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Saturday 18 Nov 2017

एक साहित्यिक की डायरी

गांधीवाद ने भावुक कर्म की प्रवृत्ति पर कुछ इस ढंग से जोर दिया है कि सप्रश्न बौद्धिक प्रवृत्ति दबा दी गई है। असल में यह गांधीवादी प्रवृत्ति, प्रश्न, विश्लेषण और निष्कर्ष की बौद्धिक क्रियाओं का अनादर करती है।

दूसरे शब्दों में, कला के तीसरे क्षण में सृजन-प्रक्रिया जोरों से गतिमान होती है। कलाकार को शब्द-साधना द्वारा नये-नये अर्थ-स्वप्न मिलने लगते हैं पुरानी फैण्टेसी अब अधिक सम्पन्न, समृद्ध और सार्वजनीन हो जाती है।

अगर वह कविता भावावेशपूर्ण होती तो एक बार उसकी आवेशात्मक अभिव्यक्ति हो जाने पर मेरी छुट्टी हो जाती। इसीलिए रिव्यू करना आग से खेल करना है।

मेरा अपना विचार है कि जिस भ्रष्टाचार, अवसरवादिता और अनाचार से आज हमारा समाज व्यथित है उसका सूत्रपात बुजुर्गों ने किया। स्वाधीनता-प्राप्ति के उपरांत भारत में दिल्ली से लेकर प्रांतीय राजधानियों तक भ्रष्टाचार और अवसरवादिता के जो दृश्य दिखाई दिये उनमें बुजुर्गों का बहुत बड़ा हाथ है। अगर हमारे बुजुर्गों पर नये तरुणों की श्रद्धा नहीं रही तो इसका कारण यह नहीं है कि वे अनास्थावादी हैं वरन् यह कि हमारे बुजुर्ग श्रद्धास्पद नहीं रहे।

यह नहीं कि आज का कथा-साहित्य अयथार्थवादी है। अथवा यथार्थ-विरोधी है; बल्कि यह है कि लेखक यथार्थ के नाम पर, अनुभूत यथार्थ (अपने जीवन के वास्तविक यथार्थ) से दूर निकलकर, किसी और के  यथार्थ से कहानियां और उपन्यास गढऩा चाहता है। मैं यह नहीं कहना चाहता कि हमारे लेखक के पास प्रतिभा नहीं है, बल्कि यह कहना चाहता हूं कि उसमें मानवीय अन्तरात्मा-मानवीय विवेक-चेतना- की हलचल मचाने वाली पीड़ा नहीं है; क्योंकि वह जरूरत से ज्यादा समझदार हो गया है, और समझदारी का यह तकाजा है कि जिस दुनिया में हम रहते हैं उससे हम समझौता करें।

आज के साहित्यकार का आयुष्य-क्रम क्या है? विद्यार्जन, डिग्री और इसी बीच साहित्यिक प्रयास, विवाह, घर, सोफासेट, ऐरिस्ट्रोक्रैटिक लिविंग, महानों से व्यक्तिगत संपर्क, श्रेष्ठ प्रकाशकों द्वारा अपनी पुस्तकों का प्रकाशन, सरकारी पुरस्कार अथवा ऐसी ही कोई विशेष उपलब्धि; और चालीसवें वर्ष के आसपास अमेरिका या रूस जाने की तैयारी; किसी व्यक्ति या संस्था की सहायता से अपनी कृतियों का अंग्रेजी या रूसी में अनुवाद; किसी बड़े भारी सेठ के यहां या सरकार के यहां ऊंचे किस्म की नौकरी!

किन्तु यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि आलोचना हमेशा तटस्थ और निष्पक्ष नहीं हुआ करती। यह बहुधा दृष्टि की बजाय मात्र एक भावावेश होती है, और दिल का कीमियागर उस भावावेश पर बनावटी आंखें जड़ देता है। उसकी कीमियागरी इतनी भयानक होती है कि वह हमारी सूरत बंदर-जैसी बना देती है जबकि हम खुद अपनी इस समझ की गिरफ्त में रहते हैं कि हमारा चेहरा बहुत खूबसूरत है। मतलब यह कि मेरा ख्याल है कि अंधी श्रद्धा से अंधी आलोचना एक भयंकर चीज है।

यह ख्याल बिलकुल गलत है कि आलोचना का संबंध बुद्धि से और श्रद्धा का हृदय से होता है। माक्र्सवाद पर लोगों की श्रद्धा हृदय से नहीं बुद्धि से उत्पन्न हुई है। और उसी माक्र्सवाद की बहुतेरी आलोचना अंधी भावना से प्रेरित हुई है। किन्तु इस सिलसिले में मैं यह भी कह दूं कि किसी भी व्यक्ति पर एकात्म श्रद्धा गलत है। चाहे वे अपने माता हों या पिता। पहले वे मनुष्य हैं, उनका अपना चरित्र है। इस चरित्र को देखने के लिए आवश्यक निर्मल तटस्थ भाव हममें चाहिए।

