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Friday 14 Dec 2018

हम एक जड़वत देश हैं

राम मनोहर लोहिया ने कहा था- जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहींकरतीं। यानी वे मानते थे कि देश को बनाए और बचाए रखने के लिए जनता को हमेशा जागरूक रहना पड़ेगा। जनता में जड़ता जहां आईं वहींउसका पतन होना शुरु हो जाएगा। लेकिन आज के नेता बिल्कुल दूसरी लीक पर चल रहे हैं। वे चाहते ही नहींकि जनता कभी जागरूक हो। अगर जनता में चेतना रहेगी, तो वह सवाल पूछेगी। जड़ और चेतन का यह बुनियादी फर्क राजनेता खूब समझते हैं कि जड़ हमेशा एक जगह रूका रहता है और उसे धक्का देकर जहां पहुंचाना चाहो, पहुंचाया जा सकता है। आज भारतीय जनता का हाल ऐसा ही है। कहने को हम विकासशील देश के नागरिक हैं, यानी लगातार आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन अपने अंदर झांककर देखें तो हम केवल वहींतक पहुंचे हैं, जहां तक हमारे नेताओं ने हमें पहुंचाना चाहा। हम धर्मनिरपेक्ष देश के लोग, मिलजुलकर आगे बढ़ रहे थे, लेकिन हमारे पैरों को धर्म और जाति की अलग-अलग जंजीरों से जकड़ दिया गया। हमें समझा दिया गया कि मिलजुलकर आगे बढऩे की जगह अपनी जाति और धर्म के आगे बढऩे की चिंता करो। हमारी चेतना में धर्मांधता, सांप्रदायिकता की जड़ता डाल दी गई। हम रुक गए। हमारा विकास रुक गया। सांप्रदायिकता पर आधारित राजनीति आगे बढ़ गई। लेकिन हमें समझाया गया कि देखो देश में अमीर इतने प्रतिशत बढ़ गए हैं, शेयर बाजार इतनी ऊंचाइयों पर पहुंच गया है, ऊंची-ऊंची इमारतें, फ्लाईओवर, सड़केें बन रही हैं, हर हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट डेटा सस्ते में उपलब्ध है, इसे ही तो विकास कहते हैं। चूंकि हम जड़ हो चुके हैं, इसलिए हमने इसे मान लिया। हमें और भरमाने के लिए गौरवशाली इतिहास की याद भी दिलाना जरूरी था और इसके लिए राजनेताओं के पास सबसे आसान तरीका था मूर्तिपूजा। भारत आमतौर पर मूर्तिपूजक समाज रहा है, जिसे हमेशा अपने उत्थान के लिए एक नायक की दरकार रहती है। राजनीतिक दलों ने हमारी इस प्रवृत्ति को भी खूब भुनाया। हर दल ने पौराणिक किरदारों से लेकर ऐतिहासिक किरदारों तक की मूर्तियां अपने-अपने वोटबैंक के हिसाब से खड़ी करवाईं। भारतीय जनता अपनी चेतना इन मूर्तियों के चरणों में अर्पित कर खुद जड़ होती गई और उसकी जागरूकता राजनीतिक दलों की बंधक हो गई। दक्षिणभारत की राजनीति में आदमकद कटआउट्स से लेकर विशालकाय मूर्तियों का चलन हमेशा से रहा है और बाद में यह प्रवृत्ति समूचे भारत में फैल गई। हर थोड़ी दूरी पर सार्वजनिक शौचालय या पानी का नल मिले न मिले, एक मूर्ति जरूर मिल जाएगी। जिस राजनैतिक दल या संगठन की जितनी हैसियत होती है, जनता से चंदा उगाही की जितनी क्षमता होती है, वह उतनी बड़ी मूर्ति अपने महापुरुष या देवी-देवता की लगवा लेता है। जो दल सत्ता में होता है, उसकी तो बात ही निराली ही होती है। गांधी, नेहरू, अंबेडकर, मौलाना आजाद, पटेल, भगत सिंह, नेताजी, चंद्रशेखर आजाद, आदि की मूर्तियां मरणोपरांत लगवाना अलग बात थी, क्योंकि ये स्वाधीनता के सिपाही थे। लेकिन बाद के ïवर्षों में तो मूर्ति लगवाना अपना राजनीतिक वर्चस्व दिखाने और चाटुकारिता करने का जरिया बन गया। कांग्रेस ने अपने आराध्य नेताओं की मूर्तियां लगवाईं, भाजपा ने अपने महान नेताओं की मूर्तियां स्थापित कीं। वह राम मंदिर भी बनवाना चाहती है, लेकिन जब तक मामला सुप्रीम कोर्ट में है, तब तक अयोध्या में रामजी की विशालकाय प्रतिमा लगाने का ऐलान मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने कर दिया है। गुजरात में सरदार पटेल की विराट मूर्ति तो मोदीजी बनवा ही रहे हैं, महाराष्ट्र में उन्होंने समंदर में शिवाजी को भी स्थापित कर दिया है। मायावती जब सत्ता में आई तो दलित गरिमा जगाने के लिए भी उन्हें मूर्तिपूजा ही सुविधाजनक लगी। उन्होंने दिवंगत लोगों के साथ-साथ अपनी मूर्तियां लगवाने की क्रांति भी कर दिखाई। लोहियाजी की अनुयायी समाजवादी पार्टी भी इस मामले में पीछे नहींहै। अपने नेताओं की मूर्तियां सपा ने लगवाई ही हैं अब अयोध्या के राम का मुकाबला सैफई के कृष्ण से करवाने की तैयारी है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना है कि वे युवाओं को आधुनिकता के साथ-साथ परंपराओं का ज्ञान भी देना चाहते हैं। कृष्ण  के बाद दुर्योधन की मूर्ति लगवाने की भी चर्चा है। इन मूर्तियों से हमारी नई पीढ़ी को कितनी प्रेरणा मिलती है, यह तो शोध का विषय है। लेकिन यह तो जाहिर है कि जड़ हो चुके इस देश में मूर्तियों के बहाने राजनीति खूब फलती-फलती है।