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Saturday 18 Nov 2017

\'ज्ञात से अज्ञात’ : कुछ सतरें

मुक्तिबोध-कॉस्मिक चेतना का अलक्षित लोक

मुक्तिबोध की जन्म शताब्दी में हम टुकड़ों में सही उनकी कविता, आलोचना, विचार और दृष्टि के उन हिस्सों का उत्खनन करने का एक प्रयास कर रहे हैं जिनपर रोशनी कम है। पिछले अंकों में यह समझने की चेष्टा की थी कि क्या उनका 'विभाजित व्यक्तित्व’ था? क्या उनके मन के रहस्यलोक में भय, आशंका, सन्देह का कोई रिश्ता उनमें संकेतित मनोरोग से है? इसके आस-पास के कुछ तथ्यों को भी हमने अपनी बातों में शामिल किया था।

मुक्तिबोध की 'एक साहित्यिक की डायरी’ को पढ़ते हुए मेरी निगाह कुछ पंक्तियों पर जैसे अटक गयी— 'मनुष्य अपने से परे जा सकता है, वह जाता भी है, गया भी है और जाएगा ही।‘ डायरी में ही वे कहते हैं— 'न जाने कौन सा अज्ञात मेरा इन्तज़ार कर रहा है।‘ कहना न होगा कि स्टीफन हाकिंग्स की यात्रा भी ज्ञात से अज्ञात की ओर है। इसे हम उनकी विलक्षण कॉस्मिक चेतना कह सकते हैं। क्या मुक्तिबोध में कोई कॉस्मिक चेतना भी थी? यह देखना दिलचस्प और रोमांचक हो सकता है। 'अँधेरे में’ में वे लिखते हैं— 'सचमुच मुझको तो जि़न्दगी की सरहद। सूर्यों के प्रांगण के पार/जाती दिखती है।‘ वे अपनी कविताओं में चाँद के टेढ़े मुँह, चाँदनी की बीमार रुग्ण चाँदनी देखते हैं, रहस्यलोक की पर्तों में प्रवेश करते हैं, सागर में प्रकाशद्वीप देखते हैं, जिसका होना अपने-आप में सम्भव नहीं उसका रिश्ता तो कहीं अन्तरिक्ष की ऊर्जा का परावर्तन है, जिस तरह पृथ्वी का अँधेरा स्वायत्त निर्मिति नहीं अपितु उसका सम्बन्ध, ब्रह्मïांड के चक्रीय परिवर्तन के प्रकाश-अन्धकार से है। उनकी कविताओं में सूर्य, चाँद, तारागण, निहारिकाओं और नेब्यूला का इतना जि़क्र क्यूँ कर आता है? एक साहित्यिक की डायरी में ही एक जगह उन्होंने लिखा है— ''मैं जो स्वयं था, वह अस्वयं हो गया था, अपने से वृहत्तर, विलक्षण अस्वयं।‘’ उनका स्वयं से अस्वयं होना सिर्फ भूलोक की संवेदनात्मक यात्रा नहीं लगती। वह अस्वयं होने की प्रक्रिया में भूलोक से परे ब्रह्मïांड की ज्ञानात्मक यात्रा भी है इसलिए तो उसमें अन्तरिक्ष के पते-ठिकाने दीखते हैं। वहाँ की वीडियो इमेजेज़ के आवर्तन का अनुभव होता है। विज्ञान कहता है पदार्थ के अलावा कुछ अदृश्य भी ब्रह्मïांड में है। जो दिखाई नहीं देता वह डार्क मैटर है। वहाँ डार्क एनर्जी है। यह रहस्य भी 'अँधेरे में’ के साथ ही कुछ अन्य कविताओं में ज्ञात से अज्ञात रूपों में दिखाई देता है अगर उसे ध्यान से पढ़ा और पकड़ा जा सके। मुक्तिबोध के कवि और चिन्तक में कहीं एक वैज्ञानिक, एक खगोलविद, एक गणितज्ञ और ज्योतिर्विज्ञानी भी अपनी तरह से झाँकता दिखता है। इस झाँकने, खोजने, बेचैन होकर अज्ञात में निकल जाने में उनकी अतिरिक्त रूप से जागृत इन्द्रियाँ सहयोग करती हैं। वे लिखते हैं कि उनके भीतर व्यक्तित्व के जाने कितने पहलू हैं जो उनमें छिपे हैं, वे उनका विश्लेषण करते हुए लिखते हैं— 'मैं स्वयं भी जो वैज्ञानिक विश्लेषण किये रहता हूँ, वह मुझे सन्तोष नहीं देता।‘ उनकी असन्तुष्टि में वैज्ञानिक चेतना है, जो कॉस्मिक है, वे विश्लेषण करते हैं उसी से और समाधान नहीं पाते जैसे उनकी कविताओं में भी निष्कर्षीय समाधान नहीं है। किसी वैज्ञानिक का निष्कर्ष भी अन्तिम नहीं और ब्रह्मïांड की खोज तो अनन्तिम है, लेकिन वे इसकी तरफ भी इशारा करते हैं— 'ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने से ही ज्ञान की विवशताएँ टूटतीं रहेंगी।‘ यह उनकी डायरी में आता है जहाँ ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने की जिजीविषा में कलाकार से वैज्ञानिक और वैज्ञानिक से कलाकार होने को मन के आभ्यन्तर में अनुभव करते हैं। इसीलिए उन्हें तारे सहचर लगते हैं, आसमान और अन्तरिक्ष चिपका हुआ उनके कवि मन में। उनका एक लेख भी ब्रह्मïांड विषय पर मिलता है। यहाँ उपलब्ध सीमा में कुछ संकेत मात्र हैं। उनकी पंक्तियाँ प्रमाणस्वरूप 'ओ अप्रस्तुत श्रोता’ से उद्धृत करना चाहूँगा—

       'ब्रह्मïांड नदी के तेज़ स्तर पर

       खड़ा हूँ मैं वैज्ञानिक

       देख रहा हूँ तुमको

       और कि तब छाया मेरी

       ब्रह्मïांड अनेकों पार

       दूर इस पृथ्वी पर फैल रही है’

 

चरित्र है चरितव्य नहीं

आज के मध्यवर्गीय लेखक अपनी रचनाओं में तो बार-बार आम आदमी की बात करते हैं, किन्तु हकीकत में जीवन में इसका उलट है इसी मानसिकता को मुक्तिबोध ने कुछ इस तरह पढ़ा और लिखा— 'बजने दो साँकल, वह जन जैसा आया था, वैसे ही खुद चला जाएगा और मैं अपनी पीड़ाएँ समेट इसी खड्ïडे के अँधेरे में पड़ा रहूँगा।‘ वह जन तो अभी भी साँकल बजा रहा है, लेकिन दरवाज़ा न पहले खुला, न अब खुल रहा है—आह कहूँ कि वाह! समझ नहीं पा रहा।

दरअसल हम अपने आत्म चरित का साक्षात्कार नहीं करते। दूसरों का करते हैं और अपने चरित्र को प्याज के अन्दर प्याज की पर्त-दर-पर्त में मज़े से छिपाये रहते हैं। मध्यवर्ग की इसी ओढ़ी हुई चेतना को लेकर मुक्तिबोध एक जगह चेताते हुए कहते हैं— 'साहित्य पर आवश्यकता से अधिक भरोसा करना मूर्खता है।‘ यह मूर्खता हमारा मध्यवर्गीय लेखक पूरी बेशर्मी से करते हुए अपनी ब्रांडिंग बिना किसी शर्मोहया के कर रहा है। साहित्यिक उत्सवों में अपने 'मुँह मियाँ मिट्ठू’ बनते लोग ज़ल्वा अफरोज़ हैं और खुले आयोजित स्पांसर्ड मयखानों में उनकी बातों में तो जनसामान्य के ‘कसीदे हैं, लेकिन चिकन, मटन की लबालब तश्तरियों के बिना कुछ भी मुमकिन नहीं— भूखे की बात भला भूखे पेट कैसे हो? इसी के लिए मुक्तिबोध ने कहा था, 'चरित्र है चरितव्य नहीं।‘

