Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

चन्द्रमा का उजास देती रहेंगी, चंद्रकांत देवताले की कविताएं

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता, प्रगतिशील, जनवादी कवि चंद्रकांत देवताले का एक लंबी बीमारी के बाद 15 अगस्त को राजधानी दिल्ली में निधन हो गया। वे 81 साल के थे। हिंदी साहित्य में साठ के दशक में नई कविता का जो आंदोलन चला, इस आंदोलन के वे एक प्रमुख कवि थे। गजानन माधव मुक्तिबोध, नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल जैसे कवियों की परम्परा से वे आते थे। अपने अग्रज कवियों की तरह उनकी कविताओं में भी जनपक्षधरता और असमानता, अन्याय, शोषण के प्रति विद्रोह साफ दिखलाई देता है। 7 नवंबर, 1936 को मध्य प्रदेश के छोटे से गांव जौलखेड़ा, (बैतूल) में निम्न-मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे चंद्रकांत देवताले ने बचपन से ही अपने जीवन में अभाव, अन्याय देखा था और इसे भुगता था। यही वजह है कि उनकी कविताओं में निर्ममतम यथार्थ और व्यवस्था के प्रति गुस्सा दिखाई देता है। देवताले की ज्यादातर कविताएं प्रतिरोध की कविताएं हैं। चंद्रकांत देवताले को पढऩे-लिखने का बचपन से ही शौक था। उनके बड़े भाई के मित्र प्रहलाद पांडेय 'शशि’ जो एक क्रांतिकारी कवि थे, उनकी कविताओं का देवताले के बाल मन पर बड़ा प्रभाव पड़ा। 'शशि’ के अलावा सियाराम शरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन’ और कथाकार प्रेमचंद और यशपाल की कहानियों ने उनके लड़कपन की रुचियों को आकार दिया और तपाया।

 बालकृष्ण शर्मा 'नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह दिनकर जैसे राष्ट्रवादी कवियों को सुन-पढ़कर वे जवां हुए थे। खास तौर पर मुक्तिबोध की कविताओं ने उन्हें बेहद प्रभावित किया था। उनकी कविता 'बुद्ध की वाणी’ को वे बार-बार पढ़ते थे। मुक्तिबोध के प्रति देवताले की ये दीवानगी ही थी, कि जब हिंदी साहित्य में पीएचडी की बारी आई, तो कवि के तौर पर उन्होंने मुक्तिबोध को ही चुना। मुक्तिबोध को जानना उनके जीवन की बहुत बड़ी घटना थी। अपने एक वक्तव्य में उन्होंने खुद यह बात स्वीकारी थी कि ''जादू की छड़ी, सृजनात्मक और एक बेचैनी देने वाला पत्थर, एक घाव, एक छाया, ये तमाम चीजें एक साथ मुक्तिबोध से मुझे प्राप्त हुईं।‘’ मुक्तिबोध के अलावा महात्मा गांधी की किताब 'हिंद स्वराज’ का भी उनके जीवन पर गहरा असर पड़ा। अपने लेख 'किताबें और मैं’ में वे लिखते हैं, ''साल 1955 में महाविद्यालयीन वाद-विवाद प्रतियोगिता मेें महात्मा गांधी का 'हिंद स्वराज’ और विनोबा की 'गीता प्रवचन’ किताब द्वितीय पुरस्कार में प्राप्त हुई। 'हिंद स्वराज’ ने सोचने के लिए स्वतंत्रता, संप्रभुता, देशीयता और अपने समय, समाज, गांव, जीवन की धड़कन के वे संकेत दिए, जो आज के भूमंडलीकरण और बाजारवाद की चपेट में अभी भी हमें बचा सकते हैं।‘’ चंद्रकांत देवताले ने साल 1952 में अपनी पहली कविता लिखी, जो साल 1954 में 'नई दुनिया’ में प्रकाशित हुई। साल 1957 तक आते-आते उनकी कविताएं उस दौर की चर्चित पत्रिकाओं-'धर्मयुग’ और 'ज्ञानोदय’ में भी प्रकाशित हो गईं। चंद्रकांत देवताले की पढ़ाई पूरी हुई, तो रोजगार का संकट पैदा हो गया। चूंकि चंद्रकांत देवताले को लिखने-पढऩे का शौक था, लिहाजा उन्होंने अखबार में नौकरी कर ली। 'नई दुनिया’, 'जागरण’, 'नवभारत’ और 'इंदौर समाचार’ जैसे अखबारों में उन्होंने कुछ समय काम किया। लेकिन ये नौकरी उन्हें रास नहीं आई। बाद में वे अध्यापन में आ गए। मध्यप्रदेश के विभिन्न राजकीय कालेजों में उन्होंने अध्यापन किया और यहीं से वे रिटायर हुए।  