मर्मी आलोचना चाहे जितनी निष्पक्ष और बेलाग दिखाई दे। ऊपर से चाहे जितनी कठोर और खुरदरी हो, अंतत: उसमें एक बड़ी भारी श्रद्धा होती है, और यह कि मनुष्य में सुधार किया जा सकता है, यह कि मनुष्य अपनी सीमाओं और कमजोरियों के ऊपर उठ सकता है; वह ऊपर उठकर उस विशाल उच्चतर क्षेत्र का भागी हो सकता है जिसे हम संस्कृति, विज्ञान, साहित्य, या दर्शन अथवा अध्यात्म का क्षेत्र कहते हैं। यह श्रद्धा व्यक्ति-विशेष पर श्रद्धा नहीं है किन्तु उसके सुषुप्त या जाग्रत सामथ्र्य पर श्रद्धा है कि यदि वह चाहे तो अपने कंधों पर ही चढ़ सकता है। मतलब यह कि इस बुनियादी श्रद्धा के फलस्वरूप इतना सारा साहित्य लिखा गया है।

मैंने उससे कहा, इसीलिए कहता हूं कि हम आलोचना करते वक्त गलतियों के लिए कम से कम पच्चीस-तीस प्रतिशत हाशिया छोड़ दें- अगर हम 'हैं’ के बदले 'हो सकता है’, 'संभव है’, 'कदाचित् यह भी हो’, इस तौर से बात करें और मानवज्ञान और अपने स्वयं ज्ञान की साक्षात् सीमाएं प्रत्यक्ष ध्यान में रख उतना मार्जिन अपने को और दूसरोंं को प्रदान करें तो बहुतेरे हृदय-दाह समाप्त हो जायें और हार्दिक तथा वैचारिक आदान-प्रदान अधिक सुगम या सरल हो! क्या मैं गलत कह रहा हूं?

मेरा स्वभाव या सिद्धांत या प्रवृत्ति कुछ ऐसी है (मेरे ख्याल से जो शायद सही भी है) कि जो व्यक्ति साहित्यिक दुनिया से जितना दूर रहेगा, उसमें अच्छा साहित्यिक बनने की संभावना उतनी ही ज्यादा बढ़ जाएगी। साहित्य के लिए साहित्य से निर्वासन आवश्यक है।

यह भद्रता किसी कस्बे की नहीं है, वरन वह बड़ी राजधानियों के कुलीन भद्र बरामदों की सभ्यता के कॉम्पलेक्सेज शेअर करती है। ये बड़ी-बड़ी प्रांतीय राजधानियां अब दिल्ली-जैसे वल्र्ड-कैपिटल में समा रही हैं। कस्बे शहरों की तरफ खिंचते जा रहे हैं।

अभिरुचि के संस्कार का ठेका उन्होंने ही नहीं लिया है। अगर चाहो तो इसे तुम भी खूब अच्छा निखार सकते हो। किन्तु उनकी कलाकुशलता की उपेक्षा करना या उस पर अपना स्वयं का अधिकार न करना गलत है।

काव्य-सत्य भावना-प्रसूत है, परन्तु उस काव्य-सत्य का नैतिक उत्तरदायित्व है। हम उसे केवल काव्य सत्य कहकर नहीं टाल सकते। वह सत्य हमारे व्यक्तित्व से कुछ मांग करता है!

मैंने जवाब दिया, 'हां, वी शुड नॉट डेजर्ट अवर ओन क्लास।‘

मैं इतना सस्ता नहीं हूं। उन्होंने मुझ पर उपकार क्या किया, मेरी सारी जिन्दगी खरीदने की उन्होंने नैतिक क्षमता पा ली। उनकी यह अधिकार-भावना मुझे अत्यंत अविवेकपूर्ण मालूम होती है।

इसलिए पुराने सामंती अवशेष बड़े मजे में हमारे परिवारों में पड़े हुए हैं। पुराने के प्रति और नये के प्रति इस प्रकार एक बहुत भयानक अवसरवादी दृष्टि अपनाई गई है। इसीलिए सिर्फ एक सप्रश्नता है। प्रश्न है, वैज्ञानिक पद्धति का अवलम्बन करके उत्तर खोज निकालने की न जल्दी है, न तबीयत है, न कुछ। मैं मध्यमवर्गीय शिक्षित परिवारों की बात कर रहा हूं।

जो पुराना है, अब वह लौटकर आ नहीं सकता। लेकिन नये ने पुराने का स्थान नहीं लिया। धर्म-भावना गई, लेकिन वैज्ञानिक बुद्धि नहीं आई।