मुक्तिबोध के व्यक्तित्व का अलक्षिण कोण

हम मुक्तिबोध के मन के रहस्यलोक को समझे बिना उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को भलीभाँति समझ सकते हैं। मुक्तिबोध के सन्देह, भय, आशंका, बेचैनी के मूल में क्या कुछ था, इसकी शिना’ख्त की कोशिश हमने की। हम जानते हैं उनके साहित्य की समीक्षा-आलोचना में उनके सम्भावित मनोरोगों की तरफ इशारा किया गया है। या कहें पेरानोइया, सिजोफ्रेनिया जैसे मनोरोगों से जोड़कर मुक्तिबोध के जीवन को जोड़कर देखा गया। उनके विभाजित व्यक्तित्व की तरफ इशारे किये गये। डॉ. विनय कुमार, सुप्रसिद्ध मनोरोग, चिकित्सक, कवि व सम्पादक को हमने विशेष रूप से आमन्त्रित किया। वे मुक्तिबोध के गम्भीर पाठक हैं और इस विषय पर पूरी तरह तैयार होकर आये थे। मुक्तिबोध की कविता, आलोचना, डायरी और पत्रकारीय कर्म को केन्द्र में रखकर उन्होंने मुक्तिबोध की सक्रियता, सूक्ष्म पर्यवेक्षण, प्रतीकों, बिम्बों की तारतम्यता, वैचारिक द्वन्द्वों और सभ्यता समीक्षा के गहरे आग्रहों को लेकर और उनकी साहित्यिक स्थापनाओं को खोलते हुए कहा कि उनके व्यक्तित्व के लक्षण मनोरोग की सम्भावना की ज़द में ज़रूर आते हैं पर उनके व्यक्ति और लेखक किसी न किसी स्तर पर अपनी विलक्षण क्षमता में किसी मनोरोग सम्बन्धी सम्भावना को क्रमश: ध्वस्त करते चलते हैं। विश्व के कई रचनाकार व कलाकारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने सरल भाषा में 'मन के रहस्यलोक’ की अन्तर्परतों को मुक्तिबोध के सन्दर्भ में विश्लेषित किया। डॉ. विनय ने फ्रायड, क्रेपलिन, राल्फ वाल्डो इमर्सन, जोसेफ केम्पबेल, सलमान अख्तर आदि का प्रस्तावना में उल्लेख करते हुए कहा— मुक्तिबोध का यथार्थ, कल्पना और फंतासी के बिना सम्भव नहीं। उन्होंने कहा Muktibodh is a poet of creative anxiety but rebel as well as consistent and obsessive in thought and its transformation.

इमेज़ेस का मुक्तिबोधीय लोक

                    (1)

कुछ महत्त्वपूर्ण बातें जो मुझे मुक्तिबोध को पढ़ते हुए लगीं।

1.      स्टीफन हाकिंग्स सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक ने पिछले दिनों डिस्कवरी चैनल पर कुछ बातें की, उनमें से एक बात नयी और रोमांचक थी। उन्होंने कहा मनुष्य के दिमाग में ब्रह्मïांड की तरह अनेक तारे हैं— परिक्रमा करते हुए। यात्रा के दौरान तारे एक दूसरे को स्पर्श करते हैं, मिल भी जाते हैं। उनकी उपस्थिति है, क्रिया और प्रतिक्रियाएँ हैं। जिस तरह हम ब्रह्मïांड के रहस्यों के प्रति आकर्षित हैं वैसे मनुष्य का दिमाग पसन्द-नापसन्द के अनुसार कुछ खास विषयों, प्रसंगों, विचारों से उलझा रहता है। मुक्तिबोध के मन के रहस्यलोक, उनकी बेचैनी और सत्य की खोज को इस ब्रह्मïांड के सत्य की खोज से जोड़कर देखा जा सकता है। इस सच को भी केन्द्र में रखना ज़रूरी है कि ब्रह्मïांड के सारे रहस्य खुल गये हों या खुल जाएँगे कहना मुश्किल है। इसी तरह किसी कलाकार, लेखक, वैज्ञानिक आदि के रहस्यलोक के बारे में समझना चाहिए। मुक्तिबोध के मन के रहस्यलोक की कई व्याख्याओं में यही जटिलता है, जिसे स्टीफन के कथन से समझा जा सकता है। मुक्तिबोध भी 'एक साहित्यिक की डायरीÓ में लिखते हैं— 'ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने का कार्यक्रम बना डालो, डरो नहीं। ज्ञात से अज्ञात की ओर जाने से ही ज्ञान की विवशताएँ टूटती रहेंगी।‘ तो इस तरह हम मुक्तिबोध के रहस्यलोक की स्थगित-स्थापित व्याख्याओं से आगे जा सकते हैं।

2.     मुक्तिबोध एक बिन्दु से अन्तिम बिन्दु तक अपनी कविता में जिन इलाकों से गुज़रते हैं, वहाँ के भू-दृश्य, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, समाज के भिन्न-भिन्न लोगों, आडियो इमेजरी और रंगों को दजऱ् करते चलते हैं, जैसे कुछ भी उनके लिए छोडऩा मुश्किल। एक कवि के लिए ये सब उसकी प्रदीप्त ऐंद्रिकता के चलते होता है। यहाँ तक कई गंध-सुगंध भी कविता में दजऱ् होती हैं। इसके लिए फिर 'एक साहित्यिक डायरी’ में लौटकर मुक्तिबोध की इस टिप्पणी से रूबरू होते हैं— 'वह व्यक्ति को अपने को प्रकट करते समय, स्वयं की सारी इन्द्रियों से काम लेते हुए एक आन्तरिक यात्रा कर रहा है। वह अपने भावों या विचारों को प्रकट नहीं करता था, बल्कि उन्हें स्पर्श करता था, सूँघता था, उनका आकार-प्रकार, रंग-रूप और गति बता सकता था, मानो वे प्रकट, साक्षात और जीवन्त हों।‘

3.         तीसरा तथ्य कि वे अपने संवेदनात्मक ज्ञान से लम्बी कविताओं में तो उन चीज़ों को दजऱ् करते हैं, जिनका मैंने जि़क्र किया, लेकिन उनकी ज्ञानमय आँखें यानि ज्ञानात्मक संवेदन उस तलछट में झाँकता-पीछा करता है, जहाँ अँधेरा गहरा रहा है। मुक्तिबोध सत्य के लिए उस अँधेरे में धँसते जाते हैं।

4.     मुक्तिबोध में अपनी कविताओं को लेकर लोक शिक्षण की प्रवृत्ति भी दीख पड़ती है। वे अपने विशिष्टï प्रतीकों, बिम्बों, रंगों और इमेजेस को कविता में लाने के साथ उनके अर्थ भी, एक से दूसरी लम्बी कविताओं में खोलने का काम करते हैं।

(2)