मालवा की मिट्टी से कई बड़े कवियों का नाता रहा है, जिसमें मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, प्रभाकर माचवे, प्रभागचंद्र शर्मा और माखनलाल चतुर्वेदी प्रमुख हैं। इन बड़े कवियों के बीच पहचान बनाना कोई आसान काम नहीं था। ेंचंद्रकांत देवताले ने इन बड़े कवियों के बीच न सिर्फ अपनी एक अलग पहचान बनाई, बल्कि कविता का एक नया लहजा इजाद किया, जो इन कवियों से उन्हें जुदा दिखलाता है। चंद्रकांत देवताले की संवेदनात्मक जड़ें आखिर तक मध्यप्रदेश के गोंडवाना-महाकौशल और मालवा के उस अंचल में रहीं, जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी का ज्यादातर वक्त बिताया। इस अंचल के लोक जीवन को उन्होंने अपनी कविता का विषय बनाया। स्थानीय बोली और यहां की संस्कृति के दर्शन भी उनकी कविताओं में होते हैं। आदिवासियों, दलित जीवन और उनकी समस्याओं, संघर्षों पर देवताले ने जमकर लिखा। सरल शब्दों में लिखी उनकी कविताओं में गजब की संप्रेषणीय क्षमता है। उनकी जीवन दृष्टि और काव्य दृष्टि में कोई फर्क नहीं है। कविता लिखना चंद्रकांत देवताले की नियति थी। कविता के बिना वे जिंदा नहीं रह सकते थे। इसके अलावा वे कुछ जानते भी नहीं थे। अपने एक वक्तव्य में उन्होंने खुद यह बात स्वीकारी थी कि वे पूर्णकालिक कवि हैं, ''जब सौ मासूम मरते होंगे, एक कवि पैदा होता है। मेरे जैसे के भीतर तो कविता का कारखाना कभी बंद नहीं होता। न अवकाश, न हड़ताल। मैं पूरे वक्त का कवि हूँ। संकोची इसे बड़बोलापन समझेंगे, तो मुझे कोई आपत्ति न होगी। इसका यह मतलब नहीं है कि कविताओं का ढेर लगता हूँ। उत्पाद वाला कारखाना नहीं यह। कविताएं बेहद उधेड़बुन और हड़बड़ी में आती हैं। कविता लिखते हुए मैं घिरा हुआ महसूस करता हूँ। उस मुसाफिर की तरह जो यादों, सपनों और अपने यथार्थ के जख्मों का असबाब लिए प्लेटफार्म छोड़ चुकी ट्रेन पकडऩे दौड़ता है और जैसे-तैसे सवार हो जाता है।‘’

'कला जीवन के लिए’ चंद्रकांत देवताले हमेशा इस विचारधारा के पक्षधर रहे। अपनी कविता, वक्तव्य और दीगर लेखन से उन्होंने इस विचार का प्रसार किया। समाज में व्याप्त दमन, अन्याय, असमानता के विरोध में उन्होंने कई कविताएं लिखीं। वे कहते थे कि कोई कवि और कविता समाज से निरपेक्ष होकर नहीं रह सकती। समाज में जो कुछ घट रहा है, उसका कला और कलाकार पर प्रभाव पड़ता है। उनका इस बारे में साफ मानना था कि ''एक और सच्चाई कि कविता कोई निरपेक्ष या स्वतंत्र प्रवस्तु तो नहीं। और कवि भी जीवन, समाज में असंपृक्त दिव्यलीन व्यक्तिमात्र नहीं। अर्थात् यही कि आम आदमी के सामने जो दमन, अन्याय, असमानता, शोषण और गरिमावंचित किए जाने की समस्याएँ हैं, वे ही आज कविता के समक्ष चुनौतियाँ हैं। कविता की चिंता धरती, जंगल, मनुष्य और 'सबार ऊपर मानष सत्य’ से जुदा नहीं। जिस तरह मनुष्य और मनुष्यता पेशा नहीं, उसी तरह कवि और कविताई भी नहीं। इसके लिए जनपक्षधरता, प्रतिबद्धता और विचारधारा से लैस होना कवि की नियति है। जब सौ मासूम मरते होंगे, तब एक कवि पैदा होता होगा।‘’ च्ंाद्रकांत देवताले एक सजग कवि थे। समाज और देश में जो भी कुछ घटता, उससे वह हमेशा संपृक्त रहते। अपनी कविताओं के माध्यम से मानव और समाज विरोधी प्रवृतियों को उजागर करते। भूमंडलीकरण और बाजारवाद के खतरों को पहचानते हुए उन्होंने लिखा था, ''हम जिस भूमंडलीकरण के बाजारवादी हड़कंप में खड़े हैं, यह देशीयता, स्थानिकता, बोली, भाषा और साहित्य विरोधी है। इतना ही नहीं अब तो विगत दो-ढाई दशकों में पर्यावरण की लूट के साथ करोड़ों हाशिए पर पड़े लोगों का चैन और उनकी नींद पर भी हमले हो रहे हैं। संगठित अपराधियों के झुंड के झुंड हम पर अनेक लिबासों, मुखौटों सहित हावी हैं।‘’  

