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Sunday 19 Nov 2017

संकीर्णता के विरुद्ध औदात्य की परिकल्पना

मुक्तिबोध रचनावली के तीसरे खण्ड में संकलित पहली कहानी का शीर्षक है 'ख़लील काका’। इसका रचना समय 5 अक्टूबर, 1936 बताया गया है, अर्थात् मुंशी प्रेमचन्द के निधन से तीन दिन पहले। यहाँ प्रेमचन्द के उल्लेख का उद्देश्य मुक्तिबोध को उनकी परम्परा से जोडऩे अथवा उसमें रखकर मूल्यांकन करना नहीं, बल्कि इस प्रश्न का सामना करना है कि क्या मुक्तिबोध की आरम्भिक कहानियों पर प्रेमचन्द के कहानी-लेखन और सरोकारों का कोई प्रभाव पड़ा है? कहने की आवश्यकता नहीं कि प्रेमचन्द अपने समय के ऐसे रचनाकार थे जिन्होंने समकालीन लेखकों को अनिवार्य रूप से प्रभावित किया था। वैसे तो प्रेमचन्द और मुक्तिबोध की कहानियों में उभयनिष्ठ तत्वों की विरलता मिलती है, किन्तु 'ख़लील काका’ कहानी के सन्दर्भ में बात करें तो इसमें कुछ एक सूत्र ऐसे हैं जो दोनों को जोड़ते हैं। इस कहानी पर जैसे ही नजऱ पड़ती है, प्रेमचन्द याद आते हैं। कथानक, पात्र, संवेदना और कुछ-कुछ भाषिक रचाव की दृष्टि से यह कहानी प्रेमचन्द की रचनाशीलता के निकट चली जाती है। इस कहानी को पढ़ते हुए हमें इस पर प्रेमचन्द की चिन्ताधारा की छाप दिखती है। हिन्दी कहानी-लेखन के प्रसंग में यह बार-बार कहा जाता है कि प्रेमचन्द के बाद मुसलमान पात्रों की संख्या निरन्तर कम होती गयी और स्वातन्त्र्योत्तर कथा साहित्य में तो उनकी उपस्थिति नगण्य है। ऐसे में मुक्तिबोध की इस कहानी का महत्व बढ़ जाता है। इस कहानी का केन्द्रीय पात्र ख़लील उस भारतीय मुसलमान का प्रतिनिधि है जिसकी जड़ें यहाँ की मिट्टी में उतनी ही गहरी हैं, जितनी किसी हिन्दू की। इस गहराई का प्रमाण स्वयं ख़लील है। उसकी सोच और संवेदना में समग्र भारतीयता की झलक मिलती है। वह हमारे बहुलतावादी समाज और उसकी सामासिक संस्कृति का आत्मीय एवं सुपरिचित पात्र लगता है। इस कहानी की चर्चा आज के संकीर्ण, तनावपूर्ण एवं अपरिचित होते जा रहे परिवेश में प्रासंगिक हो जाती है। मानवीय सम्बन्धों की दृष्टि से भी यह एक महत्वपूर्ण कहानी है। हिन्दू-मुसलमानों के बीच जिस प्रकार से अविश्वास, घृणा और शत्रुता का वातावरण निर्मित किया जा रहा है, उसे देखते हुए इस कहानी का पुनर्पाठ आवश्यक लगता है। इस कहानी में ख़लील का चरित्र एक मुसलमान की पहचान से ऊपर उठकर मानवता का प्रतीक बनकर उभरा है। ऐसा लगता है कि मुक्तिबोध ने इस कहानी का शीर्षक सोच- समझकर ही दिया होगा। यदि काका के स्थान पर चाचा होता तो भी इसके सामान्य अर्थ-ग्रहण में कोई व्यवधान न आता। हिन्दू घरों में पिता के भाइयों लिए 'काका’ औैर 'चाचा’ शब्दों का प्रयोग होता है, जबकि मुसलमान घरों में सामान्यतया 'चाचा’ शब्द का प्रयोग होता सुनायी पड़ता है। इस कहानी में 'काका’ शब्द का प्रयोग दोनों सम्प्रदायों के बीच सामान्य मानवीय सम्बन्धों का बोध कराता है। आकार की दृष्टि से 'ख़लील काका’ छोटी-सी कहानी है जिसमें ख़लील, रसूल और केशव तीन पात्र हैं। रसूल ख़लील का सगा बेटा है, जबकि केशव उसका पालित पुत्र। कहानी का आरम्भ इस प्रकार होता है: 'ख़लील काका को याद आयी, अपने लड़के रसूल की मृत्यु की नहीं, केशव के बचपन की। कैसा-कैसा खेल किया करता था, मारे मस्ती के घर...।