मुक्तिबोध 20वीं सदी और उसे लाँघकर इस सदी के भी अन्तिम कवि इस अर्थ में हैं कि उन्होंने अपने लेखन में संशय, भय और अँधेरों को पार कर एक विज़न अर्जित किया, जो उनके समकालीन नहीं कर सके। और इस अर्जन के परिपाश्र्व में उनके आत्मसंघर्ष की कुछ अहम बातें हैं— उनकी वैष्णवी चेतना, बुद्ध का दर्शन, गाँधी व तिलक की वैचारिक छायाएँ, प्रसाद के मनु से संघर्ष, नेहरू का प्रभाव आदि। इन सबसे जूझते हुए एक ही सवाल उनके मन में गूँजता है, जो कविताओं में भी है— ''तय करो किस ओर हो तुम।‘’ और अन्तत: उन्हें माक्र्सवादी दर्शन में वो विज़न मिलता है— गौर करें विजन यह स्थानिक होते हुए भी विश्वदृष्टिï से लैस है— एक उदाहरण : 

'मुझ पर क्षुब्ध बारूदी धुएँ की झार आती है। व उन पर प्यार आता है। कि जिनका तप्त मुख संवला रहा है धूम लहरों में। कि जो मानव भविष्यत- युद्ध में रत हैं। जगत की स्याह सड़कों पर। कि मैं अपनी अधूरी दीर्घ कविता में। सभी प्रश्नोत्तरी की तुंग प्रतिमा गिराकर तोड़ देता हूँ हथौड़े से। कि वे सब प्रश्न कृत्रिम और उत्तर छलमय।‘

विज़न का एक और उदाहरण :

'समस्या एक— मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में। सभी मानव सुखी, सुंदर और शोषण मुक्त कब होंगे।‘ और अब मैं आता हूँ — ''अँधेरे में और अन्य लम्बी कविताएँ’’ पर।

मेरा पाठ सिर्फ वस्तु या कथ्य आधारित नहीं है। पाठ में मैंने वस्तु और कथ्य को उन रंगों, ऑडियो-वीडियो इमेज़ेस और चित्रों के साथ रखा है, जिनके बिना मुक्तिबोध की कविताओं का पाठ मेरे लिए मुमकिन नहीं था। मुक्तिबोध समझ न आने वाले विशिष्टï प्रतीकों, बिम्बों, रंगों और इमेजेस को एक से दूसरी लम्बी कविताओं में खोलने का साहसपूर्ण कार्य करते रहते हैं।

मुक्तिबोध को इस सन्दर्भ में समझना हो तो उनकी 'एक साहित्यिक की डायरीÓ को कविताओं के साथ पढ़ें— कुछ अंश :

1.      मैंने अपनी एक कविता में उन्हीं काजली रंगों का प्रयोग किया है। अन्तर केवल यह है कि इस श्यामलता के कार्य कारण संबंध भी वहीं प्रस्तुत किये हैं।

2.     कविता, एक संगीत को छोड़, अन्य सब कलाओं से अधिक अमूर्त है। वहाँ जीवन-यथार्थ केवल भाव बनकर प्रस्तुत होता है, या बिम्ब बनकर या विचार बनकर।

3.     शब्द के अपने ध्वनि अनुषंग होते हैं जिनमें चित्र और ध्वनियाँ दोनों शामिल हैं।

मैं अगर ऑडियो-वीडियो इमेजरी, रंग आदि के बीच कथ्य को खोज रहा हूँ तो ये सभी संकेत मुक्तिबोध के हैं, जिन्हें नये सिरे देखना शेष है।

(3)

मित्रो! अभी मुझे श्रीकान्त वर्मा की याद आ रही है। श्रीकान्त जी ने 'चाँद का मुँह टेढ़ा’ है, की पांडुलिपि भारतीय ज्ञानपीठ के लिए तैयार की थी और अशोक वाजपेयी ने कविताओं के चुनाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। श्रीकान्त जी ने नवयुवकों में मुक्तिबोध की गहरी दिलचस्पी का जि़क्र किया था। यह एक अर्थगर्भी संकेत है। आज के लेखकों के लिये भी, जबकि समाज में अँधेरा सघन है। आशंका के कई द्वीप हैं जिनमें आज लेखक का मुक्तिबोधीय होना दायित्वपूर्ण है और युवा लेखकों का जागरूक व संगठित होना ज़रूरी है।

श्रीकान्त जी ने अपनी भूमिका में एक और बात कही है कि मुक्तिबोध की दो कविताएँ क्रमश: 'चम्बल की घाटी में’ और 'आशंका के द्वीप : अँधेरे में’ एक के बाद एक छापी जाएँ और दूसरी का शीर्षक बदल दिया जाए। दोनों एक मन:स्थिति की कविताएँ हैं, ऐसा मुक्तिबोध ने कहा था। श्रीकांत जी ने 'आशंका के द्वीप’ हटाकर 'अँधेरे में’ कर दिया। यह अब एक क्लासिक कविता की तरह उपस्थित है।

इस प्रसंग का मेरे लिए बहुत गहरा अर्थ है, जिसे मैं खोलने का यत्न करूँगा बाद में। अभी इतना बता दूँ कि जब मैं दुर्गा कॉलेज रायपुर में एम.ए. का विद्यार्थी था तबसे इन दो कविताओं को बार-बार पढ़ता रहा हूँ ताकि मुक्तिबोध की मन:स्थिति को समझ सकूँ। 4 दशक से मैं लम्बी कविताओं की तरफ भी लौटता रहा हूँ और पिछले एक साल से तो मैंने मुक्तिबोध को ही पढ़ा है। लेकिन इन कविताओं का मेरे भीतर पूर्ण आविर्भाव हुआ हो, मैं कह नहीं सकता।

(4)

