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Friday 14 Dec 2018

प्रस्तावना

आप एक सुरम्य स्थान पर पहुंचते हैं। वहां एक विशाल शिला है जो अपने रंग और आकार के कारण दूर से आकर्षित करती है। आपका मन होता है कि इस चट्टान पर चढ़ जाएं और चारों ओर जो प्राकृतिक छटा बिखरी है उसे जी भर कर देख लें। भारत में अगर आप ऐसा करना चाहेंगे तो इसे एक स्वाभाविक इच्छा माना जाएगा। आपके साथ कोई रोक-टोक भी नहीं करेगा। आजकल सेल्फी लेने का जमाना है तो उस सुन्दर शिला पर खड़े होकर आप शायद सेल्फी भी ले लेंगे। आपका मन होगा तो चट्टान पर कहीं किसी नुकीले पत्थर से अपना नाम भी कुरेदकर आ जाएंगे। अगर आप नौजवान हैं तो हो सकता है कि आप अपने नाम के साथ दिल में धंसे तीर की आकृति भी बना दें और जिसे मन ही मन चाहते हैं उसका भी नाम लिख दें। आखिर यह सब भारत में लंबे समय से होते आया है। जबलपुर में मदनमहल हो या उसके आसपास की पहाडिय़ां, खंडहर बन चुकी कोई भव्य इमारत हो, कोई पुराना किला हो, कांकेर के आसपास की खरबों वर्ष पुरानी पहाडिय़ां हों या देश की कोई अन्य जगह, यह दृश्य अमूमन देखने मिलता है।

उत्साही धर्मप्रवण लोगों को भी अपने पंथ का प्रचार करने के लिए ऐसे आश्रय अनुकूल प्रतीत होते हैं। कई वर्ष पूर्व मैंने बस्तर जाते हुए देखा था कि कांकेर के आसपास चट्टानों पर कहीं बाइबिल की सूक्तियां लिखी थीं, तो कहीं गायत्री परिवार के उपदेश। यदि ऐसे स्थान शासन द्वारा संरक्षित हों और वहां किसी तरह की गोदा-गादी करने की मनाही का नोटिस लगा हो तो उसका उल्लंघन करने में हमें अपनी बहादुरी का अहसास होता है। अगर हमारा वश चले तो ताजमहल की संगमरमरी दीवारों पर भी हम अपना नाम लिख आएं। आखिरकार कुछ दिन पहले आगरा के कुछ हिंदुत्ववादी लोगों ने ताजमहल परिसर में जाकर शिव चालीसा का पाठ करने का स्वांग रचाया था। वे सामूहिक रूप से इस मानसिकता को ही तो प्रदर्शित कर रहे थे। ताजमहल को प्राचीन मंदिर सिद्ध करने की कोशिशें तो पचास साल से चल रही हैं लेकिन उसमें अब एकाएक तेजी आ गई है। केन्द्र में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के जिम्मेदार समझे जाने वाले नेता भी इस अराजक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने में लग गए हैं।

मैंने बात शुरू की थी एक पर्वत शिला से जो प्रकृति की देन है; दूसरी ओर ताजमहल जैसी निर्मितियां हैं जिनमें मनुष्य की बुद्धि, कला कौशल और परिश्रम का निवेश हुआ है। दोनों प्रकार की वस्तुएं हमारे लिए अनमोल विरासत अथवा धरोहर हैं और इस रूप में उन्हें मान्यता तथा आदर मिलना चाहिए। यह कहने की बात नहीं है कि प्रकृति ने हमें अनेकानेक उपहारों से नवाजा है, जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मनुष्य जीवन के साथ अविछिन्न संबंध हैं। इस विराट पृथ्वी पर जीवन का जो तंतुजाल है उसमें हम कहां, किस तरह, किससे जुड़े हैं, इसे जानने-समझने की जिज्ञासा हममें पर्याप्त नहीं है और इस अज्ञान में हम न सिर्फ इस अमूल्य खजाने को बर्बाद कर रहे हैं बल्कि अपने निजी जीवन में भी नुकसान उठा रहे हैं। यह समझना बहुत आवश्यक है कि ताजमहल सिर्फ एक इमारत नहीं है, और न ही एक प्राचीन शिला कोई निर्जीव वस्तु।