‘ रसूल की मृत्यु और केशव का बचपन, दोनों अतीत का हिस्सा हैं। बेटे की मृत्यु वेदना का अटूट अंग बनकर जीवन-पर्यन्त किसी भी पिता को टीसती रहती है। कभी-कभी विक्षिप्त भी बना देती है। इससे हटकर इस कहानी के ख़लील को अपने सगे बेटे की याद उतनी नहीं सताती, जितनी केशव के बचपन की स्मृतियाँ। स्मृतियों के झरोखे से झाँकता है केशव का बचपन और ख़लील को इतना भिगो देता है कि उसकी आँखों से आँसू छलक पड़ते हैं। यह है मुक्तिबोध की संवेदना का उज्ज्वल-उदात्त पक्ष, जो उनकी रचनाओं में बिना किसी दुराव-छिपाव और बनाव-श्रृंगार के प्रकट हुआ है। इसे देखने और अनुभव करने के लिए भी वैसी ही संवेदनशीलता चाहिए, जिसमें चेतना का सहज प्रवाह हो। यह वही संवेदनशीलता है जो हजारों वर्षों से रचनाशीलता का सारतत्व बनकर विभिन्न रूपों में व्यक्त होती रही है। वही मुक्तिबोध के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग भी है, अन्यथा वे जीवन भर यूँ ही नहीं छटपटाते रहते। इस कहानी के ख़लील की आँखों से झरने वाले आँसू उसी संवेदना के सघन स्पर्श की परिणति हैं।

'ख़लील काका’ कहानी संवेदना के धरातल पर मनुष्य के आत्म का विस्तार है। इसमें गझिन अनुभूतियों की बुनावट है। जिस ताने-बाने से इसे बुना गया है, वे किसी संकीर्णता में नहीं बँधे हैं। इस कहानी का यथार्थ हमें चौंकाता ज़रूर है, लेकिन वह असम्भव नहीं है। क्या हुआ जो ख़लील का अपना बेटा नहीं रहा। केशव अपने से बढ़कर है। ख़लील का कुशल-क्षेम पूछता रहता है। जब वह ख़लील के पाँव दबाता है, तो लगता है जैसे आत्मीयता ने साक्षात् शरीर धारण कर लिया हो। इस दृश्य को देखकर धर्म और जाति की सीमाएँ लज्जित होकर छिप जाती हैं। दीये के बुझ जाने के बाद भी ख़लील और केशव के अन्त:करण में आत्मीयता की लौ जलती रहती है: 'केशव ने ख़लील के वृद्ध गालों को पोंछा, दाढ़ी पोंछी, गले को पोंछ दिया। कुर्ते के बटन लगा दिये, पजामा ठीक कर रजाई से आधा बदन ढक दिया। ख़लील की झुर्रियों पर एक दृष्टि डाल वह पैरों के पास बैठ गया और पैर दबाने लगा।‘ उसे दीया जलाने की ज़रूरत ही नहीं महसूस होती। वह अपने काम अर्थात् कर्तव्य के निर्वहन में संलग्न रहता है। मुक्तिबोध की इस कहानी के कई आयाम हैं। इसमें जाति-धर्म से परे मानवीय सम्बन्धों की अनिवार्यता के साथ उनके निर्वाह अथवा दायित्वबोध को भी प्रदर्शित किया गया है। यहाँ कहानी में एक मोड़ आता है। उसकी धारा ख़लील की स्मृतियों के साथ पीछे की ओर मुड़ती है। व्यक्ति सुख अथवा दु:ख दोनों ही स्थितियों में अतीत की ओर झाँकता है। 'ख़लील देखने लगा इस अन्धकार में एक-एक चित्र-भुलाई हुई बातें। यह अन्धकार उन चित्रों पर पड़े परदों को उठाने वाला बना। उसकी विचारधाराएँ एकाएक जाग उठीं।‘ अतीत में भटकती उसकी यादें रसूल पर जाकर ठहरती हैं। तब किसी आवेगमय क्षणों में उसने रसूल के गालों पर चाँटे मारे थे। अचानक वह घटना कौंधती है और टीस बनकर उसके भीतर फैल जाती है। ख़लील भावुक व्यक्ति है। उसने अनाथ केशव को पाल-पोसकर बड़ा किया। उसे रसूल से ज्यादा प्यार दिया, 'इसलिए कि उसे माता-पिता नहीं हैं, अनाथ है, बच्चा है, कोमल है।‘ धर्म उसके आड़े नहीं आया। स्वार्थ ने अपने तेवर नहीं दिखाये। समाज ने भी कुछ कहा ही होगा, लेकिन ख़लील ने उसकी कतई परवाह नहीं की। ख़लील के स्नेह पर रसूल और केशव दोनों की दावेदारी परिवार की परम्परागत संरचना में तोड़-फोड़ नहीं करती, बल्कि सम्बन्धों में बहने वाले द्रव को अधिक प्रगाढ़ बनाती है। ख़लील स्वयं को रसूल और केशव में विभाजित नहीं करता, दोनों को अपने भीतर समाहित कर लेता है, हिन्दू-मुसलमान से ऊपर उठकर।