मुक्तिबोध को समझने के फेर में हजारीप्रसाद द्विवेदी की एक टिप्पणी ने मेरे लिए पाठ की प्रक्रिया को ही उलट दिया। उन्होंने लिखा— 'मुक्तिबोध जीवन भर एक ही कविता लिखते रहे और अँधेरे में उसका अन्तिम पाठान्तर है।‘ इस गहरी टिप्पणी के कारण मुझे नये सिरे से मुक्तिबोध की कविताओं की तरफ लौटना पड़ा और विशेष रूप से लम्बी कविताओं की तरफ। वहाँ से अँधेरे में का दरवाज़ा खुला और कुछ कुहरीली भाप भरी उजास भी मिली। जो झमक के साथ न थी और वह मन: स्थिति जिसमें भय, आशंका, पुकारती हुई, एक पुकार खोती हुई, मिथकों का अबूझ संसार, कहीं प्रसाद का मनु, कहीं उनकी कामायनी के एकाएक चमकते रत्न, अछोर पगडंडियाँ, हर पंक्ति में चित्रमयता, भूरे, काले, तेलिया, स्याह, गेरूआ, लाल और सिन्दूरी रंग, पहचान न आने वाली टेढ़े चेहरों की आकृतियाँ, साँप, अजगर, पे्रत, राक्षस, घुग्घू, गिद्ध, खोह, बावड़ी, तालाब, और इन सबके साथ और ऐन बीच ध्वनियों और दृश्यों का संसार यानि एक रहस्य लोक, कवि की मन: स्थिति, और बेचैनी और जलते हुए सत्य की खोज में अँधेरे में गहरे तक धँसते जाने का बोध...। मुक्तिबोध की कविताओं के पाठ में ऐसा लगता है मानो आप कोई हॉरर िफल्म देख रहे हों और आपको दीखते हैं— गिद्धों, घुग्घूओं और जंगली पक्षियों की हिंसक निगाहों के डरावने दृश्य, मूर्तियों से झरती चिंगारियाँ, अलाव, आग-ज्वालाओं के दृश्य, काँपता कमल, जल का अथाह-अशांत जगत कोई उस जल में छप-छप करता, एकाएक सनसनी, गोलियाँ चलने का दृश्य, भीड़, पत्थरों की गडग़ड़ाहट, भूखे प्राणों की हँसी, जंजीरों की झंकार और कोई विराट पुरुष रक्तस्नात जिसकी आँखों से प्रकट होते बिजली के फूल अर्थात एक रहस्यलोक जिसमें झाड़-झंझाड़, सूखे कुँओं, गहरी बावलियों का अँधेरा लोक, आतंक का, रहस्य का वातावरण और कवि की वैसी बड़बड़ाहट, जो बेहोशी में मृत्यु के समय एम्स अस्पताल में भी सुनी गयी। मैं इन सबके मानी समझना चाहता था जो तीव्र गति से िफल्म के सजीव दृश्यों की तरह सामने थे। मेरे हिस्से मुक्तिबोध की 'साहित्यिक डायरी' से कुछ पंक्तियाँ मिलीं, जिनसे मुझे पाठ के लिए बल मिला, आप भी सुनें— 'मुझे लगता है कि मन एक रहस्यलोक है। उसमें अँधेरा है। अँधेरे में सीढिय़ाँ हैं। सीढिय़ाँ गीली हैं। सबसे निचली सीढ़ी पानी में डूबी है। वहाँ अथाह काला जल है। इस अथाह काले जल से स्वयं को ही डर लगता है। वह शायद मैं ही हूँ।‘ यहाँ से मैं, मुक्तिबोध के रहस्यलोक को समझने की कोशिश करता हूँ। मुक्तिबोध का 'मैं’ और उनका 'स्व’ कविताओं में मन के रहस्यलोक के साथ कविताओं में बाहर भी दिखता है और कविताओं में उसके रूपांतरण की परतें खुलने लगती हैं। तमाम लम्बी कविताओं में मुक्तिबोध के भीतर का रहस्यलोक िफल्म के दृश्यों की तरह खुलता है। िफल्म निर्माण की दो प्रसिद्ध अवधारणाएँ हैं। एक पुडोविकन की जिसमें दृश्य + दृश्य कथा में जुड़ते हैं जैसे उदाहरण के लिए गुलज़ार की मेरे अपने, आँधी या कोई भी िफल्म लें। दूसरी अवधारणा है— आइंजेस्टाइन की दृश्य & दृश्य। कथा में दृश्य एक के बाद जुड़ते नहीं, बल्कि मल्टीप्लाई होते हैं जैसे मणिकौल और कुमार शहानी की कुछ िफल्में। मणिकौल ने मुक्तिबोध पर 'सतह से उठता आदमी’ िफल्म बनाई थी। दर्शकों को, इस िफल्म को चाक्षुष अनुभव की तरह ग्रहण करना लाजि़मी है। आपको एक सन्नाटा, एक रहस्य, चेहरों की गतिशील आकृतियाँ, स्याहधुंध और कोहरे जैसे वातावरण में चेहरों का चीज़ों में बदलने का बोध होगा, कई रंग उभरते तिरोहित होते लगेंगे, एक अचानक आया चेहरा और उस पर सुपरइंपोज होते कई अंजान चेहरे, ढेर से शब्दों का अनगढ़-अबूझ स्वर, चक्करदार सीढिय़ों पर कैमरा पीछा करता हुआ और मीनार, गुम्बद तालाब, बावड़ी के भूदृश्य और ये किसी कथा के क्रमागत इतिवृत्त की तरह नहीं बल्कि असम्बद्ध। एक डरावनी िफल्म की तरह जिसमें कविताओं में आए किरदार इतिहास से, मिथक से, आज से एक दूसरे में डिज़ाल्व होते हुए। मणिकौल इसे दु:स्वप्न की तरह गढ़ते हैं जिसमें कुछ भी एक संगति में नहीं लगता, लेकिन वह दूसरी तरह से सम्बद्ध है जैसे मुक्तिबोध की अधूरी कविताओं की गहरी सम्बद्धता। िफल्म में मुक्तिबोध की फैंटसी को गढऩे के सिनेमैटिक अभिप्रायों में एक नरेशन या कहें आख्यान बनता है। मणिकौल ने इसमें संगीत रचना के लिए बाँस के आदिवासी वाद्य के एक ही स्वर को कई तरह से बैकग्राउंड में डाला है। लोक वाद्य, बाँस का प्रयोग मुक्तिबोधीय लोक के वातावरण निर्माण के लिए है। नेपथ्य में रमेश की गूँजती आवाज़। पत्थर के गिरने-डूबने का स्वर, उस तालाब में जहाँ रमेश का स्वर गूँजता है। ''जहाँ अथाह काला जल है... अँधेरा है... इस तालाब में कइयों ने जाने दी हैं।‘’ फिर वो एक दृश्य रमेश और केशव के बीच 'कला के तीन क्षणÓ वाली बहस का। और एक सन्नाटा, सन्नाटे को मूर्त करने की कोशिश, लेकिन मुझे िफल्म में मुक्तिबोध की गरजती, गूँजती आन्दोलित गहराइयों से उठती ध्वनियाँ, भूरी-भूरी खाक धूल, जन-जन के आन्दोलित चेहरे और आग और चकमक चिंगारियाँ, जुलूस, मशाल, बरगद पर घुग्घू, खिलते गुलाब और कमल और भविष्य की उम्मीद का प्रतीक वो बच्चा, सुबह की धूप आदि, मुक्तिबोध की दृष्टिï और मेधा के रास्ते मूर्त होते नहीं दीखते बल्कि मणिकौल सन्नाटे की तरह रचते दृश्यों-रंगों और ध्वनियों में उसे अस्मिता मूलक बनाते लगते हैं। बहरहाल... मेरा यह पाठ गलत लगे या हो सकता है, लेकिन मेरे सामने सवाल एक बनता है जिसका उत्तर मैं खोजना चाहता हूँ। वो यह कि क्या मुक्तिबोध की कविताओं में उभरे कथ्य, मिथ, या गाथा, या फिर प्रतीकों और बिम्बों को अलग-अलग स्वायत्त ढंग से समझा जा सकता है। हमारी अधिकांश आलोचना वस्तु या कथ्य केंद्रित है। वस्तु और कथ्य को मुक्तिबोध के दृश्यों, चित्रों, ध्वनियों, रंगों के स्टिल या गतिशील तत्वों से जोड़कर शायद नहीं देखा गया है जबकि इनके बिना मुक्तिबोध के कथ्य या वस्तु अपने आधार या संरचना को पूर्ण नहीं बनाते। बस... यहीं से मैं ऑडियो और वीडियो इमेजरी के साथ कविताओं का एक अपना पाठ बनाने की जद्दोज़हद में बना रहा हूँ। एक साहित्यिक की डायरी में मुक्तिबोध अपनी रचना प्रक्रिया के बारे एक सूत्र देते हैं—''होना यह चाहिए कि ज्ञान आँखों में सुनहला अंजन लगा दे, दृश्य को नि:सीम और अत्यन्त मनोहर कर दे।‘’ यह वीडियो इमेजरी है। वे आसमान का चित्र नहीं साधते, बल्कि मैले डबरे में सूरज के बिम्ब का चित्रण करते हैं जो उनके जीवन सत्य के ज़्यादा नजदीक है। मैं उनके जीवन-सत्य को सिर्फ वस्तु के एक कोण से नहीं देख पाता अपितु पूरे आब्जेक्ट में पकडऩा चाहता हूँ जैसे वस्तु को दृश्य, चित्र, रंग, ध्वनि की गतिशील अवस्था में मुक्तिबोध पकड़ते हैं। और मुझे पहले 'डूबता चाँद कब डूबेगा’ में कथ्य के साथ एक वीडियो इमेेज मिलती है—

