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Tuesday 21 Nov 2017

कार्यस्थल के खतरे

हार्वे वाइनस्टीन, यह नाम कुछ दिनों पहले तक फिल्मों में सफलता का पर्याय हुआ करता था। पल्प फिक्शन, क्लर्कस और शेक्सपियर इन लव जैसी कई मशहूर फिल्में वाइनस्टीन ने बनाईं। उनकी बनाई 81 फिल्में आस्कर अवार्ड जीत चुकी हैं और लगभग तीन सौ बार आस्कर के लिए नामित हो चुकी हैं। हॉलीवुड के कई चर्चित चेहरे वाइनस्टीन  की खोज हैं। शायद इन्हींकारणों से उन्हें मूवी मुगल कहा जाता था। लेकिन आज हार्वे वाइनस्टीन एक गंभीर अपराध के आरोपी हैं। एक, दो नहींबल्कि दो दर्जन से अधिक महिलाओं ने उनके ऊपर यौन शोषण या रेप के आरोप लगाए हैं।

अभिनेत्री रोज मैकगोवान, एंजेलीना जोली, गिनिथ पॉल्ट्रोव, एशली जु़ड, एशिया अर्जेंटो, लूसिया इवांस जैसी कई जानी-मानी हस्तियों ने स्वीकार किया है कि हार्वे ने उन्हें फिल्मों में काम देने के बदले दैहिकशोषण किया। चूंकि हार्वी की पहुंच बहुत ऊंची है, तो उनके दुराचार के खिलाफ आवाज उठाने का साहस पीड़िताओं का नहीं हुआ। लेकिन न्यूयार्कर नामक पत्रिका में एक खोजी लेख इस बारे में छपा, तो हार्वे के शोषण का शिकार कई महिलाओं ने अब खुलकर बोलना शुरु कर दिया है।

अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराकओबामा और डेमोक्रेटिक उम्मीदवार रही हिलेरी क्लिंटन ने भी बाकायदा बयान जारी कर हार्वे की निंदा की है। हार्वे वाइनस्टीन ने चुनावों के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी को चंदा भी दिया था, हिलेरी क्लिंटन ने इस घटना के बाद चंदे को लौटाने का इरादा जतलाया है। ऑस्कर अकेडमी ने भी वीनस्टीन के खिलाफ कड़ा कदम उठाते हुए उन्हें अकेडमी से बाहर कर दिया है और ब्रिटिश एकेडमी अवार्ड्स यानी बाफ्टा ने ऐसा ही कदम उठाया है। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगने के बाद हार्वे की पत्नी जॉर्जीना चैपमैन ने उन्हें छोड़ने का फैसला किया है।

पाश्चात्य देशों में हमारे देश की तुलना में समाज में खुलापन अधिक है। इसलिए यौन उत्पीड़न के खिलाफ महिलाएं खुलकर सामने आने की हिम्मत दिखा रही हैं। लेकिन महिलाओं के प्रति जो अपराध वहां के फिल्मी समाज में होता रहा है, वह भारत में भी होता है, फर्क इतना ही है कि यहां समाज में निंदा, अपमान आदि के भय से महिलाएं आवाज उठाने में कतराती हैं। हिन्दी फिल्म जगत में कई ऐसी फिल्में बनी हैं, जिनमें इस दुष्प्रवृत्ति को दर्शाया गया है, लेकिन सामने आकर बोलने का साहस कम लोग ही करते हैं। कुछेक महिलाओं ने  यौन शोषण की शिकायत की भी तो उन पर ही ऊंगली उठाने की कोशिश की गई। लेकिन हार्वे वाइनस्टीन  प्रकरण के बाद प्रियंका चोपड़ा ने कहा कि हमारी इंडस्ट्री में भी ऐसा ही होता है। सेंसर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष पहलाज निहलानी का भी कहना है कि हॉलीवुड की तरह बॉलीवुड में भी हार्वे वाइनस्टीन  जैसे लोग भरे हुए हैं और उन्हें भी जल्द से जल्द बेपर्दा किया जाना चाहिए।

घर की दहलीज लांघ कर नौकरी करना भारतीय समाज में महिलाओं के लिए आसान नहींरहा है। लक्ष्मण रेखा को महत्व देने वाले समाज में आर्थिक आजादी हासिल करने के लिए महिलाओं को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कार्यस्थल पर दैहिक शोषण से बचना ऐसी ही एक कठिन चुनौती है। अगस्त 1997 में महिलाओं के लिए कामकाज का सुरक्षित माहौल बनाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने विशाखा गाइडलाइन्स जारी की थी। अदालत का कहना था कि यौन उत्पीड़न की हर घटना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 15 तथा 21 के तहत् मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है तथा अनुच्छेद 19 (1) (जी) के अधीन स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने कार्यालय में यौन उत्पीड़न रोकने के लिए कुछ निर्देश जारी किए थे, जैसे यौन उत्पीड़न निवारण के लिए कंपनी की आचार संहिता में नियम शामिल करना।

अनिवार्य रूप से शिकायत समितियों की स्थापना करना, जिसकी प्रमुख महिला ही हो आदि। इसके बाद निश्चित ही महिलाओं की कार्यस्थिति में सुधार हुआ। लेकिन फिल्म, थियेटर, नृत्य-संगीत अकादमी, मीडिया ऐसे कई क्षेत्रों में जहां काम के घंटे और स्थान अनिश्चित होते हैं और जहां महिलाओं को बंधे-बंधाए दायरे से बाहर निकलकर अपनी क्षमता दिखलानी होती है, वहां उनके दैहिक शोषण के खतरे बढ़ जाते हैं। इस स्थिति को कैसे सुधारा जा सकता है, इस पर भी विचार होना चाहिए। 

कुछ दिनों पहले अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने सोशल मीडिया पर हैशटैग मी टू की शुरुआत की। उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर एक ट्वीट करते हुए कहा था कि जो भी महिलाएं कभी भी यौन उत्पीड़न का शिकार हुईं है वे हैशटैग मी टू के साथ अपनी कहानी शेयर करें। देखते ही देखते यह हैशटैग एक आंदोलन में बदल गया है। अमरीका, ब्रिटेन और कनाडा के बाद भारत में यह सबसे ज्यादा चलन में है। इससे जाहिर होता है कि भारत में महिलाओं के लिए बाहर निकलकर काम करना अब भी सुरक्षित नहीं है। सोशल मीडिया पर आवाज़ उठाने के साथ-साथ समाज और परिवार में भी खुलकर अपनी बात रखनी होगी, तभी हालात सुधरेंंगे।