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Saturday 18 Nov 2017

पत्र

अक्षर पर्व के सितम्बर17 अंक में प्रकाशित प्रस्तावना पढ़ी। प्रेमचंद की कहानियों के बहाने आपने बहुत कुछ कह दिया है। प्रसंगत: यह कहना चाहूंगा कि अगर हिन्दी बड़े भाई की भूमिका अदा करना चाहे तो उसे अपने छोटे भाइयों को साथ लेकर चलना पड़ेगा। संविधान स्वीकृत सभी भाषाओं को अनुवाद के माध्यम से साथ लेकर चलना होगा। साथ ही हिन्दी के दुर्वोधिकरण से बचना होगा। विद्वानों को चाहिए कि वे हिन्दी को एक सहज-सरल भाषा का प्रारूप दें । साक्षात्कार में काशीनाथ जी कैसे कह गए कि अधिक पत्रिकाएं निकल रही है! अस्सी के दशक में तो पत्रिकाएं बंद होने लगी थीं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, सारिका, दिनमान, रविवार, आदि कई बड़ी पत्रिकाएं धड़ाधड़ बंद हो गई। बुक स्टॉल पर कोई ढंग की पत्रिका नहीं मिलती। कुछ लघु पत्रिकाएँ बराबर निकलती, बंद होती रही हों, यह और बात है। बुक स्टॉल पर दिल्ली प्रेस की एवं कुछ छिटपुट अन्य स्वास्थ्य, योग, फैशन, आदि की किताबें मिल जाती हैं। साहित्य तो कब से नदारद है ! यहाँ तक कि पॉकेट बुक्स भी गुम है ! पुस्तकें पढऩे की आदत भी खत्म! अकेले चेतन भगत सरीखे लेखकों को ऑक्सिजन मिल रहा है !

 तपेश भौमिक

आनन्दलोक मॉडल स्कूल/ पो. गुडिय़ाहाटी /कूचबिहार/9851273109/प.बंगाल ।

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अक्षर पर्व कटेंट के लिहाज से तो पहले से ही समृद्घ थी, अब नए रूप-बाने में और भी चित्ताकर्षक हो गई है। आर्टपेपर, उम्दा छपाई, बेहतर ले-आउट ने इसका कायाकल्प कर दिया है। हिन्दी में संप्रति शायद ही कोई पत्रिका विशेष रूप से साहित्यिक पत्रिका इतने बेहतर ढंग से छप रही हो। काफी समय से इससे जुड़े रहने के कारण बड़ा सुखद लगता है। यह अधिकाधिक यशस्वी बने, यही कामना है।

प्रो. ओमीश परुथी, 463, सेक्टर-4, सोनीपत

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ललित जी प्रस्तावना में पुस्तक चर्चा करतेआए हैं। जून अंक में भी ऐसा ही किया है और चर्चित पुस्तक के प्रति जिज्ञासा जगा दी है। प्रेमकुमार जी को 'अभिनव प्रयासÓ में पढ़ता रहा हूं। वे साक्षात्कार विशेषज्ञ हो गए हैं। सच पूछें तो डॉ. बूला कार का लेख सर्वथा पठनीय है। राहुल देव ने व्यंग्य की समस्याएं बताई है। व्यंग्य कविता की धार कुंठित है, ऐसा उनका मानना है। जहीर कुरैशी और केशू की ग़ज़लें  अच्छी हैं।

चन्द्रसेन विराट, 121, बैकुंठधाम कॉलोनी, आनंद बाजार के पीछे, इंदौर-452018 (म.प्र.)

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अक्षर पर्व कटेंट के लिहाज से तो पहले से ही समृद्घ थी, अब नए रूप-बाने में और भी चित्ताकर्षक हो गई है। आर्टपेपर, उम्दा छपाई, बेहतर ले-आउट ने इसका कायाकल्प कर दिया है। हिन्दी में संप्रति शायद ही कोई पत्रिका विशेष रूप से साहित्यिक पत्रिका इतने बेहतर ढंग से छप रही हो। काफी समय से इससे जुड़े रहने के कारण बड़ा सुखद लगता है। यह अधिकाधिक यशस्वी बने, यही कामना है।

प्रो. ओमीश परुथी, 463, सेक्टर-4, सोनीपत

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अक्षरपर्व के अंक बहुत अच्छे निकल रहे हैं। उसमें प्रकाशित सामग्री पर व्यापक प्रतिक्रिया होती है और लोग उसे गंभीरता से लेते हैं। किसी पत्रिका की सार्थकता की इससे बड़ी और क्या कसौटी हो सकती है।

मधुरेश, 372, छोटी बमनपुरी, बरेली-243003

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अक्षरपर्व जुलाई अंक में कहानीकार साबिर हुसैन की कहानी चौथा स्तंभ पसंद आई। कहानी आज के वक्त में और भी प्रासंगिक हो गई है, जबकि मीडिया की प्रतिष्ठा पर कई प्रश्नचिह्नï लगे हैं।

सौम्य, कांदिवली (पूर्व) मुंबई

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अक्षरपर्व के अंक नियमित रूप से प्राप्त हो रहे हैं। सभी अंकों में पठनीय और रोचक सामग्री होती है।

डा.एन.लक्ष्मी अय्यर, चेन्नई