'घन-तम में लाल अलावों की नाचती ज्वालाओं में। मृदु चमक रहे जन-जन मुख पर, आलोकित ये विचार हैं, अब यह घटना बार-बार होगी। शोषण के बन्दीगृह जन में, जीवन की तीव्र धार होगी।‘  मुक्तिबोध की इस दृष्टिï में जहाँ वर्तमान से भविष्य में खुलने वाला महान दृश्य है। लेकिन जन-जन के मुख पर आलोकित विचार को और उसकी भविष्य में होने वाली जीवन की तीव्र धारा का िफल्मांकन कठिन है। मुक्तिबोध दरअसल िफल्मांकन के व्याकरण और शिल्प को भी अतिक्रमित करने वाले कवि हैं। उनके दृश्य ज्ञानमय आँखों से नि:सीम हो उठते हैं। दृश्य का नि:सीम होना और कुछ नहीं, उनके ज्ञानात्मक अभिप्रायों की महान वीडियो इमेजरी है, जो घन-तम में लाल अलावों की नाचती ज्वालाओं में अपने दर्शन को मूर्त करती हैं। उनकी कविता में उर्जस्वल, भव्य, स्वादेयित और रक्तांकित मुखमंडल विशिष्टï प्रतीक हैं जो विराट पुरूष और रक्तस्नात पुरूष के कई चेहरों में हैं, जो उनकी कई कविताओं में आकार लेते हैं मसलन— 'मेरे सहचर मेरे मित्र, लकड़ी का बना रावण, अँधेरे में, चम्बल की घाटी में कभी वो प्रत्यक्ष तो कभी प्रतीक और बिम्ब में मिलता है। ये दूसरी कविताओं में भी है-कहीं तप्तमुख, कहीं कुहरीली भाप का चेहरा और कहीं बादलों में बनते चेहरे के रूप में आदि।

(5)

मित्रो! मुक्तिबोध की कविताओं को पढ़ते, और-और-और पढ़ते हुए, मुझे अपनी हालत उनकी इन पंक्तियों की तरह लगने लगती है—

''ज्यों कोई च्यूँटी शिलालेख पर चढ़ती है अक्षर-अक्षर रेंगती वहीं कुछ पढ़ती है। त्यों मन। भीतर के लेखों को छू लेता है... बेचैन भटकता है, बेकार ठिठकता है... पर पकड़ नहीं पाता उसके अक्षर...’’

ये है मुक्तिबोध की भी ठिठक, बेचैनी और पकड़ न पाने की असहायता इसलिए वे अधूरी कविताओं के साथ 'अँधेरे में’ की ओर बढ़ते हैं, उसमें धँसते हैं, जलते सत्य का अर्जन करते हैं और तब कहीं 'अँधेरे में’ कालजयी कविता हो उठती है।

आइये अब उनकी कविताओं के कथ्य के साथ मिथक, प्रतीक और बिम्बों के साथ ऑडियो-वीडियो की सम्बद्ध इमेजरी को देखें। हाँ! एक बात और मुक्तिबोध के ऐंद्रिक लोक के रास्ते ही इन इमेजेस को समझा जा सकता है— पहले कुछ अमर वीजुअल्स इमेजेस को याद करें। 'भूल गलती’ की ये पंक्तियाँ :

सामने। बेचैन घावों की अजब तिरछी लकीरों से कटा-चेहरा।

कि जिस पर कांप दिल की भाप उठती है।

पहने हथकड़ी वह एक ऊँचा कद, समूचे जिस्म पर लत्तर।

झलकते लाल लम्बे दाग-बहते खून के

वह कैद कर लाया गया ईमान

सुल्तानी निगाहों में निगाहें डालता, बेखौफ नीली बिजलियाँ फेंकता।

खामोश... सब खामोश। मनसबदार, शाइर और सूफी।

अल गज़ाली, इब्ने सिन्ना, अलबरूनी, आलिमो फाजि़ल सिपहसार, सब सरदार हैं खामोश...।

यहाँ िफल्म की विलक्षण इमेजरी है, जिसमें संवाद नहीं नरेशन है मानो ओमपुरी की आवाज़ या सोहराब मोदी की।

इस ऐतिहासिक गतिशील काव्य दृश्य का सिरा जुड़ता है 'अँधेरे में’ के इस दृश्य से—

'चुप... साहित्यिक चुप... तख्त पर है सुल्तान, सामने कैदी है ईमान। कतारों में खड़े खुदगर्ज बा हथियार। बख्तर बन्द समझौते।‘ इसलिए मुझे लगता है मुक्तिबोध की सारी कविताओं से गुजरे बिना, मुक्तिबोध की उस मन:स्थिति, उस जलते दर्शन को समझना असम्भव है जहाँ 'अँधेरे में’ कविता में वे पूर्णत: आविष्कृत होते हैं। उनकी दृष्टिï को आज की चुप्पी, संशय और घनघोर अँधेरे से जोड़कर देखिये तो शिलालेख में दजऱ् इबारतों का अर्थ दिखेगा।

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आइये कुछ और कथ्य से सम्बद्ध इमेज़ेस पर गौर करें—

'ब्रह्मïराक्षस’ की कविता का यह अंश— 'बावड़ी को घेर, डालें खूब उलझी हैं। खड़े हैं मौन औदुम्बर व शाखों पर। लटकते घुग्घूओं के घौंसले परित्यक्त, भूरे, गोल।‘यहाँ कैमरा लाँग शॉट से मिड शॉट और फिर घोंसलों तक क्लोज अप में आता है। यह टॉप एंगल यानि ऊपर से नीचे की बावड़ी का लिया दृश्य भी अभिकल्पित होता है। यह िफल्म निर्देशक के विज़न से ही सम्भव है कि वह इस काव्य दृश्य को कैसे देखता है।

'चाँद का मुँह टेढ़ा है’ का यह दृश्य— 'कारखाना-अहाते के उस पार। ध्रुम मुख चिमनियों के ऊँचे-ऊँचे। उद्ïगार-चिन्हाकार-मीनार, मीनारों के बीचों-बीच। चाँद का मुँह टेढ़ा है’

यह कठिन दृश्य एक्सट्रीम लाँग शॉट से लाँग शॉट। इंटरकट में कहीं नीचे से दीखता या बगल से क्लोजअप में 'चाँद का टेढ़ा मुँह’ बनता है। बतायें ये टेढ़ा मुँह कोई िफल्मकार कैसे फिल्मांकित करेगा। यह इमेज की जटिलता, कम्पोज कैसे होगी, लेकिन ये वीडियो इमेज ही आपको कथ्य में छिपे अर्थ का रास्ता देती है बिना इसके उस तक पहुँचने का मार्ग बन्द है। ये पूरी कविता दृश्यों से भरी है यानि दृश्य & दृश्य से।

एक अन्त:कथा का ये दृश्य— 'अग्नि के काष्ठï खोजती माँ। बीनती नित्य सूखे डण्ठल। सूखी टहनी। सूखी डालें। घूमती सभ्यता के जंगल। वह मेरी माँ। खोजती अग्नि के अधिष्ठïान।‘