 इक्यासी साल के लंबे अपने जीवन में चंद्रकांत देवताले के कई कविता संग्रह संग्रह आये, जिनमें प्रमुख हैं-'हड्डियों में छिपा ज्वर’ (1973), दीवारों पर खून से (1975), लकड़बग्घा हँस रहा है (1980), रोशनी के मैदान की तरफ (1982), भूखंड तप रहा है (1982), आग हर चीज में बताई गई थी (1987), पत्थर की बैंच (1996), इतनी रोशनी (2002), उसके सपने (1997), बदला बेहद महँगा सौदा (1995), उजाड़ में संग्रहालय (2003), जहां थोड़ा सा सूर्योदय होगा (2008), पत्थर फेंक रहा हूँ (2011)। इन कविता संग्रहों के अलावा 'मुक्तिबोध: कविता और जीवन विवेक’ उनकी आलोचनात्मक किताब है, जिसमें उन्होंने मुक्तिबोध की कविताओं की तर्कसंगत विवेचना की है। 'दूसरे-दूसरे आकाश’, 'डबरे पर सूरज का बिम्ब’ ऐसी दो किताबें हैं, जिनका उन्होंने सम्पादन किया। चंद्रकांत देवताले ने मध्यकाल के प्रमुख मराठी संत तुकाराम के अभंगों और आधुनिककाल के प्रमुख मराठी कवि दिलीप चित्रे की कविताओं का हिन्दी में शानदार अनुवाद भी किया था। सभी भारतीय भाषाओं और कई विदेशी भाषाओं में देवताले की कविताएं का अनुवाद हुआ। उन्होंने बर्तोल्त ब्रेख्त की कहानियों का नाट्य रूपांतरण भी किया, जो कि हाल में 'सुकरात का घाव’ और 'भूखण्ड तप रहा है’ के नाम से प्रकाशित हुआ। चंद्रकांत देवताले अपनी दीर्घ काव्य साधना के लिए कई सम्मान और पुरस्कारों से नवाजे गए। जिनमें प्रमुख सम्मान और पुरस्कार हैं- 'मुक्तिबोध फेलोशिप’, 'माखनलाल चतुर्वेदी कविता पुरस्कार’, मध्य प्रदेश शासन का 'शिखर सम्मान’, 'सृजन भारती सम्मान’, 'कविता समय पुरस्कार’, 'मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’, 'पहल सम्मान’। कविता संग्रह 'पत्थर फेंक रहा हूँ’ के लिए उन्हें साल 2012 का 'साहित्य अकादमी’ पुरस्कार भी मिला।