मनुष्य के अपने निज हित में ही सही, हमें दो स्तरों पर गंभीर रूप से सोचने की आवश्यकता है। एक तो यह फर्क करना बेहद आवश्यक है कि इतिहास और धरोहर दो अलग-अलग विषय हैं। मनुष्य जाति का इतिहास प्रमुखत: सत्ताधीशों का जीवन चरित्र है जिसमें युद्ध एक स्थायी भाव की तरह लगातार उपस्थित है। जब हम सत्ताधीशों और युद्धों के परे देखने का यत्न करते हैं तभी सभ्यता के विकास के सूत्र हमें मिल पाते हैं। जिन स्थानों को या वस्तुओं को विरासत की संज्ञा मिली है उनका संबंध जिस किसी भी कालखंड से हो वह एक सूचना मात्र है। उसका असली महत्व तो इस बात में है कि वह एक सुंदर वस्तु है। दूसरे शब्दों में इतिहास में जो सुंदर है वही विरासत के रूप में मान्य है।  ताजमहल हो या हम्पी, ये सुन्दर इसलिए हैं कि इनकी परिकल्पना किसी कलाकार ने की और इसे आकार दिया कुशल शिल्पियों ने। यह कलादृष्टि और कलासम्पन्नता अभिनंदनीय होना चाहिए। इसके अलावा बाकी जो कुछ बात हो व्यर्थ का बखेड़ा करने के सिवा कुछ नहीं है।

प्रकृति के जो उपहार हैं उन पर भी सम्यक विचार करना आवश्यक है। प्रकृति के साथ हमारा चौबीस घंटे का अभिन्न रिश्ता है और बना रहना चाहिए। किसी छुट्टी के दिन, किसी सुरम्य स्थान पर जाकर पिकनिक मना लेने मात्र को प्रकृति प्रेम नहीं कहा जा सकता। यह स्मरण रखने योग्य है कि निसर्ग में जो कुछ है वह हमारे लिए किसी न किसी रूप में उपयोगी है। वह फिर छोटी सी इल्ली हो या तितली या फिर शेर ही क्यों न हो। जिन पर्वतों और पर्वतशिलाओं को निर्जीव माना जाता है उनमें भी अत्यंत सूक्ष्म रूप में प्राणतत्व होता है। इन दिनों जब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की चेतावनी बार-बार दी जा रही है तब सोचना होगा कि इसके लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। प्रकृति तो स्वेच्छा से हमें जितनी आवश्यकता हो उतना देने को तैयार है, लेकिन हम एकबारगी पृथ्वी को विपन्न कर अपने को सम्पन्न कर लेना  चाहते हैं।

मैं इस लेख के प्रारंभ में जिस चट्टान का उल्लेख कर आया था उसकी तरफ आपको वापिस ले चलता हूं। सुदूर आस्ट्रेलिया के किसी राष्ट्रीय उद्यान में उलुरू नाम की यह शिला अवस्थित है। यह लाल रंग की चट्टान तीन सौ अड़तालीस मीटर या लगभग एक हजार फीट ऊंची है। प्रतिवर्ष लगभग तीन लाख पर्यटक इसे देखने आते हैं। इस पर चढऩा आसान नहीं है फिर भी लोग खतरा उठाकर ऊपर पहुंचते हैं। इस प्रयत्न में हर साल कुछ लोग मर भी जाते हैं। विगत कई वर्षों से उस इलाके में रहने वाले आदिवासी आपत्ति कर रहे थे कि उलुरू शिला को संरक्षित तथा आम जनता की पहुंच से दूर रखा जाए क्योंकि यह हजारों वर्षों से आदिवासियों के लिए एक पवित्र स्थान है। इस तर्क को आस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय उद्यान अभिकरण ने स्वीकार किया है। उसने कहा है कि यह पवित्र शिला डि•नीलैंड में रखी हुई मनोरंजन की वस्तु नहीं है बल्कि अनांगू आदिवासियों की आस्था का बिन्दु है इसलिए इसे लोगों की पहुंच से दूर रखा जाना उचित होगा। इसी अक्टूबर से यह निर्णय लागू भी हो गया है।

आस्ट्रेलिया सरकार के इस निर्णय की तुलना भारत से करें तो क्या तस्वीर बनती है? ओडिशा के नियमगिरी पर्वत क्षेत्र में आदिवासियों की तमाम दलीलों और आंदोलनों को दरकिनार कर वहां एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को खनिज उत्खनन की अनुमति दे दी गई। ओडिशा और झारखंड के जिन जंगलों में हाथियों का आवास था वहां अंधाधुंध माइनिंग के चलते हाथी यहां-वहां भटक रहे हैं। वे अपने भोजन की तलाश में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर तक तो आ ही चुके हैं। किसी दिन रायपुर भी पहुंच जाएंगे तो आश्चर्य नहीं। तथाकथित विकास योजना के नाम पर देशभर में आदिवासियों का जो शोषण और विस्थापन हुआ है वह एक अलग कथा है। लेकिन इस प्रक्रिया में आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान के खोने के साथ उनकी आस्थाओं पर जो आक्रमण हो रहा है वह शायद हमारी समझ में ही नहीं आता।