बाल मनोविज्ञान की दृष्टि से भी इस कहानी का अपना ही महत्व है। 'ख़लील काका किसके हैं?’- इस प्रश्न को लेकर रसूल और केशव के बीच द्वन्द्व दिखाया गया है। ख़लील काका की गोदी में सोने को लेकर रसूल के मन में केशव के प्रति किंचित् ईष्र्या का भाव जगता है। वह सोचता है: 'केसू रोज सोता है, उसे नहीं सोने देता, आज वह सोयेगा और ज़रूर सोयेगा, नहीं तो केसू को पीटेगा। दुपहरिया के घाम में से आ रहे रसूल के हाथ-पाँव ख़लील की गोदी में सोने को उसी तरह अकुला उठे जिस प्रकार कोई रोगी कई दिनों से अनशन करने के कारण खाने की वस्तुएँ देख अकुला उठता है।‘ मुक्तिबोध ने बड़ी सटीक उपमा दी है। आखिर कवि-मन कब तक चुप बैठता। दूसरी ओर घर पर ख़लील को अनुपस्थित देखकर रसूल की व्याकुलता कराह में बदल जाती है। 'एक गुप्त कराह उसके हृदय की धड़कन में बिंध गयी।...ज्यों ही ख़लील आकर बैठा, रसूल उसकी गोदी में गिरकर एक वेदनामय उल्लास अनुभव करने लगा।...रसूल का वह सुख दो क्षणों का था...।...अब रसूल को होटल में नौकरी करनी होगी। कमाकर लाना होगा, नहीं तो घर से निकाल दिया जायेगा।‘ रसूल को जब मालमू पड़ता है कि उसे होटल में काम करके पैसे कमाने पड़ेंगे, तो उसका समूचा उल्लास तिरोहित होकर अवसाद में बदल जाता है। 'रसूल को रोना आने लगा।‘ उसके भीतर यह भी सवाल उठता है कि क्या 'सचमुच ख़लील काका उसके नहीं हैं।‘उसका घर से जाना पिता के स्नेह-संरक्षण से वंचित होना नहीं, इस संसार से ही हमेशा के लिए विदा हो जाना है। आखिर 'ख़लील को क्या मालूम था कि रसूल उस होटल में जाकर मर जायेगा, नहीं तो वह ज़रूर चूम लेता, प्यार कर लेता, छाती से चिपका लेता।‘ वह भावी त्रासदी से अनभिज्ञ है। स्नेह करने वाला ख़लील और बेटे को काम पर भेजने वाला ख़लील दोनों एक ही हैं, लेकिन विवशता उसके अन्त:करण को दो टुकड़ों में बाँट देती है। विभाजित होते ही ख़लील वही नहीं रह जाता, जैसा वह पहले था। यह इस कहानी का त्रासद बिन्दु है। ऐसी त्रासदियाँ सिर्फ़ ख़लील की ही नहीं, उस जैसे अनगिनत अभावग्रस्त पिताओं के लिए मर्मांतक पीड़ा का कारण बनती है। यह है ख़लील का जीवन-यथार्थ, जिसमें मौन रहने वाला उसका अभाव रसूल की मृत्यु के बाद चीख पड़ता है। यहीं पर उसके जीवन का विरोधाभास भी उभरता है। कोमल और कठोर का अन्तर्विरोध कहानी की आन्तरिक संरचना में क्षोभ उत्पन्न करके पाठक को विह्वल कर देता है। कहना न होगा कि मुक्तिबोध ने समाज की व्यापक सच्चाई को रचना में इस प्रकार विन्यस्त किया है कि उसका प्रभाव मनो-मस्तिष्क पर गहरे उभर आता है। वैसे तो मुक्तिबोध ने मध्यवर्ग के यथार्थ को अपने लेखन के केन्द्र में रखा है, लेकिन इस कहानी को समाजार्थिक रूप से विपन्न पात्रों से बुना गया है। इसमें लेखक की चिन्ताधारा एवं सरोकार को स्पष्ट देखा जा सकता है।  