स्त्रियों पर चंद्रकांत देवताले ने कई अच्छी कविताएं लिखीं हैं। स्त्रियों के प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था, जो कि उनकी कविताओं में भी साफ  झलकता है। वे स्त्री को पुरुष के मुकाबले ज्यादा मजबूत मानते थे। उसे पुरुष के ऊपर रखते थे। अपनी एक कविता में वे स्त्री की जिजीविषा और उसका मानव जीवन में महत्व प्रतिपादित करते हुए लिखते हैं-''फिर भी/सिर्फ एक औरत को समझने के लिए/हजार साल की जिंदगी चाहिए मुझको/क्योंकि औरत सिर्फ  भाप या बसंत ही नहीं है/एक सिम्फनी भी है समूचे ब्रह्मांड की/जिसका दूध, दूब पर दौड़ते हुए बच्चे में/ खरगोश की तरह कुलांचे भरता है/और एक कंदरा भी है किसी अज्ञात इलाके में/जिसमें उसकी शोकमग्न परछाईं/दर्पण पर छाई गर्द को रगड़ती रहती है।‘’ हिंदी साहित्य में मां और बेटियों पर जो अच्छी और भावपूर्ण कविताएं लिखी गई हैं, उनमें चंद्रकांत देवताले की कविताएं भी शामिल हैं। कविता 'मां पर नहीं लिख सकता कविता’ में मां की ममता के प्रति वे अपने उद्गार व्यक्त करते हुुए लिखते हैं, ''मैंने धरती पर कविता लिखी है/चन्द्रमा को गिटार में बदला है/समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया/सूरज पर कभी भी कविता लिख दूँगा/माँ पर नहीं लिख सकता कविता।‘’ वहीं कविता 'यमराज की दिशाÓ में मां की मुहब्बत का और भी ज्यादा विस्तार करते हुए वे लिखते हैं, ''माँ की ईश्वर से मुलाकात हुई या नहीं/कहना मुश्किल है/पर वह जताती थी जैसे ईश्वर से उसकी बातचीत होते रहती है/और उससे प्राप्त सलाहों के अनुसार/जिंदगी जीने और दु:ख बर्दाश्त करने का रास्ता खोज लेती है/माँ ने एक बार मुझसे कहा था/दक्षिण की तरफ पैर कर के मत सोना/वह मृत्यु की दिशा है/ और यमराज को क्रुद्ध करना/बुद्धिमानी की बात नहीं है।‘’ वहीं बेटी को संबोधित करती उनकी कुछ प्रमुख भावनाप्रधान कविताएं हैं, 'पिता का प्रेम नहीं दिखता’, 'बेटी के घर से लौटना’, 'दो बेटियों का पिता’।      

चंद्रकांत देवताले एक विचारसंपन्न कवि थे। अपने समाज से उनका हमेशा जीवंत संपर्क रहा। कई राजनीतिक आंदोलनों और लेखक संगठनों से भी उनका गहरा संबंध रहा। समाज के सूक्ष्म पर्यवेक्षण की उनमें बड़ी खूबी थी। इंदौर में कम्युनिस्ट लीडर होमी दाजी के संपर्क में आकर एक बार उन्होंने समाजवाद का जो ककहरा सीखा, फिर इस विचार से उनका नाता कभी नहीं छूटा। आखिर तक वे इस विचार पर कायम रहे। उनका इस बारे में साफ  मानना था कि बिना किसी स्पष्ट जीवनदृष्टि के कोई व्यक्ति रचनाकार बन ही नहीं सकता। कर्मकांड, रूढि़वाद, यथास्थितिवाद, सम्प्रदायवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, साम्राज्यवाद जैसे विचारों का अपनी कविता में उन्होंने हमेशा विरोध किया। मानव जीवन की गरिमा के पक्ष में उनकी कविता हमेशा खड़ी रही। उनकी एक नहीं कई ऐसी कविताएं मिल जाएंगी, जो मानव को संघर्ष को लिए उकसाती हैं। ''मैं रास्ते भूलता हूँ/और इसीलिए नए रास्ते मिलते हैं/मैं अपनी नींद से निकल कर प्रवेश करता हूँ/किसी और की नींद में/इस तरह पुनर्जन्म होता रहता है/एक जिन्दगी में एक ही बार पैदा होना/और एक ही बार मरना/जिन लोगों को शोभा नहीं देता।‘’ ('पुनर्जन्म’) पंूजीवादी व्यवस्था और साम्राज्यवाद को देवताले मानवता का दुश्मन समझते थे। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश जब भारत के दौरे पर आए, तो वे चुप नहीं बैठे और अपनी कविता 'बुद्ध के देश में बुश’ के जरिए उन्होंने इस यात्रा का कड़ा प्रतिवाद किया। इस कविता में वे अमेरिका की साम्राज्यवादी नीति का तो विरोध करते ही हैं, बल्कि देश के सत्ता पक्ष और उन पूंजीवादी घरानों की भी भत्र्सना करते हैं, जो उनके लिए पलक-पांवड़े बिछाये बैठे हुए हैं। ''अपने खतरनाक इरादों से/दुनिया को तबाह करने वाला सौदागर/पता नहीं कौन-सा मुखौटा लगाकर/प्रवेश करेगा बुद्ध के जेतवन वाले देश में/उसके लिए स्वागत द्वार-बंदनवार/बनाने-लगाने में जुटे हैं/जो लार टपकाते सत्ता-पूँजी के/भूखे-खाए-अघाए मुट्ठी-भर लोग/उनकी उदारता दर्ज की जायेगी रक्तरंजित इतिहास में।‘’