मैं एक बार फिर कांकेर का जिक्र करना चाहता हूं। भूविज्ञानी बताते हैं कि यहां की पहाडिय़ां अरबों-खरबों वर्ष पुरानी हैं। देश में अन्य स्थानों पर भी ऐसी अतिप्राचीन पहाडिय़ां हैं। स्वाभाविक है कि इन पहाडिय़ों के साथ ही उनके आसपास जंगल विकसित हुए होंगे। वनस्पतियों के साथ-साथ वन्य जीवों का भी उद्भव व विकास हुआ होगा। बहुत आगे चलकर जब मनुष्य को वहां ठौर मिला तो उसने इस प्राकृतिक संपदा को ही अपने जीवन का आधार बनाया होगा। नदी के जल से लेकर महुए के फूल और फल, माहुर बेल की लता और साल के पत्तों तक। जब यह सब नष्ट हो जाएगा, जो कि धीरे-धीरे हो रहा है, तब क्या बचेगा। शायद सिर्फ मशीनें और उन मशीनों को चलाने वाले रोबो याने यंत्र मानव। यह जीते-जागते प्राणियों की पृथ्वी तब एक कारखाने में तब्दील हो जाएगी।

यह एक भयावह दृश्य होगा जिसे देखने के लिए हम नहीं होंगे। दूसरी ओर मनुष्य ने जिन विरासतों का निर्माण किया है उनकी ओर जो दुर्लक्ष्य हो रहा है, उनका जो अपमान कर रहे हैं, वह भी कम चिंता उत्पन्न नहीं करता। यहां बात सिर्फ ताजमहल की नहीं है। अभी हाल में राष्ट्रीय हरित अभिकरण ने उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर को लेकर जो निर्णय सुनाया है उसका ध्यान कीजिए। न्यायालय ने आदेश दिया है कि भस्म आरती के समय ज्योतिर्लिंग को सूती वस्त्र से ढांक कर रखा जाएगा और अन्य समय में उस पर एक निर्धारित मात्रा में ही आर.ओ. जल चढ़ाने की अनुमति रहेगी। यह निर्णय इसलिए आया कि हमारे धर्मप्रवण दर्शनार्थी यह नहीं जानते कि ज्योतिर्लिंग पर दूध या पानी चढ़ाने से उसका क्षरण हो रहा है। अगर सावधानी न बरती गई तो किसी दिन वह विलुप्त भी हो जाएगा। कुछ वर्ष पूर्व अमरनाथ की गुफा में प्राकृतिक रूप से बनने वाला शिवलिंग भी मौसम अनुकूल न होने से पूरा नहीं बन पाया था। तब बाहर से बर्फ लाकर शिवलिंग को आकार दिया गया था।

जब ताजमहल को लेकर बखेड़ा खड़ा हुआ तो कट्टर हिन्दूवादी मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को स्वयं वहां जाकर आश्वस्त करना पड़ा कि यहां किसी तरह का उपद्रव नहीं होने दिया जाएगा। उन्हें ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि ताजमहल विश्व के सर्वप्रमुख आकर्षणों में एक है और लाखों की संख्या में पर्यटक वहां आते हैं। पर्यटन याने व्यापार, व्यापार याने रोजी-रोटी। जो इस अद्भुत भवन को देखने आते हैं वे इतिहास को नहीं, विरासत स्थल को देखने आते हैं। मैं कहना चाहता हूं कि यह सिर्फ केन्द्र सरकार या राज्य सरकार का ही दायित्व नहीं है कि वे प्राकृतिक अथवा मनुष्य निर्मित धरोहरों का संरक्षण करें, लेकिन उनका यह दायित्व तो बनता ही है कि आम जनता को भली-भांति शिक्षित किया जाए, उसके दुराग्रह और पूर्वाग्रह दूर किए जाएं तथा मानवीय संवेदना का विकास होने के साथ-साथ उसे यह भी समझ में आए कि विरासत का संरक्षण उसके अपने हित में तथा आने वाली पीढिय़ों के हित में है।