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Wednesday 22 Nov 2017

खलील काका

खलीला काका को याद आई, अपने लड़के रसूल की मृत्यु की नहीं, केशव के बचपन की। कैसा-कैसा खेल किया करता था, मारे मस्ती के...

केशव ने देखा, खलील काका को आंसू आ रहे हैं। आंसू पोंछते हुए कहने लगा, ''अरे, आप तो रोते हैं.. फिर किस हिम्मत पर मुझे बड़ा किया।‘’

केशव ने खलील के वृद्ध गालों को पोंछा, दाड़ी पोंछी, गले को पोंछ दिया। कुत्ते के बटन लगा दिये, पजामा ठीक कर रजाई से आधा बदन ढक दिया। खलील की झुर्रियों पर एक दृष्टि डाल वह पैरों के पास बैठ गया और पैर दबाने लगा।

इस मिट्टी के सूने घर में, जहां हवा आने के लिए कुछ भी जगह न थी, वह दीया, कोने वाले छोटे आले को काला करता हुआ, रोगी की तरह घंटे तै रहा था कि किसी अदृश्य शक्ति ने उसे बुझा दिया।

केशव ने अपना काम नहीं छोड़ा। दीया लगाने नहीं उठा।

खलील देखने लगा इस अंधकार में एक-एक चित्र-भुलाई हुई बातें। यह अंधकार उन चित्रों पर पड़े परदों को उठाने वाला बना। उसकी विचारधाराएं एकाएक जाग उठीं।

उस जमाने में, उस दिन, उस समय, जब वे बाहर गये हुए थे, खलील केशव को लिये बैठा था, वहां उस वृक्ष के नीचे। जरूर, जरूर तब रसूल लाल तुर्की टोपी पहने था जो उसके मामू ने दी थी, हरी जाकिट जिसकी सीप की दो घुण्डियां बदमाश ने तोड़ डाली थीं। इसी पर खलील ने उसे चांटा मार दिया था। जरूर, जरूर! तब नीले आसमान में काले बादलों के छितरे किनारे डूबते सूर्य की किरणें पडऩे से लाल झालर-से दिखाई देते थे।

रसूल चांटे से उभरा लाल मुंह लिये जाकिट की जेब में से कांच की अण्टियां निकालकर गिनने लगा।

खलील ने छोटे-से केसू से पूछा, ''आज सूरज पच्छम से निकलेगा!’’

केसू के प्यारे ओठों ने जवाब दिया, ''आँ,’’ और अपने कोमल हाथ खलील की दाढ़ी में उलझा दिये। खलील हंसने लगा।

उसने रसूल से पूछा, ''आफताब पच्छम से निकलेगा?’’ रसूल ने तमककर जवाब दिया, ''नहीं, तुम झूठ बोलते हो।‘’

''बदमाश...’’ खलील ने डांटना चाहा। रसूल रोने लगा फूट-फूटकर। वह खलील के तमाचा जडऩे पर नहीं रोया था।

केशव को कमरे में बहुत गर्मी लगने लगी। वह बाहर निकल आया और काले आकाश में चमचमाते तारों को देखने लगा, फिर मानो वे अरुचिकर प्रतीत होते हों, दूर झाडिय़ां के झुण्डों के तले साकार अंधकार को देखने लगा, जैसे उससे वह कुछ प्रश्न पूछना चाहता है।

वह खलील काका के पास आया, उसके वृद्धत्व में। वह तरुण है, कमाता है, खाता है। बाप के मरने पर खलील ने उसे सम्हाला, पाला-पोसा, बड़ा किया। खलील बीमार है, और केशव उसकी पूरी सेवा कर रहा है। केशव सोचता है- बड़ा अच्छा हो, खलील काका जल्दी अच्छे हो जाएं। बहू कितनी याद कर रही थी!

केशव अन्दर आया। दीया जला दिया और फिर पांव दाबने बैठ गया।

''रसूल भी कैसा बदमाश है... रोने लग गया। नहीं तो, केसू कभी नहीं रोता था।‘’

खलील काका ने आंसू की बाड़ रोकने का प्रयत्न किया, अपनी   अक्षम पलकों से सिर हिला दिया जिससे आंसू इधर-उधर बिखर गये, तरुण केशव को नहीं दिखे। खलील प्यार करता है केशव को रसूल से ज्यादा, इसलिए कि उसे माता-पिता नहीं है, अनाथ है, बच्चा है, कोमल है। जी हां, रसूल को पिता हैं, वह बड़ा है- पांच साल का है। खलील रसूल को डांटेगा, प्यार नहीं करेगा।

आज रात को खलील के इन आंसुओं ने उसकी अन्तर्धारा का परिचय करा दिया उसे, कि वह किसकी है? पर खलील उस समय रसूल की इस आवश्यकता को जान न सका।

रसूल रोता है- रोया करता है। इसीलिए तो उसकी मां उसे छोड़कर भाग गई, हमेशा के लिए। खैर, केशव अच्छा है, रसूल बुरा है, बहुत बुरा। पर ऐ खलील, तुमको उसकी क्या चिन्ता, इसलिए कि उसने तुझे जनम-भर छला है?

