पड़े अब्दुल और फातमा।