मुक्तिबोध की इस कहानी का एक महत्वपूर्ण पक्ष वृद्ध हो चुके ख़लील और तरुण केशव का है। 'ख़लील बीमार है, और केशव उसकी पूरी सेवा कर रहा है। केशव सोचता है-बड़ा अच्छा हो, ख़लील काका जल्दी अच्छे हो जायें। बहू कितनी याद कर रही थी।‘ कहानी की रगों में बहती मानवीय भावनाएँ गौरतलब हैं। केशव की कृतज्ञता उल्लेखनीय है। वह अपने सुखमय वर्तमान में अतीत को भूला नहीं है। जिसने उसे पाला-पोसा, आज उसकी सेवा में तत्पर है, उसकी चिन्ता करता है। इस चित्र पर भी हमारा ध्यान जाना चाहिए: 'ख़लील काका ने आँसू की बाढ़ रोकने प्रयत्न किया, अपनी अक्षम पलकों से सिर हिला दिया जिससे आँसू इधर-उधर बिखर गये, तरुण केशव को नहीं दिखे।‘ मानवीय सम्बन्धों की दृष्टि से इन आँसुओं का बहुत महत्व है। इस मोड़ पर केशव अपने हाथ में थर्मामीटर लिये खड़ा मिलता है, ख़लील के जीवन की रक्षा के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता, गहरी चिन्ता में डूबा हुआ। 'रात बीती जा रही थी। केशव की घड़ी की अविरत टकटक उसकी एक-एक चिन्ता को गिन रही थी।‘ मुक्तिबोध ने अपने लेखन में भले ही ईश्वर के प्रति आस्था प्रकट न की हो, लेकिन अपने पात्रों को वे उनकी स्वतन्त्रता से वंचित नहीं करते। उनका पात्र केशव अपने आत्मीय ख़लील काका के लिए ईश्वर से प्रर्थना करता है। यह मुक्तिबोध की उदारता और मानव मनोविज्ञान की समझ को दर्शाता है। यह भी समझ में आता है कि वे आत्मीय सम्बन्धों के संरक्षण को कितना महत्व देते हैं। इसके प्रमाण उनके लेखन में ही नहीं, उनसे जुड़े लोगों से भी मिलते हैं। ख़लील और केशव का अपनापन देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को सुखद अनुभूति होगी। इन दोनों के बीच कोई स्वार्थ नहीं है। यदि कुछ है, तो वह है मानवीय मूल्यों की डोर से बँधे रहने का आत्मनिर्णय, एक-दूसरे के सुख-दु:ख की चिन्ता और सहज भावबोध की अकुण्ठ अभिव्यक्ति: 'बेटा, अब तू सो जा, बहुत देर हो गयी जागते-जागते...।‘ यह वृद्ध ख़लील का हड़बड़ाहट में पूछा गया प्रश्न है। उसका यह पूछना कि 'प्यारे केसू, तुझे रसूल की याद आती है?’एक पिता की संचित वेदना की सहज अभिव्यक्तिहै। अशक्त हो चुके ख़लील के स्वास्थ्य की चिन्ता में आतुर केशव की यह चिन्ता कितनी परिचित, भली और अपनेपन की गरमाहट से भरी लगती है कि 'उनकी तबीयत और खऱाब होगी और उन्हें ही कष्ट होगा। उनको जल्दी अच्छा हो जाना चाहिए। बहू भी कितनी फिकर कर रही थी।‘ इस भावबोध को किसी विमर्श की परिधि में नहीं समेटा जा सकता, चाहे वह कितना भी आधुनिक क्यों न हो? जीवन-पर्यन्त झंझावातों से जूझता, अतीत और वर्तमान को समतल पर रखकर, स्मृति की कन्दराओं में घुसता-निकलता, केशव के गालों को चूमता, कण्ठावरोध को हटाने का प्रयत्न करता तथा आँखों से आँसू बरसाता ख़लील यह कहते हुए कि 'मेरा केशव कितना अच्छा है’, कहानी के अन्त में इतना भावुक, निश्छल और निष्पाप लगता है कि उसे देखकर सारी सीमाएँ और विधि-निषेध बेमानी हो जाते हैं। ख़लील हिन्दी कहानी का एक अविस्मरणीय पात्र है जिसे उपेक्षित कर दिया गया। निश्चय ही इसे भारतीय समाज, उसकी संस्कृति और दर्शन की उदात्त चेतना की उपज कहा जाएगा। 'ख़लील काका’ कहानी में ब्यौरों अथवा वर्णनात्मकता की प्रचुरता नहीं है, लेकिन शब्दों के बीच की खाली पड़ी जगहें अनकहे को विस्तार देती हैं। 'ख़लील काका’का पुनर्पाठ करते हुए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि इस कहानी में मुक्तिबोध ने स्वप्न और यथार्थ के मेल से जो विमर्श प्रस्तुत किया है, वह मानव समाज के लिए न सिर्फ़ मूल्यवान् है; बल्कि स्वयं मुक्तिबोध के रचनात्मक व्यक्तित्व को ऊँचाई एवं गरिमा प्रदान करता है।