चंद्रकांत देवताले ने देश की गुलामी, आजादी और बंटवारा देखा, तो आजादी के बाद इमरजेंसी, 1984 के सिख विरोधी दंगे और साल 2002 में गुजरात का नरसंहार भी देखा। देश में जब भी मानवविरोधी प्रवृतियां आकार लेतीं, उनका भावुक हृदय मचल जाता। सच को सच कहने में उन्होंने कभी गुरेज नहीं किया। न किसी के डर से उनकी कविता की आग ठंडी हुई। बल्कि ऐसे वक्त में उनकी कविताएं और भी ज्यादा मुखर हो जातीं। अपनी एक कविता में वे कहते हैं, ''मेरी किस्मत में यही अच्छा रहा/कि आग और गुस्से ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा/और मैंने उन लोगों पर यकीन नहीं किया/जो घृणित युद्ध में शामिल हैं/और सुभाषितों से रौंद रहे हैं/अजन्मी और नन्हीं खुशियों को।‘’ उनकी एक और कविता 'लकड़बग्घा हंस रहा है’  पढिय़े और महसूस कीजिए आज का समय.....''हत्यारे सिर्फ  मुअत्तिल आज/और घुस गए हैं न्याय की लंबी सुरंग में/वे कभी भी निकल सकते हैं/और किसी दूसरे मुकाम पर/तैनात खुद मुख्त्यार/कड़कड़ाते अस्पृश्य हड्डियों को/हंस सकते हैं अपनी स्वर्णिम हंसी/उनकी कल की हंसी के समर्थन में/अभी लकड़बग्घा हंस रहा है।‘’ इस कविता को लिखे हुए चार दशक होने को आये, लेकिन इसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। मौजूदा समय और माहौल पर कितनी सटीक बैठती है, यह कविता। अपने गठन और विचार के पैमाने पर यह कविता मुक्तिबोध की कालजयी कविता 'अंधेरे में’ से कम नहीं है। 'भूखंड तप रहा है’, 'पत्थर फेेंक रहा हूं’, 'दुनिया का सबसे गरीब आदमी’, 'सदी के अंत में कविता’ आदि कविताएं पढऩे से मालूूम चलता है कि वे किस पाए के कवि थे। उनके तर्इं मनुष्यता ही बुनियादी चीज है। कवि-कर्म एक सोद्देश्य प्रक्रिया है। इंसान, इंसान को जाने यही उनके कविता कर्म का उद्देश्य था।

चंद्रकांत देवताले साहित्य सृजन को अपना सौभाग्य नहीं मानते थे, बल्कि उनकी नजर में साहित्य सृजन एक 'सजा’ थी। सजा इस मायने में, ''साहित्य में बहुत ंंबेचैन ढंग से, तड़पते हुए अपनी बात की गवाही देना पड़ती है। अपने आपको खोदना पड़ता है और ये जो बेचैनी है, यह आदमी को चैन से जीने नहीं देती। कॉडवेल ने कहा था कि ''बेचैन होकर ही कोई आर्टिस्ट हो सकता है।‘’ मुक्तिबोध ने भी कहा था कि अपनी आत्मशांति को भंग किये बिना कोई कवि, कलाकार रचनाकार नहीं हो सकता।‘’ जाहिर है कि अंदर की ये बैचेनी ही थी, जिसने उन्हें कवि चंद्रकांत देवताले बनाया था। शोषणमुक्त समाज और एक बेहतर समाज का स्वप्न उन्हें सोने नहीं देता था। मानव जीवन और समाज की बेहतरी के लिए वे हमेशा बेचैन रहते थे। चंद्रकांत देवताले जैसे जनवादी कवि कभी इस दुनिया से जुदा नहीं होते, बल्कि अपनी कविताओं से हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहते हैं। देवताले जी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कविताएं हमें सदैव चन्द्रमा का उजास देती रहेंगी। अंधेरी रात में एक रास्ता दिखाएंगी, उनकी कविताएं। ''मैं आता रहूँगा उजली रातों में/ चन्द्रमा को गिटार सा बजाऊँगा/ तुम्हारे लिए/ और वसन्त के पूरे समय/ वसन्त को रूई की तरह धुनकता रहूँगा/ तुम्हारे लिए।‘’ (कविता 'मैं आता रहूँगा तुम्हारे लिए’) ।