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Monday 18 Jun 2018

वृक्ष का वंश

वृक्ष का वंश

 पिछले दिनों भयंकर

आंधी-तूफान आया और वर्षों पुराना

पेड़ उखड़ गया जड़ समेत

आसपास के गांव के लोग

पेड़ उखडऩे की खबर सुन कर चौंके

कुछ लोगों ने उसे गांव का पुरखा कहा

बचपन से देखने वाले बूढ़े हो गये

उसने कहा कि -मेरे दादा के जमाने में भी था

पहले इसकी मोटी-मोटी डालियां बहुत दूर तक फैली थंी

पशुओं का दोपहर में विश्राम स्थल था

उसकी सुखद छाया, वसंत में खिलना, फूलना, फलना

अब लोगों से भुलाये नहीं भूलता।

ठीक उसी जगह गांव के युवाओं ने

एक नया पेड़ लगाने की ठानी

और पहली बारिश में ही लगा भी दिया पेड़

कांटों से घेर दिया गया है

उसे बूढ़े विशाल पेड़ की यादों को

जीवित रखना चाहते हैं गांव के सभी लोग

वृक्ष की वंश परंपरा को

पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवन और धरती की

खुशहाली के लिये बचाना चाहते हैं

यह गांव भर की सांस्कृतिक धरोहर है

धूप, बारिश, चिडिय़ा और बच्चों का अटूट रिश्ता है।

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 रोबोट

अधिक की चाह

पांवों को गति देती है

दिमाग के ढांचे की तोड़-फोड़ करती है

और मुझे एक दिन

अपने ही आदर्शों से नीचे गिरा देती है।

वैभव के स्वप्न में

खोयी आंखें अपनी जिंदगी

और उसकी उम्र को दूर तक

नहीं देख पाती हैं

किसी चीज को पाने की

मन में चाह पैदा हो जाना

और उसका पूरा न होना

एक अध्ूारी प्यास बन कर रह जाती

वह तड़प उठती है

उसके लिये बार बार।

यह स्वयं को समझने

और समझाने का वक्त नहीं है

फुर्सत में की जाती है समझदारी की बातें

चीजों के बारे में और जिंदगी को

बेमौत मरने से बचाने के बारे में

समाज और दर्शन आज उपभोग के लिये रह गये हैं

यह सब सोच कर मैं हैरान होता।

देश एक विशाल बाजार में तब्दील

जरूरतें पहुंच से बाहर

बेचैनी, भाग-दौड़, रूप सौंदर्य की प्रतियोगिता

खरीद और बिक्री जिंदगी की हर खुशी की

सेल्समैन, एजेंसी, बाजार प्रबंधक, दुकानदारों के

कब्जे में लोगों की खुशी कैद

कौन है जिम्मेदार!

असीमित चाह बंजर बना देगी

खेत-खलिहान की तरह

उनकी जिंदगी को जिसका कोई दायरा नहीं

वस्तुओं का अपना आकर्षण है

मन पर कब्जा करता है धीरे-धीरे

फिर वह आदमी नहीं रह जाता

रोबोट बन जाता है।

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कपड़े की चमक

तुम्हारे कपड़े खादी के हों

या सिंथेटिक के बने

सफेद हो या चक चक रंगीन

इसकी चमक कभी कम नहीं होती

तुम्हारे चेहरे की भी रौनक बढ़ाते हैं

ये चमकदार आकर्षक कपड़े।

तुम्हारे कपड़े की यह चमक

कहां से आती है और क्यों कभी

कम नहीं होती है यह मैं जानता हूं

क्योंकि तुम रोज कमजोरों को

साबुन की तरह घिसते हो

वे टुकड़े-टुकड़े होकर नष्ट हो जाते

उनकी जिंदगी की कीमत

तुम्हारे कपड़े वसूलते हैं

अपनी चमक कभी नहीं खोते।

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 टूटे पत्ते को चुनना

इधर पिछले कई दिनों से

गांव से बाहर एक पेड़ के नीचे बैठने जा रहा हूं

कुछ देर उसके टूटे पत्ते को

बस, यूं ही चुनता हूं।

टूटे पत्ते का कुछ भी नहीं बन सकता

उसका सडऩा गलना तय है

चहे जितनी दूर तक उड़ जाय

फिर भी उन्हें चुनता हूं

इसे कोई समझदार व्यक्ति पागल हीं कहेगा।

रोज-रोज इसी तरह चुनने का काम

पेड़ के नीचे जाकर करता हूं

फिर कुछ देर के लिये घास पर लेट जाता हूं

कभी ऊबता नहीं

पत्तों को चुनने का अपना आनंद है

टूट गया तो क्या हुआ

मेरी जिंदगी में उसका भी सम्मान है

कभी कम नहीं होगा

इसके टूटने की क्रिया मेरी

जिंदगी से बिलकुल मिलती जुलती है

क्योंकि हम दोनों एक ही सांस को जीते हैं।