मित्रो! मुक्तिबोध की कविता में श्रमजीवी स्त्रियों के कथ्य के साथ अनेक दृश्य और चित्र हैं, जो निराला की स्त्रियों से जुड़ते हैं। हम गहरे स्त्री विमर्श को पाते हैं इन दृश्यों में।

चम्बल की घाटी में आइये

'अजनबी हवाओं की तेज़ मार-धाड़। बरगदों बबूलों को तोड़-ताड़, फाड़ क्षितिज पर अड़े हुए— पहाड़ों से छेड़-छाड़। नहीं कोई आड़। मद्धिम चांदनी में, हवाओं के हमलों में। मैं अधखुले रहस्यों में। टीलों के बीच जाने किस िफक्र में घूम रहा हूँ। कौन सी िफक्र।‘

इसका मेरा एक पाठ पर्यावरण का, जलवायु परिवर्तन की विभीषिका का भी बनता है। इस तरह के कई दृश्य हैं आज के सुपरिचित पाठ। चम्बल की घाटी में नदी के डूबने की अन्तर्कथा है, पक्षियों के चीत्कार आदि हैं। स्याह अँधेरा, जिन्न। भयानक गुहा। खोह। दस्यु। उजाड़। हथियार। कारखाने खोलने की कामना। गिरोह और अँधेरे में दुष्टï सत्ता है, आतंक फैलाने की तरफ संकेत हैं। कंधे पर बालक है। पीठ पर बच्ची है। गिद्ध है। पानी की नीली काली सतह है।ï सत्ता है, पीडि़त जन हैं, दाँव-पेंच, झगड़े व युद्ध हैं आदि। ये प्रतीक, बिम्ब, इमेजेस आपको कई कविताओं के साथ 'अँधेरे में’ भी मिलते हैं। अर्थात मुक्तिबोध  के संवेदनात्मक अभिप्राय इस कविता में— 'अँधेरे में’ कविता के अनकरीब हैं। दोनों कविताओं में मन:स्थिति एक सी प्रतीत होती है। शायद इसी वजह से मुक्तिबोध ने इस कविता के ठीक बाद 'अँधेरे में’ को छापने का सुझाव दिया था।

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आइये अब 'अँधेरे में’ कथ्य से सम्बद्ध वीडियो इमेजेस पर गौर करें।

मैं स्मरण दिलाना चाहूँगा उस विराट पुरुष की कल्पना के बारे में जो अन्य कविताओं में बार-बार आता है आखिर कौन है वह, और उसमें संकेत क्या हैं, उसका वास्तविक अर्थ क्या है। 'अँधेरे में’ यह 7 बार आता है। क्या यही वो विशिष्टï प्रतीक है जिसमें मुक्तिबोध की बेचैनी और सत्य की खोज है। क्या यही वो विज़न है या उसका पूर्वरंग?

यह पहला अंश :

'जि़ंदगी के... कमरों में अँधेरे, लगाता है चक्कर। कोई एक लगातार। आवाज़ पैरों की देती है सुनाई। बार-बार... बार-बार... वह नहीं दीखता, किंतु वह रहा घूम।‘

दूसरा अंश :

'खुद-बखुद कोई बड़ा चेहरा बन जाता है स्वयमपि। मुख बन जाता है दिवाल पर। नुकीली नाक और भव्य ललाट है। दृढ़ हनु। कोई वह दिखाई जो देता, पर नहीं जाना जाता है।‘

तीसरा अंश :

सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति, कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है। और मुसकाता है। पहचान बताता है। किंतु मैं हतप्रभ। नहीं वह समझ में आता।

चौथा अंश :

कुहरे में, सामने रक्तानात पुरूष एक। रहस्य साक्षात। तेजो प्रभावमय उसका ललाट देख। मेरे अंग में अजीब एक थर-थर। गौरवर्ण, दीप्त है। सौम्य मुख। सम्भावित स्नेह-सा प्रिय-रूप देखकर। विलक्षण शंका। भव्य आजानुभुज देखते ही साक्षात। गहन एक संदेह।

वह रहस्यमय व्यक्ति। अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है।

पाँचवाँ अंश :

वह निकल गया है गाँव में, शहर में। उसको तू खोज अब। उसका तू शोधकर। वह तेरी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति। उसका तू शिष्य है-

(यद्यपि पलातक...) वह तेरी गुरु है, गुरु है...।

छठवाँ अंश :

अनखोजी निज समृद्धि का वह उत्कर्ष। परम अभिव्यक्ति। मैं उसका शिष्य हूँ। वह मेरा गुरु है। गुरु है।

सातवाँ अंश :

'खोजता हूँ पठार... पहाड़... समुन्दर जहाँ मिल सके मुझे मेरी वह खोयी हुई। परम अभिव्यक्ति अनिवार। आत्म सम्भवा।Ó यह लम्बी कविताओं में आत्मसंघर्ष की अभिव्यक्ति से परम अभिव्यक्ति की यात्रा है।

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मित्रो! अपनी अनेक कविताओं में और 'अँधेरे में’ विशेष कर जिस सत्य को मुक्तिबोध बेचैनी में ढूँढ रहे थे, वह उनके लिए क्या परम अभिव्यक्ति की खोज थी? गुरु वह ब्रह्मïराक्षस हो सकता है, ज्ञान आँख हो सकता है। मुक्तिबोध परम अभिव्यक्ति को 'आत्म सम्भवा’ कहते हैं। लेकिन यहाँ वह स्वयं को शिष्य के रूप में पाते हैं, गुरु नहीं। और गौरतलब यह है कि गुरु व शिष्य दोनों एक निर्जन अभिशप्त एकान्त में क्रमश: 12 वर्षों के लिए ज्ञान की साधना या विस्तार के लिए कैद हैं यानि सकर्मक जीवन से दूर। क्या इसी परम अभिव्यक्ति से खतरे उठाने हैं, मठ और गढ़ तोडऩे हैं, क्रान्ति के रास्ते में जोडऩा है उस मनु को जो प्रसाद का नहीं, मुक्तिबोध का फटेहाल मनु है जन-जन में। जिसे उन्होंने इस तरह पाया और चित्रित किया है।

'किन्तु, वह फटे हुए वस्त्र क्यों पहने हैं?

उसका स्वर्ण-पर्ण मुख मैला क्यों?

वक्ष पर इतना बड़ा घाव कैसे हो गया?

उसने कारावास-दुख झेला क्यों?

उसकी इतनी भयानक स्थिति क्यों है?

रोटी उसे कौन पहुँचाता है?

कौन पानी देता है?

फिर भी, उसके मुख पर स्मित क्यों है?

प्रचण्ड शक्तिमान क्यों दिखता है?’