रसूल जब अपनी फूटी स्लेट बगल में दबाए मदरसे से लौट रहा था और विचार कर रहा था कि अब तो वह खलील काका की गोदी में सोयेगा, और जरूर सोयेगा, केसू रोज सोता है, उसे नहीं सोने देता, आज वह सोयेगा और जरूर सोयेगा, नहीं तो केसू को पीटेगा। दुपहरिया के घाम में से आ रहे रसूल के हाथ-पांव खलील की गोदी में सोने की उसी तरह अकुला बैठे जिस प्रकार कोई रोगी कई दिनों से अनशन करने के कारण खाने की वस्तुएं देख अकुला उठता है।

घर जाकर देखा तो खलील काका दो पैसे की शक्कर लाने रामू  दुकानदार के पास चले गए हैं- घर पर नहीं है। केसू उनके बिछौने पर मस्ती कर रहा है।

रसूल ने केशव का हाथ पकड़ उसे अलग बिठा दिया। बिस्तर को ठीक कर (जो कि केसू की मस्ती से अस्त-व्यस्त हो गया था) औंधा लेट गया, एक कराह लेकर।

केसू रसूल की शक्ति जानता था, इसीलिए रसूल का यह दुव्र्यवहार उसे बुरा लगा।

केसू ने रसूल के कान में जाकर कहा, ''खलील काका मेरे।‘’ रसूल औंधे से सीधा लेट गया, उसकी ओर आंखें फाड़-फाड़कर देखने लगा।

खलील काका किसके हैं? इस प्रश्न पर उसने कभी विचार नहीं किया था। उसका संयमी, विचार-व्यथित, सहनशील व्यक्तित्व इस बात पर एकदम चमत्कृत हो गया। केशव के हैं या रसूल के खलील काका? क्या वह खोजने निकल पड़े? एक गुप्त कराह उसके हृदय की धड़कन में बिंध गई। उसका सारा बदन दुखने लगा, पर वह वैसे ही उठा और घाम में जाकर खड़ा हो गया।

थर्मामीटर लगाने के लिए केशव उठा और उसे लेकर इस तरह से झटकने लगा मानो किसी बोझ को वह अपने से झटकना चाहता हो। अब वह ईश्वर से प्रार्थना करने की सोच रहा है कि उसके खलील काका बच जाएं।

थर्मामीटर देखने के बाद वह गहरी चिंता से खलील के पैरों के पास बैठ गया और अपनी आदत के अनुसार उन्हें दाबने लगा।

रात बीती जा रही थी। केशव की घड़ी की अविरत टकटक उसकी एकाएक चिन्ता को गिन रही थी।

खलील काका के विचार-स्वप्न हृदय की तह में घुसकर आंखों में उठने लगे। दूर से खलील काका दिखाई दिये। रसूल के सारे शरीर में विचित्र झनझनाहट पैदा हो रही थी- अवश्य वह तो खलील काका की गोद में जाकर सोयेगा और जरूर सोयेगा।

खलील काका के साथ एक आदमी और था। ज्यों ही खलील आकर बैठा, रसूल उसकी गोदी में गिरकर एक वेदनामय उल्लास अनुभव करने लगा। खलील के लम्बे कुर्ते में अपना मुंह छिपा लिया, क्योंकि उसे आनंद के मारे आंसू आ रहे हैं। उफ! कितने ही दिनों के बाद आज उसे अपने पिता की गरम गोदी मिली है। जरूर खलील काका उसके हैं, और किसी के भी नहीं।

खलील काका हड़बड़ा उठे। केशव से कहने लगे, ''बेटा, अब तू सो जा, बहुत देर हो गई जागते-जागते... प्यारे केसू, तुझे रसूल की याद आती है?’’

केशव आश्चर्य से उनकी ओर देखता ही रह गया। अटककर बोला, ''आ.. आप सो जाओ।‘’ केशव के मस्तिष्क में एक कल्पना साकार होती चली... बुड्ढा चला न जाये...।

खलील अपने में ही लीन थे... रसूल का वह सुख दो क्षणों का था, क्योंकि अब उसे तहजीब सीखना चाहिए, सामने जनाब रफीक साहब बैठे हुए हैं।

केशव खलील की गोदी में लेट गया, क्योंकि वह अभी बच्चा है, और ढाई साल का है।

अब रसूल को होटल में नौकरी करनी होगी। कमाकर लाना होगा, नहीं तो घर से निकाल दिया जाएगा। रफीक साहब इसीलिए आए हैं।

रसूल को रोना आने लगा। सचमुच खलील काका उसके नहीं।

खलील को क्या मालूम था कि रसूल उस होटल में जाकर मर जाएगा, नहीं तो वह जरूर चूम लेता, प्यार कर लेता, छाती से चिपका लेता। वाह रे खलील!

खलील काका के जी में न मालूम कैसा-कैसे होने लगा। कण्ठावरोध हटने का प्रयत्न कर केशव को बुलाया। सहसा खलील ने तरुण केशव के गालों को चूम लिया। अपनी दोनों बांहों से उसे जोर से पकड़ कहने लगे, ''मेरा केशव कितना अच्छा है!’’ और आंसू बरसाने लगे।

केशव कुछ भी न समझ सका। वह तो इतना भर जानता है कि उसके अशक्त खलील काका को ऐसा नहीं करना चाहिए, कयेंकि उन्हें जल्दी अच्छा होना है। और अब वह भी बच्चा नहीं है, युवक है। उनकी तबीयत और खराब होगी और उन्हें कष्ट होगा। उनको जल्दी अच्छा हो जाना चाहिए। बहू भी कितनी फिकर कर रही थी।

(रचनाकाल 5.10.1936)