('अँधेरे में’— पुन: शामिल पंक्तियाँ जो 'चाँद का मुँह टेढ़ा है’ किताब में नहीं थीं।)

मैं अपनी बात संकेतों में कर रहा हूँ। और अब लौटते हैं कथ्य से जुड़ी आडियो-वीडियो इमेजरी में। हालाँकि ये इमेजेस आपको इन लम्बी कविताओं में भी हेर-फेर और एक सी प्रतीति के साथ मिलेंगी, मैं गत एक वर्ष से जिनका पाठ कर रहा हूँ और करता रहूँगा। कविताएँ हैं— भूल गलती। ब्रम्हराक्षस। दिमागी गुहान्धकार का औरांट-उटांग। लकड़ी का बना रावण, डूबता चांद कब डूबेगा, मुझे पुकारती हुई पुकार, मुझे कदम-कदम पर, मेरे सहचर मेरे मित्र, एक अन्त:कथा, एक अरूप शून्य के प्रति, ओ काव्यात्मन फणिधर, चकमक की चिंगारियाँ, एक स्वप्न कथा, अन्त:करण का आयतन, इस चौड़े ऊँचे टीले पर, चम्बल की घाटी में और अँधेरे में।

आइये पहले कुछ— ऑडियो, वीडियो इमेजेस और देखें :

1.      दिमागी गुहान्धकार का ओटाँग-उटाँग

       'सुनता हूँ ध्यान से। अपने ही शब्दों का नाद, प्रवाह और पाता हूँ स्वयं के स्वर में। औरांग-उटांग की बौखलाती हुंकृति ध्वनियाँ।‘ —(ऑडियो इमेजरी)

2. चाँद का मुँह टेढ़ा है

       'चप्पलों की छप-छप। गली के मुहाने से अजीब-सी आवाज़। फुसफुसाते हुए शब्द। जंगल की डालों से गुजरती हवाओं की सर-सर।‘ —(ऑडियो)

3. मुझे पुकारती हुई पुकार

       'मुझे पुकारती हुई पुकार खो गयी कहीं। संवारती हुई मुझे। उठी सहास पे्ररणा। प्रभात भैरवी जगी-अभी-अभी’— (ऑडियो)

4. मेरे लोग

       उभरते काँपते हैं वायलिन के स्वर सहज गुंजारती झंकार, गहरे स्नेह सी मीठी सघन विस्तृत भटकती गूँज जिसकी सान्द्र ध्वनि में से झुकी मल रश्मियों के पुंज — (ऑडियो)

5. चकमक की चिंगारियाँ

       'दिवालें ले रही हैं आलाप। पत्थर गा रहे हैं तेज़। तूफानी हवाएँ धूम करती, गूँजती रहतीं। उखड़ते चौखटों में ही। खड़-खड़ खिड़कियाँ नचतीं। भड़ाभड़ सब बजा करते खड़े बेडौल दरवाजे।‘ — (ऑडियो)

6. अन्त:करण का आयतन

       'इतने में कहीं से आ रहा है पास कोई जादुई संगीत-स्वर आलाप’ — (ऑडियो)

7. चम्बल की घाटी में

       'अब तक अथाह जो भरी-पूरी नदी थी। वही आज। अपनी ही घाटी में डूब मरी। चम्बल के यहाँ आके। पैर उखड़ गये। तुमने बहुत देर कर दी। तुमने बहुत देर कर दी। पानी की खोहें और थाहें सब सूख गयीं। तले सब फट गये। दरारों में प्यास भर गयी हैं। भूख भरी गहराई खुली पड़ी कब से। जाने कब से’ — (वीडियो)

और अन्त में 'अँधेरे में’ का एक अंश ‘ — (कथ्य के साथ ऑडियो वीडियो)

''काले-काले घोड़ों पर खाकी मिलिट्री ड्रेस। चेहरे का आधा भाग सिंदूरी गेरूआ। आधा भाग कोलतारी। आबदार। कंधे से कमर तक कारतूसी बेल्ट है तिरछा। कमर में, चमड़े के कवर में पिस्तौल। रोषभरी एकाग्र दृष्टि में धार है। कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल मार्शल। कई और सेनापति— सेनाध्यक्ष। चेहरे वे मेरे जाने-बूझे से लगते। उनके चित्र समाचार पत्रों में छपे थे। उनके लेख देखे थे। यहाँ तक कि कविताएँ पढ़ी थीं। उनमें आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण, मंत्री भी, उद्योगपति और विद्वान। यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात। डोमाजी उस्ताद।‘’

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दोस्तो! मैंने कथ्य से सम्बद्ध आडियो-वीडियो इमेजेस, चित्र, प्रतीक, बिम्ब का मोतांज यहाँ प्रस्तुत किया है, जिसके भीतर मुक्तिबोध की दृष्टि, विचार, रंगलोक और दर्शन एक महानतम हो सकने वाली िफल्म में अन्तर्भुक्त हैं। किसी एक को अलगाकर या छोड़कर आप कविता के आशय, अर्थ या मर्म तक नहीं पहुँच सकते। ऐसा मैंने अपने अनेक पाठों से जाना। बिनचाहते बहुत सारा महत्वपूर्ण छूट गया है। मैं जो कुछ बता पाया वह संकेतों में है। अपनी इस बात को कहने के लिए, एक पूरी किताब कम होगी। अब मुक्तिबोध के रंगलोक के बारे में कुछ बातें—

दोस्तो, िफल्म का रंगों से गहरा सम्बन्ध और सहमेल होता है। मुक्तिबोध के प्रिय मूल रंग हैं काला, स्याह, भूरा, साँवला, राखड़ा, कुहरीला, लौह, पत्थरी, धूल रंग, तेलिया, नीला, आसमानी स्याह, खाकी अर्थात धूमिल रंग जगत। अब इन रंगों का सम्बन्ध तो किसी रहस्यलोक, किसी हॉरर िफल्म से बनता है। अब ये चुनौतीपूर्ण और जटिल काम है फिर मुक्तिबोध का कथ्य सीधा नहीं टेढ़ा, तिरछा और तिर्यक है सो िफल्म निर्माण एक जटिल काम हो जाता है। मणिकौल की िफल्म भी इस चुनौती से गुजरती है और सर्वहारा के मुक्तिबोध को पकडऩे में चूक जाती है। मुक्तिबोध खुद अँधेरे में थे सत्य की बेचैन खोज में, परम अभिव्यक्ति के अर्जन के लिए प्रतिश्रुत-प्रतिबद्ध, लेकिन वे कुछ और रंगों के साथ यात्रा करते हैं जिनसे एक प्रतीकात्मक िफल्म बनती है। जिस तरह अभी गिनाये गये रंगों को ध्यान से देखें वे विशिष्टï प्रतीकों, बिम्बों, मिथकीय और इतिहास के कुछ पात्रों के साथ दृश्य में आते हैं और आब्जेक्ट कविताओं में कथ्य के साथ स्पष्टïता में स्थापित हो जाता है, चाहे वे इमेजेस स्टिल में हों या मूव्ही के रूप में। उसी तरह वे इनके साथ जिन रंगों को लाते हैं, वे हैं— लाल, सिन्दूरी,  गेरुआ, आग और ज्वाला के रंग, बिजली के रंग, स्फटिक, पीत, गंभीर लाल, चमचमाते प्रदीप्त रंग, गुलाब और कमल के रंग, रक्तयुक्त दीप रंग, ज्वालामुखी के खौलते रंग, सुरभीला धुँआ रंग, सफेद कीचड़ के रंग, करौंदे और भटकटैया के रंग आदि-आदि। तो इस तरह िफल्म के लिए एक जुदा रंग जगत भी है, जो अँधेरे के सगोत्रीय रंगों के बरक्स एक इफेक्ट पैदा करते हैं— साथ में नेपथ्य संगीत में धकधक, उसाँस, गूंज की भी गूँज, छपछप प्रभाती, मधुर वैदिक ऋत्राओं का पाठ संगीत, ध्वनि-प्रतिध्वनि का नाद, शब्दों का पाठ नहीं नाद प्रवाह, हवाओं की सरसर, हनुमान चालीसा का डूबी हुई बानी में गान, भैरों की भयानक हँसी, सूखे प्राणमय प्राणों की हँसी, वेदना की कराह, जंगली जानवरों की लयबद्ध आवाज़ें, लोहे के नालों की टाँपों की गूँज, रात की साँय-साँय, पुकारती हुई पुकार के खोने की अनुगूंज आदि ऑडियो इमेजेस जो कथ्य को वीडियो इमेजेस और स्टिल चित्रों के साथ मूर्त करते चलते हैं। अर्थात कठिन और जटिल िफल्म की सारी प्रापर्टीज मुक्तिबोध अपनी कविताओं में देते हैं।

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अन्त में एक और अत्यन्त महत्वपूर्ण सूत्र मिलता है कि मुक्तिबोध का ज्ञानात्मक संवेदन, जन के विरुद्ध भयानक बनती स्थितियों में परिवर्तन के लिए किसी नेतृत्च को ढूँढता है, क्योंकि अपनी बिरादरी के मध्यवर्ग की अवसरवादिता से वे हताश हो चुके हैं। जन-जन में क्रान्ति के लिए वे मानो एक नेतृत्व की तलाश अपनी बेचैनी में करते हैं। वे तिलक, गाँधी से निराश हैं। यहाँ तक नेहरू में भी वे वैचारिक या कहे ज्ञानात्मक दृष्टि तो देखते हैं लेकिन उसे ऐसा शायद नहीं पाते जो अन्य महादेशों की तरह क्रान्तिकारी परिवर्तन में सक्षम में हो। मृत्यु के समय अपनी बड़बड़ाहट में वे नेहरू की तबियत के बारे में दरयाफ्त करते हैं, जो एक गहरा संकेत है। उनकी कविताओं में जो ब्रह्मïमुख, विराट पुरुष और रक्तस्नात पुरुष आते हैं, उनके बारे में बात करते हुए मुक्तिबोध उनके वैचारिक स्वप्न में उनका सकर्मक होना नहीं देखते है। यानि वे वैचारिक रूप से तो तैयार हैं— ब्रह्मï के विशिष्टï प्रतीकों में, ज्ञानी भी हैं, किन्तु उनका ज्ञान सकर्मक नहीं हो पाता यानि परिवर्तन या क्रान्ति में उनका नेतृत्व मुक्तिबोध को नाकाफी लगता है और इस त्रासद स्थिति के कई संकेत कविताओं में हैं। उनकी कुछ कविताओं में यह 'सकर्मक' शब्द गूँजता रहता है। और वे शिशु या बालक के विशिष्टï प्रतीक में सकर्मक ज्ञान की आशा को देखते हैं और उसके साथ जनता पर भरोसा करते हैं।

और एक तथ्य गौरतलब है कि स्थानीयता से उपजा उनका विश्वबोध कारणों की तलाश में हिन्दुस्तान तक महदूद नहीं है। वे कई जगह इस बात का संकेत करते चलते हैं, सिर्फ एक उदाहरण—

'आत्मविस्तार यह। बेकार नहीं लाएगा। ज़मीन में गड़े हुए देहों की खाक से। शरीर की मिट्ïटी से, धूल से। खिलेंगे गुलाब।‘

एक अन्तिम बात। मुक्तिबोध 'एक साहित्यिक की डायरी में शिद्ïदत से विवेकानन्द को याद करते हैं। उनसे सहमत हैं। दुर्भाग्य कि माक्र्सवादियों ने उन्हें छोड़ दिया। उनके विचारों को मुक्तिबोध ने अपने स्वप्न, अपने विज़न से कभी ओझल नहीं होने दिया। कुछ पंक्तियाँ जो मुक्तिबोध ने 'एक साहित्यिक की डायरी में लिखीं, वे विवेकानन्द के विचार हैं— (रूसी क्रांति के पूर्व के)

1.      मैं एक समाजवादी हूँ, इसलिए नहीं कि वह एक सर्वगुण सम्पन्न व्यवस्था है बल्कि इसलिए कि रोटी के अभाव की अपेक्षा आधी रोटी बेहतर होती है। अन्य व्यवस्थाओं की परीक्षा की जा चुकी और उनमें अभाव ही अभाव पाये गये। अब इस (व्यवस्था) की भी परीक्षा कर ली जाये, अगर और किसी बात के लिये नहीं तो केवल नवीनता के लिए क्यों न सही।

2.     भारत की एकमात्र आशा उसकी जनता है। उच्चतर वर्ग दैहिक और नैतिक रूप से मृतवत हो गये हैं।

स्मरण करें मुक्तिबोध भी परिवर्तन से क्रान्ति तक जनता में ही अपने महास्वप्न का फलीभूत होना देखते हैं। वे उच्चतर वर्ग से अवसर परस्त मध्यवर्ग को भी किसी क्रान्ति में शामिल नहीं करते। 'अँधेरे’ में कविता जो निष्कर्षीय है, वह जनता के पक्ष में है जो आज नहीं तो कल आज के शिशुओं, बालकों के रास्ते भविष्य में परिवर्तन का, क्रान्ति का रोडमेप बनेगी। वही सकर्मक होगी...। 'अँधेरे में’के साथ उनकी अन्य कविताओं का मेरे लिए फिलहाल यही पाठ बनता है।

 

मुक्तिबोध का विज़न : कुछ पंक्तियों में

समस्या एक

मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों में

सभी मानव

सुखी, सुन्दर व शोषण मुक्त कब होंगे

 

यह कविता में आया विज़न है स्थानीय, महादेशिक और सार्वभौमिक है और इसलिए मुक्तिबोध बीती से आज की सदी तक के अन्तिम कवि हैं आधुनिक दौर के। उनकी आधुनिकता में भारतीय क्लासिक्स का स्मरण बना हुआ है जबकि हमारे दौर की कविता में यह जुड़ाव न के बराबर है।

दो हमविचार कवि : एक विचार

मुक्तिबोध की तरह शंख घोष, बंगला कवि की कविता में भी एक बात पारदर्शी सोच की तरह उभरती है। कुछ पंक्तियाँ—

                           1.

'भिलाई में कौन दौड़ रहा है, छत्तीसगढ़ के गाँवों की तरफ

किसका सर है, कितना किसका झमाझम नाच होगा किस रास्ते

पर कौन-सा रास्ता होगा और ज़्यादा द्रुतगामी विचार देने से पहले

जान लो, पूछ लो प्रश्न-तुम किस पार्टी के हो’

                                      2.

'आत्मघाती फाँसी से लाश उतार कर ला

उसके कानों से पूछो तुम किस पार्टी में हो?’

मुक्तिबोध भी जीवन भर पूछते रहे अदद दो सवाल— 'पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’ और 'तय करो कि किस ओर हो तुम।‘ जिन लोगों में अस्पष्टता और अवसरपरस्ती बनी रही और जो अपनी स्थानिक अस्मिता, सच और ईमानदारी से च्युत होते रहे— उक्त दोनों कवियों ने उन्हीं बेशर्म लोगों में क्षरण को रेखांकित करते हुए अपना सिर्फ गहरा हस्तक्षेप ही दजऱ् नहीं किया अपितु आगाह किया। इसे मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता। ये दो समानधर्मा कवियों की दृष्टि और समझ का बड़ा फलक है। 'शंखदा’ कहते हैं— 'इसके अलावा सारी बातें कैसे कहूँ। बाहर है लेनिन, भीतर है शिव।‘ इन दो पंक्तियों के भी कई अर्थ निकाले जा सकते हैं, लेकिन विचार के लिए प्राचीन और आधुनिक मिथक का यह युग्म लेखकों के अपरिहार्य अर्थ संकेत की ओर आकृष्ट करता है। मुक्तिबोध भी तालस्ताय को याद करते हैं और मिथकों में भी जाते हैं।